ताकतवर को उसी जुर्म के लिए कमजोर से अधिक सजा मिले

संपादकीय
26 दिसंबर 2016


हर दिन देश में कहीं न कहीं से खबर आती है कि बैंकों में किस तरह किसी गरीब के जन-धन खाते में करोड़ों रूपए जमा हो गए। अब मेरठ की ताजा खबर यह है कि एक महिला के खाते में सौ करोड़ रूपए आ गए, और उसने दहशत में प्रधानमंत्री को इसकी खबर भेजी है। चारों तरफ से कई निजी और सरकारी बैंकों में संगठित जालसाजी की खबरें भी आ रही हैं और दो-चार मामलों में बैंक अफसर गिरफ्तार भी हुए हैं। और बैंकों के कागजात में दर्ज इस पूरी धांधली से परे भी चारों तरफ से खबरें आती हैं कि किस तरह करोड़ों के नोट एक-एक जगह से मिल रहे हैं, और कैसे कुछ कारोबारी पुराने नोटों को नए नोटों में बदलने का ही धंधा कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि जिस नोटबंदी को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती की तरह शुरू किया है, वह किस बुरी तरह धोखाधड़ी और जालसाजी का शिकार हो रही है। और देश के मौजूदा कानून अगर बाकी जुर्म की तरह ही इसको भी निपटाएंगे, तो हो सकता है कि इसमें बरसों लग जाएं।
आज देश में जरूरत दो अलग-अलग किस्म के कानूनों की है। हम पहले भी कई मामलों में यह लिख चुके हैं कि देश में संपन्नता के आधार पर दो अलग-अलग तरह के कानूनों की जरूरत है। एक जालसाजी जिसमें कोई ताकतवर किसी गरीब के खिलाफ साजिश करे, तो उसे अधिक सजा देनी चाहिए। जब ताकतवर किसी ताकतवर के खिलाफ जुर्म करे तो उन दोनों को तो आपस में निपटने की सहूलियत रहती है, और दोनों ही अदालतों का अपनी मर्जी और ताकत से बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं, और जुर्म के बाद भी बच भी सकते हैं। लेकिन जब गरीब के खिलाफ कोई साजिश कोई ताकतवर करते हैं तो गरीब के पास बचने का कोई रास्ता नहीं होगा। देश में कानून बदलकर ताकतवर तबके को अधिक सजा का हकदार बनाने का वक्त आ चुका है। हमारा मानना है कि आर्थिक संपन्नता, राजनीतिक या प्रशासनिक, संवैधानिक ओहदों का दर्जा देखते हुए ताकत का एक पैमाना तय होना चाहिए। और उसी अनुपात में सजा का पैमाना बनना चाहिए। जो जितना अधिक ताकतवर हो, उसे उतनी ही अधिक सजा मिले। ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि गरीब तो कभी किसी बेबसी या मजबूरी में किसी जुर्म में फंस सकते हैं, लेकिन ताकतवर के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती।
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी को लेकर हर दिन नियम-कायदे बदल रहे हैं, और अब बात उनकी इज्जत पर बन आई है, नोटबंदी के साथ-साथ वे बेनामी संपत्ति को लेकर भी कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं, इंकम टैक्स जैैसे विभाग एक बार फिर पूरी ताकत से कालेधन की तलाश में लोगों के कारोबार में पहुंच रहे हैं, यह सही समय है जब कानून में ऐसे बदलाव की पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को करनी चाहिए, यह उनका एक ऐसा सामाजिक समानता का कदम होगा, जो कि लंबे समय तक याद रखा जाएगा, और हो सकता है कि नोटबंदी की नाकामयाबी से उबरने में भी उन्हें मदद करेगा। इसके लिए संविधान में एक बड़े संशोधन की जरूरत पड़ेगी, और यह काम किया जाना चाहिए, बिना देर किए हुए। 

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