चुनावी जीत-हार से परे कांग्रेस की एक बुनियादी परंपरा जारी

संपादकीय
16 दिसम्बर 2017


कांग्रेस पार्टी मोतीलाल नेहरू से जवाहर, इंदिरा, राजीव, सोनिया से होते हुए आज राहुल गांधी के हवाले हो गई है। कुनबापरस्त राजनीति की यह एक बड़ी लंबी मिसाल इसलिए है कि देश में बाकी कोई भी कुनबापरस्त राजनीतिक दल इतना पुराना नहीं है। नेहरू कुनबा 1919 से लेकर अब तक बीच-बीच में खासा अरसा इस पार्टी का अध्यक्ष रहा, यह एक और बात है कि बीच-बीच में दर्जनों दूसरे लोग भी इसके अध्यक्ष रहे। आजादी के पहले का एक दौर ऐसा था जब पार्टी नेहरू के कब्जे में नहीं थी, वे अकेले उसके सर्वेसर्वा नहीं थे, और कई दूसरे लोग भी अध्यक्ष बनते रहे। लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी मोटे तौर पर उनके परिवार के भीतर रही, या फिर परिवार की मर्जी से उसमें समय-समय पर कुछ दूसरे अध्यक्ष बनाए गए। लेकिन यहां पर हम आजाद भारत के एक ऐसे दौर का जिक्र करना चाहते हैं जब यह कुनबा पार्टी पर कब्जे से पूरी तरह बाहर था, और प्रधानमंत्री की कुर्सी से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक दूसरे लोग रहे, और चुनावी शिकस्त के बाद पार्टी के अधिकतर लोग लौटकर सोनिया गांधी के चरणों में पहुंचे कि वे कमान सम्हालें और पार्टी को उबारें।
चूंकि राहुल गांधी आज पार्टी की अध्यक्षता नेहरू-गांधी कुनबे का होने की वजह से शुरू कर रहे हैं, इसलिए कुनबे की शोहरत या उसकी तोहमत, ये दोनों उनके साथ अंत तक चलने वाली बातें रहेंगी, और इससे उनका उबर पाना मुमकिन नहीं रहेगा। लेकिन कांग्रेस इस देश की अकेली कुनबापरस्त पार्टी नहीं है, यह चूंकि सबसे पुरानी है इसलिए इसके कुनबे के नाम अधिक लंबी लिस्ट बनाते हैं। वैसे तो मुम्बई में शिवसेना को देखें, शरद पवार की पार्टी को देखें, आन्ध्र में एनटीआर और चन्द्राबाबू को देखें, तेलंगाना में चन्द्रशेखर राव, तमिलनाडू में एमजीआर से लेकर जयललिता और शशिकला तक, कर्नाटक में देवेगौड़ा और उनका बेटा, छत्तीसगढ़ में शुक्ल परिवार, ओडिशा में पटनायक परिवार, मध्यप्रदेश से राजस्थान तक सिंधिया परिवार, उत्तरप्रदेश में मुलायम परिवार, बिहार में लालू परिवार, पंजाब में बादल परिवार, कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, हरियाणा में कुनबे ही कुनबे, और दूसरे कई इलाकों में इसी तरह की राजनीतिक वंशावली अच्छी तरह कायम हैं। ऐसे देश में कांग्रेस को कोसने के लिए तो यह ठीक है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने यह हिसाब लगाया है कि करीब साढ़े पांच सौ परिवार ही ऐसे हैं जो कि देश की संसद और विधानसभाओं पर हावी हैं, वहां काबिज हैं, या वहां के फैसले लेते हैं।
कांग्रेस के तीन अध्यक्ष- इंदिरा, सोनिया, राहुल गांधी
इस देश का मिजाज कुनबापरस्ती को शायद बुरा नहीं मानता है, और वह सिलसिला चलते ही आ रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को लेकर बहुत से मजाक तो बन सकते हैं कि वे अभी घुटनों पर चल रहे हैं, या कि वे पप्पू हैं। लेकिन एक दूसरी हकीकत को देखने की जरूरत है। मोतीलाल नेहरू से लेकर जवाहरलाल, इंदिरा, राजीव, सोनिया, और राहुल तक एक सैद्धांतिक कड़ी ऐसी चली आ रही है जिसमें धर्मनिरपेक्षता, जातिनिरपेक्षता, क्षेत्रनिरपेक्षता, सर्वधर्म सद्भाव की एक गौरवशाली परंपरा लगातार कायम है। कहने के लिए 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों को कांग्रेस पार्टी की एक हिंसक कार्रवाई कहा जाता है, उसके बहुत से नेता इस हिंसा में शामिल थे, लेकिन यह कहना कांग्रेस के साथ ज्यादती होगी कि उसने सिक्खों को एक धर्म और एक नस्ल के रूप में खत्म करने के लिए ऐसा किया था। इन दंगों को याद करने के साथ-साथ यह भी याद रखना जरूरी होगा कि स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सुझाव दिया गया था कि सिक्ख अंगरक्षक उनकी सुरक्षा से हटा दिए जाएं, तो उन्होंने इससे साफ मना कर दिया था। इसलिए हम इस परिवार को साम्प्रदायिकता से परे, साम्प्रदायिकता विरोधी सिद्धांतों की राजनीति करने की एक अटूट परंपरा वाला भी मानते हैं। आज इस देश में जो माहौल बना हुआ है, उसमें यह लगता है कि भ्रष्टाचार के आरोप भारतीय लोकतंत्र को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला मुद्दा नहीं हैं, और इस लोकतंत्र की धुरी में धर्मनिरपेक्षता सबसे बड़ी ताकत है, और साम्प्रदायिकता सबसे बड़ी खामी है। इसे अगर देखें, तो कांग्रेस पार्टी की लंबी परंपरा में भी कुनबापरस्ती के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की बहुत ही महत्वपूर्ण परंपरा जारी है, और आने वाले वक्त में देश की जनता यह बताएगी कि उसके लिए इन सिद्धांतों का कोई महत्व है या नहीं। हमारा मानना है कि चुनावी नाकामयाबी से परे भी किसी पार्टी के लिए धर्मनिरपेक्षता अधिक जरूरी बात है, और राहुल गांधी से देश को यह पुख्ता उम्मीद है कि चुनावी जीत-हार से परे वे इस पर टिके रहेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर

पढ़े-लिखे होने, और समझदार होने में कोई अनिवार्य रिश्ता नहीं

संपादकीय
15 दिसम्बर 2017


देश के एक प्रमुख मीडिया संस्थान द्वारा गुजरात चुनाव के मतदान के एक्जिट पोल का नतीजा सामने रखते हुए बताया गया है कि वहां पर अधिक पढ़े-लिखे वोटर भाजपा के हिमायती थे, और कम पढ़े-लिखे वोटर कांग्रेस की ओर थे। अभी हम गुजरात में पढ़ाई-लिखाई के इस पोल के पैमानों को नहीं जानते, लेकिन यह बात तो इस पोल के बिना भी साफ है कि पढ़ाई-लिखाई से समझदारी का कोई अधिक लेना-देना नहीं रहता। यहां पर हम यह भी कहना नहीं चाहते कि जो लोग भाजपा को चुन रहे हैं, वे लोग कम समझदार हैं, और संख्या में अधिक हैं। इनमें से किसी पार्टी से लगाव या दुराव के बिना हम केवल पढ़ाई-लिखाई और समझ पर बात करना चाहते हैं।
लोगों को याद होगा कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, तो देश भर में रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी खासे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। उन्हें रथयात्रा और अयोध्या में कारसेवकों के जमावड़े का खतरा मालूम था। वे अपनी पीढ़ी के सबसे पढ़े-लिखे लोगों में से एक थे। उनके साथ उस समय बाबरी मस्जिद को गिरते देखकर अपनी पीठ पर उमा भारती को लादकर खुशी से खिलखिलाते हुए डॉ. मुरली मनोहर जोशी खड़े थे जो कि विज्ञान के प्राध्यापक थे, और शायद उनके नाम के पहले वाला डॉक्टर विज्ञान से ही आया हुआ था। आज देश में नफरत की सबसे अधिक बात करने वाले, घोर साम्प्रदायिक बात करने वाले विश्व हिन्दू परिषद के डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा अपनी पढ़ाई-लिखाई से एक कैंसर सर्जन हैं, लेकिन वे इस देश की आत्मा में कैंसर का ट्यूमर ट्रांसप्लांट करके उसे बड़ा करने में रात-दिन लगे रहते हैं। इसलिए पढ़ाई-लिखाई से समझ का कोई लेना-देना रहता हो, ऐसा बिल्कुल भी जरूरी नहीं रहता।
आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो अविभाजित मध्यप्रदेश में चालीस में से उनचालीस सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। बाकी इलाकों की बात तो ठीक थी, लेकिन बस्तर का इलाका ऐसा था जिसमें कि 1975 से 1977 के बीच न तो अखबार बहुत प्रचलित थे, न ही वहां रेडियो-टीवी का चलन था, लेकिन कांग्रेस के राज में उस वक्त बिना पारदर्शिता वाले चुनाव में बस्तर के हर इलाके से कांग्रेस को हरा दिया गया था। सबसे कम पढ़ी-लिखी आदिवासी आबादी ने अपनी समझ से एक समझदार और लोकतांत्रिक फैसला लिया था, और तानाशाही को शिकस्त दी थी। इसलिए इंदिरा को हराने वाले बस्तर के आदिवासियों ने पढ़ा-लिखा न होने से कोई कमी नहीं थी, और बाबरी मस्जिद गिरवाने वाले अडवानी-जोशी जैसों को पढ़ाई-लिखाई से कोई फायदा भी नहीं हुआ था।
यह दरअसल एक बहुत ही शहरी, संपन्न, और शिक्षित सोच है कि पढऩे-लिखने से लोग अधिक समझदार हो जाते हैं। कम पढ़े-लिखे या बिल्कुल निरक्षर लोगों को समझदारी से दूर मानते हैं। ऐसी सोच वाले लोगों के फायदे के लिए हम यहां थोड़ा सा खुलासा करना चाहेंगे कि ज्ञान और समझ दो बिल्कुल ही अलग-अलग चीजें होती हैं, और ये दोनों एक-दूसरे के बिना भी हो सकती हैं, ये दोनों एक-दूसरे के बिना भी बढ़ सकती हैं, और अगर इन दोनों में से किसी एक को छांटने की जरूरत हो, छांटने की मजबूरी हो तो समझ को छांटना चाहिए। अब कैंसर सर्जन बनते हुए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा ने कोई कम पढ़ाई नहीं की होगी, मेडिकल कॉलेज में उन्होंने कम से कम दस बरस गुजारे होंगे। लेकिन इन दस बरसों का ज्ञान उनके ऊपर से ठीक उसी तरह फिसलकर बह गया, जिस तरह की किसी चिकने घड़े के ऊपर डाला गया पानी बह जाता है, या कि किसी चिकने शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध तुरंत ही बहकर बर्बाद हो जाता है। समझ एक ऐसी चीज होती है जो कि ज्ञान को उपयोगी बना देती है। ज्ञान तो लाइब्रेरी की आलमारियों में सजी हुई किताबों में सबसे अधिक होता है, लेकिन उसका इस्तेमाल अगर इंसान न करें, तो महज दीमक उनका इस्तेमाल करती है, और उस ज्ञान से उसे केवल पेट भरने का सामान मिलता है, उसकी समझ नहीं बढ़ती। इसलिए पढ़े-लिखे होने और समझदार होने के बीच किसी तरह का अनिवार्य रिश्ता नहीं होता। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 December

आज एक अकेला जिद्दी चना भी टेक्नालॉजी साथ लेकर भाड़ को फोड़ सकता है...

संपादकीय
14 दिसम्बर 2017


भारत के कानून और दुनिया की टेक्नालॉजी ने मिलकर इस देश में सच और झूठ को बड़ी रफ्तार से उजागर कर देने का दिन ला दिया है। एक तरफ तो पिछली मनमोहन सिंह सरकार के वक्त देश में लागू हुआ सूचना के अधिकार का कानून लोगों के हाथ में एक अभूतपूर्व और बेमिसाल ताकत दे चुका है, दूसरी ओर टेक्नालॉजी ने सब कुछ इतना आसान कर दिया है कि गुजरात चुनाव में जब मोदी ने समुद्री विमान में सफर करके सुर्खियां बटोरीं, तो कुछ घंटों के भीतर ही लोगों ने ये सुबूत जुटाकर सामने रख दिए कि अमरीका का यह समुद्री विमान पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचा, और प्रधानमंत्री ने उसमें सफर किया। अब यहां पर कई बातें उठना अभी बाकी है कि ऐसे विदेशी, और पाकिस्तान से होते हुए आए समुद्री विमान पर एक व्यवसायिक विदेशी पायलट के साथ भारतीय प्रधानमंत्री का यूं सफर करना क्या उनकी सुरक्षा के नियमों को तोडऩा नहीं हुआ? दूसरी बात आनन-फानन में यह सामने आई कि यह भारत का पहला समुद्री विमान सफर नहीं था, और इस देश में अंडमान के इलाके में बरसों से समुद्री विमान आम लोगों के लिए चल रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री ने तुरंत वहां चलने वाले समुद्री विमानों की तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट की कि किस तरह केरल से लक्षद्वीप के लिए 2015 से समुद्री विमान सेवा चल रही है। कुछ लोगों ने यह भी ढूंढकर निकाला कि अंग्रेजों के वक्त ग्वालियर रियासत में एक झील में समुद्री विमान उतरते थे। अब अंग्रेजों के वक्त की यह जानकारी सही हो चाहे न हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की वेबसाइटों से इस सुर्खी को तुरंत हटा दिया गया कि वे समुद्री विमान से भारत में सफर करने वाले पहले व्यक्ति हैं।
आज दुनिया की वेबसाइटों पर किसी भी विमान के नंबर से यह जानकारी निकालना आसान है कि वह किस-किस रास्ते किस-किस तारीख को कब उड़कर कहां पहुंचा। और उत्साही लोगों ने आनन-फानन मोदी के इस्तेमाल वाले इस समुद्री विमान के बारे में जानकारी निकालकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी। अभी दो दिन पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपने एक बयान में यह याद दिलाया कि देश में भ्रष्टाचार के बहुत से मामले इसलिए उजागर हो पाए हैं कि कांग्रेस ने देश में सूचना का अधिकार लागू किया है। इन दो बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि पिछली पीढ़ी के लोगों को आज भारत के नए कानून, और दुनिया की नई टेक्नालॉजी के बीच सांस लेना सीखना होगा। वे दिन अब हवा हुए जब लोगों के बड़े-बड़े स्कैंडल छुप जाते थे। आज तो हिन्दुस्तान में आबादी के इलाकों में औसतन हर सौ वर्गफीट पर कोई न कोई एक मोबाइल कैमरा जीता होगा। ऐसे में कोई भी बात छुपना भी थोड़ा मुश्किल है, और लोगों के किसी भी तरह के बेबुनियाद दावों के पांवोंतले से भी दरी या कालीन पल भर में खींच ली जाती है।
हमारा ख्याल है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक समझ और सीख जिस रफ्तार से बढ़ती है, उससे कई गुना अधिक रफ्तार से टेक्नालॉजी आगे बढ़ जा रही है। इसके साथ-साथ लोगों में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जागरूकता और समझ भी बढ़ती जा रही है। भारत में अपने अनगिनत भांडाफोड़ में यह देखा है कि उसके लिए किसी बहुत बड़े बहुमत की जरूरत नहीं होती, किसी बहुत बड़े संगठन की जरूरत नहीं होती, हवाला डायरियां एक अकेले आदमी ने उजागर की थी, इसी तरह पिछले दस-बीस बरस में भारत में सामने आए अधिकतर स्कैंडल अकेले लोगों ने ही उजागर किए हैं। इसलिए ताकतवर लोगों, और ताकतवर संगठनों को यह समझने की जरूरत है कि आज एक अकेला जिद्दी चना भी टेक्नालॉजी साथ लेकर भाड़ को फोड़ सकता है। वे दिन इतिहास हो गए हैं जब कहा जाता था कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। इस देश में एक अकेले राजनारायण ने करीब आधी सदी पहले नेहरू की बेटी की सरकार फोड़कर रख दी थी जिसकी कि भारत में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
आज भारत के बड़े-बड़े नेताओं के कुछ बरस पहले के वीडियो, उनकी तस्वीरें, और उनकी कही और लिखी हुई बातें निकाल-निकालकर लोग उनके सामने पोस्टर बनाकर रखते आ रहे हैं। लेकिन भारत के नेताओं में इस बात की फिक्र अभी कम ही दिख रही है कि उनके अतीत के कंकाल कब्र से निकलकर, सड़कों पर आकर, उनकी ताजपोशी की राह के रोड़े बन सकते हैं। हमारा ख्याल है कि भारत जैसे लोकतंत्र के नेताओं के लिए सावधानी का एक ऐसा कोर्स शुरू किया जाना चाहिए जो कि उन्हें झूठ और फरेब की शर्मिंदगी से बचाने में मददगार हो। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 December

अकेले राहुल से बहुत उम्मीदें करना नाजायज

संपादकीय
13 दिसम्बर 2017


गुजरात के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस ने राहुल गांधी को अपना अध्यक्ष बनाया, और देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों ने यह लिखना शुरू कर दिया है कि गुजरात राहुल गांधी के लिए एक कसौटी रहेगी। उन्हें चुनाव में जीतकर ही अपनी अध्यक्षता की कामयाबी साबित करनी होगी। हमारा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति से ऐसी उम्मीद करना इसलिए नाजायज है कि न तो गुजरात कभी राहुल गांधी का इलाका रहा, और न ही वहां उस अंदाज में चुनाव लड़ सकते, जिस अंदाज में वहां भाजपा और नरेन्द्र मोदी लड़ रहे हैं। गुजरात को न तो मोदी के लिए कसौटी मानना चाहिए, और न ही राहुल गांधी के लिए। फिर भी जिन लोगों कसौटी पर लोगों को कसने का शौक ही रहता है, तो फिर उन्हें मोदी और अमित शाह को ही गुजरात पर तौलना चाहिए। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है कि उन्होंने कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक, और अपने खुद के मिजाज की शराफत के मुताबिक प्रचार किया, और किसी तरह की हलकट बात नहीं कही। गुजरात को पूरे देश के लिए पैमाना मानना गलत होगा क्योंकि आने वाले लोकसभा के चुनाव पूरे देश में होंगे, और आज का गुजरात तो मोदी और अमित शाह का अपना घर है।
लेकिन आज हम गुजरात चुनाव पर नहीं लिख रहे, क्योंकि वहां के नतीजे ही अपने आपको इतिहास में लिखेंगे, और अटकलबाजी के लिए हम गुजरात से कुछ दूर बैठे हुए हैं। हम आज यहां राहुल गांधी की चर्चा करना चाहते हैं जो कि एक हादसे के बाद कांग्रेस की राजनीति में आए, ठीक अपने पिता की तरह, या कि कुछ हद तक अपनी मां की तरह। खैर, जब वे राजनीति में आ ही गए हैं, तो किसी तरह की नर्मी या रियायत के हकदार वे नहीं रह जाते। भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव बहुत ही बेरहम होते हैं, और नतीजे ही लोगों की कामयाबी, और उनकी लीडरशिप साबित करते हैं। लेकिन हम इससे सहमत नहीं हैं, और हमारा यह मानना है कि लोगों को आंकड़ों से परे इंसानियत की बात भी करनी चाहिए, और अगर किसी जगह भीड़ में बहुमत हिंसा करने पर उतारू हो, तो उसे जायज नहीं कहा जा सकता। ठीक उसी तरह अगर देश का बहुमत या किसी प्रदेश का बहुमत किसी हिंसा के झांसे में आकर, नफरत को अपनाकर किसी को जिता दे, तो वैसे जीतने वाले लोग कामयाब तो रहते हैं, लेकिन वे बेहतर भी रहते हों यह जरूरी नहीं है। और इसीलिए कहा जाता है कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं।
हमारा मानना है कि राहुल गांधी से यह उम्मीद नाजायज है कि वे अगले आम चुनाव तक अपने आपको, अपनी पार्टी को, और अपने गठबंधन को इतना मजबूत बना दें कि वे चुनाव जीत जाएं, और मोदी को हरा दें। अगर देश के मतदाताओं का एक बहुमत नाजायज मुद्दों को लेकर किसी का साथ देना चाहता है, तो उसे हासिल करने के लिए वैसे ही या कुछ और दूसरे नाजायज मुद्दों को उठाकर चुनाव लडऩा ठीक नहीं है। हमारा मानना है कि चुनाव में सिद्धांतों को छोड़कर गंदगी और हिंसा के साथ, नफरत और झूठ के साथ चुनाव लडऩे से बेहतर है ईमानदार मुद्दों को लेकर चुनाव लडऩा और फिर चाहे हार जाना। अगला आम चुनाव अकेले राहुल गांधी की जिम्मेदारी मानना उनके साथ ज्यादती होगी। देश की हर उस पार्टी को अपना रूख देखना होगा जो कि भाजपा और उसके साथियों के खिलाफ है, और जो भाजपा की या मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ है। जब तक ऐसे सारे लोग अपने छोटे-बड़े मतभेदों को भूलकर सिद्धांतों के आधार पर साथ नहीं आएंगे, तब तक इस लोकतंत्र में किसी नेता या किसी पार्टी से अकेले कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
राहुल गांधी गुजरात की आग से तपकर निकले हैं, और खरे होकर निकले हैं। वहां की जीत या हार से परे उन्होंने देश के समझदार लोगों की बड़ी वाहवाही पाई है, और उन्होंने यह साबित किया है कि कठिन चुनौती के बीच भी वे सिद्धांतों के खिलाफ जाकर कुछ नहीं करेंगे। ऐसा रूख हो सकता है कि एक-दो चुनाव में उनकी अधिक मदद न करे, लेकिन हमें एक छोटी सी उम्मीद अब भी बाकी है कि देश की जनता अच्छे और बुरे सिद्धांतों में फर्क करना सीखेगी, और बेहतर लोगों को वोट देगी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 12 दिसंबर

अंगदान श्रीलंका से सीखें और मिसाल कायम करें

संपादकीय
12 दिसम्बर 2017


बीच-बीच में देश के कुछ शहरों से खबरें आती हैं कि किस तरह किसी इंसान के दान किए हुए अंग किसी दूसरे शहर के अस्पताल तक पहुंचाने, और वहां पर किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। ऐसे शहरों में पुलिस और वहां की जनता मिलकर सारी सड़कों को खाली करती हैं, ताकि अंग ले जा रहे चिकित्सा कर्मचारी तेज रफ्तार से एयरपोर्ट तक पहुंच सकें। ऐसा ग्रीन कॉरिडोर लोगों की मदद के बिना नहीं बन सकता। छत्तीसगढ़ में भी हमने एक-दो मरीजों को दूसरे शहर से राजधानी के एयरपोर्ट तक लाने के लिए बनाया ऐसा ग्रीन कॉरिडोर देखा है।
लेकिन इस बात से हमको एक दूसरी बात सूझती है जिसकी वजह से आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा की जा रही है, वह है अंगदान की। भारत वैसे तो अपने-आपको दानियों का देश बताता है, लेकिन हकीकत यह है कि लोगों में धर्म और किसी गुरु के नाम पर ही आमतौर पर दान देने की बात सामने आती है। जहां तक अंगदान की बात है, तो लोग तो मरने के बाद भी अपनी आंखें, या अपना बदन दान करना नहीं चाहते। आंखों की कमी इतनी है कि देश में लाखों लोग इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें किसी दूसरे इंसान के गुजरने पर उनकी आंखें मिल सकें, और दूसरी तरफ देश में रोजाना कई लाख आंखें जलाई या दफनाई जा रही हैं। अब चिकित्सा विज्ञान खासा आगे बढ़ गया है, और भारत में जरूरतमंद मरीजों को दूसरे मरीजों से मिली हुई किडनी, लीवर, दिल, या और दूसरे अंग लगातार लगाए जा रहे हैं। देश के अधिकतर बड़े शहरों में अस्पताल ऐसे प्रत्यारोपण आसानी से कर रहे हैं, और जरूरत अब केवल ऐसे लोगों की है जो कि अपने परिवार के गुजर चुके, या कि बे्रन-डेड हो चुके लोगों के अंग दान कर सकें।
इस पर लिखते हुए हमें केरल की उस महिला की तस्वीर याद पड़ती है जिसने अपने पति के दोनों हाथ दान किए, और किसी विदेशी को वे दोनों हाथ लगाए गए। इसके बाद जब दोनों का सामना हुआ तो वह महिला अपने पति के हाथ दूसरे किसी बदन पर लगे हुए देखती ही रह गई, और अगर उसके चेहरे पर लिखी तसल्ली को देखा जाए, तो बाकी तमाम लोगों को भी प्रेरणा मिल सकती है। केरल के ये हाथ अफगानिस्तान के एक ऐसे भूतपूर्व सैनिक को मिले जो कि जमीनी सुरंग हटाते हुए दोनों हाथ खो चुका था। आज हिंदुस्तान में ऑपरेशन कराने के लिए पाकिस्तान से रोजाना ही मरीज आ रहे हैं, और दुनिया के और बहुत से देशों से आ रहे हैं। इस देश में लोगों में अंगदान का रिवाज बढ़ाने की जरूरत है, और चाहे हिंदू धर्म हो, चाहे जैन, चाहे बौद्ध, चाहे मुस्लिम, चाहे सिख, चाहे पारसी, इन सबमें दान की अपार महिमा लिखी हुई है। लोगों को दूसरों के काम आना चाहिए, ऐसा भी सबमें लिखा हुआ है। पारसियों में तो मौत के बाद भी लाश को पक्षियों के खाने के लिए एक मीनार पर रखकर छोड़ दिया जाता है।
आज जब भारत के कोई गुरु अयोध्या के विवाद को सुलझाने में दिलचस्पी ले रहे हैं, कोई गुरु नदियों को बचाने के अभियान में लगे हैं, और अधिकतर दूसरे गुरु भी दूसरों की मदद करने, दान करने, दूसरी जिंदगियों को बचाने जैसी बातें कहते हैं। ऐसे में देश में एक बड़ी पहल करने की जरूरत है ताकि लोगों को अंगदान करने के लिए प्रेरित किया जा सके। बौद्ध लोगों से भरे हुए श्रीलंका को दुनिया का ऐसा अकेला देश होने का गौरव हासिल है जो कि इतने नेत्रदान पाता है कि अपने देश से बाहर भी वह दुनिया के दूसरे देशों को आंखें भेजता है और वहां लोगों को उनसे रौशनी मिलती है। यह सिलसिला धर्म, राजनीतिक विचारधारा, आध्यामिक अनुयायियों, सभी की मदद से आगे बढ़ाने की जरूरत है।  अभी बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे की शादी हुई, तो समारोह में खाने का इंतजाम तो नहीं था, लेकिन वहां पर एक स्टॉल लगाया गया था ताकि लोग अंगदान करने के फॉर्म भर सकें। (Daily Chhattisgarh)

सच और हकीकत से कोसों दूर

11 दिसंबर  2017

अभी चार दिन पहले ब्रिटिश मीडिया पर एक ऐसी रिपोर्ट आई जो कि पश्चिम के उदार और आधुनिक मूल्यों के पैमानों पर भी कुछ सनसनीखेज मानी गई। वहां पर एक कामयाब पेशेवर वित्तीय सलाहकार महिला ने एक इंटरव्यू में यह खुलासा किया कि अपने पति के गुजर जाने के बाद उसने अब तक सौ से अधिक ऐसे शादीशुदा मर्दों से संबंध बनाए जो कि अपनी निजी जिंदगी से नाखुश थे। उसका कहना है कि इन लोगों के साथ अच्छा वक्त गुजार कर उसने इनकी शादीशुदा जिंदगी को बचाने में मदद भी की है क्योंकि बहुत से लोग शादी के बाद के बरसों में धीरे-धीरे एक-दूसरे में दिलचस्पी खो बैठते हैं, और उनकी शारीरिक और मानसिक जरूरतें एक-दूसरे से पूरी नहीं होती। ऐसे में अगर ऐसे जोड़ों में से कोई एक भी बाहर से कुछ खुशी पाकर घर लौटते हैं, तो उनकी शादी के बच जाने की संभावना बढ़ जाती है।
पिछले बरसों में कई बार मैंने इस मुद्दे पर लिखा और आसपास के लोगों की खूब गालियां भी खाई हैं। करीबी लोगों ने रूबरू मुझे कहा कि मैं लोगों को बदचलनी की ओर धकेल रहा हूं। उनका यह कहना सही था कि विवाहेत्तर संबंधों को बुरा न कहना उन्हें भला कहने जैसा होता है, और उससे हो सकता है कि बहुत से लोगों की दिलचस्पी ऐसे रिश्तों में बढ़ चले क्योंकि मेरा लिखा होने अपराधबोध से अग्रिममुक्ति दिला देता है।
उनकी यह तोहमत कुछ हद तक सही है, और इसे तोहमत मानने की वजह मेरी अपनी सोच नहीं है, बल्कि शादीशुदा जोड़ों की आपसी, और उनसे समाज की ये उम्मीदें हैं कि शादी में वफादारी एक अनिवार्य और स्वाभाविक बात है। उम्मीदें तो उम्मीदें होती हैं, हर बार उनका हकीकत से कुछ वास्ता जरूरी नहीं होता, इसलिए वफादारी को अनिवार्य मानने वाली उम्मीद बेबुनियाद सी होती है। और इसके लिए दो बातों को समझना जरूरी है कि शादीशुदा जोड़ों के भीतर आपसी रिश्ते वक्त के साथ-साथ कैसे बदलते हैं, और दूसरा यह कि इंसान का अपना मिजाज कैसा होता है।
दुनिया के किसी भी हिस्से में, खासकर शहरी हिस्से में, शादी का मामला उसके दोनों भागीदारों की एक वक्त की पसंद, सोच, और उम्मीदों की बुनियाद पर बना हुआ रहता है। वक्त के साथ-साथ इन तीनों में एक ऐसा फेरबदल आ सकता है कि आज का जोड़ीदार कल बोझ लगने लगे, और परसों उससे परे कुछ और दिखने लगे। शादी और वफादारी, इन दोनों को अनिवार्य रूप से जोडऩे की बात इंसान के बुनियादी मिजाज से मेल नहीं खाती। समय के साथ-साथ लोगों को नए लोग मिलते हैं, उनकी अपनी पसंद बदलती है, अपना मिजाज बदलता है, और अपनी जरूरत भी बदलती है। और ऐसा ही कुछ उनके जोड़ीदार के साथ भी होते चलता है। इन दोनों के किसी भी वक्त के ऐसे फेरबदल एक साथ देखने पर उनके रास्ते काफी कुछ अलग भी होते दिख सकते हैं। ऐसे में कुछ पल के लिए, या कि कुछ बरसों के लिए शादीशुदा जोड़ीदार एक-दूसरे से परे भी एक ऐसी खुशी पाने की चाह रख सकते हैं, पा सकते हैं, जो कि शादी की वफादारी वाली परिभाषा के साथ मेल न खाए।
लेकिन होता यह है कि जब लोग अपने जोड़ीदार से परे ऐसी खुशी पाकर लौटते हैं, तो वे घर के भीतर का तनाव झेलने के लिए कुछ अधिक दूर तक लैस होकर भी आते हैं। इसके साथ-साथ उनके भीतर का एक अपराधबोध भी होता है जो कि उन्हें घर के भीतर कुछ अधिक समझौते करने, कुछ अधिक बर्दाश्त करने का हौसला देता है। अगर ऐसे जोड़ों में इस तरह की खुशी पाने की गुंजाइश बाहर न निकले, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से लोग भीतर के तनाव को झेल नहीं पाएं।
इस बात को पहले अपने इस कॉलम में कुछ मौकों पर मैं लिख भी चुका हूं, और अब यह ब्रिटिश महिला मानो बरसों बाद उसी बात को एक और अधिक मजबूत मिसाल के साथ सामने रख रही है, अपनी खुद की गुजरी बातों को बताते हुए, बिना किसी अफसोस के साथ, और एक बिल्कुल ही आम इंसान की तरह अपनी कमजोरियों और खूबियों को मानते हुए, बताते हुए।
चाहे प्रेम-संबंध हो, चाहे विवाह-संबंध, लोगों से वफादारी की उम्मीद इसलिए भी सही नहीं लगती कि वह उम्मीद आने वाले उन दिनों को लेकर है जिनका कि अभी उन्हें एहसास भी न हो, वह उन लोगों को लेकर है जिनसे कि वे अभी तक मिले भी नहीं हैं, वह उम्मीद दिल-दिमाग की ऐसी हालत को लेकर है जो कि अभी तक आई नहीं है, और जब ऐसे नए लोग मिलते हैं, ऐसी नई नौबतें आती हैं, ऐसी नई शारीरिकऔर मानसिक जरूरत सिर चढ़कर बोलती है, तो पहले के सारे वायदे और सारी कसमें धरी रह जाती हैं, और इंसान एकदम इंसान की तरह बर्ताव करने लगते हैं, बजाय प्रेमी या प्रेमिका के, पति या पत्नी के। यह बात याद रखने की जरूरत है कि इंसानों के बीच रिश्ते तो इंसान के इतिहास में बड़े ताजा हैं, रिश्तों की इस सामाजिकता से परे इंसान की अपनी इंसानी जरूरतें तो बहुत ही पुरानी हैं। रिश्तों से लाखों बरस अधिक पुरानी जरूरतें, भला रिश्ते कैसे इन जरूरतों को दबा सकते हैं?
जिस तरह कि इंसान के भीतर हिंसा करने वाला एक पहलू होता है जिसे कि इंसान हैवान कहकर अपने बाकी हिस्से को उस तोहमत से बचा ले जाते हैं, ठीक उसी तरह  इंसान के भीतर रिश्तों की नैतिकताओं और उनके बंधनों से मुक्त एक ऐसा पहलू होता है जिसे कि सामाजिकता और निजी वफादारी छू भी नहीं पाते, और जो इंसान के हाड़-मांस, दांत और नाखूनों की तरह का अधिक पुराना, अधिक प्राकृतिक पहलू होता है।
आधुनिक समाज ने अपने ढांचे को अधिक मजबूत बनाने के लिए शादी के साथ वफादारी की उम्मीदें और कसमें जोडऩे का काम किया। उसने एक बार शादी के बाद, उस शादी के कायम रहने तक शादी के दोनों भागीदारों को परिवार नाम की एक बड़ी घड़ी के पुर्जों की तरह हिलने-डुलने की एक बड़ी सीमित आजादी दी, लेकिन उससे परे कुछ नहीं। भारत के हिन्दू समाज में तो शादी को सात जन्मों का रिश्ता कहा गया, हालांकि अगला जन्म भी किसी का देखा हुआ नहीं है। ऐसे अनदेखे छह और जन्मों की भी वफादारी का पैमाना सामने रखते हुए यह भी नहीं देखा गया कि शादी के बाद एक जन्म में ही कितने उतार-चढ़ाव आते हैं, और दोनों भागीदार उन्हें भी हर बार झेल नहीं पाते हैं। शादी नाम की व्यवस्था लोगों को कई मायनों में एक मशीन के पुर्जों की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रख देती है, और यह व्यवस्था यह ध्यान रखती कि असल जिंदगी में ये दोनों पुर्जे तो दुनिया के और बहुत से पुर्जों के साथ संपर्क में आते हैं, और अपने आपमें भी इन दो पुर्जों के बीच कई किस्म की रगड़ाहट होती है।
आज दुनिया के किसी भी समाज में शादी से परे के संबंधों को अच्छी निगाह से देखा नहीं जाता, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन्हें हकीकत भी नहीं माना जाता। ऐसा मान लिया जाता है कि शादी नाम की संस्था लोगों को इंसान से मशीनी पुर्जा बनाने की ताकत रखती है, और बना भी देती है। लेकिन यह बात सच और हकीकत से कोसों दूर की बात है। (Daily Chhattisgarh)

नेपाल में वामपंथी बहुमत से हिन्दुस्तान को सबक

संपादकीय
11 दिसम्बर 2017


दुनिया के इतिहास में इन दिनों जिस तरह की उथल-पुथल दर्ज हो रही है, वह हैरान भी करती है, और एक उम्मीद भी बंधाती है। जहां पश्चिम के कुछ देशों में कट्टरतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें जीतकर आ रही हैं, वहीं फ्रांस जैसी कुछ मिसालें भी सामने हैं जहां पर उदारवादी लोग भी सत्ता पर आ रहे हैं जो कि खाड़ी के देशों से आ रहे अल्पसंख्यकों के साथ हमदर्दी रखते हैं। कुछ ऐसा ही कनाडा में भी देखने मिलता है जहां के नौजवान प्रधानमंत्री धार्मिक-अल्पसंख्यकों, शरणार्थियों, और समलैंगिकों जैसे अल्पसंख्यकों के साथ बराबरी का बर्ताव करते हैं।
लेकिन आज इस मौके पर लिखने की एक दूसरी वजह है कि नेपाल में अभी संसदीय चुनाव के नतीजे आ रहे हैं, और अब तक घोषित 113 सीटों में से 88 सीटों पर वामपंथी गठबंधन ने जीत दर्ज की है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि यही गठबंधन सरकार बनाएगा। यह याद रखने की बात है कि नेपाल दुनिया का अकेला हिन्दू राष्ट्र है, और वहां पर अभी हाल के बरसों तक राजशाही भी बहुत मजबूत थी, लेकिन पिछले एक-दो चुनावों में माओवादियों ने, वामपंथियों ने जिस तरह से हिस्सा लिया, और संसद तक पहुंचे, उसने हिन्द महासागर के इस इलाके में लोगों को चौंका भी दिया। नेपाल के एक तरफ के चीन में अपने किस्म का वामपंथ है, लेकिन उससे परे और कहीं कोई वामपंथ नेपाल को छूता नहीं है। इसलिए यहां पर संसदीय मूलधारा में कल के नक्सलियों या माओवादियों का शामिल होना, और फिर संसद से होते हुए सरकार तक पहुंचना एक बहुत ही दिलचस्प राजनीतिक विकास है जिस पर भारत को भी गौर करना चाहिए, और हमारी सलाह है कि भारत के भी माओवादियों को इस बारे मेें सोचना चाहिए।
भारत में माओवादी आंदोलन देश की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या बना हुआ है, और पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा भी करार दिया था। हम जिस छत्तीसगढ़ में बैठे हैं, वहां के विकास को सबसे बड़ी चुनौती माओवादी नक्सलियों की तरफ से है, और प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री तक कई लोग नक्सलियों से यह अपील कर चुके हैं कि उन्हें हथियार छोड़कर चुनाव में उतरना चाहिए, और संसदीय लोकतंत्र में भागीदार बनकर उन इलाकों के विकास में भागीदारी निभाना चाहिए जिनके लिए वे अपना आंदोलन बताते हैं। भारत में माओवादियों का आंदोलन कई तरह की विचारधाराओं से गुजरते हुए कहीं हथियार थामते रहा है, तो कहीं हथियार छोड़ते भी रहा है। आज ऐसा लगता है कि देश के बहुत से धर्मनिरपेक्ष दलों, गरीबों के हिमायती दलों, और नक्सलियों के मुद्दों में कुछ बातें एक सरीखी हैं। उनके बीच हथियारबंद लड़ाई और संसदीय लोकतंत्र जैसा बहुत बड़ा बुनियादी फर्क तो है, लेकिन दोनों की सोच उन तबकों के भलाई की है जो कि सबसे अधिक शोषित और कुचले हुए हैं। इसलिए हमको ऐसा लगता है कि आज देश के वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और गरीबों के हिमायती दलों की यह जिम्मेदारी है कि वे हिंसक आंदोलन में लगे नक्सलियों को धीरे-धीरे समझाकर लोकतंत्र की मूलधारा में लाने की कोशिश करें।
किसी भी मामले में किसी दूसरी मिसाल का इस्तेमाल इसलिए खतरनाक हो जाता है कि उन दोनों में लोग फर्क गिनाने लगते हैं। लेकिन फिर भी हम नेपाल में वामपंथियों की जीत को यहां पर इसलिए गिनाना चाहते हैं क्योंकि राजशाही से थका हुआ एक हिन्दू राष्ट्र किस तरह वामपंथियों की सरकार को बना रहा है, यह भारत के लिए एक दिलचस्प मॉडल तो है ही। भारत के हथियारबंद नक्सलियों को लोकतंत्र में आना चाहिए, और आज जिन तबकों का वे भला करना चाहते हैं, उनका भला संसदीय लोकतंत्र के रास्ते ही हो सकता है। हमारा यह भी ख्याल है कि स्वामी अग्निवेश जैसे जो लोग भी नक्सलियों से बातचीत का रिश्ता रखते हैं, उनको भी यह कोशिश करनी चाहिए। देश और प्रदेश की सरकारों को भी यह कोशिश करनी चाहिए क्योंकि दुनिया ने यह देखा है कि उत्तरी आयरलैंड सहित किसी भी जगह पर बातचीत के बिना हथियारबंद आंदोलन खत्म नहीं हुए हैं। इसलिए भारत की तमाम सरकारों को, और लोकतांत्रिक ताकतों को हिंसक और हथियारबंद नक्सल-आंदोलन को सहमत कराकर लोकतांत्रिक चुनावों में शामिल करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 दिसंबर

सुरक्षा बलों को बुलेटप्रूफ जैकेट जितनी ही जरूरी होती है मानसिक शांति

संपादकीय
10 दिसम्बर 2017


कल छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक सीआरपीएफ कैम्प में एक जवान ने अपने अफसरों से तनातनी के बाद गन उठाई, और चार सीनियरों को मार डाला। जिस अफसर से उसका ज्यादा झगड़ा था, वह घायल होकर अस्पताल में है। इस मामले की जांच होने पर समझ आएगा कि झगड़े की जड़ क्या थी, और उसे काबू करने में चूक कहां पर हुई। लेकिन ऐसे मामले पहले भी हुए हैं जिनमें दूर जंगलों में या सरहदों पर  तैनात सुरक्षा कर्मचारियों ने पारिवारिक, निजी, या कि नौकरी के तनाव के चलते हुए अपनी जान दे दी, या दूसरों की जान ले ली। सीआरपीएफ में ऐसी गिनती बढ़ते चल रही है, और हमें पूरा भरोसा है कि यह सुरक्षा बल इसकी फिक्र करते हुए इससे बचने के बारे में सोच भी रहा होगा।
दरअसल अपने घर-बार से दूर तैनात रहने वाले सुरक्षा कर्मचारियों के बीच तनाव नई बात नहीं है, और न ही यह हिन्दुस्तान की अकेले की बात है। पारिवारिक जिंदगी को छोड़कर लगातार मौत के खतरेतले तैनाती आसान बात नहीं रहती है। अभी चार दिन पहले ही ऑस्ट्रेलिया की एक महिला फौजी अफसर का लिखा एक लेख मीडिया में आया है कि मुश्किल मोर्चों पर लंबे समय तक तैनात रहने वाले सैनिकों को अपना तनाव घटाने के लिए पेशेवर वेश्याओं की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। न सिर्फ भारतीय सुरक्षा बलों में, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के तहत दूसरे देशों में लंबे समय तक रहने वाले सैनिकों के खिलाफ भी सेक्स-अपराधों की शिकायतें हमेशा ही आती रहती हैं। बस्तर में भी सुरक्षा बलों के खिलाफ ऐसी शिकायतें लगातार रहती हैं, और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे अधिकतर मामले पुलिस तक पहुंचाने का हौसला भी आदिवासियों में नहीं रहता होगा। इसलिए आज जब आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है, तो आदिवासी इलाकों के नक्सल मोर्चों पर तैनात सीआरपीएफ जवानों के तनाव पर भी चर्चा होना चाहिए, और साथ-साथ ऐसे जवानों की वजह से आदिवासियों पर होने वाले खतरे पर भी बात होनी चाहिए।
जिस तरह से एक बंदूकधारी वर्दीधारी सीआरपीएफ जवान अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस तरह थोक में मार सकता है, उससे उसके तनाव का अंदाज लगाया जा सकता है। यह तनाव कभी हत्यारा हो जाता है, कभी आत्मघाती हो जाता है, और कभी बलात्कारी भी हो जाता होगा तो उसमें हैरानी नहीं होगी। जब सरकारें सुरक्षा जवानों को मुश्किल मोर्चों पर परिवारों से बहुत दूर रखती हैं, तो उनके परिवारों का बेहतर ख्याल रखना भी सरकारी जिम्मेदारी होनी चाहिए। बहुत से मामलों में यह सुनाई पड़ता है कि जब लंबे समय के बाद ऐसे सुरक्षा कर्मचारी घर लौटते हैं, तो वहां की छोटी-छोटी दिक्कतों को दूर करने में ही उनकी छुट्टी गुजर जाती है। बहुत से कर्मचारियों को छुट्टी मिलती नहीं है, और ऐसे कई मौके आए हैं कि छुट्टी के विवाद को लेकर ही जवानों ने अपने अफसरों को मार डाला। न सिर्फ सुरक्षा जवानों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए, बल्कि उनकी तैनाती के ऐसे आदिवासी जंगल-इलाकों में आम जनता की हिफाजत के लिए भी सुरक्षा बलों के लिए मानसिक परामर्शदाताओं की तैनाती की जानी चाहिए। जब हाथ में ऐसी बंदूकें रहती हैं जिनसे कि पल भर में दर्जनों को मारा जा सकता है, तो ऐसी ताकत वाले जवानों का तनावमुक्त रहना जरूरी है। हमारा मानना है कि सीआरपीएफ के लिए भी यह हादसा बहुत बड़ा नुकसान है, बहुत बड़ा तनाव है, और उसे तुरंत अपने कर्मचारी-अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने का इंतजाम करना चाहिए। राज्य सरकार के लिए भी यह जरूरी है कि नक्सल-मोर्चे पर तैनात अपने लोगों के लिए वह मनोबल बढ़ाने की कोशिशें करे, और तनाव को घटाने की। इसके बिना दूसरों के खिलाफ या अपने खिलाफ हिंसा के मामले होते ही रहेंगे। यह भी समझना चाहिए कि जान लेने और देने से परे, स्थानीय लोगों के साथ बदसलूकी भी ऐसी दिमागी हालत के लोगों के लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी, और उससे भी बचना जरूरी है। राज्य सरकार और सीआरपीएफ जैसे सुरक्षा बलों को यह मानकर चलना चाहिए कि जिस तरह अपने लोगों की हिफाजत के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट खरीदी जाती है, उसी तरह उनकी मानसिक शांति का इंतजाम भी करना जरूरी है, उसके बिना ऐसे खतरे आते ही रहेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 10 दिसंबर

निजी चिकित्सा उद्योग के जुर्म पकडऩे की जरूरत

संपादकीय
9 दिसम्बर 2017


दिल्ली और गुडग़ांव के इलाके में बड़े-बड़े अस्पतालों पर सनसनीखेज खबरों के बाद सरकारें हड़बड़ाकर कड़ी और बड़ी कार्रवाई कर रही हैं। पांच सितारा और सात सितारा होटलों जैसी रईसी वाले इन अस्पतालों का कहीं कोई लाइसेंस रद्द कर रहे हैं, तो कहीं इनकी जमीन की लीज रद्द कर रहे हैं। अब जब कोई घेरे में आ गए हैं, तो यह पता लग रहा है कि किस तरह वहां की दवा दुकानों से ही दवा खरीदने की अनिवार्यता लादकर उन्हें कई गुना अधिक दामों पर बेचा जाता है। बड़े अस्पतालों का यह हाल पश्चिम के देशों से लेकर हिन्दुस्तान तक है, और दिल्ली से लेकर दूसरे शहरों-प्रदेशों तक मरीजों की ऐसी ही लूटमार चल रही है। यह बात जगह-जगह पकड़ में आती है कि किस तरह अस्पताल मरीज पाने के लिए दूसरे डॉक्टरों को, नीम-हकीमों को, या दलालों को कमीशन देते हैं, कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक अस्पताल के ऐसे खाताबही भी जब्त हो गए थे, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां पर सरकारी इलाज-बीमा हर किसी को हासिल है, उनके बीमा की रकम लूटने के लिए प्रदेश के दर्जन भर अस्पताल महिलाओं के गर्भाशय जबर्दस्ती निकालते हुए पकड़ाए थे, और वे सारे मामले भी आए-गए हो गए।
दरअसल निजी इलाज को बढ़ावा देने की सरकारों की नीतियों के चलते हुए देश भर में अब सरकारी अस्पताल कमजोर किए जा रहे हैं, और सरकारें न सिर्फ अपने कर्मचारियों को, बल्कि गरीब जनता को भी निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए बीमा का कार्ड देने लगी हैं। आज छत्तीसगढ़ सहित बहुत से प्रदेशों में एम्बुलेंस की बड़ी तेज व्यवस्था काम कर रही है, और ये एम्बुलेंस किसी घायल या मरीज को किस अस्पताल में लेकर जाएं, इसके पीछे भी गिरोहबंदी और कमीशन का धंधा जोरों से जारी है। यह बात तो बहुत पहले से जारी है कि डॉक्टरी जांच लिखने के एवज में डॉक्टरों को जांच-केन्द्रों की तरफ से मोटा कमीशन मिलता है, और अभी कुछ दिन पहले कर्नाटक में ऐसा एक पूरा बड़ा मामला पकड़ में भी आया है।
अभी दिल्ली-हरियाणा में बड़े अस्पतालों पर कार्रवाई इसलिए हो रही है कि वहां की दो घटनाएं दिल्ली की वजह से देश भर के मीडिया में छाई रहीं। एक मरीज की मौत के बाद उसकी लाश देने के लिए अस्पताल ने दस-बीस लाख जैसे मोटी रकम मांगी। एक दूसरे मामले में दो बच्चों को जिंदा रहते हुए भी मरा बताकर उन्हें बैग में बांधकर दे दिया गया, और बाद में वे जिंदा निकले। चूंकि ये घटनाएं दिल्ली में थीं, इसलिए टीवी और अखबारों में इन्हें खूब जमकर जगह मिली, और सरकारें इस दबाव में रहीं कि कोई कार्रवाई करनी है। लेकिन पूरे देश में आज निजी चिकित्सा, खासकर बड़े और महंगे अस्पतालों की निजी चिकित्सा और लूटमार में अधिक फर्क नहीं बचा है। लोगों की मजबूरी है कि वे कर्ज लेकर भी, गहने और सामान बेचकर भी इलाज कराते हैं, और अस्पतालों के सामने अधिक विरोध नहीं कर पाते। आज ऐसा लगता है कि निजी अस्पतालों पर निगरानी के लिए क्या कोई एजेंसी बननी चाहिए जो कि नियमित रूप से यह देखे कि वहां पर दवाओं को कितनी कमाई लेकर बेचा जा रहा है, कौन सी गैरजरूरी जांच करवाई जा रही हैं, कितना बिल बनाया जा रहा है? हमारा यह सुझाव देना आसान है, लेकिन सरकारों के लिए भी ऐसा करना आसान नहीं होगा। फिलहाल इस मुद्दे पर और चर्चा जरूरी है ताकि निजी चिकित्सा उद्योग के जुर्म पकड़े जा सकें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 9 December

देश के लोगों की ताकत का इस्तेमाल तरक्की के लिए न करके, धर्मान्धता के लिए..

संपादकीय
8 दिसम्बर 2017


राजस्थान में हिन्दू धर्म और संस्कृति का तकाजा देते हुए एक मुस्लिम पर लव जेहाद का आरोप लगाते हुए उसे खुलेआम काटकर मार डालने, उसका वीडियो बनाने, और फिर उसे बाकी मुस्लिमों के लिए चेतावनी के साथ जारी करने वाले एक हिन्दू नौजवान को पुलिस ने वीडियो सुबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया है। न तो इसे हिन्दू नौजवान के परिवार में किसी ने अंतरजातीय या विधर्मी विवाह किया है, और न ही जिस मुस्लिम प्रवासी मजदूर को मारा गया है, उसने किसी दूसरे धर्म में शादी की थी। हत्यारे ने हत्या के वीडियो के अलावा दो और वीडियो शेयर किया है जिनमें से एक में वो मंदिर में है और हत्या की जिम्मेदारी ले रहा है जबकि दूसरे वीडियो में वो भगवा ध्वज के सामने बैठा है और लव जिहाद और इस्लामिक जिहाद के खिलाफ भाषण दे रहा है। ये वीडियो उसके एक नाबालिग भतीजे ने ही रिकॉर्ड किए थे, और चारों तरफ फैलाए थे। आज राजस्थान के इस इलाके में तनाव का हाल यह है कि इन चाचा-भतीजे की गिरफ्तारी के बाद भी आसपास के इलाकों में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। कल से मीडिया में ये वीडियो सामने आने के बाद देश के हजारों जिम्मेदार और समझदार लोगों ने इसकी तुलना तालिबान से की है कि हिन्दुस्तान के ऐसे धर्मान्ध और हत्यारे लोग तालिबानों से पीछे नहीं हैं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता, धर्म और जाति की नफरत, कट्टरता, और हिंसा को लेकर हर हफ्ते-दो हफ्ते में इसी जगह फिक्र लिखते आए हैं कि देश को एक ऐसी अवैज्ञानिक कट्टरता में धकेला जा रहा है कि जिससे उबरने में पता नहीं कितना वक्त लग जाएगा। भड़काऊ बातों के झांसे में आकर, उनसे प्रभावित होकर, कमअक्ल और बिनसमझ वाले बहुत से लोग हिंसक हो चले हैं, भीड़ उन्मादी हो चली है, अपने धर्म और जाति को लेकर लोगों के मन में  गौरव उन्माद की हद तक बढ़ चला है, और दूसरे धर्मों और जातियों के लिए एक हिंसक हिकारत सड़कों पर सामने आ रही है। एक उग्र राष्ट्रवाद के लिए जरूरी निशाने के रूप में पड़ोस के एक देश, अपने भीतर के कुछ धर्म, अपने भीतर की कुछ जातियां, और महिलाओं सरीखे कमजोर बनाकर रखे गए तबकों पर हमले किए जा रहे हैं, और इन सबको एक ऐसे इतिहास से जोड़कर बताया जा रहा है जो कि कभी मौजूद नहीं था। यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, और हर प्रदेश के चुनाव के साथ ऐसी हिंसा में और पेट्रोल झोंक दिया जा रहा है।
धर्मान्धता, कट्टरता, और साम्प्रदायिक नफरत किस तरह हिंसक हो सकते हैं, इसे अफगानिस्तान से लेकर इराक और सीरिया तक, तालिबान और आईएसआई की शक्ल में देखा जा चुका है, उसके बावजूद महान परंपराओं वाले इस देश में आज जनता को साम्प्रदायिक सरहदों में जिस तरह बांटा जा रहा है, जिस तरह पहले दर्जे के नागरिक और दूसरे दर्जे के नागरिक तय किए जा रहे हैं, वह बहुत भयानक है। देश में कुछ राज्यों में जिस तरह से बहुसंख्यक हिन्दू धर्म के धर्मराज की स्थापना का माहौल बनाया जा रहा है, उससे भी बाकी दुनिया में हिन्दुस्तान की इज्जत मटियामेट हो रही है, इस देश का अमन-चैन तो खत्म हो ही रहा है। आज नफरत भरे हुए दिल-दिमाग लेकर एक अकेला इंसान जिस परले दर्जे की हिंसा कर रहा है, उसे रिकॉर्ड करवा रहा है, उसे धमकी और चेतावनी की पहले से की गई रिकॉर्डिंग के साथ जोड़कर बांट रहा है, वह नौबत भयानक है। ऐसी एक-एक हिंसा देश के लोगों को बांटने और काटने की ताकत रखती है, वैसी तबाही फैला भी रही है। आज इस देश को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए धार्मिक और सामाजिक सद्भाव कायम रखना चाहिए, और देश के लोगों की ताकत का इस्तेमाल तरक्की के लिए करना चाहिए। लेकिन महज वोटों की चाहत में देश की संभावनाओं को जिस तरह से खत्म किया जा रहा है, वह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो रहा है। प्रधानमंत्री को इस मामले पर देश भर के हजारों समझदार लोगों की सामने आई प्रतिक्रिया को देखना चाहिए, समझना चाहिए, और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करते हुए देश में साम्प्रदायिकता की आग को फैलने से रोकना चाहिए। लव जिहाद का नारा लगाते हुए उसके खिलाफ की गई इस हिंसा का हत्यारा तो कमअक्ल हो सकता है, लेकिन देश भर में लव जिहाद का आरोप लगाते हुए जो बड़े-बड़े मंत्री-मुख्यमंत्री नफरत फैला रहे हैं, वे तो कमअक्ल नहीं हैं। उनकी साजिशों के शिकार होकर आम लोग ऐसी हत्यारी और आत्मघाती हिंसा पर उतारू हो रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 दिसंबर

इंसानियत सरहद से बहुत ऊपर रहती है

संपादकीय
7 दिसम्बर 2017


सोशल मीडिया की वजह से बहुत से ऐसे सरकारी फैसले पल भर में ही दुनिया के सामने आ जाते हैं जो कि पहले लोगों को नजर ही नहीं आते थे। भारत सरकार की एक मंत्री सुषमा स्वराज का ट्विटर अकाऊंट रोज ऐसी खबर लेकर आता है जिससे सरहद के दोनों तरफ बसे हुए जंगखोरों की तमाम साजिशें हार जाती हैं। पाकिस्तान के लोगों में से बहुतों को भारत में जान बचाने वाली सर्जरी या इलाज की जरूरत होती है, और ऐसे लोग वीजा पाने के लिए ट्विटर पर सुषमा स्वराज से अपील करते हैं, और रात-दिन के किसी भी वक्त उनकी तरफ से जवाब भी पोस्ट हो जाता है कि जाकर भारतीय उच्चायोग से वीजा ले लें। वे बात की बात में ऐसे इलाज-वीजा मंजूर करती हैं, और तकरीबन हर दिन ऐसा कोई न कोई मामला सामने आता है जिसे लेकर यह भरोसा बढ़ता है कि इन दोनों देशों की तमाम सोच सरहद नहीं है, इंसान भी हैं।
दो देशों के बीच चाहे कितनी ही फौजी तनातनी हो, उसके बीच भी आमतौर पर बातचीत का रिश्ता बने रहता है, और यह बातचीत दोनों देशों के प्रमुख नेताओं के बीच मेज पर बैठकर औपचारिक बातचीत ही नहीं होती, वह कभी खिलाडिय़ों की शक्ल में सामने आती है, कभी जेल में बंद किसी कैदी को रिहा करने की शक्ल में सामने आती है, और इन दिनों हम लगातार देख रहे हैं कि किस तरह भारत में इलाज के लिए आने वाले लोगों को सुषमा स्वराज तुरंत ही वीजा देकर एक नए किस्म का रिश्ता आगे बढ़ा रही हैं, मजबूत कर रही हैं। दोनों देशों में बहुत से ऐसे आतंकी लोग हैं, धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोग हैं, जंगखोर और नफरतजीवी लोग हैं जो कि एक-दूसरे पर हमले की भड़काऊ बातें करते रहते हैं। इसके बीच में सुषमा स्वराज की यह छोटी सी पहल, और उसका सोशल मीडिया पर इस तरह लगातार दिखना, इससे दोनों देशों के बीच इंसानी रिश्ते मजबूत हो रहे हैं, और ऐसी ही मजबूती से सरकारों की जिद कमजोर भी होगी।
सोशल मीडिया पर ऐसी बातों को बढ़ावा मिलने से जो माहौल बनता है, वह बताता है कि अच्छा काम न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि वह दिखना भी चाहिए। यही काम हो सकता है कि  पिछली सरकारें भी करती आई हों, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार में सोशल मीडिया की समझ नहीं थी। ऐसे में लोगों के बीच भावनाओं को बदलने के लिए इस नए औजार की ताकत को पहचानना होगा। हमारा यह मानना है कि पाकिस्तान में भी जो लोग भारत को नापसंद करते होंगे, वे भी जब यह देखेंगे कि किस तरह भारतीय विदेश मंत्री कुछ घंटों में ही पाकिस्तानियों को इलाज के लिए भारतीय वीजा देती हैं, तो उनकी सोच भी इससे बदलेगी। फिर इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि देशों के बीच तनातनी कितनी भी रहे किसी कुदरती मुसीबत के वक्त, या कि इलाज जैसी जरूरत के लिए देशों को अपने दरवाजे हमेशा खुले रखने चाहिए। भारत एक बड़ा देश है, इसलिए इसे पड़ोस के छोटे देशों के साथ नरमी भी बरतनी चाहिए क्योंकि उन देशों में इलाज की उतनी सहूलियतें नहीं हैं।
डिप्लोमेसी कई किस्म की होती हैं, कई सरकारों में भारत और पाकिस्तान के कुछ बड़े अखबारनवीसों ने भी बातचीत के रिश्ते जारी रखवाए थे। अभी भी सुनाई पड़ता है कि भारत के एक बड़े कारखानेदार का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ के कुनबे से दो पीढिय़ों का कारोबारी रिश्ता रहा है, दोस्ताना रिश्ता रहा है, और नवाज शरीफ और नरेन्द्र मोदी को करीब लाने में इस हिन्दुस्तानी कारखानेदार का खासा हाथ रहा है। यह बुरा हुआ कि इन दोनों नेताओं के बीच बढ़ती हुई दोस्ती कायम नहीं रह पाई, और दोनों देश बातचीत तोड़कर घर बैठे हुए हैं, लेकिन इस किस्म की दूसरी कोशिशें भी जारी रहनी चाहिए। हमारा मानना है कि सरहद के दोनों तरफ कम ही लोग ऐसे हैं जो कि दूसरे देश की तबाही चाहते हैं, अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो कि अमन-चैन चाहते हैं, ऐसे लोगों के बीच से भलमनसाहत की मिसालें उठनी चाहिए, आगे बढऩे चाहिए, और ऐसी मिसालें ही सरकारों को मजबूर करेंगी कि वे मिल-बैठकर बात करें। अभी चार दिन पहले ही पाकिस्तान से किसी ने सुषमा स्वराज को ट्वीट किया है कि किस तरह बोल-सुन न सकने वाला एक पाकिस्तानी बच्चा भारत की एक जेल में कैद है, और उसे छोडऩा चाहिए। इस पर सार्वजनिक रूप से ही सुषमा ने इस मामले की जानकारी मांगी, और हो सकता है कि जल्द ही यह बच्चा रिहा होकर अपने वतन लौट भी पाए। फिलहाल पाकिस्तान के लोगों की सेहत ठीक रखने में हिन्दुस्तान की अस्पताली ताकतें जो कुछ कर सकती हैं, वह जरूर करना चाहिए, इंसानियत सरहद से बहुत ऊपर रहती है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 December

दीवारों पर लिक्खा है, 6 दिसंबर

सुरक्षा स्वाभाविक हो जाने तक लोगों को सावधान रहना होगा

संपादकीय
6 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज सुबह सूरज निकला ही था कि शहर के बीच बाजार में एक छोटी बच्ची के साथ ज्यादती की कोशिश में पहचान के एक आदमी को पकड़ा गया, और उसे पीटकर पुलिस के हवाले कर दिया गया। बच्ची की मां ही एक सड़क किनारे होटल में पकाने वाले इस आदमी के पास बच्ची को छोड़कर गई थी।  देश भर में चारों तरफ से बलात्कार की ऐसी खबरें आती है जिनमें घर का ही कोई रिश्तेदार किसी बच्चे से सेक्स ज्यादती करते पकड़ाता है, कहीं पड़ोसी किसी नाबालिग पर बलात्कार करते मिलता है, कहीं मोहल्ले का कोई लड़का किसी बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर ले जाता है और रेप करता है। चारों तरफ बलात्कार की ऐसी खबरें हैं जिनमें बलात्कारी जान-पहचान का निकलता है। ऐसी नौबत में पुलिस और सरकार इसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते। जब तक पहले से किसी छेड़छाड़ की शिकायत न हो, जब तक पहले ऐसा जुर्म कर चुका आदमी पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज न हो, तब तक लोगों को खुद ही अपना और अपने बच्चों का ख्याल रखना है। कहने के लिए तो लोकतंत्र में हर किस्म की हिफाजत के लिए सरकार और उसकी पुलिस जवाबदेह है, लेकिन यह जवाब किसी नुकसान की भरपाई कभी नहीं कर सकता।
पश्चिमी देशों में एक वक्त जवान लड़कियों को सावधान किया जाता था कि कुछ खाते-पीते हुए उन्हें यह सावधानी बरतनी चाहिए कि कोई उन्हें रेप-पिल नाम से बदनाम वह दवा घोलकर न पिला दे, जिसके बाद वे अपना आपा खो बैठें, और उनके साथ बलात्कार हो जाए। लेकिन भारत में इसकी भी जरूरत नहीं पड़ रही है। बहुत सी लड़कियां अपने किसी दोस्त या फेसबुक-दोस्त के साथ ऐसे चली जाती हैं, कि उसके साथ और भी दोस्त रहते हैं, और फिर सब मिलकर सामूहिक बलात्कार करते हैं। अब ऐसे मामलों में देश की आधी आबादी को पुलिस बना दिया जाए, तो ही वह बाकी आधी आबादी पर नजर रख सकती है। इसलिए समझदारी इसमें है कि लोग सावधानी सीखें, सावधानी बरतें, और खतरों से दूर रहें।
इस देश में महिलाओं को लेकर लोगों का सोच वैसे भी बहुत सम्मान का नहीं है, और ऐसे में उनको कोई सामाजिक बचाव नहीं मिल पाता है। अभी कल ही दिल्ली की घटना दिल दहलाने वाली है जिसमें एक लड़की छेडख़ानी की शिकार बनी हुई थी, और छेडऩे वाले लड़कों ने कल उसे चाकुओं से गोदकर खुली सड़क पर मार डाला। ऐसे में पुलिस तो मौके पर जब पहुंचे, तभी कोई कार्रवाई कर सके, लेकिन आसपास के लोग भी तमाशबीन बने खड़े रहते हैं, और हिंसा को रोकने की कोशिश नहीं करते। दिनदहाड़े सड़क पर अगर समाज से कोई हिफाजत नहीं मिल सकती, तो ऐसे समाज को पुलिस की कितनी भी ताकत नहीं बचा सकती।
सेक्स को लेकर होने वाले जुर्म का एक दूसरा सामाजिक पहलू है, जिसकी चर्चा किए बिना सेक्स-अपराध किसी तरह से कम नहीं हो सकते। इस देश में लोगों को प्रेम-संबंधों की इजाजत नहीं है, लड़के-लड़कियों की दोस्ती पर समाज की कातिल निगरानी है, खानदान की इज्जत के नाम पर प्रेमी-जोड़ों की हत्या हर हफ्ते-पखवाड़े खबरों में रहती है। ऐसे में सेक्स की जरूरत, या भावनात्मक संबंधों की जरूरत होने पर लोगों के पास सिवाय सेक्स-शोषण के, सेक्स-अपराध के, और कोई रास्ता नहीं बचता। वयस्क जरूरतों को लेकर भारत एक बड़ा पाखंडी देश है, जहां की कारोबारी राजधानी मुम्बई को डांस-बार भी बर्दाश्त नहीं है, यह एक अलग बात है कि मुंबई एशिया का सबसे बड़ा चकला बना हुआ है, जहां रोजाना लाखों बदन बेचे जाते हैं। यह पाखंड भारत के मिजाज की रग-रग में समाया हुआ है, और लोग उन तमाम बातों को अनदेखा कर देना चाहते हैं, जो कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को ठेस पहुंचाती हैं। लोग बच्चों के यौन शोषण को एक पश्चिमी बीमारी मानते हैं, लोग समलैंगिकता को जुर्म मानते हैं, लोग दूसरे धर्म की शादी को लव-जेहाद जैसे नाम देते हैं, लोग दूसरी जाति में शादी को बर्दाश्त नहीं करते, अपने खुद के गोत्र के भीतर शादी बर्दाश्त नहीं करते, और कुल मिलाकर वे वेश्यावृत्ति से लेकर परिवार के भीतर यौन-शोषण तक सबको बर्दाश्त करते हैं। ऐसी दकियानूसी समाज-व्यवस्था सेक्स-अपराधों को कम नहीं कर सकती, और ऐसा समाज चाहता है कि हर किस्म की हिफाजत पुलिस का जिम्मा रहे। पुलिस का काम है अधिकतर मामलों में अपराध हो जाने के बाद शुरू होता है, और बंद कमरों में दो लोगों के बीच होने वाले अपराध को पुलिस कभी नहीं रोक सकती। हिफाजत की हसरत रखने वाले समाज को अपने आपको पाखंड से निकालना भी पड़ेगा। (Daily Chhattisgarh)

मेरे पास पृथ्वी थिएटर है...

संपादकीय
5 दिसम्बर 2017


फिल्म अभिनेता और निर्माता-निर्देशक शशि कपूर के गुजरने पर जो लोग उन्हें याद कर रहे हैं, उनमें दो चीजें सबसे अधिक कही और लिखी जा रही हैं। एक तो यह कि इंसान के रूप में उनका बर्ताव बहुत ही ऊंचे दर्जे का था। वे हँसते-मुस्कुराते ही अनजान लोगों से भी मिलते थे, और  किसी को उनसे बदसलूकी नहीं झेलनी पड़ी। उनकी दूसरी खूबी जो मायने रखती है, वह थी मुंबई में नाटकों के लिए सबसे अच्छी जगह, पृथ्वी थिएटर को बनाना और चलाना, जो कि फायदे का काम शायद नहीं भी था। इन दोनों ही खूबियों को देखें, तो यह लगता है कि इनका खानदान से कोई लेना-देना नहीं था। कपूर खानदान के दर्जन भर लोग फिल्म उद्योग में कामयाब हुए, लेकिन इन दो खूबियों के लिए और किसी को नहीं जाना गया। हम किसी एक कलाकार के गुजरने पर उसके काम पर लिखने के आदी नहीं हैं, क्योंकि उनका छोड़ा गया काम ही उनके बारे में लिखा हुआ रहता है। लेकिन उनकी दूसरी खूबियों के बारे में कभी-कभी लिखने को दिल करता है, और शशि कपूर की ये दो खूबियां उनकी जिंदगी के साथ इस तरह चस्पा हैं कि आखिर में यही सबसे अधिक मायने रखती दिखती हैं, उनके अभिनय के साथ-साथ।
जो लोग यह मानते हैं कि किसी खानदान के होने के नाते किसी इंसान को आगे बढऩे का ऐसा मौका मिलता है, वे लोग कुछ खूबियों को कभी-कभी अनदेखा कर देते हैं। किसी खानदान का होने के नाते ऐसे लोगों से बड़ी ऊंची-ऊंची उम्मीदें भी बंध जाती हैं, जैसे कि आज राहुल गांधी से बंधी हुई हैं, और जिन पर खरा उतरना खासा मुश्किल भी हो जाता है। ऐसे में लोगों के अपने काम ही उन्हें यादगार बनाते हैं। शशि कपूर के साथ कुछ ऐसा ही था।
लोगों को यह याद रखना चाहिए कि मशहूर और कामयाब हो जाने के बाद दुनिया उन्हें लंबे अर्से तक याद तो रखती हैं, लेकिन ये यादें लोगों को खुशी देने वाली होनी चाहिए। लोग जब तक कामयाब हैं, तब तक तो बहुत यादों की जगह निकलती नहीं है, लेकिन बाद में लोगों के बर्ताव की सकारात्मक बातें ही उन्हें संस्मरणों में बेहतर जगह दिला पाती हैं। इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह भी रहती है कि लोगों ने अपने पेशे, और कमाऊ कामकाज से परे समाज के लिए, दूसरे लोगों के लिए क्या किया, यह बात भी लोग याद करते हैं, और याद रखते हैं। नाटकों को एक मंच देने के लिए पृथ्वी थिएटर का मुंबई और हिंदुस्तान के लिए योगदान शशि कपूर का एक बड़ा काम हमेशा ही गिना जाएगा। दूसरी तरफ हम फिल्म उद्योग के कुछ और लोगों को देखते हैं, तो नाना पाटेकर जैसे लोग दिखते हैं जो कि अपनी थोड़ी सी कमाई का पूरा सा हिस्सा आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को देते हैं, और अपनी मिसाल अपने कहे बिना दूसरों के सामने रखते हैं। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन जैसे लोग दिखते हैं जो कि एक सैनिक वाली फौज की तरह काम करते हैं, और अरबों कमाते हैं, और बांटते शायद कुछ भी नहीं हैं। उन्होंने अपने ससुराल भोपाल के गैस पीडि़तों के लिए भी इस चौथाई सदी में कुछ किया हो ऐसा याद नहीं पड़ता। यह उनकी निजी-कारोबारी पसंद हो सकती है, लेकिन लोगों को समाज के लिए किया हुआ याद रहता है, और न किया हुआ भी याद रहता है। शशि कपूर की चर्चा करते हुए अमिताभ की चर्चा इसलिए की जा रही है कि आज अमिताभ यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, अरबों हैं, तुम्हारे पास क्या है, और मानो इसके जवाब में शशि कपूर की देह से आवाज निकल रही है कि मेरे पास पृथ्वी थिएटर है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 5 दिसंबर

छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी ही कामयाबी से सबक की जरूरत

संपादकीय
4 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ में इन दिनों तेंदूपत्ता बोनस बंट रहा है। लाखों लोगों को सैकड़ों करोड़ रूपए बंटेंगे, और यह सबसे गरीब तबके को सीधे-सीधे मिलने वाला एक ऐसा मेहनताना है जो कि किसी किस्म का दान नहीं है, और इससे लोकतंत्र के भीतर एक बहुत बड़ा प्राकृतिक न्याय भी पूरा हो रहा है कि जंगलों में बसे हुए लोग जंगल की उपज की पूरी कमाई पर हकदार हों। तेंदूपत्ता वनवासियों की कमाई का एक छोटा सही, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी तरह जंगल में होने वाली दूसरी छोटी-छोटी चीजों से भी छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को साल भर कुछ न कुछ कमाई होती है। राज्य में इसके लिए बने हुए लघु वनोपज संघ ने एक कारोबारी की तरह इस काम में महारथ हासिल कर ली है, और छत्तीसगढ़ का तेंदूपत्ता देश में बड़े अच्छे दामों पर बिकने लगा है। हैरानी की बात यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा उन नक्सल इलाकों में से आता है जहां पर बहुत से दूसरे कारोबार नहीं हो पा रहे हैं।
आज इस मामले पर यहां चर्चा की जरूरत दो और मुद्दों को जोड़कर जरूरी लग रही है। एक तो लघु वनोपज का मामला है ही, दूसरी तरफ दो और मामले हैं जो कि सीधे-सीधे जनता की भलाई से जुड़े हुए हैं, और गरीबों का फायदा होने के साथ-साथ राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को भी सरकार के इन जनकल्याणकारी कार्यक्रमों का फायदा होता है। छत्तीसगढ़ में धान की खरीदी को लेकर सरकार ने एक खूबी हासिल कर ली है, और पूरे प्रदेश में गांव-गांव तक बिखरी हुई मंडियों में किसान की पूरी उपज सरकार सही दामों पर खरीद लेती है जो कि छोटी बात नहीं है। इससे राज्य की साख इतनी अच्छी हुई है कि अड़ोस-पड़ोस के राज्यों से भी वहां के किसान अपना धान तस्करी से छत्तीसगढ़ में लाते हैं, और यहां के किसानों के खेतों के कागजात जुटाकर उन्हें बेचते हैं। तीसरा मुद्दा जो इसी संदर्भ में चर्चा के लायक है वह है राज्य में पीडीएस की सफलता का। प्रदेश की तकरीबन आधी आबादी इतनी गरीब है कि वह सरकार के रियायती अनाज और चना या दूसरे किस्म के कुछ और सामानों की वजह से पेट भर खा पाती है। हालांकि छत्तीसगढ़ में नागरिक आपूर्ति निगम का एक घोटाला राज्य सरकार की ही एजेंसी ने पकड़ा, और उसे अदालत तक लेकर गई, लेकिन वह धान की मिलिंग और चांवल से जुडा हुआ मामला था, उसका गांव-गांव तक बिखरी हुई राशन दुकानों से लेना-देना नहीं था, और राशन दुकानों से लोगों को अनाज ठीक मिलना एक बहुत बड़ी कामयाबी है जिसकी तारीफ सुप्रीम कोर्ट से लेकर यूपीए सरकार तक, और भाजपा-आरएसएस के सबसे कट्टर आलोचक वामपंथी अर्थशास्त्रियों तक, सभी जगह से हुई है।
सरकार की इन तीन बड़ी कामयाबियों से सत्तारूढ़ भाजपा के वोटों की रीढ़ की हड्डी तो बनती है, लेकिन यह कामयाबी राज्य सरकार के सामने एक अलग किस्म की चुनौती भी खड़ी करती है, और उसी पर बात के लिए आज हमने यह मुद्दा उठाया है। एक राज्य सरकार जब लगातार, बरस-दर-बरस, करीब डेढ़ दशक तक, जब लगातार इन तीन मुद्दों पर कामयाबी पा सकती है, इनके अलावा जब वह लगातार बिजली दे सकती है, और बिजली का विस्तार भी कर सकती है, तब सवाल यह उठता है कि कुछ दूसरी सरकारी सेवाओं में सरकार लगातार नाकामयाब क्यों बनी हुई है? क्यों सरकार प्रायमरी स्कूलों को नहीं सुधार पा रही है, क्यों सरकारी अस्पतालों का हाल बेहतर नहीं हो पा रहा है, क्यों शहरों के म्युनिसिपल अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं? सरकार का एक हिस्सा जब अच्छा काम करता है, तो वह काम दूसरे मंत्रियों, और दूसरे अफसरों के लिए एक चुनौती भी होना चाहिए। ऐसे में राज्य सरकार को गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि जिन क्षेत्रों में, जिन विभागों में वह कमजोर है, उन्हें किन तरीकों से बेहतर बनाया जा सकता है? यह राज्य एक तरफ तो अपनी अच्छी अर्थव्यवस्था की वजह से, एक बड़े अच्छे आर्थिक और वित्तीय अनुशासन की वजह से देश में सबसे सफल राज्यों में से एक है। ऐसे में कोई वजह नहीं है कि बेहतर दिमाग, बेहतर योजना, और बेहतर मुखिया ढूंढकर बाकी के कमजोर विभागों को भी ठीक किया जाए। राज्य सरकार को अपनी खुद की कुछ दायरों की कामयाबी से सबक लेना चाहिए, और बाकी दायरों का काम सुधारना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 दिसंबर

बोझ और उम्मीदों से दबी पुलिस को बेहतर बनाने नई सोच जरूरी

संपादकीय
3 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हफ्ते भर से अधिक हो गया है कि शिक्षाकर्मी सड़क पर हैं, और पिछले तीन दिनों से यहां की पुलिस ने मानो और कोई काम किया ही नहीं है। फिर आए दिन इस शहर में नेताओं और बड़े लोगों के आने पर तरह-तरह से इंतजाम में पुलिस झोंक दी जाती है, और उसका बुनियादी काम धरे रह जाता है। सड़कों पर कोई हादसा न दिखे, किसी का पुतला न जले, किसी बंगले के गेट तक भीड़ न पहुंचे, इसी सब इंतजाम में पुलिस की पूरी ताकत लगी रहती है, और छोटे-बड़े कई किस्म के जुर्म की जांच नहीं हो पाती, जांच हुई रहती है तो कार्रवाई नहीं होती। यह सिलसिला थमना चाहिए। लोकतंत्र में आंदोलनों को तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन जो लोग आंदोलन करते हैं, उनके और बाकी जनता के पैसों से ही पुलिस का इंतजाम होता है, और कुल मिलाकर यह सिलसिला जनता की जेब पर भारी पड़ रहा है।
भारत के कुछ और शहरों में पुलिस को दो हिस्सों में बांट दिया जाता है जिनमें से एक का काम सिर्फ जुर्म की जांच होता है, और दूसरे का काम कानून व्यवस्था का इंतजाम। छत्तीसगढ़ में ऐसी जरूरत अब आ ही गई है कि जांच के लिए पर्याप्त पुलिस अलग कर दी जाए, ताकि मुजरिमों को आगे और जुर्म करते चलने का मौका न मिले, और जनता का भी पुलिस पर यह भरोसा रहे कि उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई हो रही है। इसके साथ-साथ पुलिस के खुफिया विभाग को इस बात के लिए तैयार किया जाना चाहिए कि वह कई किस्म के आर्थिक अपराध, धोखाधड़ी होने के पहले ही उन पर निगरानी रखे, और हजारों शिकायतें खड़ी हो जाने के पहले उनको रोक सके। हम पहले भी यह बात लिख चुके हैं कि राज्य में जिस तरह नक्सल इंटेलीजेंस है, बाकी बातों के लिए इंटेलीजेंस है जिसे कि मोटे तौर पर राजनीतिक इंटेलीजेंस भी कह दिया जाता है, उससे परे एक आर्थिक अपराध इंटेलीजेंस और होना चाहिए। बड़े पैमाने पर कोई भी संगठित अपराध न तो रातों-रात होते, और न ही बंद कमरे में होते। कहीं न कहीं कंपनियां खुलती हैं, हजारों एजेंट बनाए जाते हैं, दफ्तर खुलते हैं, कतारें लगती हैं, बड़े-बड़े हॉल में कार्यक्रम होते हैं, और तब कहीं जाकर धोखाधड़ी के लिए एक उपजाऊ जमीन तैयार होती है। ऐसे में अगर समय रहते निगरानी रखी जाए, तो हजारों-लाखों लोग लुटने के पहले ही बच सकेंगे, और बैंक खातों से पैसे निकल जाने के पहले मुजरिम पकड़े जा सकेंगे।
भारत के बाकी अधिकतर हिस्से की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस का ढांचा, उसकी ट्रेनिंग, और उसकी सोच, ये सब कुछ अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा के मुताबिक ही जारी है, जबकि अपराध के तौर-तरीके बदल चुके हैं, लोकतंत्र में आंदोलनों के पैमाने बड़े हो चुके हैं, और मुजरिमों की ताकत बहुत अधिक बढ़ चुकी है। ऐसे में राज्य को एक नई के साथ पुलिस की क्षमता को न सिर्फ बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए, बल्कि उसे आज की जरूरत के मुताबिक अधिक हुनरमंद भी बनाना चाहिए। पुलिस की मौजूदा पीढिय़ां आज की नई चुनौतियों के लायक नहीं रह गई हैं, और दूसरी बात यह भी है कि सामाजिक-राजनीतिक दबाव पुलिस पर इतना अधिक होता है, मीडिया का दबाव इतना अधिक होता है, कि उसकी सोच इन सबके तले दब जाती है। यह सिलसिला बदलना जरूरी है वरना जनता की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकेंगी, और लोकतंत्र पर से उसका भरोसा भी कम होने लगेगा। हम पुलिस से जुड़ी कुछ घिसी-पिटी और पुरानी बातों को यहां दुहराना नहीं चाहते क्योंकि उन पर बहुत बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन पुलिस को अधिक पेशेवर बनाने के लिए पूरी तरह से एक नई सोच चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 दिसंबर

छत्तीसगढ़ को स्कूल शिक्षा पर अधिक ध्यान देने की जरूरत

संपादकीय
2 दिसम्बर 2017


छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों का आंदोलन लगातार चल रहा है और राज्य सरकार ने अपना पक्का इरादा जाहिर कर दिया है कि वह किन शर्तों पर ही बात करेगी। करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी राज्य की प्राथमिक शालाओं में पढ़ाने के लिए सबसे बड़ी ताकत हैं, और वे बुनियादी रूप से जिला पंचायत के कर्मचारी हैं। उनकी नौकरी भी जिला स्तर की रहती है, और राज्य सरकार उनकी नियोक्ता नहीं है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि निर्वाचित जिला पंचायतों के नियुक्त किए गए शिक्षाकर्मियों की मांगों पर कोई फैसला हो, या कि उन्हें बर्खास्त करने का फैसला हो, राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र कितना है, उसकी जिम्मेदारी कितनी है, और जिला पंचायत का दायरा कितना है। कुछ जानकारों का यह मानना है कि राज्य सरकार इस मामले में कोई दखल नहीं दे सकती है और न ही उसकी कोई जिम्मेदारी बनती है। यह बारीक कानूनी मुद्दा हो सकता है कि बर्खास्तगी के खिलाफ किसी के अदालत जाने पर तय हो, लेकिन फिलहाल तो सरकार ने बैठकें करके और बातचीत करके इसे अपनी जिम्मेदारी मान ही लिया है।
छत्तीसगढ़ में यह भी शायद पहली बार हो रहा है कि किसी आंदोलन की शुरूआत मुख्यमंत्री की मेज पर एक बैठक हो जाने के बाद शुरू हुई हो। दरअसल बिना किसी तैयारी के जब अफसरों ने शिक्षाकर्मियों को ले जाकर मुख्यमंत्री से इस अंदाज में मिलवाया कि मानो सारी बातें तय हो चुकी हैं, तो वहीं से गड़बड़ी शुरू हो गई। बाद में पता लगा कि कोई बात तय नहीं हुई है, कोई सहमति नहीं बनी है, और आंदोलन उसके बाद से लगातार चल रहा है। आज राजधानी रायपुर में इस वक्त दस हजार से अधिक शिक्षाकर्मी पूरे प्रदेश से आकर गिरफ्तारी दे रहे हैं, और उनकी संख्या सरकार के लिए चिंता की वजह हो सकती है।
हम अभी पलभर के लिए शर्तों की बारीकियों पर न जाकर सिर्फ यह सोचते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को लेकर सरकार का क्या रूख होना चाहिए तो लगता है कि शिक्षा के जिस स्तर पर सबसे अधिक मेहनत होनी चाहिए, वह छत्तीसगढ़ में सबसे उपेक्षित है। पिछले दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़ आए थे और उन्होंने शिक्षा और चिकित्सा इन दो मुद्दों पर सबसे अधिक मेहनत की जरूरत बताई थी। अब छत्तीसगढ़ में प्राथमिक शिक्षा का शिक्षा विभाग से भी लेना-देना है, और पंचायत विभाग से भी लेना-देना है। इन दोनों की जिम्मेदारियों को तय करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन हम यह बात जोर देकर कहना चाहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को अधिक महत्व देने की जरूरत है, उस पर शहरीकरण की खूबसूरती से कहीं अधिक खर्च करने की जरूरत है, उस पर सड़कों के ढांचों से अधिक खर्च करने की जरूरत है। अगर सरकार प्राथमिक शिक्षा को राज्य के ढांचे का विकास नहीं मानती है, तो यह गलती होगी। शिक्षाकर्मियों की मांगों से परे भी राज्य की प्राथमिक शिक्षा को भी तरह-तरह के भ्रष्टाचार से बचाने की जरूरत है, क्योंकि कोई ऐसी स्कूल नहीं है जहां पर एक-दो कमरे टूटे-फूटे फर्नीचर से भरे हुए न हों। इसके अलावा भी तरह-तरह की गड़बडिय़ां समय-समय पर सामने आते रहती हैं, यह राज्य शिक्षकों का इंतजाम भी नहीं कर पा रहा है, और उनके लिए जगह-जगह अलग-अलग कई विषयों में आऊटसोर्सिंग से शिक्षक नियुक्त करने जैसी नौबत भी सामने आ चुकी है। छत्तीसगढ़ को अपनी नींव के पत्थर मजबूत करने के लिए प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। कल स्कूल शिक्षा मंत्री ने शिक्षाकर्मियों को अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की विरासत में दी हुई समस्या बताया है। किसी भी राज्य सरकार के लिए चौदहवें बरस के जश्न के मौके पर डेढ़ दशक पहले की सरकार को कोसना शोभा नहीं देता। छत्तीसगढ़ को बिना देर किए प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारना होगा, और आज का यह चल रहा आंदोलन एक बड़ी फिक्र पैदा करता है। आंदोलनकारी शिक्षाकर्मियों की मांगों को लेकर हम यहां कोई सलाह देना नहीं चाहते, लेकिन राज्य सरकार को स्कूल शिक्षा पर अधिक खर्च करने की जरूरत है, अधिक ध्यान देने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 दिसंबर

दिल्ली में ओबामा की कही बातों पर सोचने और अमल की जरूरत

संपादकीय
1 दिसम्बर 2017


अमरीकी राष्ट्रपति रह चुके, और अभी दिल्ली एक अखबार के कार्यक्रम में पहुंचे बराक ओबामा ने हिन्दुस्तान के संदर्भ में अपनी राय दी कि यहां के नौजवानों को स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त में उसी से उनका काम चल सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि मशीनीकरण और कम्प्यूटरों के ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की वजह से बहुत से रोजगार घट रहे हैं, लेकिन स्किल बढ़ाने से लोगों को दूसरे तरह के काम मिल सकते हैं, कौशल विकास से ही नौजवानों को काम मिलेगा, और उनका भविष्य बेहतर होगा। उन्होंने अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक दूसरी बात भी कही कि सबसे ऊपर के एक फीसदी लोग अधिक धन इक_ा कर लेते हैं, और गरीबों को कुछ नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि इंसान और इंसान में फर्क करना बेहद खतरनाक है। उन्होंने इंसानों के साथ-साथ गरीब और अमीर देशों के बीच के फर्क को घटाने की बात भी कही।
हम इन बातों में से कौशल विकास या अपने हुनर को बेहतर बनाने वाली बात को भारत के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं, और यह मानते हैं कि इस एक अकेली कोशिश से हिन्दुस्तानी नौजवान बाकी पूरी दुनिया में जाकर कामकाज और रोजगार, कारोबार और दूसरे किस्म की पहल कर सकते हैं, अपना भी भला कर सकते हैं, और देश का भी भला कर सकते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम पहले भी कई बार इस बारे में लिख चुके हैं कि भारत में नौजवान पीढ़ी का अधिकांश हिस्सा ऐसा है जो कि मामूली स्कूल-कॉलेज से महत्वहीन किस्म की पढ़ाई करके अपने को पढ़ा-लिखा मान लेने की खुशफहमी में जीता है, और आखिर में जाकर वह परिवार, समाज, और देश पर बोझ बनकर रह जाता है। लोगों के बीच पढ़ाई को रोजगार या कामकाज का एक जरिया मान तो लिया जाता है, लेकिन सरकार से लेकर परिवार तक के बीच यह नहीं सोचा जाता कि इन दो बातों के बीच एक बहुत बड़े पुल की जरूरत होती है, जिसके बिना यह पढ़ाई किसी काम की नहीं रह जाती है। ऐसे में कौशल विकास या अपने हुनर को बेहतर बनाना, नए हुनर सीखना ही एक ऐसा काम है जिसे मशीनें टक्कर नहीं दे सकतीं, और जिसे कम्प्यूटर शिकस्त नहीं दे सकते।
हम आसान शब्दों में इस बात को कहें, तो स्कूल की बुनियादी पढ़ाई के बाद सीधी जरूरत यह है कि लोग अपनी पसंद के ऐसे हुनर को छांटें जिसकी कि दुनिया को जरूरत भी दिख रही हो। यह हुनर जरूरी नहीं है कि सफेद कपड़े पहनकर दफ्तर में कुर्सी पर बैठकर करने वाले काम का हो, हो सकता है कि यह हुनर फिजियोथैरेपी का हो, किसी दुकान में बिक्री करने वालों का हो, कहीं मालिश और कहीं बागवानी करने वालों का हो, तो कहीं ड्राइविंग और घरेलू कामकाज करने वालों का हो। ऐसे ही काम लोगों को पूरी दुनिया में मिल सकते हैं जो कि कम्प्यूटर और मशीनें आसानी से नहीं कर सकते। लोगों को ऐसे हुनर के साथ-साथ कोई न कोई दूसरी जुबान भी सीखना चाहिए, कम्प्यूटर का काम सीखना चाहिए, पहरावे और बातचीत का सलीका सीखना चाहिए। इस तरह से लोगों को अपने आपको एक ऐसा आकर्षक पैकेज बनाना होगा जिसकी जरूरत दुनिया के लोगों को कहीं न कहीं लगती हो। आज विकसित और संपन्न दुनिया लगातार काम के घंटों को घटाते चल रही है। हफ्ते में अब महज चार दिन लोग काम कर रहे हैं, और तीन दिनों का सप्ताहांत मना रहे हैं। ऐसे में उनको घर के कामकाज के अलावा अपने सुख और अपनी सुविधा के लिए भी कामगार लगेंगे। कुछ विकसित देशों में अभी यह सोच भी मंजूर की जा रही है कि हर नागरिक को एक न्यूनतम गुजारा भत्ता दिया जाए, और ऐसा होने पर वहां के लोगों में काम न करके रहने का मिजाज भी बढ़ सकता है, और वहां पर बाहरी कामगारों की जरूरत हो सकती है। इसलिए ओबामा की बात को महत्व देते हुए भारत के लोगों को यह सोचना चाहिए कि कौशल विकास को सरकारी फर्जी आंकड़ों वाली योजना से बाहर निकालकर किस तरह हकीकत में जमीन पर उतारा जा सकता है ताकि भारत में करोड़ों नौजवानों की जो कामगार पीढ़ी है, उसकी उत्पादकता एकदम से बढ़ाई जा सके। आज अगर भारत में कौशल विकास करते हुए पूरी दुनिया में जाकर काम करने की तैयारी नहीं की जाएगी, तो वह योजना शुरू होने के पहले ही दम तोड़ चुकी होगी। इसलिए सरकार की योजना से परे लोगों को अपनी क्षमता बढ़ाने, अपने हुनर को बढ़ाने के बारे में खुद भी सोचना होगा। इसके बाद उनके सामने आसमान भी कोई सीमा नहीं रहेगी। (Daily Chhattisgarh)