सुप्रीम कोर्ट को आजम खान के माफीनामे पर रूकना नहीं चाहिए

संपादकीय
7 दिसंबर 2016


उत्तरप्रदेश के बड़बोले समाजवादी नेता और मंत्री आजम खान का माफीनामा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। बलात्कार की शिकार एक लड़की के बारे में आजम खान ने बहुत ही गंदा बयान सार्वजनिक रूप से मीडिया में दिया था, और उसके ऊपर जब सुप्रीम कोर्ट से नोटिस मिला, तो आजम खान ने बिना शर्त माफी मांगने का प्रस्ताव रखा। लेकिन अभी जब उनके वकील ने माफीनामा रखा, तो उसने अगर और यदि जैसे शब्द लिखे गए थे, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ऐसे शब्दों के साथ कोई भी माफीनामा बिना शर्त का नहीं माना जा सकता। आजम खान को दुबारा बिना शर्त का माफीनामा दाखिल करने को कहा गया है।
देश की ममता बैनर्जी जैसी महिला नेताओं से लेकर वामपंथी नेताओं से लेकर दक्षिणपंथी नेताओं तक बहुत से लोग बलात्कार के शिकार लड़की या महिला के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसे बयान जारी करते हैं, और उसकी नीयत पर शक करने में उन्हें दो पल भी नहीं लगते। खुद ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनते ही बंगाल के एक बड़े चर्चित बलात्कार को अपनी सरकार को बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश करार दिया था, और इसके कुछ हफ्तों के भीतर ही उन्हीं की पुलिस ने उसी बलात्कार में गिरफ्तारी की, और कुछ महीनों में ही अदालत से उस आदमी को सजा भी हो गई।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम लगातार यह लिखते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भड़काऊ या आपत्तिजनक बातें करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, और अगर इनके खिलाफ कोई व्यक्ति अदालत तक न जा सके, तो अदालत को खुद होकर ऐसे लोगों को नोटिस देने चाहिए, और सजा देनी चाहिए। हमारा तो यह भी मानना है कि ऐसे बयान देने वालों को चुनाव लडऩे के लिए अपात्र करने का भी इंतजाम होना चाहिए, क्योंकि चुनाव ही नेताओं की कमजोर रग रहती है, और उससे कम किसी तरह का नुकसान उनके लिए बहुत मायने नहीं रखता है।
हमने तीन अगस्त को आजम खान के बयान के बाद इसी जगह पर लिखा था- आजम खान ने कहा है कि बलात्कार की इस शिकायत के पीछे राजनीतिक साजिश हो सकती है। आजम खान का यह कहना है कि वोटों के लिए लोग किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं, और जब मुजफ्फरनगर हो सकता है, शामली और कैराना हो सकता है तो यह क्यों नहीं हो सकता। जाहिर है कि ऐसे संवेदनाशून्य बयान पर इस बलात्कार की शिकार नाबालिग के पिता ने जवाब में यह सवाल किया है कि क्या आजम खान के परिवार के साथ ऐसी घटना होती तब भी क्या वे ऐसी बात कहते? भारत में न सिर्फ राजनीति, बल्कि जिंदगी के किसी भी दायरे में ताकत पा जाने वाले लोगों में से कुछ लोग इतने बददिमाग हो जाते हैं, कि वे न सिर्फ बेदिमागी की, बल्कि हिंसा की भी बातें करने लगते हैं। हम पहले भी इसी कॉलम में लिख चुके हैं कि ऐसी हिंसक और ओछी बकवास के खिलाफ मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग जैसे राज्य और केन्द्र के संवैधानिक संगठनों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों को भी ऐसे हिंसक बयानों पर नोटिस जारी करना चाहिए। लेकिन राजनीति में एक-एक करके अधिकतर पार्टियों के लोग गंदगी की बातें करते आए हैं, और हरेक के सामने गंदगी के लिए दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मिसाल मौजूद रहती है। लेकिन हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसे मामलों पर चुप रहने के बजाय खुलकर बोलना चाहिए, और जब कभी ऐसे बकवासी नेता चुनाव मैदान में रहें, उनके खिलाफ एक अभियान भी छेडऩा चाहिए। किसी नेता के पेट पर लात दो ही मौकों पर पड़ सकती है, जब उसका वोट कमाने का मौका हो, या जब उसका नोट कमाने का मौका हो।
लेकिन बलात्कार को भारत में बहुत से लोग कॉर्टून और लतीफों का सामान भी मान लेते हैं और हमारा मानना है कि सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। देश की जनता की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का दीवाला ऐसा निकला हुआ है कि सलमान खान बलात्कार का मजाक बनाता है, और उसकी फिल्म हिट हो जाती है, जो कि जाहिर है कि महिला दर्शकों के बिना नहीं हो सकती, और ऐसे आदमियों के बिना भी नहीं हो सकती जिनको किसी महिला ने जन्म दिया है। इसलिए जब तक देश की जनचेतना हिंसक बयानों के खिलाफ नहीं होगी, तब तक नेताओं की बेशर्मी जारी रहेगी। हम अगर उत्तरप्रदेश या देश के महिला आयोग की कुर्सी पर होते तो आजम खान को नोटिस जारी करते, और अगर उत्तरप्रदेश या देश की सबसे बड़ी अदालत के जज होते, तो भी आजम खान को बिना किसी रिपोर्ट के अदालती कटघरे में खींच लाते।

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