सामान सौ बरस का, कल की खबर नहीं

संपादकीय
28 दिसंबर 2016


भारतीय ओलंपिक संघ की कल हुई आमसभा में भ्रष्टाचार के दो आरोपियों को आजीवन संरक्षक और अध्यक्ष चुन लिया गया। अब तक राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के कटघरे में खड़े हुए सुरेश कलमाड़ी को आजीवन संरक्षक और राजनीति में भ्रष्टाचार के लिए जानी जाने वाली परंपरा के अभय चौटाला को आजीवन अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है कि खेलों की दुर्गति और अधिक होगी, और संभावनाएं खत्म होती चलेंगी। लेकिन हमने खेल संघों में अफसरों और पदाधिकारियों के कब्जे से होने वाले नुकसान के बारे में दो-चार दिन पहले ही लिखा है, इसलिए आज उन पहलुओं पर लिखने के बजाय एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में किस तरह लोग अपने आपको सार्वजनिक ओहदों पर आजीवन बनाए रखने की बेशर्मी दिखाते हैं।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पहले इसी जगह अविभाजित मध्यप्रदेश के एक संवेदनशील कहे जाने वाले मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बारे में लिखा था कि किस तरह उन्होंने कला और संस्कृति के एक राष्ट्रीय केन्द्र, भारत भवन, को बनाकर अपने आपको उसका आजीवन ट्रस्टी बना लिया था। जनता के पैसों से जो संस्थान बनते हैं, या कि जो सार्वजनिक जीवन के संस्थान होते हैं, उनमें आजीवन भला क्या हो सकता है, और क्यों होना चाहिए? किसी भी इंसान को ऐसी खुशफहमी में क्यों रहना चाहिए कि वे मरने तक किसी जगह का भला कर सकते हैं, और उनकी जगह कोई और काबिल आ ही नहीं सकते? कई लोग ऐसे रहते हैं जो अपने जीते जी अपने कब्जे के संगठनों या ट्रस्ट-संस्थानों पर अपनी कुर्सी अपने ही औलादों को देकर समाज पर एक एहसान सा करके जाते हैं। राजनीति में लोग अपनी चुनावी सीट को अपने बाद अपनी औलाद को देते आए ही हैं, और इंदिरा गांधी गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह के लिए नाहक ही बदनाम होती रहीं कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा।
भारत में किसी भी संस्था के पद पर ऐसे लोगों के चुनाव लडऩे या मनोनीत होने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए जो कि अदालतों में आपराधिक मुकदमे झेल रहे हैं। और भारतीय ओलंपिक संघ के इस ताजा मामले से यह भी समझ आता है कि भारत के खेल संघों पर किस तरह के लोग किस हद तक हावी हैं, और इस पर भी रोक लगनी चाहिए। हमारा मानना है कि अमरीका के राष्ट्रपति जिस तरह चार-चार बरस के दो कार्यकाल के बाद किसी भी सरकारी ओहदे पर नहीं रह सकते, उसी तरह भारत में भी कम से कम सार्वजनिक पदों के लिए तो यह होना ही चाहिए। और अगर यह भी हो जाए कि कोई व्यक्ति किसी विधानसभा या लोकसभा, या राज्यसभा में दो कार्यकाल से अधिक के लिए निर्वाचित या मनोनीत नहीं हो सकेंगे, तो भी भारत की राजनीति का बहुत भला हो सकता है।
अपने आपको किसी पद पर आजीवन देखना एक बहुत सामंती सोच है। लोगों को अपने आने वाले कल की खबर नहीं होती कि वे इज्जत की किसी कुर्सी पर होंगे, या कि जेल में होंगे, और वे अपने आपको आजीवन मनोनीत करवा लेते हैं। किसी समझदार ने एक वक्त लिखा था- सामान सौ बरस का, कल की खबर नहीं।
जिन लोगों को कल और जेल का अंदाज न हो, वे भी अपने आपको सौ बरस के लिए कुर्सी पर बांधकर उस पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर धिक्कार के सिवाय और क्या किया जा सकता है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें