फौज के मुद्दों का राजनीतिकरण पर्रिकर को सलाह का क्या हक?

संपादकीय
9 दिसंबर 2016


प्रतिरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को चिट्ठी लिखकर कहा है कि सेना को राजनीति में घसीटना ठीक नहीं है। उन्होंने कुछ दिन पहले कोलकाता में सेना के एक अभ्यास पर ममता बैनर्जी की आपत्ति करने के सिलसिले में यह बात लिखी है। ममता का आरोप था कि राज्य सरकार की इजाजत के बिना सड़कों पर सेना की ऐसी तैनाती उनकी सरकार को पलटने की साजिश है। पर्रिकर ने इसे सेना के नियमित अभ्यास का हिस्सा बताते हुए कहा है कि सेना को राजनीति में खींचना गलत है। इस चिट्ठी के बारे में ममता की तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद डेरेक ओ ब्रायन का कहना है कि यह चिट्ठी अभी तक ममता तक पहुंची भी नहीं है और इसे मीडिया को लीक कर दिया गया है, तो यह राजनीति कौन कर रहा है?
पिछले कुछ महीनों में सेना को लेकर राजनीति करने की कई बातें हुई हैं। इसमें सबसे बड़ी और पहली घटना रही भारत द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल स्ट्राईक करने का दावा जिसका कि पाकिस्तान आज तक खंडन करता है। इस फौजी कार्रवाई को अभूतपूर्व कहा गया और पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी ने इसे लेकर जश्न सरीखा मनाया, उनके कार्यकर्ता सड़कों पर निकले, और कुछ ऐसा माहौल बनाया गया कि मानो पाकिस्तान को निपटा दिया गया है। इसे लेकर चुनाव के मुहाने पर खड़े उत्तरप्रदेश में भाजपा के नेताओं ने पोस्टर लगाए, और जब तक रिटायर्ड फौजी और दूसरी पार्टियों के लोग यह गिनाते कि इसके पहले भी सर्जिकल स्ट्राईक होते आई हैं, इसे मोदी की बहुत बड़ी कामयाबी साबित करने की कोशिश चलती रही। कुछ समझदार लोगों ने यह कहा भी कि अगर फौज का सम्मान करना है, तो इस फौजी कार्रवाई का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, और अगर इसे कामयाबी भी मानना है, तो इसे एक फौजी कामयाबी ही मानना चाहिए। दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ से लगातार हमले चलते रहे, और इस सर्जिकल स्ट्राईक के बाद भी तकरीबन रोज ही औसतन एक या अधिक हिन्दुस्तानी सैनिक या नागरिक मारे जा रहे हैं। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि अगर उस सर्जिकल स्ट्राईक के लिए मोदी को तारीफ देनी है, तो उसके बाद के पाकिस्तानी हमलों में हुई मौतों की जिम्मेदारी किसे दी जाए?
फिर इसके बाद कुछ दिन पहले हमने गोवा की चुनावी सभा को लेकर मनोहर पर्रिकर के भाषण पर लिखा था कि जिस अंदाज में वे अपने गृहप्रदेश जाकर लोगों के सामने भड़काऊ दावे कर रहे हैं, वह बात देश के प्रतिरक्षा मंत्री के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने तो वहां जाकर यह घोषणा तक कर दी कि वे अब बिना बुलेटप्रूफ शीशों वाली कार में चलेंगे, और जिसे मारना है आकर मार दे, और पाकिस्तान पर हमले के बारे में भी उन्होंने कई तरह की बातें कहीं। प्रतिरक्षा मंत्री जब भारत सरकार के घोषित और औपचारिक फैसलों से परे जाकर नारों की जुबान में देश की विदेश नीति से जुड़ी हुई बातों पर हमलावर बयान देते हैं, तो वह चुनावी सभा की राजनीति भर रहती है, वह देश के भले का काम नहीं रहता। यह बात आज मनोहर पर्रिकर को याद दिलाना इसलिए जरूरी है कि वे आज ममता से शिकायत कर रहे हैं कि फौज को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। हमारा भी यह मानना है कि फौज को लेकर या सरकार के किसी भी नियमित काम को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। और इस बारे में सभी पार्टियों के लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने चुनावी फायदे के लिए ऐसी खोखली बयानबाजी करने, पोस्टर और बैनर लगाने, होर्डिंग सजाने से कैसे बच सकते हैं। फिलहाल प्रतिरक्षा मंत्री की बंगाल की मुख्यमंत्री को यह नसीहत खोखली लगती है, क्योंकि वे ममता से कहीं अधिक राजनीतिकरण फौज का कर रहे हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें