जयललिता सोचे-समझे शून्य की गारंटी करके गईं हैं...

संपादकीय
6 दिसंबर 2016


तमिलनाडु मुख्यमंत्री जयललिता का गुजरना उस प्रदेश के लिए जिंदा लोगों की जिंदगी का एक युग गुजर जाने सरीखा है। पिछले कई दशकों से तमिलनाडु अम्मा कहे जाने वाली जया के साए में चल रहा था, और सत्ता में न रहने पर भी वे प्रदेश में सबसे अधिक ताकतवर नेता कई मायने में थीं। और आज उनके गुजर जाने पर भारत में ऐसे मौके पर कही जाने वाली एक बात पूरी तरह खरी लगती है कि वे अपने पीछे एक विशाल शून्य छोड़ गई हैं, जिसे कि शायद ही कोई कभी भर सके।
जयललिता का मूल्यांकन करते हुए शायद इसी एक बात को सबसे अधिक अहमियत की बात मानना होगा, क्योंकि उन्होंने पूरी कोशिशों से, और पूरी कामयाबी से अपनी पार्टी के भीतर एक ऐसा शून्य बना रखा था जिसमें कि उनके बाद एक से दस नंबर तक के दर्जों पर और कोई भी नेता नहीं थे, और उनकी पार्टी में किसी भी और नेता की जगह महज जयललिता के पैर हुआ करते थे। इस राज्य के एक इतिहासकार ने अभी यह कहा है कि जयललिता ऐसे दण्डवत अनुयाइयों को न सिर्फ देखना चाहती थीं, बल्कि दुनिया को दिखाना भी चाहती थीं। इसलिए उनकी पार्टी में उनके बाद किसी नेता को पैरों पर खड़ा भी नहीं होने दिया गया, और उनकी तस्वीर को कमीज की जेब से झांकते हुए दिखाना इस पार्टी में जिंदा रहने की एक शर्त की तरह लागू रहा।
लेकिन जयललिता के बहुआयामी व्यक्तित्व की कुछ दूसरी बातों की भी चर्चा जरूरी है। उन्होंने दशकों पहले राजनीति शुरू करने के बाद पलटकर नहीं देखा, और एक महिला होने को उन्होंने कभी अपने आड़े नहीं आने दिया। इसी तरह प्रदेश के गरीबों के लिए अनगिनत सहायता-योजनाओं को लागू करते हुए उन्हें कभी इस बात की परवाह नहीं रही कि अनुपातहीन संपत्ति जुटाने की तोहमत उन पर लगती रहीं, और अदालत से उन्हें इसी बात के लिए सजा भी हुई। अपनी संपन्नता, और लोकप्रियता पाने के लिए विपन्नता की मदद का मिलाजुला काम एक अनोखा मेल था, और देश में शायद ही ऐसी कोई दूसरी मिसाल हो कि राज्य की हर रियायत अम्मा नाम से जुड़कर ही निकले, और पूरे प्रदेश को इस बात का अहसास रहे कि अम्मा से अधिक जनकल्याणकारी और कोई नहीं।
यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि जयललिता ने जनता को रियायतें देने का जो विश्वरिकॉर्ड बनाया है, उससे उनकी जनता का सबसे गरीब तबका सचमुच बड़ा फायदा पा सका, या कि इस राज्य की औद्योगिक कमाई का एक अनुपातहीन बड़ा हिस्सा वोटों के लिए फिजूलखर्च किया गया। तमिलनाडु गरीबों की मदद के लिए सरकारी खर्च से जितनी योजनाएं शुरू की गईं, शायद उतनी योजनाएं देश के बाकी तमाम प्रदेशों में मिलकर भी नहीं बनाई गई होंगी, और इस तरह जयललिता ने जनता को रिझाने का दशकों लंबा एक निरंतर कार्यक्रम चलाया, जो कि एक बिल्कुल ही अलग किस्म का लोकतंत्र रहा।
लेकिन जयललिता के राजकाज के बारे में यह बात भी कहना होगा कि लोकतंत्र के तमाम स्तंभों और उसकी तमाम परंपराओं को खारिज करते हुए भी वे चुनावी राजनीति में एक बिल्कुल ही अलग ही किस्म से  कामयाब रहीं। उनके प्रदेश के सरकारी कामकाज को लेकर बाहर बदइंतजामी की अधिक खबरें सुनाई नहीं देती थीं, और ऐसा माना जाता है कि अपने नेताओं की तरह वे अपनी सरकार के अफसरों से भी पूरी निष्ठा की उम्मीद करती थीं, और समर्पित नौकरशाही की एक अलग मिसाल तमिलनाडु में उन्होंने बनाई।
चलते-चलते आखिरी में उनके बारे में एक बात और कहने की जरूरत है कि वे हिंदुस्तान की अपने कद की अकेली नेता रहीं जिन्होंने दशकों की राजनीति मीडिया के लिए पूरी हिकारत के साथ चलाई। उनकी राजनीति में जनता तक पहुंचने के लिए मीडिया की कोई उपयोगिता नहीं थी, वे अपनी शर्तों पर पे्रस से बात करती थीं, और जनता से सीधे जुडऩे के लिए वे कभी भी अखबारों और टीवी पर आश्रित नहीं रहीं। उनकी राजनीति के अलग-अलग पहलुओं पर आज ही के हमारे अखबार में बहुत से जानकारों के लेख छप रहे हैं, और उन सब पहलुओं का अधिक जिक्र यहां पर करना गैरजरूरी है। कुल मिलाकर जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में एक इतना बड़ा शून्य छोड़ गई हैं, कि उसे भरने में हो सकता है कि उनकी अपनी पार्टी के टुकड़े हो जाएं। लेकिन ऐसे किसी शून्य की आशंका छोड़कर वे नहीं गईं, वे ऐसे शून्य की गारंटी करके गई हैं, और इसे अगर कोई पूरी तरह भर सकेगा, तो ऐसे लोग जयललिता की आत्मा को बेचैन करके छोड़ेंगे।

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