सुशासन की गारंटी के लिए रिटायर्ड अफसरों की नहीं, मुसद्दीलालों की जरूरत

संपादकीय
25 दिसंबर 2016


भारत में भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए उनके जन्मदिन, 25 दिसंबर, क्रिसमस पर सुशासन दिवस मनाया जाता है। इसे 2014 में शुरू किया गया, और आज ऐसा तीसरा दिवस रहा। छत्तीसगढ़ सहित देश के शायद सभी राज्यों मेें इसे मनाया गया, और जाहिर है कि बेहतर सरकार, बेहतर शासन, और बेहतर प्रशासन की जरूरत लोकतंत्र में हमेशा ही बनी रहेगी जिसमें कि सुधार की गुंजाइश रहती ही रहती है। अब इसी सिलसिले में देखें तो छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सुधार आयोग पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के वक्त भी बनाया गया था, और एक ऐसे ताजा-ताजा रिटायर हुए मुख्य सचिव अरूण कुमार को उसका मुखिया बनाया गया था जो कि सरकारी नौकरी में रहते हुए भी कोई काम न करने के लिए जाने जाते थे। जानकार लोगों को पता है कि वे रिटायर होने के बाद किसी तरह का पुनर्वास चाहते थे, और यह कुर्सी और उससे जुड़ी सहूलियतें पाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री और उनके सचिव का जीना हराम कर दिया था। आखिर में उनसे छुटकारा पाने के लिए उन्हें वह कुर्सी दी गई थी।  जो काम न करने के लिए बदनाम रहा हो, उसे सरकार ने यह काम दे दिया कि काम बेहतर कैसे किया जाए!
दूसरी तरफ मौजूदा रमन सरकार ने कुछ समय पहले इस आयोग की कुर्सी पर एक दूसरे भूतपूर्व मुख्य सचिव सुयोग्य कुमार मिश्र को बिठाया, जो अपने कार्यकाल में सुयोग्य माने जाते रहे, और उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे सरकारी कामकाज को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन हमारा सवाल यह है कि जो लोग एक ही प्रदेश में रहते हुए दशकों लंबी अपनी नौकरी सरकारी सेवा में गुजारते हैं, क्या उनके पास ऐसा कुछ नया तिलस्म छुपा रहता है कि वे प्रशासन में कोई ऐसा सुधार कर दिखाएं जो कि वे मुख्य सचिव रहते हुए भी नहीं दिखा पाए थे? अगर प्रशासन में सुधार की कोई संभावना या गुंजाइश उन्हें सूझती, तो उसका इस्तेमाल तो उन्हें प्रशासन का मुखिया रहते हुए कर ही लेना था। लेकिन उस वक्त कुछ न करने वाले, या दूसरे नजरिए से देखें, तो सब कुछ कर लेने वाले लोगों को अब क्या सोचकर ऐसी कुर्सियों पर बिठाया जाता है?
लेकिन प्रशासनिक सुधार से जुड़ी कुछ और कुर्सियां भी हैं। राज्य और केन्द्र में सूचना आयोग तो एक संवैधानिक संस्था है, और यह संस्था जनता के सरकार से सूचना पाने के हक की गारंटी करने के लिए बनाई गई है। लेकिन परंपरागत रूप से पूरे देश में इस आयोग की कुर्सियों पर रिटायर्ड अफसरों को ही बिठाया जाता है, जिनकी सारी नौकरी इस संस्कृति में काम करते हुए गुजरती है कि किस तरह जानकारी को जनता से, विधानसभा से, संसद से, यथासंभव छुपाकर रखा जाए। जो लोग पूरी जिंदगी जानकारी की गोपनीयता की शपथ लेकर काम करते आए हैं, उन लोगों को इस बिल्कुल नए ताजा लोकतांत्रिक हथियार के इस्तेमाल की गारंटी का जिम्मा दे देना निहायत ही नासमझी का इंतजाम है, लेकिन यह पूरे देश में चल रही व्यवस्था है। कुछ ऐसा ही एक दूसरा आयोग मानवाधिकार आयोग है जिसमें आमतौर पर पुलिस के जुल्म के खिलाफ शिकायतें पहुंचती हैं। लेकिन इसकी कुर्सी पर भी रिटायर्ड पुलिस वालों को बिठाने का सिलसिला पूरे देश में है, और उनका नजरिया जिंदगी भर वर्दी का काम करते हुए वर्दी को बचाना रह जाता है। सरकार की ऐसी कई संवैधानिक कुर्सियां हैं जिन पर अगर संविधान की भावना की इज्जत करते हुए लोगों को मनोनीत करना है, तो वहां पर राजनीति से परे के, सरकार से परे के, सार्वजनिक जीवन के ऐसे लोगों को रखा जाना चाहिए जो कि न कल सरकार से उपकृत थे, न आज रहेंगे, और न कल उपकार चाहेंगे। अगर इस नजरिए से संवैधानिक सुधार और निगरानी की कुर्सियां भरी जाएंगी, तो अपने आप सुशासन आने लगेगा। लेकिन सरकारों की नीयत समारोह की जरूर रहती है, बुनियादी सुधार की नहीं रहती, क्योंकि उससे बेकाबू दिक्कतें ही दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं।
हमारा मानना है कि किसी भी राज्य को अगर सचमुच प्रशासनिक सुधार करना है, तो उसे ऐसे आयोग को मौजूदा या रिटायर अफसरों से परे रखना होगा। ऐसे आयोगों में जनता के बीच से ऐसे लोगों को लाना होगा जिनका सरकार के साथ लंबा वास्ता पड़ते रहा हो, जो सरकारी काम को बाहर से देखते रहे हों, और दुख भोगते रहे हों। लोगों को याद होगा कि टीवी पर एक सीरियल आता था जो सरकारी दफ्तरों की मनमानी को दिखाता था, और उसमें मुसद्दीलाल नाम का एक आम नागरिक धक्के खाते रहता था। आज प्रशासनिक सुधार या दूसरे संवैधानिक आयोगों में ऐसे सीरियल के सरकारी अधिकारियों को बिठा दिया गया है, जबकि जरूरत मुसद्दीलालों को बिठाने की है। 

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