बच्चों पर बोझ बनता पीएम पद छोड़ दिया न्यूजीलैंड पीएम ने

संपादकीय
5 दिसंबर 2016


न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री पी.एम. जॉन ने आज अचानक घोषणा की कि वे पद से इस्तीफा दे रहे हैं। वे पिछले आठ बरस से प्रधानमंत्री हैं अपनी पार्टी को तीन चुनाव जिता चुके हैं, और यह माना जा रहा था कि वे अगले चुनाव में भी पार्टी की अगुवाई करेंगे। लेकिन उन्होंने यह तय किया है कि वे महज सांसद बने रहेंगे ताकि उनके चुनाव क्षेत्र को एक गैरजरूरी मध्यावधि चुनाव न झेलना पड़े। उन्होंने इस्तीफे की जो वजह बताई है, उसके बारे में भारत के नेताओं को भी सोचना चाहिए। प्रधानमंत्री जॉन ने कहा है कि मेरे बालिग हो चुके बच्चों को अपने पिता के इस काम के चलते हुए बेहद दबाव और दखलंदाजी का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए मैं अपने करीबी लोगों और अपने परिवार के साथ मिलकर यह फैसला ले चुका हूं और 12 दिसंबर को मेरी पार्टी नए प्रधानमंत्री को चुन लेगी।
भारत के बारे में अगर देखें तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई अपने बच्चों का ख्याल करके कुर्सी छोड़ भी सकते हैं। भारतीय राजनीति में लोग अपने बाद अपनी कुर्सी अपने बच्चों को देने के लिए पूरा इंतजाम करने में लगे रहते हैं, और इंदिरा गांधी के वक्त यह नारा चला था कि इंदिराजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा। इसी तरह कांग्रेस के उसी दौर में जब नया चुनाव चिन्ह हासिल किया गया, तो गाय-बछड़ा चुनाव चिन्ह को लेकर भी इंदिरा गांधी और संजय गांधी के नाम पर अनगिनत मजाक होने लगे थे। और आज तो देश में बहुत सारे ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जो कि एक कुनबे के भीतर चलते हैं, और पिछले कुछ महीनों से ऐसे एक कुनबे की घरेलू लड़ाई के चलते हुए मुलायम-अखिलेश का झगड़ा देखने लायक भी रहा है।
दुनिया की विकसित सभ्यताएं, और विकसित लोकतंत्र लोगों को कुनबे से ऊपर उठने का मौका देते हैं। भारत में तो किसी वार्ड या पंचायत में भी जब आरक्षण के चलते किसी आदमी को अपनी सीट खोनी पड़ती है, और अगर वह सीट महिला के लिए आरक्षित हो जाती है, तो रातों-रात हलफनामा देकर पत्नी के नाम के साथ पति का नाम जोड़ दिया जाता है, और उसे पार्षद या पंच बनाने का काम शुरू हो जाता है। भारतीय राजनीति में जो ताजा शब्दावली है, उसमें सरपंच-पति को सांप, और पंच-पति को पाप भी कहा जाने लगा है, और यह कुनबापरस्ती कम होते दिखती नहीं है। फिर ऐसा भी नहीं है कि परिवार को आगे बढ़ाने का काम सिर्फ क्षेत्रीय दल के मालिक लोग ही करते हैं, बड़ी-बड़ी पार्टियों में परिवार को आगे बढ़ाना एक पूरी तरह से आम संस्कृति मान ली गई है।
न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री की इस मिसाल से बहुत से लोगों को सीखने की जरूरत है। अगर उनको यह तकलीफ है कि उनकी कुर्सी की वजह से उनके बच्चों पर बहुत दबाव पड़ रहा है, और वे ठीक से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, उनके कामकाज में बहुत दखल होती है, तो इसका एक मतलब यह है कि वे अपने बच्चों के कामकाज को भी प्रधानमंत्री के पद के इस्तेमाल से आगे बढ़ाना नहीं चाहते। जिसका कार्यकाल आधा बचा हो, और जिसका अगला चुनाव जीतकर आना पक्का दिख रहा हो, वह इस तरह कुर्सी को छोड़ दे, तो उसका यह साफ मतलब है कि वहां पर कुर्सी का बेजा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी पिछले दिनों ताईवान की राष्ट्रपति से फोन पर बात की, जो कि अमरीकी विदेश नीति के ठीक खिलाफ बात थी। अब ताईवान की मेयर का यह बयान सामने आया है कि कुछ महीने पहले उनसे एक महिला ने आकर यह प्रस्ताव रखा था कि ताईवान शहर के विकास की कुछ बड़ी योजनाओं में ट्रंप की कंपनी कारोबार करना चाहती है। ट्रंप के साथ यह आशंका बनी हुई थी कि अपने कई देशों में फैले हुए कारोबार के चलते उनकी विदेश नीति में हितों के टकराव की बात आएगी, और यह आ भी गई है। ऐसे में न्यूजीलैंड और अमरीका के इन दो नेताओं की सोच के फर्क को देखने की जरूरत है।

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