नोटबंदी की तबाही के बीच भी फायदे की संभावना बाकी

संपादकीय
8 दिसंबर 2016


अब जब नोटबंदी को महीना पूरा हो चुका है, और करीब तीन हफ्ते तक तो इसका चलना तय है ही, तो फिर अब इसे लेकर मोदी सरकार से जवाब-तलब एक अलग बात है, एक दूसरी बात यह है कि अब जो हो चुका है, उससे सबक लेकर और आगे इसका क्या फायदा उठाया जा सकता है। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें राख के ढेर से भी कुछ अच्छी चीज उठकर खड़ी हो पाती है। लोगों को याद होगा कि एक वक्त गुजरात के सूरत शहर में प्लेग फैला था, और वहां पर लगातार मौतें हो रही थीं, लेकिन उस हादसे ने उस शहर को यह मौका दिया था कि वह अपनी गंदगी दूर करके साफ हो सके। नतीजा यह निकला कि आज वह देश के एक साफ-सुथरे शहर में गिना जाता है। इसी तरह अब जब नोटों की किल्लत ने लोगों में दहशत पैदा कर ही दी है, करोड़ों लोगों के दर्जनों दिनों के रोजगार छीन ही लिए हैं, तो अब कुछ ऐसा करने की सोचना चाहिए जिससे कि आगे चलकर कभी ऐसी दिक्कत न हो। मोदी सरकार के किए हुए पर जनता अगले चुनावों में मनचाहा फैसला लेगी, लेकिन फिलहाल केन्द्र और राज्य सरकारों को, समाज और कारोबार को, जनता को यह समझने की जरूरत है कि बिना नगदी के काम करने से देश और लोगों का क्या भला हो सकता है। और यह भी कि भला हो भी सकता है या नहीं, या उसमें क्या-क्या खतरे हो सकते हैं, उसके क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं।
आज पूरे देश में राज्य सरकारें जगह-जगह बिना नोटों के किसी कार्ड से या मोबाइल फोन से भुगतान को बढ़ावा दे रही हैं। लेकिन आज भी अखबार ऐसी खबरों से रंगे हुए हैं कि पढ़े-लिखे नौकरीपेशा लोग भी किस तरह टेलीफोन पर ठगी और जालसाजी के शिकार हो रहे हैं, किस तरह लोग एटीएम कार्ड का फ्रॉड कर रहे हैं, किस तरह झारखंड का एक पूरा गांव ही ऐसा है जहां पर हजारों लोग केवल टेलीफोन पर ठगी और धोखाधड़ी का काम करते हैं। ऐसे में इस देश के करोड़ों अनपढ़, बुजुर्ग, और तकनीक को न जानने वाले लोग किस तरह धोखा खाने के खतरे में जिएंगे, इसको भी देखने की जरूरत है। टेक्नालॉजी अपने आपमें एक अच्छी चीज है, लेकिन देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसके लिए तैयार है या नहीं, इसको समझना होगा, और क्या सरकार साइबर-धोखाधड़ी को रोकने के लिए तैयार है, यह भी अंदाज लगाना होगा। अभी दो दिन पहले ही यह खबर आई है कि रूस के बैंकों से अरबों की रकम घुसपैठियों ने ऑनलाईन ही निकाल ली है, तो ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के खतरे हिन्दुस्तान की जनता पर नहीं रहेंगे। अगर भारत में ऐसी व्यवस्था लागू करनी है, तो केन्द्र सरकार को इसके लिए एक ऐसी बीमा योजना भी लागू करनी चाहिए जिससे कि किसी भी तरह की साइबर-ठगी, या ऑनलाईन-जुर्म के शिकार लोगों के नुकसान की भरपाई हो सके।
आज देश में मोबाइल फोन या क्रेडिट-डेबिट कार्ड से भुगतान करने की एक नई जागरूकता आई है। हम यह बात लिखते हुए मोदी सरकार के इस फैसले का मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं, लेकिन आज की जो हकीकत है, उसी पर लिख रहे हैं। हकीकत यह है कि अधिक से अधिक छोटे-छोटेे कारोबारी भी भुगतान के लिए मशीनों और मोबाइल फोन की तरफ जा रहे हैं, और धीरे-धीरे हो सकता है कि आम जनता भी इसका इस्तेमाल करने लगे। और नोट बंद तो हो नहीं रहे हैं, जिनको ऐसे भुगतान नहीं करने हैं, उनके लिए नोट भी खुले ही रहेंगे, और धीरे-धीरे लोग अपनी प्राथमिकता तय कर पाएंगे। आज देश में बड़े पैमाने पर डिजिटल-ट्रेनिंग की जरूरत है, ताकि बैंकों के ग्राहक और बाजार में लेन-देन करने वाले लोग बिना नोटों के काम चला सकें, और मौजूदा नोटबंदी के सारे नुकसानों के बाद भी ऐसी नौबत का यह एक फायदा भी उठाया जा सकता है, और अगर ऐसा हो सका, तो इस पूरे महीने के नुकसान की एक अलग तरह की भरपाई हो सकेगी।

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