चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना

संपादकीय
21 दिसंबर 2016


नोटबंदी पर और कुछ न लिखने की कसम खाने के बाद भी हर तीसरे दिन तक इस मुद्दे पर लिखने को फिर इतना कुछ जुट जाता है, और वह देश के सबसे कमजोर तबके की जिंदगी पर इतनी बुरी तरह असर डालने वाला रहता है कि इस पर न लिखें, एक बार और न लिखें, तो अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं लगती। मोदी सरकार सदमे पर सदमे दिए चली जा रही है। दो दिन पहले यह फैसला आया कि पांच हजार रूपए से अधिक अगर कोई जमा करेंगे, तो बैंक के दो अफसर उनसे पूछताछ करेंगे, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग होगी, और उसके बाद जब बैंक संतुष्ट हो जाएगा कि अब तक यह रकम जमा क्यों नहीं की गई थी, तब जाकर इसे जमा किया जाएगा। पूरा देश मोदी के होर्डिंग और इश्तहार देखते आ रहा था कि लोग हड़बड़ी में बैंक या डाकघर न पहुंचें, क्योंकि तीस दिसंबर तक पुराने नोट जमा किए जा सकते हैं। अब जो लोग कतार में पूरे-पूरे दिन धक्के खाने के बजाय, और मरने के बजाय राह देखते रहे कि कब भीड़ छंटे, और कब वे अपने पुराने नोट जमा करने पहुंचें, तब तक यह नई रोक लगा दी गई। और आज दोपहर खबर आती है कि यह रोक हटा ली गई है, और लोग अब जितनी चाहे उतनी रकम जमा कर सकते हैं।
नोटबंदी के हर दिन बदलते हुए नियमों को देखते हुए यह हैरानी होती है कि केन्द्र सरकार के स्तर पर देश भर से पहुंचे हुए मंत्री और सांसद, और देश के सबसे काबिल माने जाने वाले अफसर, बैंकों के अनुभवी लोग, रहते हुए मोदी सरकार यह नहीं समझ पा रही है कि वह लोगों का विश्वास किस रफ्तार से खो रही है, किस रफ्तार से वह लोगों की जिंदगी को दिक्कतों से भर रही है। मजे की बात यह है कि देश के सबसे अधिक योजनाबद्ध तरीके से कॉलोनी जैसे बने हुए आधुनिक शहर चंडीगढ़ की म्युनिसिपल के कुछ लाख वोटरों के वार्ड चुनाव में जीत को देश भर में मोदी समर्थक नोटबंदी की जीत बता रहे हैं। इस शहर में अधिकतर लोग क्रेडिट या डेबिट कार्ड वाले, पढ़े-लिखे, शहरी, और अपेक्षाकृत खाते-पीते लोग हैं, और देश की आधी से अधिक गरीब-ग्रामीण आबादी की जिंदगी का ऐसी चंडीगढ़ी जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है। और अगर ऐसे चुनावी नतीजे को हवा का रूख माना जा रहा है, तो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार खुद भाजपा के लोगों की भावनाओं को नहीं देख रही है, और सोशल मीडिया पर लोगों का एक तबका, जो कि मोदीभक्त कहा जाता है, उसकी लिखी हुई बातों को वह देश की नब्ज मानकर चल रही है।
यह पूरा सिलसिला मोदी और भाजपा के लिए चाहे कितना ही नुकसानदेह और खतरनाक क्यों न हो, हम उसे लेकर अधिक फिक्रमंद नहीं हैं। हमारी फिक्र देश की उस अनगिनत गरीब जनता की है जो कि नोटबंदी के बाद से लगातार अपना कारोबार, अपनी रोजी-मजदूरी खो रही है, जगह-जगह कारखाने बंद हो रहे हैं, निर्माण बंद हो रहे हैं, और मजदूर अपने गांवों को लौटने के लिए मजबूर हैं। यह हकीकत मीडिया से होते हुए रात-दिन देश के सामने पहुंच रही है, और इसे अनदेखा करना भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही नुकसानदेह नौबत है। पिछले सवा महीने में इस देश में गरीबों की कमाई को जो धक्का लगा है, उससे उबरने में साल-छह महीने लगेंगे, और गरीब को निजी स्तर पर जो नुकसान हुआ है, उससे वे कभी नहीं उबर पाएंगे। जो सबसे गरीब हैं उनकी नुकसान सहने की क्षमता सबसे कम रहती है, और यह नौबत किसी ने सोची नहीं थी, और सरकार रोजाना इस नौबत को और मुश्किल बनाए दे रही है।
बाकी बातों को बार-बार यहां लिखकर दुहराना ठीक नहीं है, लेकिन एक पुरानी कहावत चली आ रही है जिसे मोदी के लिए दुहराया जाना चाहिए- चि_ी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें