गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।

उप्र में ऑक्सीजन दलाली के चलते दर्जनों मौतें, हत्यारे कौन?

संपादकीय
12 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हास्पिटल में ऑक्सीजन सप्लायर का भुगतान नहीं हुआ तो उसने कई नोटिसों के बाद ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी, और इस वजह से वहां भर्ती तीन दर्जन बच्चों की मौत पिछले दो दिनों में हो चुकी है, और कुल मिलाकर पिछले चार-पांच दिनों में साठ के करीब मौतों का अंदाज है। खुद भाजपा के सांसद और नेता इसे सरकारी लापरवाही मान रहे हैं, और हत्या का मुकदमा चलाने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ और लोगों का यह भी कहना है कि सप्लायर से कमीशन और दलाली पर मुख्यमंत्री के करीबी लोग मोल-भाव कर रहे थे और इसी की वजह से भुगतान रोका गया था, और बड़ी संख्या में यह मौतें हुईं। यह मामला इतना भयानक है कि दो दिन बाद आजादी की सालगिरह उत्तरप्रदेश में मनाई जाए या न मनाई जाए, इस बारे में सोचना चाहिए। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से देश की जनता से यह मांग रहे हैं कि वे किन-किन मुद्दों पर लालकिले से बोलें, इस पर जनता राय दे। इससे बड़ी और राय क्या हो सकती है कि देश में भाजपा के राज वाले कई राज्यों में अस्पतालों में थोक में ऐसी मौतें हुई हैं, वे कम से कम अपनी पार्टी के राज पर तो बोल ही दें।
दरअसल सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी कल ही बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।
छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है। प्रधानमंत्री को पूरे देश के राज्यों को सचेत करना चाहिए, और खासकर अपनी पार्टी के राज वाले प्रदेशों को तो सबसे पहले। आज उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ इसमें लगे हुए हैं कि वहां के मदरसे तिरंगा फहराते हैं या नहीं, और उसका वीडियो बनाकर अपनी देशभक्ति का सुबूत भेजते हैं या नहीं। हमारे हिसाब से ऑक्सीजन के दलाल हत्यारों से कम नहीं हैं, देशद्रोही से कम नहीं हैं, और उन्हीं को पहले सजा हो जाए, मदरसों की देशभक्ति बाद में नापी-तौली जाए।

सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती होती है

संपादकीय
11 अगस्त 2017


हरियाणा के भाजपाध्यक्ष का बेटा दारू के नशे में साथियों के साथ कार में एक  लड़की का पीछा करने और उसके अपहरण की कोशिश में गिरफ्तार है, और हरियाणा के मुख्यमंत्री की शुरुआती प्रतिक्रिया मुजरिम दिखते शराबी नौजवान के खिलाफ होने के बजाय उसके पिता को बेकसूर ठहराने वाली सामने आई है। यह बात अपनी जगह सही है कि किसी बालिग औलाद के लिए मां-बाप जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन यह बात भी सही है कि संविधान की शपथ लेकर सरकार चलाने वाले किसी इंसान को मुजरिम को सजा दिलाने की बात कहनी चाहिए, उसे बचाने वाली नहीं।
लेकिन यह बचाना बड़ा आम हो चुका है। देश में जगह-जगह कई पार्टियों के लोग अपने नेताओं को, और अपने कुनबों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं। पड़ोस के मध्यप्रदेश को ही देखें, तो वहां वेश्याएं मुहैया कराने के सेक्स-कारोबार में फंसे हुए और गिरफ्तार हुए भाजपा नेता से लेकर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करते गिरफ्तार भाजपा नेताओं तक एक लंबा सिलसिला सामने आया है, लेकिन भाजपा ने अपने इन कुलकलंकों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है। ऐसा न कहना उनको बचाने सरीखा है। दूसरी तरफ अगर ये काम करने वाले कोई मुस्लिम होते, तो उन्हें मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कूद-कूदकर पीटते और देशद्रोही करार देते, भारत की संस्कृति तबाह करने वाला बताते। लेकिन गोमांस बेचने वाले भी कुछ लोग भाजपा के निकले हैं, कुछ लोग नकली नोट छापने और चलाने वाले भी निकले हैं, लेकिन पार्टी ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कहा। मोटेतौर पर यही हाल बाकी पार्टियों का है, और ऐसे में यह देखकर हैरानी होती है कि किस तरह सीपीएम ने बंगाल में अपने एक नेता को इसलिए निलंबित कर दिया कि वह एक महंगा मोबाइल इस्तेमाल करता था। आज तो बाकी किसी भी पार्टी में लोग लाखों-करोड़ों की घडिय़ां पहनकर घूमें तो भी उनकी पार्टी को उससे कोई दिक्कत नहीं होती, वे एयरपोर्ट या दूसरी जगहों पर सरकारी कर्मचारियों को पीटें तो भी उनको कोई दिक्कत नहीं होती है।
ऐसी बददिमागी, गुंडागर्दी, और जुर्म के लिए जो हौसला सत्ता से मिलता है, वही हौसला लोगों को तबाही तक ले जाता है। पूरे देश में जगह-जगह राजनीतिक दलों के नेताओं ने भ्रष्टाचार की छूट मिलने को इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचार किए कि वे उनकी अगली पूरी सदी की राजनीतिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से अधिक की दौलत और जायदाद जुटाने वाले रहे, और उसी चक्कर में वे जेल भी पहुंच गए, सजा भी काट रहे हैं। जिस चौटाला कुनबे की अरबों-खरबों की दौलत है, उसके मुख्यमंत्री रहे हुए मुखिया जेल में सजा काट रहे हैं, तमिलनाडू की शशिकला कर्नाटक की जेल में बंद हैं। राजनीति में भ्रष्ट पैसे की कुछ जरूरत तो हो सकती है, अगर ईमानदारी से चुनाव लडऩे का हौसला न हो तो। लेकिन ऐसी मजबूरी किसी की नहीं रहती। ऐसे में सत्ता की बददिमागी सिर चढ़कर बोलती है, और मां-बाप भ्रष्ट रहते हैं, आल-औलाद गुंडागर्दी पर उतर आती है, और सौ में से चाहे एक ही सही, सारी ताकत के बावजूद जेल की कैद तक पहुंच ही जाते हैं। अगली सौ पीढ़ी के लिए जमा की गई दौलत धरी रह जाती है, और एक मामले में पुख्ता सुबूत, ईमानदार जज आ जाने से वह पूरी दौलत किसी ताकत की नहीं रह जाती।
जो लोग सत्ता की ताकत से जुर्म करते चलते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि अगर कानून एक बार भी ठीक से काम कर बैठा हो, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। लेकिन सत्ता से ऐसी बददिमागी आती है कि लोगों को यह लगता ही नहीं कि उनके बुरे दिन भी कभी आ सकते हैं, कभी उनके मामलों पर कार्रवाई करने वालों अफसर या जज ईमानदार भी निकल सकते हैं, या कि कोई ऐसे गवाह भी हो सकते हैं जिन्हें धमकाना या खरीदना मुमकिन न हो। मध्यप्रदेश में सत्ता की सारी ताकत मिलकर भी व्यापम घोटाला फूटने से रोक नहीं पाई। सत्ता के कई लोग सरकार की लाख कोशिश के बावजूद जेल चले गए, हालांकि सत्ता से जुड़ी रहस्यमय ताकतों की इतनी कामयाबी तो सामने आई कि इस मामले से जुड़े हुए पचास लोग अब तक रहस्यमय तरीके से मर चुके हैं, या कि मार डाले गए हैं। इस पूरे सिलसिले से हम केवल यही एक नतीजा निकालना चाहते हैं कि सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती साबित होती है।

शरद यादव के सामने आ खड़ा है एक ऐतिहासिक मौका

संपादकीय
10 अगस्त 2017


बिहार में सत्तारूढ़ जदयू के भीतर की बेचैनी अब किसी किनारे लगते दिख रही है। वहां पर पार्टी के सबसे ताकतवर नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा के साथ उनकी ताकत तो कम नहीं होगी, लेकिन पार्टी के सबसे बड़े राष्ट्रीय स्तर के वैचारिक स्तंभ शरद यादव अगर पार्टी के बाहर निकलकर भाजपा-एनडीए विरोधी विपक्ष के लिए खुला काम करते हैं, तो इससे एक वैकल्पिक विपक्ष मजबूत होकर सामने आने की संभावना बन सकती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इन्हीं नीतीश कुमार को मोदी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का एक संभावित नेता माना जा रहा था, फिर अचानक बिहार की सत्ता से लालू को बाहर करने के लिए नीतीश ने भाजपा का दामन थाम लिया, और कुछ घंटों के भीतर ही वे सीएम की कुर्सी छोड़कर फिर सीएम की कुर्सी पर बैठ गए, और दलबदल या सत्ता पलट की एक बिल्कुल ही अभूतपूर्व मिसाल पेश की थी, और उनकी पार्टी के ही शरद यादव इस फैसले को टीवी पर ही देख पा रहे थे, रूबरू नहीं। ऐसे में शरद यादव ने अपने कुछ तेवर नीतीश के फैसले के खिलाफ दिखाए हैं, और गुजरात के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने के लिए अपने समर्थक जेडीयू विधायक को कहा।
शरद यादव एनडीए सरकार में रह चुके हैं, नीतीश कुमार के साथ-साथ। इसलिए यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि वे भाजपा से ऐसे परहेजी हैं कि उसके साथ बैठ भी नहीं सकते, लेकिन भारत की राजनीति यह बताती है कि पिछली एनडीए सरकार के वक्त की वाजपेयी की भाजपा, और आज मोदी-शाह की भाजपा में लोग बड़ा फर्क देखते हैं। बिहार में ही नीतीश कुमार ने पिछले चुनाव के वक्त भाजपा से नाता तोड़कर अपने धुरविरोधी लालू यादव से गठबंधन इसी मुद्दे पर किया था कि वे मोदी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने कोई ऐसी एंटी एलर्जिक दवा पा ली है कि अब वे मोदी को भारत का अगला भविष्य भी देख रहे हैं, और शरद यादव इस नौबत को मान नहीं पा रहे हैं। ऐसे में वे अब तक ऐसी संभावनाओं की चर्चा का लालच छोड़कर बाहर बैठे हुए हैं कि बिहार के गठबंधन के केन्द्र में विस्तार के रूप में उन्हें भी केन्द्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। शरद यादव सत्तर बरस की उम्र में अब सत्ता के मोह को छोड़कर सैद्धांतिक राजनीति भी कर सकते हैं, और उनके आगे आने से एनडीए-विरोधी एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है, जो कि आज कांग्रेस की अगुवाई में नहीं बन सकता। नीतीश कुमार ने बहुत ही पाखंडी नारों के साथ भाजपा से गठबंधन किया है कि वे लालू के भ्रष्टाचार के साथ रह नहीं पा रहे थे, यह अलग बात है कि एनडीए में बादल कुनबा वैसी ही साख वाला कुनबापरस्त और भ्रष्टाचारजीवी परिवार है, और उससे भी बढ़कर अब जया-शशिकला का अन्नाद्रमुक भी एनडीए में आते दिख रहा है।
देश की राजनीति में गठबंधनों का ध्रुवीकरण लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है, और शरद यादव के सभी दलों के साथ ऐसे दोस्ताना संबंध हैं कि कांग्रेसियों से लेकर वामपंथियों तक, और छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों तक से वे बात कर सकते हैं। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीति पर एनडीए और मोदी के एकाधिकार के मुकाबले ऐसी एक राजनीतिक एकजुटता लोकतंत्र के शक्ति संतुलन में मदद करेगी, और आज शरद यादव के अलावा किसी दूसरे में ऐसी संभावना नहीं दिख रही है। यह उनके सामने एक ऐतिहासिक मौका है, और यह बात पहली बार हम नहीं लिख रहे हैं, बल्कि कुछ और राजनीतिक विश्लेषक लिख चुके हैं कि नीतीश देश के दूसरे जयप्रकाश नारायण बन सकते हैं जो खुद सत्ता में न आकर देश की सत्ता के खिलाफ एक बहुत बड़ा जनमोर्चा खड़ा करने का इतिहास बना चुके हैं। जब भी किसी की मिसाल किसी दूसरे पर लागू की जाती है, तो वह खतरे भी खड़े करती है, इसलिए हम ऐसी मिसाल पर जोर देने के बजाय बस इतना ही कहना चाहते हैं कि शरद यादव को उनके सामने अनायास पेश हो गए इस मौके पर भारतीय लोकतंत्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।

गुजरात की राज्यसभा सीट, एक अनैतिक और अवांछित लड़ाई में भाजपा की शिकस्त

संपादकीय
9 अगस्त 2017


गुजरात की एक राज्यसभा सीट के लिए भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदेश में इतना बड़ा दांव लगाया था कि उस बाजी की शिकस्त पार्टी के मुंह में कड़वाहट छोड़ गई है। विधानसभा के भीतर विधायकों की गिनती के मुताबिक भाजपा से दो लोगों को राज्यसभा के लिए चुना जाना था, और वे अमित शाह और स्मृति ईरानी रहे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दशकों के राजनीतिक सचिव रहे और लंबे समय से राज्यसभा में बने आ रहे अमहद पटेल को राज्यसभा में आने से रोकने के लिए भाजपा ने मानो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह पार्टी के लिए एक बहुत ही खोखला कदम था कि कांग्रेस से बगावत करके बाहर आने वाले एक विधायक को भाजपा ने आनन-फानन अपना राज्यसभा उम्मीदवार बना दिया। यह एक वैचारिक और सैद्धांतिक दीवालियापन भी था, और आज अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा की एक बहुत ही सतही और सस्ती अवसरवादिता भी थी। देश की संसद के जिस उच्च सदन को देश के सबसे अच्छे लोगों की सेवाएं पाने के लिए बनाया गया था, उसकी दुर्गति तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन कल के कांग्रेस विधायक और आज के भाजपा राज्यसभा प्रत्याशी, चौबीस घंटे के भीतर बदले ये राजनीतिक रंग बहुत ही स्तरहीन थे, और इन्हें भाजपा ने सोच-समझकर एक बड़े दांव की तरह खेला था। इसके बाद की विधायकों की खरीद-फरोख्त को हम अधिक वजन नहीं देते क्योंकि वामपंथियों के अलावा देश की अधिकतर पार्टियां ऐसी खरीदी करती रही हैं, और अधिकतर पार्टियों के सांसद और विधायक अंतरात्मा की ऐसी बिक्री करते आए हैं। ऐसे में भाजपा की इस मंडी में अगर आज के सबसे बड़े खरीददार की तरह थैली लिए खड़ी थी, तो वह ऐसा करने वाली न तो पहली पार्टी थी, और न ही आखिरी पार्टी रहेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा के संदर्भ में सैद्धांतिक शुचिता की बात अडवानी-युग के साथ चल बसी है, और प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए भाजपा अपने ही दिग्गजों को छोड़कर कल के दलबदलू को आज सिर पर बिठाने को बेताब है, अगर इससे उसे कोई तात्कालिक फायदा होता है। और भाजपा ने यह रूख जगह-जगह अलग-अलग राज्यों के चुनावों में दिखाया है, और म्युनिसिपल चुनावों तक उसने अपनी पार्टी के पुराने निष्ठावानों को कचरे की टोकरी में डालकर नवजात दलबदलू को सिर पर बिठाया है। यह बात भाजपा को आनन-फानन सीटें तो दिला पाई है, लेकिन इससे एक राष्ट्रीय पार्टी की नैतिकता की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। लेकिन अब गुजरात में नैतिकता भी गई, और दांव भी डूब गया। यह एक अलग बात है कि यह पूरे का पूरा दांव दूसरी पार्टी के बेईमानों और दगाबाजों के भरोसे पर लगाया गया था।
गुजरात में जिस अंदाज में भाजपा ने कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करवाई, या कि उसमें हुई बगावत को दुहने की कोशिश की, उसमें उसे एक बड़ी मात हुई है। अगर वह अपनी सारी ताकत के साथ अहमद पटेल को हरा भी देती, तो भी सोनिया गांधी, कांग्रेस, और अमहद पटेल की उतनी बेइज्जती न हुई होती, जितनी आज एक पूरी तरह अवांछित लड़ाई को छेड़कर भाजपा ने हासिल की है। और देश में कांग्रेस के बहुत से शुभचिंतकों का यह मानना है कि अगर अहमद पटेल हार गए होते, तो कांग्रेस जीत जाती, और सोनिया गांधी को शायद कोई ऐसा दूसरा सलाहकार बनाना सूझता जो कि पार्टी को और गर्त में डूबने से बचा पाता। लेकिन अहमद पटेल की वापिसी से कांग्रेस की पुनर्जीवन की संभावनाएं भी खत्म हो गई है।
लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल की इज्जत महज जीत नहीं होती है, ईमानदारी और सिद्धांतवाद की जीत उसके लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में तमाम अनैतिक तरीकों के इस्तेमाल से इस देश की राजनीति में एक वक्त कांग्रेस जो करती थी, भाजपा अब उससे सौ कदम आगे बढ़कर कर रही है। यह सिलसिला गुजरात की इस एक राज्यसभा सीट से कहीं आगे की शर्मिंदगी भाजपा को दिला चुका है, और इस पार्टी को गंभीरता से अपनी साख सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द अहमद पटेल को सत्ता का एक सबसे बड़ा सौदेबाज माना जाता रहा है, और राजनेता के रूप में उनकी साख फूटी कौड़ी की नहीं रही। जब कांग्रेस की अगुवाई की सरकार रही तो उसके सबसे बड़े आर्थिक फैसलों की राह अहमद पटेल से होकर ही गुजरती थी, और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष को भी लोग महज गिनने वाला मानते थे, बड़े लेन-देन के लिए अहमद पटेल का ही नाम रहता था। इन बातों की हकीकत सोनिया और पटेल ही बता सकते हैं, लेकिन वामपंथियों को छोड़कर देश की तमाम पार्टियों में कोई न कोई अहमद पटेल तो रहते ही हैं। इसलिए ऐसा काम करने वाले को हराने के लिए भाजपा का इतना बड़ा दांव बेकार गया, यह पूरी तरह अवांछित था, और इसमें जीत से भी भाजपा की बदनामी ही होती कि उसने खरीद-बिक्री करके या धमकाकर विधायकों को मोड़ा, और इस बाजी में हारकर तो भाजपा की बड़ी ही किरकिरी हुई है। यह बात बाकी राजनीतिक दलों के सामने भी एक सबक की तरह खड़ी है कि लोगों को अनैतिक और अवांछित लड़ाई नहीं छेडऩी चाहिए, जीतने के लिए भी नहीं। आज नौबत यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दोनों राज्यसभा सीट जीतकर भी खुशी मनाने की हालत में नहीं हैं।

विश्व आदिवासी दिवस पर दो तकलीफदेह मामले

संपादकीय
8 अगस्त 2017


कल नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है, और दुनिया के तमाम देशों में मूल निवासियों के मुद्दों पर चर्चा होगी। लेकिन यह छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरा संयोग है, या कि दुर्याेग है कि राज्य के दो आदिवासी-मामलों पर मीडिया में अप्रिय चर्चा चल रही है। इनमें से एक तो अभी कल की ही है जब आदिवासी बस्तर के नक्सलग्रस्त दंतेवाड़ा जिले के एक गांव में कन्या छात्रावास में प्रशासन और पुलिस के लोग सीआरपीएफ के जवानों को ले गए ताकि छात्राएं उनको राखी बांध सकें, और उन्हें यह भरोसा हो कि सुरक्षा बल उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा, और छात्राओं ने यह शिकायत दर्ज कराई है कि उनके पीछे-पीछे सीआरपीएफ जवान शौचालय में पहुंच गए, और उनका यौन शोषण किया। यह बहुत ही गंभीर मामला इसलिए है कि राखी का यह पाखंड अफसरों द्वारा प्रायोजित था, और उनकी निगरानी में हो रहा था। ऐसे में यह जाहिर है कि अकेले में मिलने वाली लड़कियों या महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों द्वारा शारीरिक बदसलूकी करने की शिकायतों में से कुछ तो सही होती ही होंगी। बस्तर में नक्सलग्रस्त इलाकों में मुसाफिर बसों में चलने वाली महिलाओं की भी यह शिकायत रहती है कि सुरक्षा बल बसों में घुस जाते हैं और तलाशी लेने के नाम पर उनके बदन टटोलते हैं। यह बहुत ही अप्रिय मौका है जब प्रदेश को आदिवासी मुद्दों पर कोई सकारात्मक चर्चा करनी थी, और ऐसी नकारात्मक खबरों से मीडिया पटा हुआ है।
दूसरी घटना जेल के एक मंझले दर्जे के आदिवासी अफसर की है जिसे विभाग ने अभी चार दिन पहले निलंबित कर दिया है। इस पर यह तोहमत है कि उसने अपने फेसबुक पेज पर यह पोस्ट किया था कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होते। इस बात को राज्य सरकार की आलोचना मानते हुए इसे नोटिस दिया गया, और जवाब न मिलने की बात कहते हुए इसे निलंबित कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले जेल की एक और नई-नई अफसर को भी निलंबित किया गया था जिसने जेलों में लाकर बंद की जाने वाली और नक्सल होने के आरोप वाली महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के बलात्कार की आपबीती घटनाओं को लिखा था। इसे भी सरकार की कड़ी आलोचना मानते हुए इसे निलंबित किया गया था। हमने इस निलंबन के मौके पर भी लिखा था कि इस महिला अधिकारी को उसे पता लगी बातें सरकार की जानकारी लानी चाहिए थीं, बजाय उन्हें पहले सोशल मीडिया पर लिखने के।
अब उस महिला अधिकारी का निलंबन तो हो गया, लेकिन उसकी कही बातों पर कोई जांच राज्य सरकार ने शुरू नहीं की, जो कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी बनती है। जब भी कोई ऐसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, और खासकर एक सरकारी अफसर ने उसे बताई हुई बातों को लिखा था, तो यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बनती थी कि उन बातों की जांच करवाई जाती। लेकिन उस अफसर को निलंबित करने के साथ मानो वह पूरा मामला खत्म हो गया था, और उसके उठाए मुद्दे भी दफन हो गए।
राज्य सरकार ने आदिवासी मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत है। अपने अफसरों को निलंबित करना तो ठीक है, लेकिन सरकार को इस हकीकत को मानना होगा कि जुल्म और ज्यादती के, हत्या और बलात्कार के आरोपों को अनसुना करके सरकार आदिवासियों को नक्सलियों की तरफ धकेलने के अलावा और कुछ नहीं कर रही। बस्तर में सीआरपीएफ या बाकी सुरक्षा बलों की जनता में साख खराब है, और उन्हें कन्या छात्रावास में ले जाने का अफसरों का फैसला ही गलत था। इसके बाद जब वहां पर सुरक्षा कर्मचारी छात्राओं का यौन शोषण करने लगे, तो भी शुरू में बड़े अफसरों ने इस मामले को दबाने की कोशिश की। कल आदिवासी दिवस पर अगर कोई सार्थक चर्चा इस प्रदेश में होनी है, तो वह आदिवासियों पर ऐसे जुल्म को रोकने केे बारे में होनी चाहिए। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ की संवैधानिक संस्थाओं से लेकर बस्तर के आदिवासी मंत्री-सांसद और विधायकों तक ने गजब की चुप्पी साध रखी है, और ऐसा लगता है कि मानो मीडिया ही लोकतंत्र की जिम्मेदारी पूरी कर रहा है।

रक्षाबंधन, गैरबराबरी के रिवाज से निकली परंपरा

संपादकीय
7 अगस्त 2017


आज देश भर में जगह-जगह लोग धर्म और जाति से परे, और पारिवारिक रिश्तों से भी परे राखी का त्यौहार मना रहे हैं। राखी का शायद किसी धर्म में कोई उल्लेख नहीं है, और यह मोटे तौर पर एक सामाजिक परंपरा के रूप में चले आ रहा त्यौहार है। राखी, या रक्षाबंधन, यह भाई-बहन के बीच का रिश्ता पुख्ता करने का एक मौका रहता है जिस दिन कोर्ट-कचहरी में आपस में मुकदमा लड़ रहे भाई-बहन भी एक साथ जुट जाते हैं, और बहन इस उम्मीद के साथ भाई को राखी बांधती है कि वह मुसीबत में उसकी रक्षा करेगा। भारत की सामाजिक व्यवस्था में आमतौर पर यह भी चले आता है कि बूढ़े मां-बाप बेटे के पास रहते हैं क्योंकि अधिकतर समाजों में बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं। ऐसे में मां-बाप से लेकर बहन तक से रिश्ता रखना भाई के जिम्मे ही आता है। यह एक अलग बात है कि बहुत से बूढ़े मां-बाप ऐसे रहते हैं जिनका ख्याल रखने के लिए केवल बेटियां ही रह जाती हैं, और बेटे जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं। ऐसे बेटों से उनकी बहनों को भी किस तरह की हिफाजत या मद मिल सकती है, यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। आज ही इसी वक्त मुंबई की एक खबर आ रही है कि अमरीका से आया एक बेटा जब अपनी बूढ़ी और अकेली रह गई मां से मिलने के लिए घर पहुंचा तो पता लगा कि मां तो कई दिनों की मरी पड़ी है। दरवाजा तोड़कर मां को ऐसे हाल में देखने वाले बेटे ने पिछले डेढ़ बरस से मां से फोन पर भी बात नहीं की थी। यह एक अलग बात है कि अब मां का करोड़ों का मकान बेटे का ही होगा।
दरअसल राखी को लेकर सदियों से चली आ रही यह सोच आज सामाजिक समानता के पैमाने पर अटपटी लगती है कि भाई ही बहन की हिफाजत करेगा। इस रिवाज की एक बड़ी खामी यह है कि महिला को कमजोर माना जाता है, और यह माना जाता है कि उसकी हिफाजत के लिए बाप-भाई, या पति जैसे किसी एक पुरूष की जरूरत होती है। रक्षाबंधन अगर दोनों के बीच एक-दूसरे की बराबरी से हिफाजत का बंधन होता, तो शायद यह एक बेहतर रिवाज होता। लेकिन जिस तरह भारत में महिला को सुहाग की निशानी के नाम पर सिंदूर से लेकर मंगलसूत्र तक, और तरह-तरह की चूडिय़ों से लेकर बिंदी तक सबको ढोना पड़ता है, उसी तरह उसे भाई या किसी और पुरूष से हिफाजत की गारंटी भी लेकर चलना पड़ता है। इस रिवाज में यह फेरबदल करने की जरूरत है क्योंकि आज बहुत सी बहनें भी अपने बेरोजगार, या बीमार भाई की जिम्मेदारी ढोती हैं, और उस भाई की सामाजिक जिम्मेदारी, माता-पिता को भी ढोती हैं।
भारत के अधिकतर रीति-रिवाज महिलाओं को कमजोर या आश्रित बनाने वाले रहते हैं। उनकी बुनियाद इस बात पर रखी जाती है कि वे पुरूषों से कमजोर रहती हैं, और उन्हें लगातार पुरूष की हिफाजत चाहिए ही चाहिए। लोगों को याद होगा कि जिस हरियाणा में दो दिन पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने एक युवती से छेडख़ानी करके खतरनाक अंदाज में उसका पीछा किया, उसी हरियाणा में मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर ने अपने चुनाव प्रचार में यह कहा था कि जिन महिलाओं को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं निकल जातीं? ऐसी सोच वाले हरियाणा में जाहिर है कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, प्रदेशाध्यक्ष, का बेटा यह मानकर चल रहा होगा कि रात में अगर कोई लड़की कार से भी अकेले जा रही है, तो उसे नंगा करना उसका बुनियादी हक है। आज वही मुख्यमंत्री वहां की बच्चियों से राखी बंधवा रहे हैं, और उन्हें एक तरह से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी ले रहे हैं। संस्कृति के ऐसे ठेकेदार पूरे राज्य के संवैधानिक जिम्मे को उठाने का हक तो रखते नहीं, आज वे राखी जरूर बंधवा रहे हैं। इस तरह जब निजी संबंधों के एक धागे का सार्वजनिककरण कर दिया गया है, तो उसका महत्व भी खत्म कर दिया गया है। रक्षाबंधन को आज के हालात देखते हुए दुबारा परिभाषित करने की जरूरत है।

न चीन की तरह सस्ता, न ही एप्पल की तरह बढिय़ा...

संपादकीय
6 अगस्त 2017


अमरीका की एक खबर है कि वहां एप्पल कंपनी का मुनाफा बढऩे से किस तरह उसके शेयर रखने वाले दुनिया के एक सबसे बड़े पूंजीनिवेशक वारेन बफे को रातों-रात दसियों अरब की कमाई हो गई। एप्पल न सिर्फ अमरीका बल्कि दुनिया की उन कंपनियों में से है जो बिना किसी एकाधिकार के, खुले बाजार के मुकाबले में एक के बाद एक बेहतरीन सामान लाकर बड़ा मुनाफा कमाती है, और उसके सामानों के प्रति निष्ठावान बने रहने वाले ग्राहक उसके हर सामान के अगले मॉडल का इंतजार भी करते हैं।
दूसरी तरफ इससे ठीक उल्टा हाल चीन की कुछ कंपनियों का है जो कि सामान इतना सस्ता बनाती हैं कि वह सामान कमजोर और अविश्वसनीय रहता है, और जाने कब तक चले, कब खराब हो जाए। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी को लेकर तरह-तरह के मजाक चलते रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां से भारत आने वाले बहुत से सस्ते सामानों ने भारत के उसी किस्म के सामानों के कारखाने बंद करवा दिए हैं। चीन में सामान अच्छे भी बनते हैं, और घटिया भी। लेकिन वहां के सस्ते सामान इतने सस्ते रहते हैं कि वे दुनिया के अधिकतर देशों में जाकर वहां के स्थानीय सामानों को पीटकर रख देते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वहां पर लागत इतनी कम आती है, उत्पादन इतना अधिक होता है कि सामान सस्ते बनते हैं। दूसरी तरफ भारत में बनने वाले बहुत से सामान घटिया चीनी सामानों जितने ही घटिया रहते हैं, लेकिन वे महंगे बनते हैं, क्योंकि कामगार हुनरमंद नहीं हैं, मशीनें अच्छी नहीं है, बिजली का ठिकाना नहीं है, और कंपनियां उत्पादन ठीक से नहीं कर पातीं।
अब ऐसे में जब भारत की सरकार लगातार यह ताकत लगा रही है कि मेक इन इंडिया को कामयाब बनाया जाए, तो उसके कुछ रास्ते हैं। पहली बात तो यह कि भारत में सामानों का उत्पादन बेहतर क्वालिटी का हो, और इसके लिए कामगारों का हुनर बेहतर हो। चीन में यह नौबत रातों-रात बेहतर कर ली जाती है, और भारत में कौशल विकास के नाम पर राज्यों में अंधाधुंध लूटपाट और धांधली चलती रहती है। ऐसे में दुनिया के दूसरे देश तो दूर रहे, भारत के भीतर भी सस्ते चीनी सामानों का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ भारत में अधिक कमाई वाला एक तबका ऐसा है जो कि दुनिया का सबसे महंगा एप्पल कम्प्यूटर या फोन लगातार इस्तेमाल करता है, और वह क्वालिटी के लिए अधिक से अधिक दाम देने को भी तैयार रहता है। भारत में ही सॉफ्टवेयर का काम करने वाली कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों से खुला मुकाबला करती हैं, वे क्वालिटी में भी अच्छी हैं, और उनके दाम भी बाजार के मुकाबले के हैं। लेकिन भारत का भविष्य बेहतर मानने वाले लोगों को यह भी समझ लेना चाहिए कि इस देश में आज कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खदानों और खनिजों से जुड़े हुए ऐसे उद्योगों का है जो कि भारी प्रदूषण फैलाते हैं, और जिन्हें दुनिया के विकसित देश अपने घर पर चलाना नहीं चाहते। ऐसे उद्योगों पर टिकी हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर यह भावनात्मक सोच तो ठीक है कि भारत सब कुछ खुद बनाने लगेगा, और दुनिया में अव्वल हो जाएगा, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि यह देश न तो चीन की तरह का सस्ता बना पा रहा, न ही दुनिया के बहुत से देशों की नामी कंपनियों जैसा अच्छा बना पा रहा है। इन दोनों मामलों में आगे बढऩे की कोशिश के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। 

गंदा लिखने वाले लेखकों का पूरी तरह बहिष्कार जरूरी

संपादकीय
5 अगस्त 2017


पाकिस्तान से अभी एक खबर आई थी कि कल के क्रिकेटर और आज के राजनेता इमरान खान ने अपनी पार्टी की एक महिला नेता को कोई अश्लील संदेश फोन पर भेजा, और उसने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया। इसके बाद इमरान समर्थक उस महिला के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़े हैं, और उसके चाल-चलन पर भद्दी बातें कहते जा रहे हैं। लेकिन यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, और न ही महज राजनीति तक। अमरीका में मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार महिलाओं के बारे में बहुत ही घटिया और अश्लील बातें कहते आए हैं। और इन दिनों भारत में सोशल मीडिया पर हिन्दी साहित्य से जुड़े हुए लोगों के बीच एक बहस चल रही है कि साहित्यकार अपने बीच की महिलाओं के खिलाफ जितनी घटिया और अश्लील बातें लिख रहे हैं, तो उनका क्या किया जाए?
लिखने-पढऩे वाले और चर्चित नामों को जब सोशल मीडिया पर बहुत ही गंदी बातें लिखते देखा जाता है, तो फिर उनके लिखे हुए से भी नफरत होने लगती है। ऐसा लगता है कि साहित्य की सारी समझ, और उसमें गुजारी हुई जिंदगी भी न तो उन्हें सामाजिक न्याय सिखा पाई, और न ही महिला का सम्मान उन्हें समझ आया है। वैसे तो साहित्य में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कई तरह की खेमेबाजी चलती है। और ऐसे खेमों के बीच बहस कई बार बड़ी फूहड़ भी हो जाती है। लेकिन किसी महिला के चाल-चलन की तरफ गंदा इशारा करके कोई साहित्यकार किस तरह से लोगों के बीच बने रहने का हौसला दिखा सकता है, यह देखना हो तो इन दिनों फेसबुक पर चल रही ऐसी बहस को देखना काफी होगा। महिलाओं को लेकर पुरूषों के मन में सदियों से चले आ रहा एक अनादर वहां चीख-चीखकर सामने आ रहा है, और इस ज्यादती के खिलाफ भी बहुत से लोग लिख रहे हैं।
फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ने लोगों के भीतर छुपे हुए एक हिंसक और खूंखार हैवान को उजागर करने का काम बखूबी किया है। अपने लेखन में जो लोग महानता और सिद्धांत की बातें करते नहीं थकते, वे लोग भी यहां पर नंगे हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों के मिजाज की कमजोरियों को उजागर करने का एक बहुत बड़ा काम किया है, और लोग आत्मघाती अंदाज में अपनी हिंसा को अपने नाम और चेहरे के साथ लिखते चले जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि साहित्य में चल रही खेमेबाजी से परे भी यह महिला के खिलाफ पुरूष के मन की एक आम हिकारत है, जो कि उसके किसी भी फैसले को उसके चाल-चलन से जोडऩे के लिए उतारू बैठे रहती है। यह तो अच्छा है कि सोशल मीडिया पर और बहुत से लोग ऐसे ओछे हमलों का जवाब देने के लिए मौजूद हैं, लेकिन इससे अधिक भी कुछ करने की जरूरत है। ऐसे लेखकों की किताबों का एक सामाजिक बहिष्कार हो, ऐसे लेखकों को छापने वाली पत्रिकाओं में लिखने का भी बहिष्कार हो, और उनको खरीदने का भी बहिष्कार हो। जब किसी लेखक के पेट पर इस तरह की लात पड़ेगी, तभी जाकर उन्हें यह समझ में आएगा कि हिंसक बकवास करना कितना महंगा पड़ सकता है।

विश्व स्तनपान सप्ताह जागरूकता की जरूरत

संपादकीय
4 अगस्त 2017


दुनिया भर में अभी विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जा रहा है। अगस्त का पहला हफ्ता इसी बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए रहता है, क्योंकि कुछ समाजों में किसी अंधविश्वास के चलते महिलाएं बच्चों को दूध पिलाने से कतराती हैं, तो कुछ अतिसंपन्न और अतिआधुनिक तबके की महिलाएं अपने शरीर की फिक्र करते हुए बच्चों को दूध पिलाने से बचती हैं। इसके अलावा बाजार में बच्चों के पहले खाने का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेबी फूड को बढ़ावा देने के लिए उसके फायदे गिनाते हुए इतने आक्रामक तरीके से डॉक्टरों और दवा दुकानों के रास्ते, और ईश्तहार से भी बेबी फूड को घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। ऐसे में बच्चों के भले के लिए यह जागरूकता जरूरी है कि नवजात बच्चों को शुरुआती एक-दो बरस सबसे अधिक फायदा मां के दूध का होता है, और उसकी एक बूंद बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है, और उनके विकास में मदद करती है।
इसी से जुड़ा हुआ एक दूसरा मुद्दा कई बरसों से खबरों में हैं कि अपने बच्चों को दूध पिलाती हुई मां क्या अपने बदन को लेकर किसी तरह की अश्लीलता की नौबत लाती है, या कि किसी सार्वजनिक जगह पर भी मां और बच्चे का यह पहला हक होता है, कि वे बच्चे की जरूरत पूरी कर सकें। यह बहस चलती रहती है और लोग सार्वजनिक जगहों पर दूध पिलाती महिला को देखकर बड़बड़ाते भी हैं, और उसका बुरा भी मानते हैं। लेकिन दूसरी तरफ विकसित दुनिया में ऐसी महिलाएं हैं जो संसद में भी अपने बच्चों को लेकर जाती हैं, और वहां संसद की कार्रवाई के बीच बच्चे को दूध पिलाना वे अपना हक समझती हैं। दरअसल समाज में अधिकारों को लेकर इस तरह की जागरूकता का आंदोलन ताकतवर और संपन्न तबके की तरफ से, चर्चित लोगों की तरफ से शुरू होने पर उसके कामयाब होने की संभावना अधिक रहती है। समाज में बड़े कहे जाने वाले लोग जब कुछ करते हैं, तो उनसे नीचे के तबके में भी उसे मंजूर करने का मिजाज रहता है। इसलिए विकसित देशों के ताकतवर तबके से शुरू हुई यह बात बाकी दुनिया तक भी पहुंच सकती है।
दूसरी बात यह है कि जो मजदूर या गरीब तबका रहता है, उसकी महिलाओं के पास तो पसंद-नापसंद की संभावना भी नहीं रहती। उसे तो मजदूरी की जगह पर, या सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठकर भी अपने बच्चे को दूध पिलाना पड़ता है। इसलिए अधिक दिक्कत मध्यम वर्ग की है जो कि सामाजिक रीति-रिवाजों को सबसे अधिक ढोने का आदी रहता है। समाज की सोच में एक बदलाव की जरूरत है कि महिला और बच्चे के अधिकार बाकी तमाम अधिकारों से ऊपर हैं, और जिन लोगों को दूध पिलाती मां देखने में बुरा लगता हो, वे अपनी नजरों को लेकर कहीं दूर जा सकते हैं। कल ही एक खबर आई है कि भारत में बच्चों को मां का दूध न मिल पाने से देश का कितना नुकसान होता है। यह नुकसान सेहत पर भी होता है, और कुपोषण से प्रभावित होने वाली सेहत की वजह से बच्चों के बड़े होने पर उनकी आर्थिक उत्पादकता का नुकसान भी होता है। आमतौर पर कुपोषण से देश का होने वाला आर्थिक नुकसान गिनना आसान नहीं रहता, इसलिए उसकी चर्चा कम ही होती है। फिलहाल इस हफ्ते इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए यह भी समझने की जरूरत है कि एक मां अपने बच्चे को ठीक से दूध पिला सके इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह मां सेहतमंद रहे, बीमारियों से दूर रहे, और उसका खानपान ठीक हो। भारत के सक्षम और संपन्न तबके के लोग अपने आसपास में महिलाओं की सेहत का ध्यान रख सकते हैं, और उन्हें जागरूक बना सकते हैं। 

विधानसभाएं हों या संसद, विपक्ष एक-एक पल का इस्तेमाल करे

संपादकीय
3 अगस्त 2017


संसद और कई राज्यों की विधानसभाओं के सत्र साथ-साथ चल रहे हैं, और विपक्ष कई मुद्दों को लेकर काम ठप्प कर रहा है, इधर छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के कुछ मुद्दों को लेकर विधानसभा के चल रहे सत्र में काम रूकना शुरू हो गया है, और इस छोटे से सत्र में कोई काम हो पाना मुश्किल दिख रहा है। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने बहुत सी ऐसी नौबतें विपक्ष को मुहैया कराई हैं, जिनको अगर विपक्ष न उठाए, तो वह गैरजिम्मेदार कहलाएगा। इसलिए विधानसभा सत्र शुरू होते ही विपक्ष का विरोध जायज था, लेकिन हम विधानसभा की कार्रवाई को बहिष्कार करने, या बार-बार बहिर्गमन करने का विरोध करते हैं, और उसी तरह संसद की कार्रवाई ठप्प करने का भी विरोध करते हैं। और यह बात हम तब भी लिखते आए थे जब छत्तीसगढ़ में भाजपा विपक्ष में थी, और संसद में एनडीए विपक्षी थी।
चाहे देश की कुछ विधानसभाओं के चुनाव हों, या फिर छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल के चुनाव हों, राजनीतिक विरोध के मुद्दों को अगर संसद और विधानसभा पर ऐसे हावी होने दिया जाता है कि उससे संसदीय काम ठप्प हो जाए, तो उससे राजनीतिक दल चुनावी फायदा पाने की कोशिश चाहे कर लें, उससे राज्य और देश का एक बहुत बड़ा नुकसान होता है। जितने संसदीय कार्य रहते हैं, उन विधेयकों पर, उन संशोधनों पर, उन प्रस्तावों पर चर्चा का वक्त हंगामे में खत्म हो जाता है, और जब नए कानून बनते हैं, या मौजूदा कानूनों में फेरबदल होता है, तो उन पर जो चर्चा होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती। आज ही छत्तीसगढ़ विधानसभा में नारेबाजी और बहिर्गमन के बीच अनुपूरक बजट और सात विधेयकों को पारित कर दिया गया। जाहिर है कि उन पर जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई।
हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि सदन के समय का एक-एक पल का इस्तेमाल होना चाहिए, क्योंकि वह मौका रहता है जिसमें जनता के प्रतिनिधि के रूप में विपक्ष सरकार को घेर सकता है, और हर मुद्दों पर जवाब मांग सकता है। जहां तक विरोध-प्रदर्शन की बात है, तो हम यह सुझाएंगे कि विपक्ष को सदन के समय को और बढ़वाने की कोशिश करनी चाहिए, रोज शाम देर तक सदन की कार्रवाई चलाने पर सरकार को मजबूर करना चाहिए, हर मुद्दे पर सवाल पूछने चाहिए, और घेरना चाहिए। ऐसा करके ही विपक्ष अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है और सरकार के लिए परेशानी भी खड़ी कर सकता है। आज जिस तरह से संसद और विधानसभा में कार्रवाई ठप्प है, उससे सत्र के आखिर में जाकर सरकार के तमाम किस्म के प्रस्ताव, तमाम किस्म के संशोधन रफ्तार से आगे बढ़ा दिए जाएंगे, और बिना अक्ल के इस्तेमाल के नए कानून बन जाएंगे, कानून में फेरबदल हो जाएगा।
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि सदन का उपयोग बहिष्कार और बहिर्गमन में बर्बाद करना सरकार के हाथ मजबूत करने जैसा है। इससे मीडिया में कुछ घंटों के लिए एक सुर्खी तो हासिल हो जाती है, लेकिन देश की जनता लुटी हुई सब देखते रह जाती है। सरकार को घेरने का यह तरीका संसदीय उत्पादकता को खत्म करने का है। हमारा मानना है कि सदन के समय का पल-पल इस्तेमाल करके, प्रदर्शन के लिए बाहर मौका ढूंढना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सब जगह गांधी की प्रतिमाएं लगी हुई हैं, और वहां बैठकर अनशन और उपवास करके सांसद और विधायक मीडिया से सीधे बात भी कर सकते हैं, जो कि सदन के भीतर नहीं कर सकते। सांसदों और विधायकों के ऐसे ही रूख के चलते जनता के मन में इन निर्वाचित और मनोनीत प्रतिनिधियों के लिए इज्जत घटती चली गई है, और हिकारत बढ़ती चली गई है। प्रदर्शन के लिए सड़क का इस्तेमाल हो सकता है, आमसभाओं के मैदान का इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन सदन को सड़क बना देना पूरी तरह नाजायज है, और दिल्ली से लेकर रायपुर तक जनता के बीच ऐसे रूख के खिलाफ एक जागरूकता खड़ी होनी चाहिए। 

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरों को समझे बिना उसे आगे बढ़ाने पर रोक लगे...

संपादकीय
2 अगस्त 2017


कम्प्यूटरों की दुनिया में आज एक सबसे बड़ी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को माना जाता है। कृत्रिम बुद्धि के विकास में दुनिया के कई कम्प्यूटर वैज्ञानिक लगे हुए हैं, और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने इस रिसर्च में बहुत बड़ा पूंजीनिवेश किया हुआ है। लेकिन अभी पिछले हफ्ते दुनिया के कुछ सबसे बड़े कम्प्यूटर-दिमागों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को विकसित करना कितना खतरनाक होगा, और यह कि इसके लिए क्या पहले कड़े नियम बनाना बेहतर नहीं होगा? अमरीका के एक दूसरे बड़े कारोबारी ने मार्क जुकरबर्ग की कोशिशों को गैरजिम्मेदार और खतरनाक बताया। यह बहस तब शुरू हुई जब फेसबुक को अपने ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोजेक्ट में एक कोशिश को खारिज कर देना पड़ा। उसने ऐसी दो कृत्रिम बुद्धियां बनाकर उन्हें विकसित करने का काम किया था, लेकिन वे कुछ इस तरह बेकाबू विकसित हुईं कि वे आपस में बात करने के लिए एक नई जुबान बना बैठीं, और वे दोनों बुद्धियां अंग्रेजी छोड़ इस नई भाषा में आपसी बातचीत करने लगीं जो कि इन वैज्ञानिकों की समझ से भी परे की थी। इसके बाद लाख कोशिश करके भी ये वैज्ञानिक इन कृत्रिम बुद्धियों को वापिस अंग्रेजी तक नहीं ला पाए, तो फिर उन्होंने इन्हें खत्म कर दिया। यही तजुर्बा ऐसे बहुत सारे मामलों में हुआ जहां पर कृत्रिम दिमागों ने अपनी एक अलग भाषा बना ली, और अंग्रेजी को पूरी तरह छोड़ ही दिया।
यह तो महज भाषा की बात है, और अभी ये कृत्रिम दिमाग इंसानी काबू के बाहर के नहीं थे, इसलिए इन्हें खत्म किया जा सका। लेकिन अधिकतर लोगों ने हॉलीवुड की ऐसी फिल्में देखी होंगी जिनमें इंसानों के बनाए हुए मशीनी मानव इंसानों के काबू से बाहर हो जाते हैं, और तबाही फैलाने में लग जाते हैं। दरअसल ऑर्टिफिशियल इंटेंलीजेंस के साथ एक दिक्कत यह है कि इंसान ऐसी बुद्धियों को बनाकर उन्हें विकसित तो करते चलता है, लेकिन एक सीमा के बाद जाकर ऐसे दिमाग अपने आपको खुद ही विकसित करने लगते हैं, और इंसान महज देखते रह सकता है। लोगों को हिन्दुस्तान में प्रचलित एक बहुत पुरानी कहानी याद होगी कि किस तरह कुछ लोग हड्डी, मांस, और चमड़ा जोड़कर एक शेर तैयार करते हैं, और फिर आखिर में उसमें प्राण भी फूंक देते हैं। प्राण मिलते ही वह शेर अपने को बनाने वाले लोगों को ही खा जाता है। कुछ ऐसा ही खतरा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर बहुत से लोग देखते हैं जिनमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भी हैं। लेकिन फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग फेसबुक पर लोगों की पसंद के मुद्दों से जुड़े हुए इश्तहार ढूंढने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करते हैं। अब कल के दिन अगर ये दिमाग बेकाबू हो जाएं, तो हो सकता है कि लोगों की निजी और गोपनीय बात खुद होकर बाजार में बेचने लगें। कृत्रिम बुद्धि के विकास को शुरू तो किया जा सकता है, लेकिन बहुत से लोगों का यह मानना है कि वह इंसान की समझने की सीमा को बहुत रफ्तार से पार कर लेगी, और फिर हो सकता है कि बेकाबू होकर अपना खुद का एक एजेंडा तय कर ले।
दुनिया की कहानियों और फिल्मों में ऐसे ही मानव निर्मित दानव, फ्रैंकस्टीन की कहानी है जिसे एक वैज्ञानिक ने बनाया, और फिर जो बेकाबू होकर तबाही करने लगा। हम ऐसे नाजुक और खतरनाक मामले में संकीर्णतावादी होना बेहतर समझते हैं, और विज्ञान-टेक्नालॉजी का ऐसा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जिस पर इंसान का किसी दिन काबू ही न रह जाए। ऐसा ही जेनेटिक्स के साथ हो रहा है, इंसानों से लेकर फल-सब्जी और अनाज की फसलों तक जेनेटिक मॉडिफिकेशन का काम चल रहा है, और लोग इसके खतरों की तरफ दुनिया को आगाह भी कर रहे हैं। इंसानों का बनाया हुआ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस किसी दिन एक तानाशाह बनकर इंसानी बिरादरी को, या धरती को खत्म करने पर आमादा हो जाए, तो क्या होगा? उस दिमाग से इंसान मुकाबला भी नहीं कर पाएंगे, और शतरंज की बिसात पर प्यादों की तरह मारे जाएंगे।

दलबदलू सांसद-विधायकों की सीट छीन लेनी चाहिए

संपादकीय
1 अगस्त 2017


गुजरात, बिहार, और उत्तरप्रदेश में कांगे्रस और दूसरी विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शाामिल हो रहे हैं। गुजरात में तो कांगे्रस के लिए अपना घर संभालकर रखना मुश्किल पड़ रहा है, और राज्यसभा चुनाव के मतदान तक उसे अपने विधायकों को अपनी पार्टी के राज वाले कर्नाटक भेजना पड़ा, और उनके मोबाइल फोन ले लेने पड़े। आज सोशल मीडिया और मीडिया दोनों जगह कांगे्रस विधायकों की आलोचना हो रही है कि बाढ़ में डूबे गुजरात में वे अपने मतदाताओं के बीच न रहकर कर्नाटक में छुपकर बैठे हैं, लेकिन लोगों को याद रहना चाहिए कि भाजपा के येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहते हुए जब वहां उनके मंत्री, रेड्डी बंधु सरकार पलटने के लिए विधायक खरीदी में लगे थे, तो कर्नाटक में बाढ़ की तबाही के बावजूद भाजपा के विधायक दूसरे प्रदेश में ले जाकर संभालकर रखे गए थे कि भाजपा का खरबपति खदान मालिक-मंत्री ही उन्हें न खरीद ले। इसलिए विधायकों या सांसदों की खरीद-फरोख्त कोई नई बात नहीं है। हमारा अनुभव यह रहा है कि छत्तीसगढ़ में 2003 में भाजपा विधायकों की जोगी द्वारा खरीदी के मामले से लेकर सांसदों की खरीदी तक, कोई मामले अदालतों में साबित नहीं हो पाते, और यह खरीद-बिक्री चलती ही रहती है।
ऐसे में हमें लगता है कि देश के चुनाव कानून में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि पांच बरसों के लिए चुने गए सांसद या विधायक जिस पार्टी के निशान पर चुने जाते हैं, उस पार्टी को छोड़कर जाने पर, या कि थोक में दलबदल करने पर भी अपनी सीट खो बैठें। आज दलबदल कानून अकेले सांसद-विधायक को दलबदल से रोकता है, लेकिन जब एक तिहाई से अधिक सांसद-विधायक दलबदल करते हैं, तो उसे कानूनी मंजूरी है। चुनाव कानून में संशोधन करके दल बदलने वाले तमाम लोगों को बाकी कार्यकाल के लिए अपात्र कर देना चाहिए, और अगर उनकी सीट पर दुबारा चुनाव होता भी है, तो भी उन्हें चुनाव लडऩे की पात्रता नहीं रहनी चाहिए। आज तो हालत यह है कि गुजरात में कांगे्रस के जिस विधायक ने पार्टी छोड़ी और भाजपा में शामिल हुआ, उसे अगले ही दिन भाजपा ने अपना राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया। खुद भाजपा के लिए यह शर्मिंदगी की बात है कि अपने इतने नेताओं के रहते हुए वह इस तरह कल के दलबदलू को आज का प्रत्याशी बना रही है। यह सिलसिला लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, और कानून का बेजा इस्तेमाल है। इसके खिलाफ एक संशोधन तुरंत जरूरी है जिससे दल बदलने वाले लोग कम से कम कुछ बरस तो सदन और सत्ता से दूर रहें।
यह बात अपनी जगह सही है कि हर नौबत को देखते हुए जब कानून में फेरबदल होते हैं, तो वे फेरबदल खतरनाक भी रहते हैं। लेकिन आज हिंदुस्तान में सांसदों और विधायकों की खुली खरीद-फरोख्त लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक हो चुकी है, और इस पर कड़ी रोक लगनी चाहिए। जनादेश शब्द का सम्मान होना चाहिए, और जिस विधायक को या सांसद को जिस पार्टी के साथ जनादेश मिला है, उस पार्टी से अलग होते ही वह जनादेश समाप्त मान लेना चाहिए, फिर चाहे यह अलग होना अकेले हो, या एक तिहाई भीड़ के साथ हो।

सूचना के अधिकार के बीच सिंचाई विभाग की अपना भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश

संपादकीय
31 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों से भरे हुए सिंचाई विभाग के सचिव ने अपने अफसरों को लिखा है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो जैसी दूसरी जांच एजेंसियों या राजभवन जैसी संस्थाओं से मांगी गई जानकारी विभागीय अनुमोदन के बिना सीधे न दी जाए। इस पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने आपत्ति करते हुए इस आदेश को गैरकानूनी बताते हुए मुख्य सचिव को लिखा है कि जानकारी देने से मना करने वाले कानून के खिलाफ काम करेंगे। यह आदेश हैरान करने वाला है क्योंकि एक तरफ तो देश में सूचना का अधिकार लागू किया गया है, और उसकी गारंटी के लिए हर राज्य में संवैधानिक शर्त के रूप में सूचना आयोग बनाए गए हैं, सूचना न देने पर जुर्माने का प्रावधान भी है। दूसरी तरफ सरकार का कोई विभाग इस तरह की रोक लगाकर अपने भीतर के भ्रष्टाचार को छुपाने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा। आज सिंचाई विभाग के कई आदेश हवा में तैर रहे हैं जिसमें सिंचाई मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के परिवार की जमीन के मामलों में विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, यह बात उजागर होने के पहले से ही विभाग को यह मामला अच्छी तरह मालूम था, और ऐसा विभाग जांच एजेंसियों से भी जानकारी छुपाने की कोशिश कर रहा है, तो राज्य शासन को इस आदेश को खारिज करना चाहिए।
दरअसल नेताओं और अफसरों को सूचना के अधिकार नहीं सुहाते। अब जनता की पहुंच कानूनी हक के साथ सरकारी फाईलों तक हो चुकी है, और आम जनता भी जिस जानकारी को सीधे मांग सकती है, उस जानकारी को भी जब अपने बड़े-बड़े अफसरों को देने से मना किया जा रहा है, तो इससे विभाग की नीयत साफ दिखती है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और सिंचाई विभाग के बीच कुछ हफ्तों से एक तनातनी चल रही थी जब सिंचाई विभाग के कुछ भ्रष्ट मामलों पर एसीबी ने जांच शुरू की। इसके खिलाफ सिंचाई मंत्री ने मुख्यमंत्री को यह लिखा कि ऐसी जांच से विभाग के निर्माण कार्य प्रभावित होंगे। यह बात जगजाहिर है कि छत्तीसगढ़ में सरकारी निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार बहुत ही आम बात है। जब-जब एसीबी के छापे पड़ते हैं, तो इन विभागों के अधिकारियों से दसियों करोड़ की काली कमाई बरामद होती है, और यह जाहिर है कि विभाग के निर्माण बजट का एक चौथाई हिस्सा भ्रष्टाचार में चले जाता है। ऐसे भ्रष्ट विभाग भी जब जानकारी को छुपाकर रखना चाहते हैं तो सरकार के काम में ईमानदारी और पारदर्शिता की थोड़ी-बहुत भी संभावना खत्म हो जाती है।
सिंचाई विभाग का एसीबी से टकराव भ्रष्टाचार को छुपाने, दबाने, और जारी रखने की एक खुली कोशिश है, और कल से शुरू हो रही विधानसभा में भी इस बारे में विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। हमारा तो सुझाव यह है कि राज्य के जितने निर्माण विभाग हैं उन पर निगरानी रखने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम और काबिल एक ऐसे बड़े अफसर को इन विभागों के बाहर से लाना चाहिए जो कि समय रहते गड़बड़ी को पकड़ सके। जब एनीकट बह जा रहे हैं, बांध फूट जा रहे हैं, नहरों की गड़बड़ी पकड़ में आ रही है, तो उसके बाद फिर किसी जांच से नुकसान की भरपाई तो नहीं हो पाती। राज्य सरकार को चाहिए कि मुख्य सूचना आयुक्त का जो पद साल भर से खाली पड़ा हुआ है, उस पर किसी ईमानदार व्यक्ति को नियुक्त करे, वरना सरकारी विभाग अपने भ्रष्टाचार को दबाने और छुपाने में जितनी खुली कोशिश कर रहे हैं, वह सिंचाई विभाग की इस चि_ी से जाहिर है। मुख्यमंत्री को इस बारे में तुरंत देखना चाहिए। 

नफरती-हिंसा रोकने के लिए केन्द्र-राज्य तुरंत कुछ करें

संपादकीय
30 जुलाई 2017


केरल में आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या के खिलाफ आज प्रदेश स्तर का बंद रखने का आव्हान भाजपा-आरएसएस ने किया है। वहां पुलिस ने इस हत्या के मामले में ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है जो कि सीपीएम से जुड़े हुए बताए गए हैं। राज्य में आरएसएस और सीपीएम के लोगों के बीच बरसों से ऐसी खूनी लड़ाई चल रही है जिसमें सड़कों पर एक-दूसरे पर बम भी चलाए जाते हैं, और कत्ल भी किए जाते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले एक सीपीएम कार्यकर्ता के कत्ल के पुराने मामले में आरएसएस के कई लोगों को सजा हो चुकी है। दोनों ही तरफ से लड़ाई कत्ल तक पहुंच जाती है, और देश में शायद केरल अकेला राज्य है जहां पर इन दोनों के बीच टकराहट इतनी हिंसक है।
कुछ अरसा पहले तक बंगाल में भी ममता के समर्थकों और वामपंथियों के बीच ऐसा ही टकराव देखने मिलता था, लेकिन केरल जितने कत्ल वहां भी देखने में नहीं आते। इसकी एक वजह तो शायद यह है कि केरल में हिन्दू धर्म छोड़कर ईसाई और मुस्लिम बनने वाले लोगों की बहुत बड़ी संख्या है। वहां पर स्थानीय स्तर पर लोग ईसाई बनते आए हैं, और खाड़ी के देशों में काम करने जाने वाले लोगों में से बहुत से लोग वहां पर काम की सुविधा और इजाजत के लिए मुस्लिम भी बनते हैं। इस तरह केरल में धार्मिक अनुपात पिछली आधी-पौन सदी में बड़ा बदला है, और यह बात आरएसएस के लिए एक किस्म की चुनौती रहती है कि वहां पर अब तक जो हिन्दू हैं, उन्हें संगठित किया जाए, और खासकर उन वामपंथी कार्यकर्ताओं से टक्कर ली जाए जो कि धर्म परिवर्तन के मामले को कोई महत्व नहीं देते हैं।
लेकिन देश के एक प्रदेश में होने वाली हिंसा का दूसरी जगहों पर भी बड़ा बुरा असर पड़ता है। आज ही उत्तरप्रदेश की खबर है कि वहां योगी राज के चलते मेरठ में एक मजार पर सिंदूर जैसा रंग पोतकर उस पर बजरंग बली की प्रतिमा बिठा दी गई। और ऐसा करने वाले एक हिन्दू संगठन ने यह कहा कि अमरनाथ में यात्रियों पर हुए हमले और कश्मीर में भारतीय फौज पर चलने वाले पत्थरों के जवाब में पूरे उत्तरप्रदेश में मजारों का भगवाकरण किया जाएगा। इसका एक वीडियो भी सामने आया है जो बताता है कि ऐसा साम्प्रदायिक जुर्म करने वाले लोगों का हौसला आज कितना बुलंद है। इसके साथ-साथ मध्यप्रदेश की एक खबर है कि किस तरह बीफ के शक में एक मुस्लिम महिला के साथ हिंसा की गई है। ऐसी सारी घटनाओं की प्रतिक्रिया देश के दूसरे हिस्सों में तो होती ही है, देश के बाहर भी उन जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इसकी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ती है जहां पर स्थानीय सरकारें किसी धर्म को महत्व देती हैं। अब जैसे खाड़ी के देश हैं, वहां पर उन तमाम घटनाओं की प्रतिक्रिया हिन्दुस्तानियों को झेलनी पड़ती है जो कि भारत में मुस्लिमों के खिलाफ होती हैं।
पूरी दुनिया में जगह-जगह सिक्खों को लोगों की हिंसा झेलनी पड़ती है, भेदभाव झेलना पड़ता है, क्योंकि पश्चिम के लोग उनकी पगड़ी और पहरावे से उन्हें मुस्लिम मान बैठते हैं, और दुनिया में जगह-जगह मुस्लिम आतंकी जो हिंसा कर रहे हैं, उसका हर्जाना अमन-पसंद मुस्लिमों के साथ-साथ सिक्खों को भी देना पड़ता है। और सिर्फ हिंसा से यह भेदभाव सामने नहीं आता, भारत में होने वाले ऐसे हमलों को देखते हुए पूरी दुनिया में भारत की तस्वीर गंदी होती है, यहां आने वाले पर्यटक घटते हैं, यहां से कारोबार करने की दिलचस्पी घटती है।
भारत सरकार को बहुत तेजी से सारे प्रदेशों के साथ मिलकर देश में फैल रहे नफरत के सैलाब को रोकना चाहिए। अभी दो दिन पहले ही दिल्ली के अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने इंटरनेट पर अपने पेज पर भारत में नफरती-हिंसा की सारी घटनाओं को एक साथ इक_ा करके रखा है। इसे देखकर दिल दहल जाता है कि यह देश किस तरफ जा रहा है। इसलिए आज केन्द्र और राज्य की सरकारों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और हिंसा को रोकना चाहिए। हिंसा के जख्म बरसों तक जवाबी हिंसा के लिए लोगों को उकसाते हैं।

नवाज शरीफ के मामले से निकला सबक, जुर्म पकड़ आ ही जाता है

संपादकीय
29 जुलाई 2017


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार मामलों में जिस तरह से कुर्सी छोडऩी पड़ी, वह पाकिस्तान में कोई नई बात नहीं है। उनसे पहले उनके सबसे बड़े विरोधी भुट्टो-जरदारी परिवार के आसिफ अली जरदारी के भ्रष्टाचार पकड़ में आए थे, और उनके खिलाफ भी अदालती फैसले हुए थे। दरअसल जहां-जहां लोकतंत्र कमजोर होता है, मीडिया और अदालत जैसे लोकतांत्रिक संस्थान कमजोर होते हैं, जहां आतंकी या फौजी हावी होते हैं, जहां पर धार्मिक कट्टरता राज करती है, वहां पर इस तरह के भ्रष्टाचार बढऩा तय रहता है। इसलिए नवाज शरीफ का हटना महज वक्त की बात थी, किसी को उनके हटने पर शक नहीं था, यह नौबत कब आएगी, सिर्फ इसका इंतजार हो रहा था। और अब दूसरा इंतजार इस बात का हो रहा है कि वे अपने परिवार के किसको अपनी कुर्सी देते हैं। कल तक उनके भाई का नाम सुर्खियों में आ रहा था, और आज सुबह ऐसी भी एक खबर है कि वे लालू की राबड़ी की तरह अपनी पत्नी को प्रधानमंत्री बना सकते हैं। उनकी जो बेटी सियासत में शामिल थी, और जिसके सामने एक अच्छा राजनीतिक भविष्य हो सकता था, वह भी नवाज के भ्रष्टाचार में शामिल मानी गई है, और उसके भी चुनाव लडऩे पर अदालती रोक लग गई है।
लेकिन भारत-पाकिस्तान जैसे देशों में भ्रष्टाचार न तो नया मुद्दा है, और न ही बड़ा मुद्दा है। भारत में भी मुख्यमंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार करने वाले ओमप्रकाश चौटाला जेल में ही हैं, और भी कई केन्द्रीय मंत्री जेल जाकर आ चुके हैं। लेकिन जिन-जिन देशों में सत्ता भ्रष्टाचार से जुड़ी रहती है, वहां पर एक वक्त ऐसा आता है जब तक ताकतवर लोगों के भ्रष्टाचार भी उजागर होते हैं, और ऐसे लोगों को नवाज शरीफ का यह मामला देखना चाहिए। उनकी बड़ी होशियार और पढ़ी-लिखी, तजुर्बेकार और दौलतमंद बेटी ने जालसाजी-धोखाधड़ी करते हुए एक ऐसा निजी दस्तावेज तैयार किया था जिसे उन्होंने पुराना कागज बताया था, लेकिन जिसका प्रिंट निकालते हुए उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के एक ऐसे फॉंट का इस्तेमाल किया था जो कि उस पुरानी तारीख पर प्रचलन में ही नहीं था। नतीजा यह निकला कि वे कागजात अदालत में फर्जी साबित हो गए, और उसी बुनियाद पर यह केस खड़ा हो गया, सजा हो गई।
भ्रष्टाचार करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि उससे दौलत तो मिल जाती है, लेकिन जैसे कि किसी भी दूसरे जुर्म के सुबूत छूटते चलते हैं, भ्रष्टाचार के भी सुबूत कायम रहते हैं, और लालू जैसे लोग, कई दूसरे नेताओं और अफसरों जैसे लोग जेल चले जाते हैं, सजा पा जाते हैं, और उनका चुनावी भविष्य खत्म हो जाता है। यह एक अलग बात है कि भारत और पाकिस्तान की राजनीति में सजायाफ्ता नेता भी अपने कुनबे को कुर्सी पर बिठाकर बैक सीट ड्राइविंग करते चलते हैं, और उनके सजा पाने से उनकी पार्टी खत्म नहीं हो जाती। आज हम इस मुद्दे पर महज इसलिए लिख रहे हैं कि भ्रष्टाचार या इस किस्म के दूसरे जुर्म करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि साजिश और झूठे सुबूत कभी भी इतने गहरे नहीं दफनाए जा सकते कि उनको खोदकर निकाला न जा सके। कहीं न कहीं हर मुजरिम से चूक होती है, और सत्ता में ऊपर बैठे हुए लोग तो अपने अधिकतर जुर्म आसपास के सहयोगियों की मदद से ही कर पाते हैं, और दुनिया का यह इतिहास है कि ऐसे सहयोगी मुसीबत आने पर अदालत में सरकारी गवाह बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। एक वक्त था जब कम्प्यूटर और टेलीफोन नहीं थे, और जुर्म के सुबूत आसानी से पकड़ में नहीं आते थे। लेकिन अब जांच एजेंसियों के औजार अधिक बारीक हो गए हैं, इसलिए हर तरह के जुर्म पकड़ में आ ही जाते हैं। पाकिस्तान का कई बार प्रधानमंत्री रहा हुआ आदमी कम्प्यूटर के फॉंट के गलत इस्तेमाल से कुर्सी खो बैठा, और चुनावी भविष्य भी खो बैठा। यह देखते हुए भारत में भी लोगों को अपने काम के बारे में दुबारा सोचना चाहिए।

संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होना बेहतर

संपादकीय
28 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ में इन दिनों रोज सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन बढ़ गए हैं। राजनीतिक दलों के नेता, और छात्र नेता किसी न किसी जगह प्रदर्शन करते दिखते हैं। और कुछ को उम्मीद है कि कॉलेज-विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव होंगे, और हर किसी को मालूम है कि सवा साल बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं, तो बहुत से नेताओं की नजरों में कोई न कोई सीट है, और पार्टियों के तो अपने मुद्दे हैं ही। ऐसे में छत्तीसगढ़ के पुलिस-प्रशासन के पास पहुंचने वाले मामलों का भविष्य अंधकारमय है। प्रदेश शासन की प्राथमिकता चुनाव तक पूरे होने वाले काम हैं, नीचे के अफसरों की प्राथमिकता चुनाव तक या उनके अपनी कुर्सी पर रहने तक कानून-व्यवस्था कायम रखना है, और ऐसे में दूरगामी प्रभाव वाले, या कि दीर्घकालीन हित वाले काम छेडऩे की कोई सोच भी नहीं रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सहित बाकी जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वे सभी इसी तरह के चुनावी मोड में आ गए हैं, और लंबी सोच को फिलहाल ताक पर धर दिया गया है। लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने आने के बाद यह चर्चा शुरू की थी कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाने चाहिए? हम यह भी सोचते हैं कि इसके साथ-साथ म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव भी क्यों न करवाए जाएं? दरअसल मोदी की पिछले आम चुनाव में लोकप्रियता और कामयाबी साबित होने के बाद भाजपा और एनडीए का ऐसा सोचना जायज है कि विधानसभाओं के चुनाव भी साथ-साथ निपट जाएं। अगर ऐसा हुआ रहता तो पंजाब या गोवा या मणिपुर में भी भाजपा-एनडीए को शायद जीत मिल सकती थी। इसके साथ-साथ देश में चुनावी खर्च भी कम हो सकता था, और सरकारों के काम करने के तरीके में भी ऐसा फर्क आ सकता था कि बिना चुनावी दबाव के सरकारें बाद में पांच बरस काम कर सकतीं।
हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि छह-छह महीने में तीन चुनाव होते हैं, और सबसे पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से सत्तारूढ़ पार्टी फूंक-फूंककर कदम रखने लगती है जो कि तीसरे चुनाव तक जारी रहता है। ऐसे में करीब ढाई बरस का समय सरकार चुनावी-दबाव में निकालती है, और उसके फैसले बहुत उत्पादक नहीं रह जाते। कुछ दूसरे राज्यों में ये चुनाव पांच बरसों में और अधिक बिखरे हो सकते हैं, और वहां पर राज्य सरकार अपना पूरा ही कार्यकाल चुनावी मोड में निकालती हो सकती है। इसलिए लोकतंत्र में यह एक अच्छी बात हो सकती है कि संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। अब यह देखें कि ऐसी सोच में दिक्कत क्या-क्या है।
पहली बात तो यह कि देश भर में जब एक तारीख तय की जाएगी तो कई राज्य ऐसे होंगे जहां की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ रहेगा। लेकिन ऐसे में चुनाव आयोग पर यह फैसला छोड़ा जा सकता है कि कौन सी ऐसी तारीख छांटी जाए जिसमें अधिकतर राज्यों के चुनाव एक साथ करवाए जा सकें, और फिर हो सकता है कि उसके लिए संसद का कार्यकाल कुछ कम करना पड़े। ऐसा एक ही बार करना पड़ेगा, और उसके बाद जब तक कोई विधानसभा भंग न हो, राज्य के चुनाव संसद के साथ ही होते रहेंगे। हमारा मानना है कि देश-प्रदेश को चुनावी दबावों से मुक्त होकर पांच बरस काम करने का मौका मिलना चाहिए, और वह देश-प्रदेश सभी के लिए अधिक उत्पादक स्थिति रहेगी। अब राज्यों में सरकारों को भंग करना करीब-करीब खत्म हो चुका है, और राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत भी नहीं आती है। ऐसे में एक साथ चुनाव करवाने के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ताकि सरकारें लुभावनी राजनीति से परे एक लंबा कार्यकाल गुजार सकें। 

बिहार में अब हारा-जीता गठबंधन नीतीश की हार, भाजपा की जीत

संपादकीय
27 जुलाई 2017


बिहार में किसकी जीत हुई, और किसकी हार इसका विश्लेषण कुछ जटिल है। जीत और हार के पैमाने पर बिहार के पिछले चौबीस से कम घंटों को रखने के लिए पहले तो यह तय करना होगा कि जीत किसे मानें, और हार किसे। अलग-अलग नजरिए से अलग-अलग लोग जीते और हारे हुए दिखेंगे। सत्ता पर काबिज बने रहने के नजरिए से नीतीश जीते हुए हैं क्योंकि वे कुछ घंटों के भीतर ही मुख्यमंत्री, कार्यवाहक मुख्यमंत्री, और फिर नए मुख्यमंत्री बन गए हैं, और हिन्दुस्तान में ऐसी रफ्तार कम ही देखी गई है। दूसरी तरफ वे अगले आम चुनाव में विपक्ष के एक सर्वसम्मत या अधिकतम संभव सहमति वाले प्रधानमंत्री-प्रत्याशी बनने की संभावना हमेशा के लिए खो चुके हैं। बिहार के सत्तारूढ़ महागठबंधन के टूटने के लिए अकेले जिम्मेदार लालू यादव का कुनबा भी राजनीति और कानून में हारा हुआ है, लेकिन वह काली कमाई के मामले में जीता हुआ है। कांग्रेस पार्टी की हालत बिहार और वहां के कल तक के महागठबंधन कुछ वैसी थी जैसी कि बड़ों के खेल में शामिल किसी बच्चे को रियायत देते हुए उसे दूध-भात कह दिया जाता है, यानी उसका एक रियायती दर्जा रहता है। कांग्रेस के पास खोने-पाने को कुछ भी नहीं है, इसलिए वह आज यह लतीफा झेल रही है कि तलाक तो लालू और नीतीश में हुआ, लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई। हम मजाक में भी महिला के लिए इस शब्द के खिलाफ हैं, लेकिन देश की आज की राजनीतिक चर्चा का एक नमूना यहां रख रहे हैं।
अब कुछ सवाल और खड़े होते हैं जिन पर लोग सोच सकते हैं। बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार भाजपा की पिछली भागीदारी से निकलकर एक नए गठबंधन में शामिल हुए थे, और उनकी इस पहल की अकेली बुनियाद भाजपा और संघ का विरोध थी। उनके इस ताजा रूख के चलते लालू-सोनिया उनके साथ थे, और बिहार में यह गठबंधन एक ऐतिहासिक बहुमत लेकर आया था, और मोदी के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को बिहार में खूंटा गाड़कर बांध दिया गया था। इसलिए आज जब अपनी उगली हुई तमाम बातों को निगलकर नीतीश कुमार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना रहे हैं, तो यह सबसे बड़ी जीत तो भाजपा की है जिसने अगले आम चुनाव के विपक्षी गठबंधन का भट्टा बैठा दिया है, और एक संभावित प्रतिद्वंद्वी को अपने 18 राज्यों में से एक राज्य तक सीमित कर दिया है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विपक्ष का यह सबसे बड़ा नुकसान है और अगले आम चुनाव में इस नुकसान से उबरने का विपक्ष के पास अब कोई रास्ता बचा नहीं दिखता है।
नीतीश और भाजपा ने एक-दूसरे के खिलाफ पिछले कुछ बरसों में जितना कुछ कहा है, उसे लोग तो याद रखेंगे, लेकिन बिहार की सत्ता पर बने रहने के लिए नीतीश और इस सत्ता पर आने के लिए भाजपा ने, अपना उगला सब निगलना तय कर लिया है। अब अमित शाह भी यह नहीं कहेंगे कि अगर नीतीश मुख्यमंत्री बनेंगे तो फटाके पाकिस्तान में फूटेंगे, और न नीतीश कुमार अब भारत को संघमुक्त करने का बीड़ा उठाएंगे। लेकिन ऐसी नौबत के बीच अब जब बिहार की नीतीश-भाजपा सरकार एक हकीकत बन चुकी है, तो भारत की राजनीति की एक दूसरी हकीकत के बारे में भी बाकी पार्टियों को सोचना चाहिए।
बिहार में महागठबंधन के टूटने के पीछे लालू-कुनबे पर भ्रष्टाचार के जो नए मामले सामने आए, उनकी बड़ी अहमियत रही। दिग्विजय सिंह जैसे लोग आज नीतीश को यह जरूर याद दिला सकते हैं कि जिस दिन गठबंधन में शामिल हुए थे, क्या उस दिन लालू कुनबे पर चल रहे मुकदमों की जानकारी नहीं थी? लेकिन यह बात अपनी जगह सच है कि गठबंधन में भागीदार लालू खुद सरकार में शामिल नहीं थे, और उनका बेटा जो कि नीतीश के साथ उपमुख्यमंत्री था, उसके खिलाफ कानून ने ताजे मामले दर्ज किए थे, और लालू कुनबे की अथाह संपत्ति का सत्ता से रिश्ता साफ होते चल रहा था। ऐसे में गठबंधन शायद बना रह सकता था, अगर भ्रष्टाचार के मामले में घिरा लालू का बेटा मंत्रिमंडल से हट जाता। लेकिन अगर लालू यादव अपने बेटे को नहीं बचा पाते, तो अपनी राजनीति भी नहीं बचा पाते, इसलिए गठबंधन चाहे न बचा हो, गठबंधन की आखिरी सांस तक लालू ने अपने बेटे की कुर्सी को बचाया, और फिर कांग्रेस के पास तो इस गठबंधन में बोलने की कोई जुबान है नहीं। बिहार में अपने दम पर उसकी कोई हस्ती नहीं है, और वह नीतीश-लालू के रहमोकरम पर सत्तारूढ़ राजनीति में बनी हुई थी।
बिहार की कल की इस ताजा सत्तापलट से देश में एनडीए की एक और बहुत बड़ी जीत हुई है, और यह बात साफ हुई है कि कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार से लदे हुए राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई नहीं लड़ सकते। कल से अब तक बिहार के इस फेरबदल पर जनादेश शब्द का बड़ा इस्तेमाल हो रहा है कि बिहार की जनता ने नीतीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन को भाजपा के खिलाफ जनादेश दिया था, और उससे गद्दारी करके नीतीश भाजपा के साथ सरकार बना रहे हैं। इस तोहमत का जवाब देते हुए कई लोग यह भी याद दिला रहे हैं कि 1980 में हरियाणा में भजनलाल जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे, और बहुत सारे विधायकों सहित कांग्रेस में चले गए थे, और मुख्यमंत्री बने रहे थे। इसलिए जनादेश के ऐसे किसी बड़े सम्मान की भारत में कोई बड़ी गौरवशाली परंपरा रही नहीं है। नीतीश के जाने पर राहुल के यह कहने की कोई अहमियत नहीं है कि उन्होंने गठबंधन को धोखा दिया है। ऐसे ही धोखेबाज भजनलाल के लिए राहुल के कुनबे ने 1980 में लाल कालीन बिछाया था।
दूसरी तरफ बिहार की जनता के एक तबके का यह भी मानना है कि बहुत लंबे अरसे बाद केन्द्र और राज्य दोनों जगह एक गठबंधन की सरकार रहेगी, और इससे बिहार का भला होगा। यह एक और बात है कि पिछले चौबीस घंटे में नीतीश सत्ता को तो एक नए सिरे से पा गए हैं, लेकिन अपनी साख पूरी तरह खो बैठे हैं। 

नेहरू पर तंगदिली के साथ कोविंद की पारी शुरू

संपादकीय
26 जुलाई 2017


नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद के अपने पहले भाषण में बड़ी सावधानी से बहुत से नाम लिए जिन्हें उन्होंने महान परंपरा बनाने वाला कहा। लेकिन इस फेहरिस्त में उन्होंने नेहरू का नाम छोड़ दिया। इस पर आज सुबह संसद में कांग्रेस ने हंगामा भी किया कि भाजपा के अपने आस्था केन्द्र दीनदयाल उपाध्याय का नाम गांधी के साथ, गांधी की बराबरी से लिया गया, और नेहरू के नाम का जिक्र भी नहीं किया गया। लेकिन कांग्रेस ने तो यह बात आज उठाई, आज सुबह के अनगिनत अखबारों में स्तंभकारों और संपादकों ने इस बात को पहले ही उठा दिया था, और जाहिर है कि उन्होंने कल ही यह बात लिख दी होगी। इन दोनों बातों को अधिकतर गंभीर संपादकों ने समझा, और टिप्पणी के लायक माना।
जब कभी कोई किसी ऐतिहासिक मौके पर आजाद भारत में, या कि भारत की आजादी में योगदान देने वालों के नाम गिनाते हैं, तो कांग्रेसी-गैरकांग्रेसी किसी भी तरह की विचारधारा के लोग गांधी के तुरंत बाद नेहरू का नाम गिनाते आए हैं, और अनगिनत इतिहासकारों ने भी भारत की आजादी और भारत-निर्माण में गांधी के तुरंत बाद नेहरू को जगह दी हुई है। जब कभी बड़प्पन दिखाने का कोई मौका रहता है, तब अगर तंगदिली दिखाई जाती है, तो वह तुरंत इस तरह खटक जाती है कि मानो चावल में कंकड़ हो। अगर कंकड़ न हो तो चावल के अच्छे या बुरे होने की तरफ किसी का ध्यान भी न जाए। कल अगर नए राष्ट्रपति ने दर्जन भर नामों की लिस्ट में नेहरू का नाम भी गिना दिया होता, तो उससे न तो उस सरकार की विचारधारा पर कोई चोट पहुंचती जिसने कि उन्हें राष्ट्रपति बनाया है, और न ही राष्ट्रपति के पद की गरिमा इस तरह से कम होती कि पहले ही भाषण को लेकर कोविंद को व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ता। दरियादिली लोगों की इज्जत बढ़ाती है, और तंगदिली उनकी इज्जत उससे अधिक रफ्तार से घटा देती है। कोविंद को कम से कम यह तो याद रखना था कि कुछ महीने पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी नेहरू की तारीफ सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं, और यह कोई छुपी हुई बात तो है नहीं कि मोदी और उनकी पार्टी के मन में नेहरू के लिए कोई बहुत अधिक सम्मान है नहीं।
एक तरफ तो रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी मनोनीत होने के बाद, फिर चुनाव जीतने के बाद, और फिर शपथ ग्रहण के बाद हर बार सहमति-असहमति, एकता और अनेकता, और वैचारिक विविधता की चर्चा करते हुए अपने को दलगत राजनीति से ऊपर रखने की बात कही थी। लेकिन अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण इस पहले भाषण में, और खासकर लिखित भाषण में उन्होंने जिस अंदाज में नेहरू को अनदेखा किया है, वह उनके पद की गरिमा के ठीक खिलाफ गया है, और इससे उस पार्टी का सम्मान भी घटा है जिसने उन्हें राष्ट्रपति बनाया है। नेहरू से असहमति एक अलग बात हो सकती है, लेकिन इस देश को आजाद कराने में, भारत को एक नए आजाद देश के रूप में बनाने में नेहरू से बड़ा योगदान और किसका था? आगे भी पांच बरस के कार्यकाल में राष्ट्रपति के सामने ऐसे बहुत से मौके आएंगे जब उन्हें अपनी मातृ संस्था की विचारधारा से ऊपर उठकर भारत के राष्ट्रपति के रूप में कहना होगा और करना होगा, और अगर वे ऐसे सार्वजनिक मौकों पर भी कमजोर पड़ेंगे, तंगदिली दिखाएंगे, तो इतिहास तो हर राष्ट्रपति को अच्छे से दर्ज करता ही है।

जेएनयू में फौजी टैंक की सोच हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद

संपादकीय
25 जुलाई 2017


समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे बहुत से विषयों पर अपनी एक मौलिक और उदार सोच के साथ ऊंचे दर्जे की पढ़ाई और शोध कार्य के लिए विश्वविख्यात जेएनयू को उग्र राष्ट्रवाद का निशाना बनाया जा रहा है। एनडीए सरकार के आने के बाद वहां कुलपति बने जगदेश कुमार अब चाहते हैं कि विश्वविद्यालय कैंपस में भारतीय फौज का कोई रिटायर्ड युद्धक टैंक लाकर खड़ा किया जाए ताकि वहां के छात्रों के बीच फौज के लिए पे्रम उपज सके। जगदेश कुमार पिछले कुछ अरसे से वामपंथी रूझान वाले छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों से लगातार टकराव लिए हुए चल रहे हैं, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जेएनयू की पहचान एक वामपंथी रूझान वाले शिक्षा केंद्र के रूप में बनी हुई है। वहां के छात्र-छात्राओं को बदनाम करने के लिए दो बरस पहले छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को झूठे मामलों में झूठे वीडियो सुबूत गढ़कर फंसाया गया था, लेकिन ऐसी साजिश करने वाले दिल्ली पुलिस अदालत में खड़ी नहीं हो पाई। लेकिन तब तक पूरे देश में वामपंथ-विरोधियों ने कन्हैया कुमार और जेएनयू को देशद्रोही करार देने का अभियान छेड़ दिया था, जो कि अब तक जारी है, और विश्वविद्यालय ने फौजी टैंक खड़ा करने की सोच इस अभियान का ही एक हिस्सा है।
जेएनयू किसी भी कार्रवाई के लिए पुलिस और दूसरी एजेंसियों के सामने उतना ही खुला हुआ है जितना कि देश का कोई भी दूसरा विश्वविद्यालय। ऐसे में एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान को मौलिक सोच से परे करने का काम भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भी चौपट करेगा, कर रहा है, क्योंकि देश के बाहर चाहे आईआईटी-आईआईएम के लोगों को रोजगार अधिक मिलता हो, सामाजिक विज्ञान से जुड़े तमाम पहलुओं पर देश की साख जेएनयू से ही है। अब वामपंथ-विरोधियों को यह भी सोचना चाहिए कि पूरी दुनिया में कहीं भी मौलिक सोच के लिए लोगों को वामपंथियों की ओर ही क्यों देखना पड़ता है? दक्षिणपंथियों में स्तर के विद्वान, लेखक, या प्राध्यापक क्यों नहीं पनप पाते हैं? इस आत्ममंथन से परे अगर देश के शिक्षा संस्थानों का हिंदूकरण या हिंदुत्वकरण करने, उन्हें राष्ट्रवाद के कारखाने बना देने का काम अगर किया जाएगा, तो हिंदुस्तानियों की पूरी पीढ़ी ही इसका नुकसान झेलेगी।
हम छत्तीसगढ़ में ही बनाए गए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को देखते हैं कि पिछले कई बरस से इस विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के बजाय राष्ट्रवादिता का अभियान चलते आया है, और उसी का नतीजा है कि देश के तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकारों के नाम पर बहुत ही औसत दर्जे के लोगों को बुला-बुलाकर गैरमीडिया मुद्दों पर राष्ट्रवादी कार्यक्रम करवाए गए, और यहां से मीडिया के पेशे में बहुत ही कम लोग आए पाए। नतीजा यह निकला कि इतने बरस गुजर जाने के बाद भी यह विश्वविद्यालय महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं तक सीमित है, और राष्ट्रवादी इसे अपने रंग में रंगने के एक कारखाने की तरह चला रहे हैं जिसका मीडिया में योगदान शून्य है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी की अपनी विचारधारा के मुताबिक बहुत से ओहदो को भरने का विशेषाधिकार रहता है। लेकिन न तो लोगों का कोई भला हो, और न ही संस्थान की साख बची रहे, ऐसे मनोनयन लोगों को पांच बरस की सहूलियत और मर्जी के लोगों को बाकी नौकरियां देने में तो काम आ सकती है, लेकिन इन संस्थानों की खोई हुई प्रतिष्ठा लंबे समय तक वापिस नहीं आ पाएगी, और बाकी की दुनिया के विद्वान लोग भारत को हिकारत की नजर से जरूर देखेंगे। जेएनयू में टैंक खड़ा करना एक हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद की सोच है, और इसमें यह देश झुलसकर रह जाएगा।

जुर्म करने की भड़ास निकालने का मौका देने वाली रोबो-डॉल!

आजकल
24 जुलाई 2017
जैसे-जैसे विज्ञान और टेक्नालॉजी अपनी सारी तरक्की लेकर लोगों की निजी जिंदगी को सहूलियतों से भरने में जुट गए हैं, समाज के तौर-तरीके और लोगों की अपनी सोच भी सामानों के साथ बदल रही है। एक वक्त जिन लोगों के बीच ओहदों या उम्र, या रिश्तों के फासलों का लिहाज रहता था, आज वे वॉट्सऐप पर एक-दूसरे को कोई उत्तेजक तस्वीर या फिल्म भेजने में पल भर भी नहीं सोचते। एक कमरे में बैठकर लोग टीवी पर ऐसे प्रोग्राम तो देखते हुए अब एक पीढ़ी गुजार चुके हैं जिन्हें किसी वक्त दो पीढिय़ां एक साथ नहीं देख पाती थीं। अब कम ही चीजें बिल्कुल अकेले वाली रह गई हैं।
टेक्नालॉजी ने बढ़ते-बढ़ते अब मशीनी इंसान बना लिए हैं, और मशीनी मजे की जिंदगी शुरू हो गई है। आज दुनिया भर में सेक्स-डॉल्स का बाजार खुल गया है और लोग बाजार से एक पुतला लेकर आ सकते हैं जो कि बड़े जटिल कम्प्यूटर से लैस भी है, और उससे अपने हमबिस्तर साथी की तरह मजा भी ले सकते हैं। अब यह मजा बढ़ते-बढ़ते इंसान की तमाम जरूरतों को पूरा करने जा रहा है। इन जरूरतों में लोगों की अपनी सेक्स की पसंद-नापसंद का ख्याल तो रखा ही जा रहा है, लेकिन इससे परे भी कुछ ऐसी बातों का भी ख्याल रखा जा रहा है जो कि जुर्म की दर्जे में आती हैं।
अभी कल की ही खबर है कि एक ट्रू कम्पेनियन नाम की कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर जो नए सेक्स रोबो बिक्री के लिए रखे हैं, उनमें उस रोबो के मूड की सेटिंग में एक ऐसी सेटिंग भी रखी गई है जो कि उसे सेक्स में दिलचस्पी न लेने वाली बना देती है। अब ऐसी गुडिय़ा जो बर्फीली मिजाज की कही जाएगी, उसके साथ सेक्स एक किस्म से बलात्कार जैसा होगा, और इसी मकसद से यह नई सेटिंग जोड़ी गई है। इस तरह इंसान की एक सामान्य सेक्स की जरूरत को पूरा करने के बाद अब उसके असामान्य और हिंसक सेक्स को पूरा करने के लिए उसे एक ऐसी मशीनी लड़की दी जा रही है जिससे वह बलात्कार की तरह का सेक्स कर सकता है।
आज हिन्दुस्तान जैसे देश सेक्स-अपराधों के शिकार हैं, और यह सिलसिला बढ़ते ही चलते दिख रहा है। दूसरी तरफ जिन देशों में इंसानी समाज ने अपने तौर-तरीके उदार रखे हैं, और लोगों को अपनी निजी जिंदगी के शारीरिक और मानसिक फैसले तय करने का पूरा हक दिया है, वहां पर सेक्स-जुर्म घटते भी जा रहे हैं, कहीं-कहीं खत्म सरीखे भी हैं। दूसरी तरफ जापान जैसे देश में निजी जिंदगी भी मशीनों पर इस कदर टिकती जा रही है कि लोग नए भावनात्मक या शारीरिक रिश्ते बनाने से डरने और कतराने लगे हैं, और उन्हें मशीनों से रिश्ता रखना ज्यादा महफूज लगने लगा है। लोग समाज में उठना-बैठना कम करने लगे हैं, शादियां घट गई हैं, प्रेम-संबंध और सेक्स-संबंध तेजी से घटते जा रहे हैं, और ऐसे ही समाज से मशीनी सेक्स की टेक्नालॉजी निकल रही है।
कुछ बरस पहले अमरीका के एक सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय एमआईटी के वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि जिस रफ्तार से मशीनी इंसान बन रहे हैं, और वे असली इंसानों के करीब आ रहे हैं, सन् 2050 तक इंसानों और मशीनों में कानूनी शादियां होने लगेंगी। अभी इस दिन को 30 से अधिक बरस बचे हैं, और इंसान ने बलात्कार के लायक रोबो भी तैयार कर लिए हैं, और इस हद तक तैयार कर लिए हैं कि वे बाजार में हैं, महज प्रयोगशाला में नहीं। अब बाजार के अपने कायदे रहते हैं, और वह दिन भी अधिक दूर नहीं है जब कम उम्र के रोबो बनते-बनते ऐसे छोटे बच्चों जैसे रोबो सेक्स के लिए बनने लगेंगे जिस पर आज कड़ी सजा है। और फिर समाज यह सोचने लगेगा कि क्या सेक्स-रोबो की सहूलियत समाज में सेक्स-अपराधों को घटा भी सकती है? मशीनें निजी सोच और सामाजिक सोच को किस तरह बदलती हैं, यह टीवी और मोबाइल फोन ने दिखा दिया है, और आगे यह सिलसिला और भी देखने मिलते रहेगा।
दो और छोटी-छोटी खबरें अभी सामने आईं, एक खबर में न्यूयार्क में एक सुरक्षा-रोबो इमारत में बने पानी के एक टैंक में गिर गया, तो पल भर में पूरी दुनिया में उसकी तस्वीरें फैल गईं कि रोबो ने खुदकुशी कर ली। अधिकतर लोगों ने इसे मान भी लिया। लेकिन इसी के आसपास एक दूसरी खबर निकलकर आई कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से विकसित रोबो या मशीनें अगर किसी समय इंसानों को मारने पर उतारू हो जाएंगे, जैसे कि फिल्मों में आज हर दिन ही देखने मिलता है, तो इंसान उन्हें कैसे रोकेंगे? कैसे उन मशीनों के दिमाग को हिंसा से दूर रखने की कोशिश हो सकेगी? एक तीसरी खबर कुछ ही दिन पहले आई कि किस तरह एक घर में पति-पत्नी के बीच कुछ हिंसक बातें हो रही थीं, और उस घर में लगे हुए एक उपकरण ने उन बातों को सुनकर हिंसा रोकने के हिसाब से पुलिस के नंबर पर खुद ही फोन लगा लिया, पुलिस वक्त पर पहुंच गई, और हिंसा को रोक दिया। अब यह बात उठ रही है कि घर के मामूली काम करने के लिए, लाईट या टीवी शुरू-बंद करने के लिए लगे ऐसे उपकरण अगर आसपास की बात सुनकर खुद फोन लगाकर पुलिस या किसी और को खबर करने लगें, तो ऐसी टेक्नालॉजी कौन-कौन सी संभावनाएं, और कौन-कौन सी आशंकाएं खड़ी करती है।
एक बार फिर जापान की एक मिसाल देना ठीक है जहां पर बाजारों में ऐसे पार्लर बने हुए हैं जिनके भीतर जाकर लोग भुगतान करके अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। वे कुछ सामान भी खरीद सकते हैं, और एक खाली कमरे में जाकर उन सामानों को तोड़कर अपना गुस्सा उतार सकते हैं, अपनी कुंठाओं से मुक्ति पा सकते हैं। दूसरी तरफ जापान में ही ऐसी सेक्स-सेवा मौजूद है जो सेक्स-कामगारों को स्कूली पोशाक में मौजूद रखती है क्योंकि बहुत से जापानी आदमी स्कूली छात्रा को अधिक उत्तेजक पाते हैं। इस तरह आज बाजार का कारोबार और टेक्नालॉजी इन दोनों की सोच लोगों की जरूरतों को पूरा करने की है। और जिस तरह आज लोगों की मोबाइल-ऑनलाईन जिंदगी के चलते निजी दोस्तों की जरूरत घट गई है, और दोस्ती की सामाजिकता कमजोर होती जा रही है, उसी तरह आज देह-सुख के लिए, और हो सकता है कुछ बरस जाकर मानसिक शांति के लिए भी लोग मशीनी साथियों के साथ हमबिस्तर होना बेहतर समझेंगे।
जापान पर अभी बनी एक गंभीर डॉक्यूमेंट्री फिल्म में वहां के बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें इंसानों से रिश्ते बनाने में जटिलताओं की वजह से घबराहट होती है। कई लोगों ने यह कहा कि रिश्तों का बोझ ढोना उन्हें मुमकिन नहीं लगता है। जाहिर है कि ऐसा समाज ही जीवन साथी जैसे रोबो बनाने में उत्साह दिखा रहा है, और यह सिलसिला जापान से परे भी हर उस समाज तक पहुंचेगा जो कि ऐसे रोबो खरीदने की ताकत रखेगी। मशीनों के साथ लोगों को यह सहूलियत होगी कि साथी का सच्चा या झूठा ऐसा बहाना सुनना नहीं पड़ेगा कि आज वे बहुत थक गए हैं, या कि सिर दर्द हो रहा है।

बीवी बेचने का फतवा देने वाले बददिमाग अफसर...

संपादकीय
24 जुलाई 2017


बिहार के एक कलेक्टर का एक वीडियो कल से टीवी चैनलों पर चल रहा है जिसमें वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से गरीबों को लताड़ते हुए, गाली देने के अंदाज में चीखते हुए कह रहे हैं कि अगर शौचालय बनाने का पैसा न हो, तो बीवी को बेच दो, और शौचालय बनाओ। अगर इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो अक्सर अपनी कही बात को तोड़-मरोड़कर छापने या दिखाने की तोहमत लगा देता, और बच निकलता। हालांकि अभी तक राज्य सरकार ने इस अफसर पर कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन ऐसी उम्मीद की जाती है कि गरीबों की ऐसी बेइज्जती करने वाले तानाशाह अफसर को तुरंत ही मैदानी कुर्सी से हटाकर पिछवाड़े के किसी दफ्तर में बिठाया जाएगा।
यह बात हर कुछ दिनों में किसी न किसी प्रदेश से सामने आती है कि किस तरह ताकत की कुर्सियों पर बैठे अफसर जनता को, या मातहत कर्मचारियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ सामंती सुलूक करते हैं। आमतौर पर जिला कलेक्टरों की कुर्सी पर बैठे हुए अफसरों के बीच से ऐसी बददिमागी कुछ अधिक दिखती है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले जिले इंदौर के कलेक्टर पर बनी एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की खबर सामने आई है जिसमें उस अफसर की महानता की स्तुति भरी हुई है, और उसके गुणगान की बातों में उस अफसर और उसके परिवार से बातचीत भी शामिल है। जाहिर है कि उस अफसर की मर्जी और संभवत: उसकी पहल पर ही यह स्तुति तैयार हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हम इस तरह के बहुत से आत्ममुग्ध अफसरों को देखते हैं जो कि अपने प्रचार के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, और अपनी निजी बातों को भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों सहित फैलाने में लगे रहते हैं। लोकतंत्र में इस तरह के प्रचार से बचकर अफसरों को अपने नाम और अपनी तस्वीरों को पीछे रखकर सरकार को आगे रखना चाहिए, लेकिन अफसर अपनी वाहवाही से बच नहीं पाते हैं, और बहुत से मामलों में तो वे सरकारी खर्च पर भी अपने और परिवार के प्रचार में लगे रहते हैं।
हमने पहले भी इसी कॉलम में यह सुझाया था कि अंग्रेजों के वक्त टैक्स कलेक्ट करने का काम होता था, और इसलिए जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अफसर को कलेक्टर कहा जाता था। अब तो सरकार जिलों से ऐसा कोई बड़ा टैक्स इकट्ठा करती नहीं है, और टैक्स इकट्ठा करने वाले विभाग अलग काम करते हैं। ऐसे में अंग्रेजों के वक्त का यह नाम खत्म करना चाहिए। लेकिन इससे परे इस कुर्सी के एक नाम और चलता है जिलाधीश, इस नाम से भी मठाधीश जैसी बू उठती है और यह नाम अफसरों में एक सामंती अहंकार पैदा कर देता है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बात की पहल कर सकती है कि कलेक्टरों और जिलाधीशों के पदनाम बदलकर जिला जनसेवक जैसा एक नाम बनाएं ताकि अफसरों को हमेशा यह ध्यान रहे कि उनकी बुनियादी जिम्मेदारी क्या है। आज तो छत्तीसगढ़ के बहुत से अफसर अपने जिलों से अपनी ऐसी तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं जिनमें वे महंगी-निजी गाडिय़ों को किराए पर लेकर उस पर कलेक्टर या कमिश्नर के नाम की तख्ती लगाकर उसका इस्तेमाल करते हैं, और कहीं उसका किराया कोई अफसर घोषित या अघोषित रूप से देते हैं, या फिर कोई सरकारी ठेकेदार उसका भुगतान करते हैं। राज्य सरकार को अफसरों की ऐसी मनमानी को तुरंत खत्म करना चाहिए, वरना बिहार के इस कलेक्टर की तरह छत्तीसगढ़ का भी कोई अफसर गरीबों को बेटी-बहू या बीवी बेचने का फतवा इसी तरह मंच से देने लगेगा। लोकतंत्र में अफसरों की भूमिका नीति-निर्धारण करने वाले विधायकों और सांसदों, और उनमें से चुनकर मंत्री बने लोगों के मातहत ही होनी चाहिए। इसके अलावा अफसरों का अपना कोई एजेंडा नहीं होना चाहिए, सिवाय लोकतंत्र के संवैधानिक दायरे के भीतर आने वाली सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों पर बने सरकारी कार्यक्रमों पर अमल करने के। हर राज्य की सरकार को अपने-अपने प्रशासनिक ढांचे में तुरंत ही एक लोकतांत्रिक बर्ताव लाना चाहिए, वरना सत्तारूढ़ पार्टी को अगले चुनाव में हराने की पर्याप्त क्षमता बददिमाग अफसरों के बर्ताव में रहती है। 

विशेषाधिकारों के खतरों की ताजा मिसाल है ट्रंप

संपादकीय
23 जुलाई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जिस तरह से जीतकर आए थे, उस पर भी अमरीका सहित दुनिया के बहुत से देशों के समझदार लोग हक्का-बक्का थे। लोगों को लग रहा था कि ऐसा नफरतजीवी और युद्धोन्मादी, सिद्धांतहीन, और बदसलूकी से भरा हुआ आदमी किस तरह चुनकर आ गया। अमरीकी जनता के एक मुखर हिस्से ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन भी किया था कि यह उनका राष्ट्रपति नहीं है। तब से लेकर अब तक लगातार ट्रंप के बारे में विचलित करने वाली बातें सामने आती रही हैं, और अब तो ट्रंप सरकारी, कानूनी, और संसदीय जांच से बुरी तरह घिरे हुए दिख रहे हैं कि उनके चुनाव अभियान के दौरान उनके बेटे, दामाद, और सहयोगियों ने रूस के उन लोगों के साथ मुलाकात की, और तालमेल बनाया जिन्होंने हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ नुकसान पहुंचाने वाली जानकारी देने का वादा किया था। अब जब यह लग रहा है कि ट्रंप परिवार जांच के ऐसे घेरे में है जो कि मजबूत दिखता है, और खुद ट्रंप ऐसे हाल में संसद में महाभियोग में घेरे जा सकते हैं, तो ऐसी खबरें आ रही हैं कि वे राष्ट्रपति के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके अपने परिवार को, सहयोगियों को, और अपने आपको भी क्षमादान दे सकते हैं।
यह एक बहुत ही भयानक सोच दिखती है जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति को मिले हुए इस विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल वह अपने ही परिवार को बचाने के लिए कर सकता है, और खुद अपने आपको बचाने के लिए। जब इस बारे में ट्रंप से पूछा गया तो उनका कहना है कि उन्हें किसी को भी माफी देने का पूरा हक है। अमरीकी संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति लोगों को उनका जुर्म साबित हो जाने के बाद, या उन पर कोई मुकदमा शुरू होने के पहले भी, किसी भी वक्त उन्हें माफी दे सकते हैं। आमतौर पर अमरीकी राष्ट्रपति कुछ बहुत ही चुनिंदा मामलों में, दूसरे देशों की सरकारों की अपील पर उन देशों के नागरिकों को माफी देते आए हैं, और कभी-कभी अमरीका के कुछ लोगों को भी। लेकिन ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि इस अधिकार का उपयोग कोई अमरीकी राष्ट्रपति अपने परिवार और अपने खुद के जुर्म को खत्म करने के लिए करे, लेकिन आज अमरीका इसी मोड़ पर खड़ा हुआ दिख रहा है। अपने अनैतिक आचरण या गैरकानूनी काम के लिए संसद में महाभियोग का सामना करना अमरीका के लिए एकदम अनोखा भी नहीं है। दो चर्चित अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, और बिल क्लिंटन अपने सरकारी और निजी फैसलों की वजह से संसद में महाभियोग झेल चुके हैं, लेकिन किसी ने भी कभी अपने आपको माफ करने जैसा शायद सोचा भी नहीं था। यह कुछ उसी किस्म का होगा कि मानो भारत में राष्ट्रपति के परिवार ने, या खुद राष्ट्रपति ने कोई जुर्म किया, और फिर खुद ही उसे माफी दे दी। हालांकि भारतीय लोकतंत्र इस मामले में अमरीका के मुकाबले अधिक परिपक्व है, और यहां पर राष्ट्रपति को अदालत के आखिरी फैसले हो जाने के बाद, और वह भी महज मौत की सजा के मामलों में की गई रहम की अपील पर माफी देने का हक है, न उसके पहले, और न ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश के बिना। अमरीका ने अपने राष्ट्रपति को अधिक हक दिए हुए हैं, और अब वह इनके बेजा इस्तेमाल का गवाह भी बन सकता है।
दरअसल ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अमरीका कई तरह के हितों के टकराव के खतरे में पड़ गया है। बहुत से देशों के साथ ट्रंप के परिवार के कारोबारी रिश्ते हैं, वहां के व्यापारियों से भी, और वहां की सरकारों से भी। खुद अमरीका के भीतर ट्रंप परिवार के कारोबार और सरकार के बीच हितों के टकराव के कई मामले सामने आए हैं, और इन पर ट्रंप को यह सफाई देनी पड़ी है कि ट्रंप-होटलों को सरकार से मिलने वाले किसी भी भुगतान की रकम वे दान में दे देंगे, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप के साथ औपचारिक रूप से उनके बेटे-बेटी-दामाद जुड़े हुए हैं, और उन सबके अपने-अपने कारोबारी हित हैं जो कि राष्ट्रपति भवन के प्रभाव का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और जो ट्रंप के साथ दुनिया के दूसरे देशों में सफर भी करते हैं। अब ऐसी जटिलता के बीच आज ट्रंप अगर यह सोचते हैं कि वे अपने परिवार और सहयोगियों को उनके किसी जुर्म, या कि संभावित जुर्म से माफी दे देंगे, तो अमरीकी राष्ट्रपति के ओहदे की साख चौपट हो जाएगी, और अमरीकी जनता के बीच से यह मांग भी उठने लगेगी कि राष्ट्रपति का ऐसा संवैधानिक अधिकार खत्म किया जाए।
फिर अमरीका से परे बाकी देशों को भी सोचना चाहिए कि वे किसी भी पद को किए गए विशेषाधिकारों को किस तरह से खत्म करें। लोकतंत्र और विशेषाधिकार ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। लोकतंत्र को खत्म करने की कीमत पर कुछ चुनिंदा कुर्सियों को असीमित अधिकार देना एक भ्रष्ट और बुरी तानाशाही को खड़ा करना ही हो सकता है, और ट्रंप इसकी ताजा मिसाल हैं।

कार्टूनिस्ट की बनाई पार्टी को व्यंग्य जरा भी बर्दाश्त नहीं !

संपादकीय
22 जुलाई 2017


मुंबई में अभी स्थानीय म्युनिसिपल की असहिष्णुता का एक दूसरा चर्चित मामला सामने आया है। कुछ महीने पहले कॉमेडियन कपिल शर्मा ने म्युनिसिपल अफसरों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था, और जवाब में म्युनिसिपल ने उनका दफ्तर नापकर अवैध निर्माण निकाल दिया, और तोडऩे का नोटिस भेज दिया। अभी दूसरा मामला सामने आया है वहां एक रेडियो जॉकी मलिश्का मेंडोंसा ने शहर की सड़कों की गड्ढों को लेकर एक बड़ा मजेदार और मजाकिया गाना गाया और उसका वीडियो पोस्ट कर दिया। यह गाना एक लोकप्रिय मराठी गाने की धुन पर बनाया गया था और मुंबई की सड़कों के कुख्यात गड्ढों को लेकर म्युनिसिपल का मजाक था। नतीजा यह निकला कि मुंबई महानगरपालिका पर राज करने वाली शिवसेना ने इस वीडियो के आते ही मलिश्का के घर की जांच की, और वहां पर डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का लार्वा मिलना बताकर उसे एक नोटिस थमा दिया। शिवसेना के सत्तारूढ़ पार्षद इस रेडियो जॉकी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की मांग करने लगे। महाराष्ट्र की राजनीति में राज्य में एक साथ सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना के बीच तनातनी चलते रहती है, और शिवसेना के इस कदम पर भाजपा ने म्युनिसिपल पर हमला भी किया है और मलिश्का पर की गई कार्रवाई को व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भी बताया है।
शिवसेना के इस तरह आपा खो देने को देखते हुए यह याद पड़ता है कि इसके संस्थापक बाल ठाकरे एक वक्त कार्टूनिस्ट थे, और अच्छे तेज-तर्रार कार्टूनिस्ट थे। अब एक कार्टूनिस्ट की पार्टी भी एक व्यंग्य या मजाक पर इस तरह बौखलाकर कार्रवाई करती है तो यह उस पार्टी के लिए शर्मनाक बात है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान भारत की एक बहुत प्रतिष्ठित कार्टून पत्रिका शंकर्स-वीकली को उसके संपादक और कार्टूनिस्ट शंकर ने बंद कर दिया था कि जब लोगों की सहनशक्ति खत्म हो गई है, और सेंसरशिप लागू की जा रही है, तो वे इसे चलाने के बजाय बंद कर देना बेहतर समझते हैं। अब अगर देश की कारोबारी राजधानी की सड़कों पर वहां करोड़ों लोग भुगतते हैं, तो क्या लोगों को मजाक उड़ाने का भी हक नहीं है?
अमरीकी अखबारों को देखें और वहां पर ताजा मामलों पर बने हुए कॉमेडी के कार्यक्रमों को देखें तो समझ में आता है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है। देश के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति की बातों को लेकर जिस तरह की खिल्ली उनकी उड़ाई जाती है उसका एक फीसदी भी कोई हिन्दुस्तानी नेता शायद ही बर्दाश्त करे। और उसी से समझ में आता है कि जनता के बीच लोकतांत्रिक समझ कैसे विकसित होती है, और कैसे लोगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पनपती है। मुंबई के इस ताजा मामले को लेकर हमारा मानना है कि वहां के हाईकोर्ट को तुरंत इस मामले में दखल देना चाहिए और महानगरपालिका को पूछना चाहिए कि इस गायिका के घर पर डेंगू का लार्वा तलाशने के लिए जाने की उन्हें कैसे सूझी थी? मुंबई में दसियों लाख मकान हैं, और आनन-फानन किसी एक घर के भीतर का लार्वा म्युनिसिपल को अपने दफ्तर बैठे दिख गया? यह सरकारी गुंडागर्दी की एक मिसाल है, और हकीकत तो यह है कि ऐसी ओछी और अलोकतांत्रिक गुंडागर्दी से मुंबई महानगरपालिका ने अपनी ही नालायकी और निकम्मेपन को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह पूरा सिलसिला सिर्फ एक म्युनिसिपल का मानकर चलना ठीक नहीं है। देश में जहां-जहां ऐसी अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है, उसे तुरंत कुचलना जरूरी है, और अगर मुंबई का हाईकोर्ट इस पर पहल नहीं करता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ेगा।

बच्ची से बलात्कार और अनगिनत सवाल

संपादकीय
21 जुलाई 2017


चंडीगढ़ की एक अदालत ने दस बरस की एक बच्ची को गर्भपात की इजाजत नहीं दी है। उसका मामा उससे लगातार बलात्कार करते आया था, और अब वह 26 हफ्तों की गर्भवती है। भारत में कानून 20 हफ्तों से अधिक के गर्भ के बच्चे को खत्म करने की इजाजत नहीं देता। लेकिन इस मामले में अदालत के साफ रूख से परे, डॉक्टरों के सामने यह समझ नहीं है कि दस बरस की बच्ची का मां बनना मां-बच्चे दोनों की जिंदगी के लिए अधिक खतरनाक है, या उसका गर्भपात। दोनों ही मामलों में इस लड़की की जिंदगी और सेहत दोनों बहुत बुरी तरह खतरे में रहना तय है। अब इस सिलसिले में इस बच्ची के इलाके की जनता उबली पड़ी है कि इस बच्ची को बलात्कार के इस नतीजे को जिंदगी भर पालना पड़ेगा। हमारे सामने इस मामले से जुड़े कई पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन जिन पर दो-दो पल सोचने की जरूरत है।
सबसे पहली बात यह कि किसी परिवार में सबसे करीबी रिश्तेदारों से बच्चों को सुरक्षित मानना ठीक नहीं है। इसी हादसे की और जानकारी ढूंढने के लिए अभी हमने इंटरनेट पर इस खबर को ढूंढा तो इसके साथ-साथ अनगिनत ऐसी और खबरें आ गईं जिनमें मामा, चाचा, पिता और भाई जैसे करीबी रिश्तेदार बच्चों से बलात्कार करते आए हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों मामलों में से कोई एक ही पुलिस और खबरों तक पहुंचता है। बाकी तमाम चीखें घर के भीतर ही दबा दी जाती है। इसलिए मां-बाप की पहली जिम्मेदारी अपने बच्चों को देह शोषण के बारे में जागरूक करना और उन्हें हिफाजत से रखना है। रिश्तों की जिम्मेदारी का नैतिक बोझ इंसानों के भीतर की हवस को हमेशा दबाकर नहीं रख पाती।
दूसरा पहलू कानून के बेअसर होने का है जिसके बारे में कल ही हमने इसी इलाके के एक पड़ोसी राज्य में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार और फिर उसकी हत्या को लेकर भारी तनाव बना हुआ है। जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक की कमजोरी और व्यापक भ्रष्टाचार के चलते लोगों को अब न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है और लोग सड़कों पर इंसाफ चाहने लगे हैं। मुजरिम को सजा दिलाने का काम अगर बेहतर और असरदार नहीं हो पाएगा तो समाज में अराजकता भी बढ़ती जाएगी और मुजरिमों का हौसला भी।
भारत में जहां अब तकरीबन हर बच्चे को स्कूल भेजने की कोशिश होती है, वहां स्कूलों-बच्चों को देह शोषण के बारे में सावधान और जागरूक करने के लिए सबसे अच्छी जगह हो सकती है लेकिन पाखंडी सोच वाले इस देश में जैसे ही सेक्स-शिक्षा शब्द भी हवा में आता है, भारतीय संस्कृति के हिंसक ठेकेदार डंडे-झंडे लेकर इस शब्द को हवा में ही मारने में जुट जाते हैं। ऐसे में कोई बच्चे अपनी देह को लेकर जागरूक नहीं हो पाते। केन्द्र और राज्य सरकारें खुद होकर तो सेक्स-शिक्षा की सोचेंगी नहीं, किसी को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए ताकि सत्तारूढ़ पार्टियां अदालती आदेश की आड़ लेकर सेक्स-शिक्षा लागू कर सकें।
एक आखिरी सवाल हमें सुझाता है ईश्वर के बारे में। जो कण-कण में मौजूद माना जाता है, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान माना जाता है, जो सबका भला करने वाला माना जाता है, जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह ईश्वर छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार के वक्त कहां रहती है? क्या देखता है? क्या सोचता है? और कुछ करता क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि धर्म का नाम लेकर, धार्मिक चोगा पहनकर आसाराम से लेकर पादरियों तक और मौलवियों तक को बच्चों से बलात्कार में शामिल पाया जाता है। नास्तिक लोग तो ईश्वर की हकीकत जानते हैं और अपने बच्चों की खुद हिफाजत करते हैं। लेकिन जो आस्तिक और आस्थावान ईश्वर पर भरोसा करते हुए बैठे रहते हैं, उनको ऐसे मामलों को लेकर अपने-अपने ईश्वरों से सवाल जरूर करना चाहिए।