कुपोषण के शिकार, भूखे बच्चों को नेताओं के अहंकार के लिए मुंह का कौर दान देना ही होगा

संपादकीय
24 दिसंबर 2016


महाराष्ट्र में आज सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां के मराठा शासक रहे छत्रपति शिवाजी की एक विशाल प्रतिमा बनाने का काम शुरू किया। यह प्रतिमा साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक लागत से बनने जा रही है, और भारत की सरकारी योजनाओं का जो आम हाल रहता है वह अगर इस योजना के साथ हुआ तो हो सकता है कि यह लागत बढ़कर डेढ़-दो गुना भी हो जाए। फिलहाल मुंबई के समंदर के पानी के बीच शिवाजी का यह स्मारक कुछ ऐसा बनने जा रहा है कि वह गुजरात में बनने जा रही सरदार पटेल की प्रतिमा से भी ऊंचा रहेगा।
महाराष्ट्र में मराठा समुदाय एक बड़ी राजनीतिक ताकत माना जाता है, और प्रदेश की राजनीति में कोई भी राजनीतिक दल न इस तबके को अनदेखा कर सकता है, और न ही महाराष्ट्र में क्षेत्रीय स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक छत्रपति शिवाजी को अनदेखा कर सकता है। यही वजह है कि मुंबई का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन, और मुंबई का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ये दोनों ही छत्रपति शिवाजी के नाम पर हैं, और अब यह देश का सबसे महंगा, सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा स्मारक भी उन्हीं के नाम पर बन रहा है। इस मौके पर बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया पर यह ऑनलाईन अभियान छेड़ा है कि सरकार को इतनी बड़ी फिजूलखर्ची से रोका जाए, और कहा जाए कि यह रकम महाराष्ट्र के आत्महत्या करते किसानों की मदद पर खर्च की जाए, या महाराष्ट्र के कुपोषण से मरते आदिवासी बच्चों पर खर्च की जाए, या शिवाजी के बनवाए हुए बहुत से किले खंडहर हो रहे हैं, उनकी मरम्मत करवाई जाए। एक मुद्दा यह भी है कि समंदर में जिस जगह यह स्मारक बनाया जा रहा है उससे समुद्री पर्यावरण और वहां के जीवों पर भी बड़ा बुरा असर पड़ेगा, इसलिए भी पानी के भीतर ऐसा स्मारक न बनाया जाए।
लेकिन दुनिया का इतिहास है कि स्मारकों के बिना शासकों का काम चलता नहीं है। चाहे वे दूसरे देशों पर हमला करने वाले मुगल शासक रहे हों, या आपातकाल में इस देश पर राज करने वाला संजय गांधी रहा हो, इन सबके लिए दुनिया भर में स्मारक बनते ही हैं। संजय गांधी न तो किसी भी संवैधानिक पद पर थे, और न ही देश के लिए उनका जुल्म के अलावा कोई योगदान था, इसके बावजूद दिल्ली में उनके लिए एक बड़ा स्मारक बनाया गया, और नेहरू-गांधी परिवार एक ऐसी परंपरा शुरू की, जिसकी मिसाल दे-देकर अब देश के किसी भी मुजरिम के नाम पर भी स्मारक बनाया जा सकता है। संजय गांधी लोकतंत्र में एक खलनायक के अलावा कुछ नहीं रहे, और इंदिरा गांधी के पतन की सबसे बड़ी वजह भी वही रहे, जब उनके नाम पर देश की राजधानी में कई एकड़ जमीन पर स्मारक बन सकता है, तो फिर आपातकाल के बाकी खलनायकों के नाम पर भी बन सकता है।
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में जिंदा मायावती ने अंबेडकर, कांशीराम, और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं लगवाकर भी लाखों करोड़ की जमीन पर हजार करोड़ की लागत से स्मारक बनवाकर एक नई परंपरा शुरू की। और हमारा ख्याल है कि सरदार पटेल और शिवाजी की आसमान छूती ऐसी प्रतिमाओं के बाद अब तमिलनाडू में जयललिता की पार्टी इस स्वाभाविक मानसिक दबाव में आ जाएगी कि चेन्नई के समंदर में वह इन दोनों स्मारकों से अधिक ऊंचा स्मारक जयललिता का बनवाए, और हमारा ख्याल है कि कुछ महीनों के भीतर ही ऐसी घोषणा सामने आ जाएगी। हो सकता है कि आज जब प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की खबर चेन्नई में देखी जा रही हो, तब यह फैसला लिया भी जा चुका होगा।
यह देश मूर्तिपूजकों का देश है, और इस देश के नेता अपने कुनबे और अपने बड़े नेताओं की प्रतिमाओं को बनाना अपनी राजनीतिक कामयाबी मानते हैं। यहां की सड़कें गड्ढों से भरी रहें, लेकिन वहां पर प्रतिमाओं को लगाना राजनीतिक प्रतिष्ठा और जनता के संतुष्टिकरण का मामला रहता है। ऐसी प्रतिमाएं जिन लोगों की रहती हैं, उन्होंने अगर महानता की कुछ बातें कही भी हों, तो उन बातों पर अमल के बजाय उन लोगों की प्रतिमाओं को बनाने पर भारतीय लोकतंत्र का अधिक भरोसा है। ऐसे में इस देश के भूखे और कुपोषण के शिकार बच्चों को अपने मुंह का कौर दान देना ही होगा ताकि नेताओं का अहंकार पूरा हो सके। 

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