मोदी के सामने दीर्घकालीन नीतियों की बड़ी चुनौती

संपादकीय
22 दिसंबर 2016


एक वक्त हिन्दुस्तान पर राज करने वाले ब्रिटेन से भारत की अर्थव्यवस्था की तुलना करते हुए एक रिपोर्ट आई है कि पहली बार भारत का जीडीपी ब्रिटेन को पछाड़ रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है और ब्रिटेन में यूरोपियन यूनियन को छोडऩे के बाद अब वहां आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। दो देशों के जीडीपी की तुलना महज आंकड़ों की तुलना होती है, न कि वहां के नागरिकों की आर्थिक स्थिति की। ब्रिटेन की आबादी बहुत कम है और वहां प्रति व्यक्ति आय भारत से बहुत अधिक है, लेकिन एक देश के रूप में अगर सकल घरेलू उत्पादन दूसरे देश के इस आंकड़े से आगे निकलता है, और यह रफ्तार जारी रहने का अंदाज भी है, तो यह कल के गुलाम, और आज तरक्की कर रहे एक देश में थोड़ी सी खुशी की वजह तो बनती है। एक दूसरे मोर्चे पर क्रिकेट है जिसमें भारत ने इंग्लैंड की टीम को बुरी तरह से हराया है और एक बड़ी खुशी खेल प्रेमियों को दी है।
भारत को इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि दुनिया की बहुत सी ऐसी अर्थव्यवस्थाएं रही हैं जो एक समय आसमान पर थीं, और वे बाद में जमीन पर आ गईं। भारत में विकास की रफ्तार मौजूदा सरकार की लाई हुई नहीं है, मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री रहते हुए भी जिस तरह के आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की थी, उससे गरीब और अमीर के बीच का फासला तो चाहे बढ़ गया था, लेकिन देश की कुल माली हालत बेहतर हुई थी। आज जब भारत नोटबंदी की वजह से रोजगार और कारोबार दोनों खो रहा है, और रिजर्व बैंक का अंदाज एक धीमी विकास दर का है, तब यह समझने की जरूरत है कि हर छोटी-छोटी कमाई मायने रखती है। अभी तक अंतरराष्ट्रीय बाजार से मोदी सरकार को लगातार बहुत सस्ते में पेट्रोलियम मिल रहा है। नतीजा यह हुआ है कि उस पर सरकारी टैक्स-शुल्क बढ़ाकर जनता को मिल सकने वाली राहत खुद सरकार ने रख ली, और अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का काम किया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार भारत के काबू से परे रहता है, और हो सकता है कि आगे चलकर यह तेल बड़ा महंगा हो जाए, और वह एक बात ही भारत सरकार और भारतीय जनता दोनों की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए काफी हो सकती है। एक दूसरी बात यह कि ब्रेक्सिट के फैसले के बाद ब्रिटेन बुरे हाल से गुजर रहा है,  और उससे जुड़े हुए भारत के रोजगार और कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। तीसरी बात यह कि अमरीका के अगले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जो रूख गैरअमरीकी कामगारों के बारे में हैं, तो उससे ऐसी आशंका है कि करीब 80 हजार हिन्दुस्तानी अमरीका में काम खो सकते हैं। डॉलर में कमाने वाले ये लोग वापिस अपने देश भी रकम भेजते हैं, और यह नुकसान खासा बड़ा हो सकता है। जो बात खबरों में अधिक नहीं रहती है, वह यह भी है कि सउदी अरब के दिन बहुत खराब चल रहे हैं, और वहां काम करने वाले हिन्दुस्तानी महीनों की मजदूरी पाए बिना किसी तरह हिन्दुस्तान लौट पा रहे हैं, और यह जाहिर है कि ऐसी हालत में वहां पर हिन्दुस्तानियों के और अधिक रोजगार पाने का मौका नहीं है, बल्कि वहां से लौटे हुए लोग इस देश में खाली बैठे रहेंगे।
इसलिए भारत को आज न केवल देश के भीतर, बल्कि बाकी दुनिया के रोजगार और कारोबार के बाजार में अपनी संभावनाओं को लगातार बढ़ाना होगा। भारत के पास जो मौलिक खूबियां हैं, उनमें बड़ी संख्या में कामगार हैं, यहां पर खूब सौर ऊर्जा हो सकती है, यहां पर खूब बंदरगाह हैं, यहां लोहे और कोयले जैसे कई खनिजों के बड़े भंडार हैं, और यह अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कई देशों के बीच पड़ता है। आज देश की ऐसी दीर्घकालीन नीतियों की जरूरत है जो कि भारत की इन खूबियों को इस्तेमाल करके कारोबार और रोजगार दोनों पैदा करे। आज नोटबंदी और उसके बाद के दौर में भारत एक बड़ी उथल-पुथल से गुजर रहा है। पहली नजर में नोटबंदी के नुकसान ही नुकसान दिख रहे हैं, और कालेधन का कोई पता नहीं चल रहा है। अब इस दौर से जूझते हुए आगे दूर तक की सड़क तय करना आसान भी नहीं है, लेकिन मोदी सरकार के पास कोई भी लंबी नीतियां बनाने के लिए कुछ महीनों का ही वक्त है, और उसके बाद उन पर अमल शुरू करने के लिए अधिक से अधिक दो बरस हैं। ऐसे वक्त में एक दिक्कत यह भी रहती है कि मतदाताओं को सीधे खुश करने वाले फैसले लिए जाएं, न कि चुनाव के बरसों बाद तक की सोची जाए। ये दोनों बातें इस सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है, और देखना यह है कि मोदी क्या फैसले लेते हैं।

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