जाते हुए राष्ट्रपति ओबामा के कुछ आखिरी फैसले

संपादकीय
30 दिसंबर 2016


अमरीका में इन दिनों एक दिलचस्प टकराव चल रहा है। दो कार्यकाल पूरे करने के बाद जा रहे डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ने निर्वाचित रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चुनावी नतीजे आने के तुरंत बाद राष्ट्रपति भवन न्यौता देकर उनके साथ लंबी बात की थी, और दोनों की मौजूदगी में ओबामा ने मीडिया से कहा था कि वे बहुत अच्छे तरीके से सत्ता का यह हस्तांतरण करना चाहते हैं, और उनकी टीम ट्रम्प के सहयोगियों के साथ मिलकर यह काम करेगी। नतीजे आने के करीब चालीस दिन बाद राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण होता है जिसे अमरीकी जुबान में इनॉगरेशन कहते हैं। यह बीस जनवरी को होना है, लेकिन इस बीच ऐसा लगता है कि मौजूदा और अगले राष्ट्रपति के बीच कुछ तनातनी चल रही है, और कुछ हो भी सकती है।
इन दोनों ही नेताओं के बर्ताव को देखकर बाकी लोगों को भी सीखने का कुछ मौका मिलता है। कुछ दिन पहले जब चीन के पास समंदर में अमरीकी फौज का एक द्रोन जब्त हुआ, तो डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक बयान दिया कि चीन उसे रख ले, अमरीका उसे वापिस नहीं चाहता। जबकि अमरीकी प्रशासन उसे वापिस पाने की कोशिश में लगा हुआ था, और उसे एक फौजी गोपनीय रहस्य मानकर उसकी तकनीक को भी चीनी हाथों में जाने से अमरीका रोकना चाहता था। ऐसे में ट्रम्प का यह बयान उनके कुर्सी संभालने के पहले दिया गया गैरजिम्मेदारी का एक बयान था। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने आखिरी कुछ हफ्तों में विदेश नीति के कुछ ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनका असर लंबे समय तक होगा। और यह बात हमें कुछ अटपटी लग रही है कि ये फैसले सही होते हुए भी क्या इनको टालना बेहतर नहीं होता?
संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के खिलाफ आए एक प्रस्ताव पर अमरीका ने वीटो नहीं किया, बल्कि अमरीकी प्रतिनिधि ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। इसे अमरीका की फिलीस्तीन-इजराइल नीति में एक बड़ा फैसला माना जा रहा है, और इजराइली सरकार की तरफ से यह भी कहा जा रहा है कि उसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में आए इस प्रस्ताव के पीछे बराक ओबामा ने मेहनत करके इजराइल की फजीहत का इंतजाम किया। हमारी अपनी नीति इजराइल के खिलाफ आए इस प्रस्ताव के समर्थन की है, लेकिन ओबामा का यह रूख कार्यकाल के आखिरी कुछ हफ्तों के हिसाब से कुछ अटपटा है, और अगले राष्ट्रपति को इस नीति और इस रूख को तुरंत ही पलटना भी होगा।
ओबामा ने दूसरा फैसला लिया जब आज उन्होंने दर्जनों रूसी राजनयिकों को जासूसी के आरोप में अमरीका से बाहर निकाल दिया। पाठकों को याद होगा कि पूरे चुनाव अभियान में अमरीका में ये आरोप चलते रहे कि रूसी हैकरों ने ओबामा की पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के निजी ईमेल खातों में घुसपैठ करके उनके खिलाफ जानकारी ट्रम्प को मुहैया कराई थी। इस बात को लेकर ओबामा और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच सार्वजनिक तनातनी चल ही रही थी। अब ओबामा को इस कार्रवाई का हक तो पूरा है, लेकिन कार्यकाल के आखिरी तीन हफ्तों में उनका यह फैसला अगले राष्ट्रपति के कार्यकाल को दूर तक प्रभावित करने वाला रहेगा, और लोग यह जरूर सोचेंगे कि क्या ओबामा को इससे बचना चाहिए था?
एक आखिरी बात इस सिलसिले में यह भी है कि अमरीका के कुछ विचारक ओबामा से दो बातों पर अपने विशेषाधिकार से आदेश करके जाने की अपील कर रहे हैं। वहां के एक उदारवादी विचारक नोम चॉमस्की ने ओबामा से कहा है कि वे अमरीका में बसे हुए तमाम अवैध प्रवासियों की मौजूदगी वैध करने का एक आदेश जारी करें। और अमरीका के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ओबामा से अपील की है कि वे जाते-जाते फिलीस्तीन को एक देश का दर्जा घोषित करके जाएं। हमारा मानना है कि ओबामा को अगर कोई फैसले लीक और परंपरा से हटकर लेने भी थे, तो वे ये दो फैसले हो सकते थे। हालांकि उनके लिए हुए दोनों फैसलों से हम अधिक असहमत भी नहीं हैं, लेकिन वे फैसले जाते हुए राष्ट्रपति के हिसाब से थोड़े से अटपटे जरूर हैं। 

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