कांग्रेस की कमसमझी और यादवी लठैती से निराशा...

संपादकीय
29 दिसंबर 2016


ढाई बरस बाद के अगले आम चुनाव में मोदी के खिलाफ गैरभाजपा, गैरएनडीए दलों का एक मोर्चा बनाने की लोगों की हसरत फिलहाल तो कुछ उसी तरह कमजोर दिख रही है जिस तरह नोटबंदी से कालेधन पर काबू की हसरत कमजोर साबित हुई है। इसकी एक वजह यह है कि कोई दो बरस पहले जब मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में एक विपक्षी मोर्चा ऐसा बन रहा था जिसमें नीतीश और लालू सभी शामिल थे, और फिर वह बनते-बनते टूट भी गया। और आज उत्तरप्रदेश से जो खबरें आ रही हैं, उनमें एक तरफ तो मुलायम सिंह यादव माईक पर यह मुनादी कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी का किसी दूसरी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं होगा, और दूसरी तरफ वे अपने कुनबे के भीतर चल रही यादवी-लठैती से सिर बचाकर किसी तरह अब तक तो कायम हैं, आने वाले हफ्तों में उनका, उनकी पार्टी का, और उनके कुनबे का क्या होगा, इसे कोई भविष्यवक्ता ही बता सकते हैं।
उत्तरप्रदेश के चुनाव एक तरफ तो मायावती की बसपा को किसी भी तरह के भावी गठबंधन से दूर करते चल रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इन दोनों से उनकी मौजूदा बढ़ती हुई कटुता आगे चलकर एक साथ आने को नामुमकिन सा कर रही है। दूसरी तरफ अगर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, और बसपा सब अकेले-अकेले मैदान में रहते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी या एनडीए के लिए चुनावी मोर्चा अपेक्षाकृत आसान रह सकता है, हालांकि चुनावी नतीजे पर अटकलबाजी लगाना, नोटबंदी की इस आंधी के बीच समझदारी नहीं होगी।
लेकिन भाजपा-एनडीए के विरोध में किसी मोर्चे के बनने के आसार बन नहीं पाते हैं, और बिगड़ जाते हैं। नोटबंदी पर संसद के भीतर और बाहर एक मोर्चा बनते दिख रहा था, और शायद राहुल गांधी को अपने राजनीतिक जीवन में दूसरी पार्टियों का सबसे बड़ा साथ भी मिलते दिख रहा था, कि उन्होंने महज कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल मोदी तक ले जाकर विपक्षी एकता की संभावना को खत्म सा कर दिया। यह महज राहुल गांधी की नासमझी या कमसमझी का मामला नहीं था, यह कांग्रेस पार्टी की एक रणनीतिक चूक थी कि वे बाकी पूरे वक्त विपक्ष के साथ मिलकर विरोध पर तालमेल बनाए, लेकिन किसानों का नाम लेकर मोदी से अकेले मिल आएं। नतीजा यह हुआ कि चतुर नरेन्द्र मोदी ने तुरंत राहुल गांधी से कहा कि वे मिलते रहा करें, और यह एक लाईन अखबारी सुर्खी बनकर विपक्ष को फिर तितिर-बितिर कर गई।
हालांकि एक दूसरी बात यह भी है कि आम चुनावों के वक्त मोदी विरोधी एक मोर्चे के बनने की नौबत आने में खासा वक्त बाकी है, और कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना रहता है कि मौके की मजबूरी बहुत से मेंढकों को तराजू के एक पलड़े पर एक साथ बैठने के लिए मजबूर भी कर देती है, और आपातकाल की जनता पार्टी से लेकर यूपीए और एनडीए तक बहुत से ऐसे सुबूत भी हैं कि मौका आने पर एक लीडर के सामने आने में भी वक्त नहीं लगता, और उसके इर्द-गिर्द दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं को जुटने में भी वक्त नहीं लगता। लोगों को याद होगा कि राजीव गांधी की सरकार छोड़कर निकले वी.पी.सिंह एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने इतिहास को बदलकर रख दिया था। लेकिन भारत का ऐसा कोई भी गठबंधन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बिना बनना थोड़ा मुश्किल होगा, और कांग्रेस की कमसमझी और सपा की घरेलू लाठीबाजी भाजपा की खुशी बढ़ाने के अलावा और किसी काम की नहीं दिख रही हैं। यहां पर बिहार के मुख्यमंत्री और अगले एक संभावित प्रधानमंत्री-प्रत्याशी समझे जाने वाले नीतीश कुमार की चर्चा भी जरूरी है कि किस तरह बिना किसी वजह के उन्होंने नोटबंदी की तारीफ करके गैरभाजपाई पार्टियों को निराश कर दिया, जबकि उस वक्त नोटबंदी के मुद्दे पर खुद भाजपा के भीतर लोग गहरे संदेह से भरे हुए थे, और आज पचासवें दिन नोटबंदी पूरी तरह फ्लॉप शो साबित हो चुकी है, तो नीतीश कुमार के पास अब बोलने को कुछ नहीं है। भारत की चुनावी राजनीति में अब भाजपा-एनडीए का विरोध कतरा-कतरा में नहीं हो सकता, भाजपा विरोधी पार्टियों को, और उनके नेताओं को इन ढाई बरसों में शतरंज के ढाई घर की तरह की समझदारी की चाल चलनी होगी, वरना अगला चुनाव भी मोदी विरोधियों के लिए आसान नहीं होगा।

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