ये कुनबा अपनी लठैती अपने बंगलों के भीतर क्यों नहीं निपटा लेता?

संपादकीय
31 दिसंबर 2016


उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी के घरेलू झगड़े पर कुछ लिखना खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि बिखरे हुए पारे की बूंदों की तरह बाप-बेटे का मिजाज कभी आ मिलता है, तो कभी छिटककर बिखर जाता है। पिछले कई महीनों से जिस तरह मुलायम और अखिलेश के बीच तलवारें खिंचीं हुई थीं, उसके चलते कल रात पार्टी से निष्कासन का लहू भी बहने लगा था, लेकिन आज दोपहर होते-होते पार्टी से निकाला गया बेटा, और चचेरा भाई, वापिस ले लिए गए, और कहा गया कि साम्प्रदायिक ताकतों से लडऩे के लिए यह एका किया जा रहा है।
इस बिखराव के पीछे अपने-आपको राष्ट्रीय दलाल कहने वाले अमर सिंह को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, और आज दोपहर के एके के पीछे आजम खान का योगदान बताया जा रहा है जो कि हमेशा से अमर सिंह से सांप-नेवले जैसे रिश्ते रखते आए हैं, और पार्टी में फूट के पीछे अमर सिंह को जिम्मेदार ठहराते भी आए हैं। जाहिर तौर पर बाप-बेटे के बीच आज रिश्तों की मरम्मत में बिहार के लालू यादव का योगदान भी दिख रहा है जो कि मुलायम-कुनबे के समधी भी हैं, और जिन्होंने आज बाप-बेटे से बात करके दोनों को झगड़ा खत्म करने कहा, और सार्वजनिक रूप से मीडिया को यह बात बताई कि उन्होंने यह पहल की है।
जो बात हमारे जैसे किसी मामूली समझ-बूझ के इंसान की समझ से परे की है, वह यह कि इतने बड़े-बड़े सरकारी बंगलों पर काबिज रहने के बाद बाप-बेटे, चाचा-भतीजे, भाई-भाई, अपनी लाठियां घर के भीतर भांजकर बाहुबल को वहीं क्यों नहीं तौल लेते हैं? आज जब चुनाव सिर पर खड़े हैं, और कुनबे में से हर कोई मुलायम के नाम का झंडा लेकर चल रहे हैं, और इस झंडे के डंडे से साम्प्रदायिकता को पीटने का नारा भी लगाते चल रहे हैं, तो सड़क पर आकर ऐसी हफ्तावार लठैती क्यों कर रहे हैं? जिस नेताजी की प्रधानमंत्री बनने की हसरत हो, और राजनीतिक गणित के हिसाब से थोड़ी बहुत संभावना भी हो, उसे ऐसी हरकत क्यों करना चाहिए कि सोशल मीडिया पर लोग लिखने लगें कि आजकल वे क्या पीते हैं? इससे परे भी लोग परिवार के भीतर एक से अधिक शादी और एक से अधिक मां के मुद्दे को लेकर भी लिखने लगते हैं कि परिवार के भीतर की कटुता पार्टी को डुबा रही है। यह सिलसिला न तो मुलायम जैसे बुजुर्ग को सुहाता, और न ही विदेशों में पढ़े-लिखे और बेहतर मुख्यमंत्री समझे जाने वाले नौजवान अखिलेश को सुहाता। फिर जब एक घर के भीतर सत्ता के गोश्त के कतरे-कतरे पर कुनबे के लोग जंगल के जानवर पर भोज करते जानवरों की तरह लडऩे लगता है, झपटने और छीनने लगता है, तो लोगों को समाजवाद के नाम पर उत्तरप्रदेश की यह कुनबापरस्ती और भी खटकने लगती है।
कम्प्यूटर पर जो ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर काम करते हैं, उनमें पिछली किसी तारीख और समय की सेटिंग पर लौटने का एक विकल्प रहता है। समाजवादी पार्टी नाम का यह कुनबा उसी विंडोज की तरह अपनी सेटिंग को पिछली तारीख और समय पर वापिस ले जाता है। आज दोपहर बाप-बेटे ने मिलकर कल बीती हुई दोपहर पर सेटिंग को दुबारा पहुंचा दिया है। फिलहाल हम महज यही दुआ कर रहे हैं कि इन शब्दों के छप जाने तक, और अखबार के बंट जाने तक, पारे की यह एक हो चुकी बूंद फिर से न बिखर जाए, क्योंकि छपाई एक बार शुरू होने के बाद उसे बार-बार बदलना मुश्किल और खर्चीला रहता है, और फिर हमारे जैसे अखबारों के पास उत्तरप्रदेश सरकार का पैसा तो है नहीं कि मुख्यमंत्री से लेकर बाकी सरकार तक जनता के पैसे पर यही फेरबदल करती रहें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें