खेल के मामले में भारत है सतही और औसत दर्जे का

संपादकीय
23 दिसंबर 2016


भारत के एक दिग्गज गोल्फ खिलाड़ी एसएसपी चौरसिया ने कहा है कि उन्हें खेल मंत्रालय द्वारा रियो ओलंपिक पर उनके खर्च के 30 लाख रूपए अभी तक नहीं दिए हैं। इस रकम की मंजूरी उन्हें पहले भी मिल चुकी थी, लेकिन महीनों गुजर जाने पर भी यह भुगतान नहीं किया गया है, और ओलंपिक निपट जाने के बाद खेल मंत्रालय ने लिखित वायदे की अपनी चि_ी से मुकरते हुए इस रकम को घटाकर आधा कर दिया, और आज तक उसमें से चौरसिया को कुल साढ़े 5 लाख रूपए ही दिए गए हैं। खेल संघ और मंत्रालय के अपने कड़वे अनुभव गिनाते हुए इस खिलाड़ी ने कहा कि न तो रियो ओलंपिक में खिलाडिय़ों के लिए गाड़ी का इंतजाम किया गया, और न ही ठंड और बारिश में छाते या रेनकोट तक का इंतजाम हुआ। उन्होंने कहा कि मंत्रालय और खेल संघ के अधिकारी ऐसा बर्ताव करते थे जैसे वे मालिक हों, और खिलाड़ी उनके नौकर हों।
यह हाल पूरे देश में, अधिकतर प्रदेशों में, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अधिकतर जिलों में भी देखने मिलता है जहां खेल संघों पर सत्ता और राजनीति से जुड़े हुए, नेता-अफसर और कारोबारी काबिज हैं, और उनकी पसंद खिलाडिय़ों को चुनने से लेकर उनको सहूलियतें दिलाने तक हर जगह हावी रहती हैं। ओलंपिक में गए हुए कई खिलाड़ी पहले भी यह कह चुके हैं कि भारत से रियो तक का एक-डेढ़ दिन का सफर उन्होंने इकॉनामी क्लास की तंग सीटों पर तय किया, और खेल संघों के पदाधिकारी और मंत्रालय के अफसर महंगी क्लास की आरामदेह सीटों पर गए। ऐसा कहने वाले कई खिलाड़ी रहे, और दूसरी तरफ भारत के खेल मंत्री ने रियो में जाकर जो शर्मनाक बर्ताव किया था, उसके चलते स्थानीय आयोजकों ने भारत के प्रतिनिधि मंडल को लिखित नोटिस भी दिया था।
आज चीन, रूस, अमरीका जैसे देश अगर ओलंपिक से किलो-किलो सोना-चांदी ले जाते हैं, और भारत जैसा सवा अरब की आबादी का देश इक्का-दुक्का मैडल को देश का गौरव मानकर लौटता है, तो उसके पीछे भारत के यह सरकारी रवैया, और खेल संघों की राजनीति है जिनके चलते खिलाड़ी खड़े ही नहीं हो पाते। दूसरी बात यह कि हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से यह देखते हैं कि किस तरह स्कूलों से ही खेल के सामान की खरीदी में भारी भ्रष्टाचार चलता है, शहरों के मैदान सिमटते जा रहे हैं, और राज्य सरकार अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम को, उनमें साल में एक-दो बड़े सितारा-मैचों को प्रदेश में खेल का विकास मानकर बैठी रहती है। स्कूल और कॉलेज के बच्चे मुकाबलों में आने-जाने के लिए बिना सीट पाए सफर करते हैं, दरियों पर सोते हैं, और अभावों में खेल की, मुकाबले की तैयारी करते हैं। प्रदेश में एक के बाद एक, अलग-अलग शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम प्रदेश का खेल विकास बताया जाता है, जबकि बच्चों के रोज के खेलने के मैदान घटते जा रहे हैं, शहरों में खेल के मैदानों पर साल भर बाजार की प्रदर्शनियों से लेकर ऑटो और हाउसिंग मेले लगे रहते हैं, राजनीतिक और धार्मिक प्रवचन चलते रहते हैं, और गड्ढों सहित छोड़े गए मैदान बीच-बीच में कुछ दिन मैदान गिन लिए जाते हैं।
भारत के खेल के माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इसे ओलंपिक में और अधिक मैडल मिलें या दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में इसके खिलाड़ी मैडल लेकर आएं। आज इक्का-दुक्का मैडल जो आते हैं, वे सरकार और खेल संघों की वजह से नहीं आते हैं, उनके बावजूद आते हैं, और खिलाडिय़ों की यह उपलब्धि छोटी नहीं है। बहुत से लोग यह कहते भी हैं कि भारत को ओलंपिक से कुछ बरसों के लिए हट जाना चाहिए क्योंकि सौ खेलों की तैयारी करके जाने वाले खिलाड़ी आधा दर्जन मैडल भी नहीं ला पाते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान जिस तरह बाकी तमाम बातों में भी बहुत सतही और औसत दर्जे के काम वाला देश है, वही हाल खेल के मामले में भी है। 

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