शाहिद कपूर के गाने पर नाचते-गाते बड़े-बड़े नेता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2017


अभी पिछले कुछ घंटों से अमरीकी मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने विदेशी मोर्चे पर शहीद हुए एक नौजवान सैनिक की पत्नी से फोन पर बात करते हुए एक से अधिक बार यह याद दिलाया कि जब उसने फौज की नौकरी की, तब भी उसे यह मालूम था कि उसके साथ क्या हो सकता है। जो लोग अमरीका में ट्रंप के आदतन-आलोचक नहीं हैं, वे लोग भी बुरी तरह से विचलित हैं कि एक ऐसे शहीद की पत्नी के साथ बात करते हुए राष्ट्रपति ने ऐसी ओछी और घटिया बात कही है जो कि अब तक शायद किसी राष्ट्रपति ने न की हो। यह वह शहीद है जो अपने पीछे दो बच्चे और गर्भवती पत्नी छोड़ गया है, और जो देश के लिए लड़ते हुए ऐसी बुरी मौत मरा है कि अंतिम संस्कार के पहले उसका ताबूत भी नहीं खोला गया, जाहिर है कि उसकी लाश देखने लायक भी नहीं रही होगी। ट्रंप अपनी उस जुबान के लिए कुख्यात हैं जिसे इंसानी जुबान में हैवानियत कहा जाता है, हालांकि न हैवान नाम की कोई चीज होती, और न ही कुछ हैवानियत होती, यह पूरा मिजाज इंसानों के मिजाज का एक हिस्सा है, जो कि समय-समय पर बेकाबू होकर बाहर आते रहता है। हैरानी इसमें बस यही है कि जब लोग देश या प्रदेश के किसी सबसे बड़े ओहदे पर पहुंच जाते हैं, तो उसके बाद भी अपने भीतर की हैवानियत पर उनका काबू ऐसा खोते रहता है, और यह हैवानियत सार्वजनिक रूप से इस तरह सामने आती रहती है।
हिन्दुस्तान में भी हम बहुत से ओहदों पर बैठे हुए लोगों को देखते हैं जो कि मुंह खोलते हैं, और गंदी, हिंसक, साम्प्रदायिक, अश्लील, और भद्दी बात करते हैं। इनमें से कुछ लोग तो धर्म का लबादा भी ओढ़े रहते हैं, बहुत से लोग अपने आपको किसी संस्कारी पार्टी या संगठन का कहते हैं, और वे गरीबों के खिलाफ, महिलाओं के खिलाफ और लड़कियों के खिलाफ गंदा कहना उसी तरह जारी रखते हैं जिस तरह किसी एक फिल्मी गाने में कोई किरदार यह गाता है- अब करूंगा गंदी बात, तेरे साथ...। भारत में हम महिला मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी से काम सम्हालते ही बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में यह सुन चुके हैं कि महिला की शिकायत राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हम हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की चुनाव के पहले की यह बातें सुन चुके हैं कि जिन लड़कियों या महिलाओं को शाम के बाद बाहर निकलना हो वे बिना कपड़ों के नंगी होकर क्यों नहीं निकलतीं। अभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कियों पर यौन हमले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार के लोगों के तरफ से भी बहुत ही गंदी और ओछी बातें कही गईं। जेएनयू के विवाद के समय राजस्थान के एक भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने जेएनयू के अहाते में हर दिन तीन हजार इस्तेमाल हो चुके कंडोम और दो हजार शराब-बोतलें मिलने की बात कही थी। विधायक का नाम तो ज्ञानदेव है, लेकिन जिस विश्वविद्यालय में देश की होनहार लड़कियां भी पढ़ती हों, उसके बारे में गंदी बात कहते हुए इस विधायक का ज्ञान धरे रह गया।
हम ट्रंप के बारे में तो यह नहीं कहते, लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में जरूर कह सकते हैं कि यह देश यौन-कुंठाग्रस्त देश है जिसके लोगों को स्वाभाविक और प्राकृतिक सेक्स भी आपत्तिजनक, वर्जित, और जुर्म लगता है। यह वही देश है जिसमें सदियों पहले खजुराहो जैसे मंदिरों पर बड़ी मेहनत से कलाकारों ने सेक्स-क्रिया की मूर्तियां उकेरी थीं, जहां पर सदियों पहले वात्सायन में दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कहा जाने वाला सेक्स-ग्रंथ कामसूत्र लिखा था, जहां सदियों पहले शहरों में नगरवधुएं हुआ करती थीं, वहां पर आज किसी भी तरह की वयस्क बातचीत को जुर्म करार दे दिया गया है। यह यौन कुंठा महिलाओं के बारे में बात करते हुए, लड़कियों के बारे में बात करते हुए, प्रेमी जोड़ों के बारे में बात करते हुए उनके खिलाफ भारी हिंसा के साथ बाहर आती है। इस देश के बड़े पुराने-पुराने ग्रंथ इस जिक्र से भरे हुए हैं कि किस तरह राम की अयोध्या में, और कृष्ण के वक्त भी शहरों में वेश्याएं हुआ करती थीं, और वे राम के अयोध्या आने पर स्वागत करने भी पहुंचीं थीं। लेकिन आज उस इतिहास को मिटाने के लिए लोग आदमकद रबर (इरेजर) लेकर घूम रहे हैं, और जहां इतिहास पसंद नहीं आता, वहां उसे मिटाने पर जुट जाते हैं। कोई हैरानी नहीं कि इनमें से कुछ लोग कुछ बरसों के भीतर खजुराहो के मंदिरों को बम लगाकर उड़ा दें, और कामसूत्र की छपी हुई किताबों की बिक्री पर रोक भी लगवा दें। हमने बात शुरू की थी ट्रंप की गंदी बात से, फिर वह हिन्दुस्तानी नेताओं की गंदी बात पर आई, और हम आज की इस बात का अंत ऐसी गंदी बातों के पीछे की सोच की जड़ों पर लाकर खत्म कर रहे हैं। लोकतंत्र में लोगों को मुंह खोलने के पहले याद रखना चाहिए कि अब मुकरने के दिन खत्म हो चुके हैं, और उनकी कही गंदी बातों के सुबूत हमेशा के लिए दर्ज होते जाते हैं। एक वक्त आएगा जब हिन्दुस्तान में हिंसक और गंदी बातें कहने वालों को उसका दाम भी चुकाना पड़ेगा, नोटों की शक्ल में नहीं, वोटों की शक्ल में, और नेताओं के पेट पर जब मतदाता की लात पड़ेगी, तभी यह सिलसिला थमेगा। आज के डिजिटल जमाने में हमारा यह सुझाव है कि नेताओं की गंदी बातों को उनके चुनाव के वक्त उनके इलाकों में जमकर फैलाना चाहिए, और उन्हें निपटाना चाहिए, तभी लोकतंत्र की गंदी हवा साफ हो सकेगी, चाहे वह अमरीका हो, चाहे हिन्दुस्तान हो। 

सबको मालूम है लक्ष्मी की हकीकत लेकिन, दिल...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2017


एक बार फिर दीवाली सामने खड़ी है, और हिंदुस्तान का लगभग पूरा हिस्सा थोड़ा सा अधिक रौशन है। कुछ लोगों के मन में यह मलाल है कि पटाखों पर कहीं कुछ रोक लगी है, वहीं दूसरे बहुत से लोग हैं जिनके सामने यह फिक्र है कि इस त्यौहार को कैसे मनाएं, कैसे अपने बच्चों को बिना खर्च त्यौहार मनाने के लिए मनाएं। हर त्यौहार एक आर्थिक-सामाजिक खाई लेकर आता है और जितनी खुशियां लेकर आता है, उससे बहुत अधिक मलाल भी लेकर आता है। दीवाली की पूजा से जिस लक्ष्मी के खुश होने की धारणा है, वह लक्ष्मी अगर है, और वह किसी पर खुश होती है, तो वह चुनिंदा लोगों पर ही होती है, और ये वे लोग हैं जिनके पास पहले से वह लक्ष्मी मौजूद है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हाल के बरसों में दौलत का जो इजाफा हुआ है, वह पूरे का पूरा कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही हुआ है, और बाकी लोगों का हाल इसी दौर में और बदहाल हुआ है। गरीब और गरीब होते चले गया है, कुपोषण का शिकार, भूख का शिकार, पड़ोस के बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक कुपोषित और भूखा रह गया है।
आज जब बाजार धनतेरस की शानदार, चकाचौंध भरी खरीददारी के लिए तैयार हो रहा है, हो चुका है, तब सुबह-सुबह यह खबर थी कि आधार कार्ड नाम का पहचान पत्र न होने से एक परिवार का नाम राशन कार्ड से कट गया, और राशन न मिलने से, स्कूल की छुट्टी होने से दोपहर का भोजन भी न मिलने से झारखंड में एक गरीब बच्ची भूख से मर गई। ऐसे में एक बच्ची की मौत सरकारों की धनतेरस, और उसकी मनतेरस पर सवाल खड़े करती है। इस देश में हर दीवाली पर यही लगता है कि यह किसकी दीवाली है, एक छोटे से तबके की दीवाली, या देश की दीवाली। कहने को गरीब से गरीब घर में दीवाली पर दो दिए जल जाते हैं, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था को ढोना है, और गरीब इस उम्मीद में भी रहते हैं कि दीवाली की लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न लक्ष्मी उस पर मेहरबान होंगी, और उसकी गरीबी दूर होगी। लेकिन जैसा कि धर्म का मकसद था, उसे बनाने वालों का मकसद था, धर्म लोगों को ऐसे ही झांसे में रखता है, और गरीबों में बगावत को रोकने के लिए, अमीरों की हिफाजत करने के लिए यह एक हथियार बनाया गया था जो कि आज भी उतना ही कारगर है।
खर्च वाले हर त्यौहार के मौके पर यह बात और अधिक तल्खी से चुभती है कि भारत जैसे देश की उदार अर्थव्यवस्था किस तरह लक्ष्मी को समेटकर कुछ गिनेचुने लोगों तक ले जा रही है, और बाकी तमाम लोगों से उसे दूर कर रही है। फिर लक्ष्मी को भी इससे कोई परहेज नहीं है, वह भी इस इंतजाम में खुश है कि उसे बड़े-बड़े महलों, बड़ी-बड़ी तिजोरियों में रहने मिले, और कच्चे मकानों, झोपडिय़ों और बदबू से दूर रहने का मौका मिले। लक्ष्मी को कोई चुनाव तो लडऩा नहीं है कि वह किसी दलित के घर, किसी गरीब के घर जाकर रहे और खाना खाए, चाहे उस घर का, चाहे किसी रेस्त्रां से आया हुआ। लक्ष्मी की पूजा का यह त्यौहार धर्म की उसी गैरबराबरी वाली सोच पर बना और ढला हुआ है, इसे जो बना रहे हैं, उनकी हकीकत, और उनकी हसरत, सबके लिए हमारी बधाई। 

इतिहास पेंसिल से नहीं लिखा जाता कि रबर उठाया, और मिटा दिया...

संपादकीय
16 अक्टूबर 2017


एक गैरजरूरी और नाजायज बहस जो कि कुतर्कों पर आधारित हो, कभी-कभी बकवासियों को भारी भी पड़ सकती है। कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तरप्रदेश के घोर साम्प्रदायिक और बड़बोले, हिंसक और आक्रामक भाजपा विधायक संगीत सोम के साथ। उत्तरप्रदेश इन दिनों शाब्दिक अर्थों में भी एक भगवाकरण से गुजर रहा है, और वहां की सरकारी बसों और इमारतों को भगवा रंगना तेजी से चल रहा है, प्रदेश के इतिहास का हिन्दू धर्मांतरण किया जा रहा है, और ताजमहल को इतिहास से मिटा दिया जा रहा है। ताजमहल को मौजूदा वक्त से मिटा पाना कानूनी रूप से योगी आदित्यनाथ की सरकार के हाथ में नहीं है, वरना बाबरी मस्जिद के गुंबदों की तरह उसे भी गिरा दिया जाता। ऐसे में जब उत्तरप्रदेश की पर्यटन पुस्तिकाओं से ताजमहल को हटाकर सीएम योगी के खुद के गोरखनाथ मंदिर को जोड़ा जा चुका है, साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में जेल जा चुके भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा है कि देश का इतिहास अब तक बिगड़ा हुआ था उसे सुधारने का काम भाजपा कर रही है। ताजमहल कैसा इतिहास है, किस काम का इतिहास है, जिसमें अपने पिता को ही कैद कर डाला था, इन लोगों ने हिन्दुस्तान में हिन्दुओं का सर्वनाश किया था, अब भाजपा सरकार देश के इतिहास से बाबर, अकबर, और औरंगजेब की कलंक कथा को निकालने का काम कर रही है।
इस पर देश की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जवाब दिया है कि लाल किले को भी गद्दारों ने बनवाया था, क्या पीएम मोदी लाल किले से तिरंगा फहराना बंद कर देंगे? क्या मोदी-योगी देशी-विदेशी सैलानियों को ताजमहल जाने से मना करेंगे? क्या गद्दारों के द्वारा ही बनाए गए हैदराबाद हाउस में पीएम मोदी विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी बंद कर देंगे?
यह बहस इतिहास को मिटाने के अज्ञान भरे अहंकार से शुरू हो रही है, और इसका जैसा जवाब ओवैसी ने दिया है, उससे इस बकवासी विधायक की बोलती बंद हो जानी चाहिए। हिन्दुस्तान का इतिहास आज संगीत सोम और योगी की हसरत का मोहताज नहीं है, वह हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तान से ज्यादा अच्छी तरह दर्ज हैं, और खुद हिन्दुस्तानियों द्वारा दर्ज किए गए इतिहास को भी योगी जैसे लोग मिटा नहीं सकते, वह इस पार्टी की सरकार के बाद भी कायम रहेगा, और आज पूरी दुनिया में ऐसे दकियानूसी और धर्मांध लोग जिस अंदाज में ताजमहल को मिटाने पर आमादा हैं, यह उन तालिबानों की सोच की ही शुरुआत है जिन्होंने अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की पर्वताकार प्रतिमाओं को खत्म किया था। धर्मांधता से इतिहास को खत्म करने की कोशिशें तो तानाशाहों की भी कामयाब नहीं होतीं, यह तो पांच बरस के लिए निर्वाचित सरकार है। और जिन मुस्लिम शासकों को गद्दार कहते हुए जिनके बनाए ताजमहल को पर्यटन की पुस्तिकाओं पर से मिटाया जा रहा है, उन गद्दारों के बनाए लाल किले से प्रधानमंत्री आजादी की सालगिरह पर देश और दुनिया के नाम पैगाम देते हैं। फिर मुस्लिम गद्दारों के बाद अंग्रेज गद्दारों की बारी आएगी, जिनके राज में लोग ईसाई भी बने, और अंग्रेज राज ने हिन्दुस्तानियों का शोषण भी किया था। तो क्या संगीत सोम और योगी मिलकर पूरे देश से रेल की पटरियां उखाड़ फेंकेंगे? रेलवे स्टेशनों को गिरा देंगे? देश भर में ईसाई संस्थाओं द्वारा बनाई गई अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों को गिरा देंगे? संसद भवन और राष्ट्रपति भवन को गिरा देंगे? और क्या वह पूरे देश को अफगानिस्तान और सीरिया की तरह खंडहर बनाकर छोड़ेंगे?
दिक्कत यह है कि भाजपा की तरफ से ऐसे धर्मांध बयानों पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती है। ऐसे लोग समय-समय पर रामजादा-हरामजादा जैसे फतवे जारी करते हैं, कभी मुस्लिमों के हाथ काटकर फेंक देने के फतवे जारी करते हैं, और जाहिर है कि इसकी प्रतिक्रिया में देश की हवा और अधिक जहरीली होती है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को दीवाली गुजर जाने के बाद, पटाखों का मुद्दा निपट जाने के बाद, अब इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि देश की एकता के खिलाफ, देश की सद्भावना के खिलाफ नफरत फैलाने वाले लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कब तक मिले? एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म अगर यही करता चलेगा, तो एक की आंख फोडऩे के मुकाबले दूसरों की आंख फोड़ते-फोड़ते यह देश ही अंधा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी इसलिए समझनी चाहिए क्योंकि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं। आज सोशल मीडिया में लोग अपने असली नाम और असली चेहरे वाले अकाउंट से भी दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां दे रहे हैं, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला जारी रहने देना लोकतंत्र के खिलाफ है। और लोकतंत्र अकेली सरकार का मोहताज नहीं रहता। जब कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, जब विधायिका बाहुबल का शिकार रहती है, और वह बिना दांत और नाखून वाले जानवर सरीखी बेअसर हो जाती है, तब जनता न्यायपालिका की तरफ देखती है। न्यायपालिका को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, देश में नफरत और हिंसा को फैलाते हुए जब-जब कानून तोड़ा जाता है उसे तब-तब खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों में इतनी ताकत संविधानप्रदत्त है। फिलहाल संगीत सोम को नहले पर दहला मिल गया है, और जहां तक तर्क की बात है, संगीत सोम के कुतर्क की बोलती बंद हो चुकी है। बकवास कोई कभी तक भी जारी रख सकते हैं।

पेट्रोल और आग करीब आने से धर्म-आध्यात्म का ब्रम्हचारी साम्राज्य डांवाडोल हो रहा है...

संपादकीय
15 अक्टूबर 2017


मध्यप्रदेश में एक जैन मुनि को एक भक्त परिवार की युवती के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पैंतालीस बरस के जैन मुनि पर 19 बरस की युवती ने बलात्कार का आरोप लगाया था और उसके बाद मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई। अभी पिछले कुछ बरसों से देश लगातार आध्यात्मिक और धार्मिक नेताओं, संत-स्वामियों के बलात्कार के मामलों को देख रहा है। ऐसे में कुछ बुनियादी सवाल भी उठते हैं कि ऐसी नौबत क्यों आती है?
एक बात तो यह है कि बहुत से धर्मों में संत, मुनि, साध्वी, पोप, मौलवी जैसे ओहदों पर बैठे लोगों या उपाधियों से सजे हुए लोगों के साथ यह शर्त रहती है कि वे ब्रम्हचारी रहें। इंसान की देह का इतिहास धर्मों के इतिहास से लाखों, या शायद दसियों लाख साल पुराना है। इसलिए देह की जरूरतें धर्म से ऊपर रहती हैं। अब जो लोग धर्म या आध्यात्म के अनुशासन में जाते हैं, वे शुरुआत से ही अपने तन और मन के साथ एक संघर्ष करते हैं, और यह संघर्ष जिंदगी के आखिरी दिन तक चलता है। यह बात महज धर्म और आध्यात्म के लोगों के साथ नहीं है, महात्मा गांधी जैसे लोग भी ब्रम्हचर्य के प्रयोग करते रहे, और कई किस्म के अनैतिक तरीकों को इस्तेमाल करके भी उन्होंने अपने बदन पर काबू का इम्तिहान लेने का एक लंबा सिलसिला चलाया, और बाद में उस बारे में खुद ही लिखा भी। इसलिए चाहे किसी भी तरह के धार्मिक अनुशासन की वजह से लोगों को ब्रम्हचर्य के तहत रहना पड़ता है, उनके बारे में यह बात समझ लेना चाहिए कि वे आखिरी सांस तक के एक अंतहीन संघर्ष में पड़ते हैं, और यह संघर्ष कम कठिन नहीं होता। पौराणिक कहानियां पढऩे वालों को याद होगा कि किस तरह ऋषि विश्वामित्र की साधना को एक सुंदरी मेनका ने भंग कर दिया था।  पूरी दुनिया में ऐसे मामले हैं, और ईसाई चर्च के तो सैकड़ों-हजारों मामले बच्चों के साथ सेक्स के भी सामने आए हैं जिन्हें लेकर अदालती मुकदमे तक चले हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त भी इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि इंडोनेशिया में एक ईसाई बिशप को एक महिला से अनैतिक रिश्ता रखने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।
ऐसी नौबत में हमारा यह मानना है कि जब आसाराम पर एक नाबालिग लड़की से बलात्कार का मामला चल ही रहा है, राम-रहीम कई नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामले में सजा काट ही रहा है, तो बाकी धर्मों और सम्प्रदायों के भक्तों-अनुयायियों को चाहिए कि वे अपने परिवार सम्हाल कर रखें, और बलात्कार की ऐसी नौबत, ऐसे खतरे से उनको दूर रखें। दूसरी तरफ धर्म और सम्प्रदाय के जिम्मेदार लोगों को भी चाहिए कि वे अपने ब्रम्हचारी लोगों के लिए अनुशासन का कुछ ऐसा इंतजाम रखें कि वे ऐसी किसी नौबत में न फंसें। लोगों को वह पुरानी कहावत याद रखनी चाहिए कि आग और घी को साथ-साथ नहीं रखना चाहिए। आज के वक्त में कहा जा सकता है कि पेट्रोल के कनस्तर को आग के करीब रखना आगे-पीछे खतरे का सामान बनता ही है। इसलिए जिस किसी धर्म और सम्प्रदाय को ऐसी बदनामी से बचना है, उन्हें समय रहते अपने मुखिया या उनके नीचे के सेवकों को लेकर नियम-कायदे की एक परंपरा कायम करनी चाहिए। इसके बिना बड़ी संख्या में बलात्कार होते रहेंगे, और उनमें से कोई एक-दो भी पुलिस तक पहुंचकर पर्याप्त बदनामी दे देंगे।
हम यह नहीं मानते कि लोग धर्म और आध्यात्म को छोड़ ही देंगे। लोगों को अपने मन की कमजोरी की वजह से हमेशा ही ऐसे सहारे की जरूरत पड़ते रहेगी। लेकिन उनके ऐसे सहारे जेल में न रहें, इसके लिए उनको खुद को चौकन्ना रहना होगा। यह बात याद रखनी होगी कि एक किसी बलात्कारी बाबा या स्वामी, साधु या मुनि के चलते जब ऐसा कोई भांडाफोड़ होता है, तो उसके हजारों-लाखों अनुयायी और भक्त भी तरह-तरह का सामाजिक अपमान झेलते हैं, और उनके परिवार भी तरह-तरह से ताने झेलते हैं। इसलिए अपनी आस्था के उतने ही करीब जाना चाहिए जितने करीब जाने से तन और मन पर काबू टूटने न लगे। आज पूरे देश में आस्था के खिलाफ अनास्था का एक माहौल चल रहा है। इससे एक फायदा भी हो रहा है कि और लोग ऐसे खतरों में फंसने से बचेंगे, और बच रहे हैं। लेकिन यह जागरूकता बढऩी चाहिए, उसके बिना धर्म और आध्यात्म का साम्राज्य डांवाडोल है।

प्रणब-मनमोहन की दरियादिली, और देश की जहरीली हवा...

संपादकीय
14 अक्टूबर 2017


देश की आम हवा से परे कल दिल्ली में दरियादिली और बड़प्पन का एक ऐसा नजारा देखने मिला जिससे लगा कि हिन्दुस्तान अभी बाकी है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब, द कोलिशन इयर्स, का विमोचन होना था, और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो थे ही। इस कार्यक्रम के पहले एक इंटरव्यू में प्रणब से पूछा गया कि जब सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया, तो उन्हें कैसा लगा? उन्होंने कहा कि वे जरा भी निराश नहीं हुए, क्योंकि उनकी अयोग्यता की सबसे बड़ी वजह यह भी थी कि वे अधिकतर वक्त राज्यसभा के सदस्य थे, महज 2004 में लोकसभा जीती थी। वे हिन्दी नहीं जानते थे, और ऐसे में बिना हिन्दी जाने किसी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। इसके बाद कार्यक्रम में जब मनमोहन सिंह के भाषण का वक्त आया तो उन्होंने कहा- 'प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा एक बेहतर विकल्प थे जो कि अपनी मर्जी से राजनेता बने थे, लेकिन मेरा राजनेता बनना एक इत्तफाक था।Ó
एक ही पार्टी में देश की सबसे ताकतवर एक ही कुर्सी के लिए सबसे दिग्गज दो नामों के बीच ही जब घोषित या अघोषित, चाहा या अनचाहा, ऐसा मुकाबला हो, और उसके बाद भी दो लोग तंज और रंज के बिना एक-दूसरे के प्रति न सिर्फ मंच और माईक से, बल्कि बाकी वक्त भी इस तरह दरियादिली दिखा सकें, तो उससे भारतीय राजनीति की गंदी साफ होती है। हम किसी एक पार्टी के भीतर वैचारिक असहमति को गलत नहीं मानते, लेकिन आज बहुत सी पार्टियों में, पार्टियों के बीच भी, सरकारों के बीच, नेताओं के बीच, विचारधाराओं के बीच जिस बुरी हद तक कड़वाहट घुल चुकी है, बातचीत के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, वह लोकतंत्र के लिए एक डरावनी नौबत है। लोकतंत्र असहमतियों का सम्मान करने, उन्हें समझने, महत्व देने, और उनसे सीखने का नाम होता है। आज भारत का लोकतंत्र पार्टियों की खेमेबंदी में, विचारधाराओं के ध्रुवीकरण में, और साम्प्रदायिक आधार पर इस तरह खंडित-विखंडित हो गया है कि लोकतंत्र में महज चुनावी जीत ही मानो सबकुछ रह गई है। यह देश और यह लोकतंत्र अब पूरी तरह से, और बुरी तरह से चुनाव केन्द्रित कर दिया गया है, और वह चुनाव भी धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुमत पर।
आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि देश की जनता लोकतंत्र की परिभाषा को समझ पा रही है, या कि वह महज चुनावी बहुमत को लोकतंत्र मान रही है? विविधताओं से भरे हुए इस देश में एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे तबके के लिए, एक-दूसरे की विचारधारा के लिए जो परस्पर सम्मान होना चाहिए, उसकी एक मिसाल प्रणब-मनमोहन में देखने मिली, और उसी वजह से देश का बाकी माहौल कुछ अधिक खटकने भी लगा, और उस पर लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। असहमति का असम्मान करके, अप्रिय लगती आवाजों को अनसुना करके अगर ध्रुवीकरण से चुनावी जीत हासिल की जाती है, तो वह लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती। जिस पार्टी के पास लोकतंत्र का सम्मान करते हुए भी बहुमत हासिल करने की संभावना हो उसका तंगदिल हो जाना खुद उसकी शिकस्त है। दुनिया के इतिहास में लोगों का मूल्यांकन चुनाव आयोग के नतीजों के अंकगणितीय विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता है। ये आंकड़े ताक पर धरे रह जाते हैं, चुनावी नतीजे महज थोड़ी सी जगह पाते हैं, और लोकतंत्र की कसौटी पर जीत या हार को इतिहास विस्तार से दर्ज करता है। अगर प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन-मंत्रिमंडल के मंत्री रहते हुए अपना वक्त सत्ता पलटने की साजिश में लगाया होता, तो आज इतिहास में उनका सम्मान नहीं होता। दूसरी तरफ अगर मनमोहन सिंह ने तीन चौथाई से अधिक मंत्री-समूहों का मुखिया प्रणब को न बनाया होता, तो मनमोहन भी तंगदिली की तोहमत झेलते। यह उदारता लोकतंत्र में पार्टियों के बीच भी कायम रहना चाहिए। एक-दूसरे का ओछा और अंधा विरोध लोकतांत्रिक नहीं होता। भारत की राजनीतिक हवा में इतना जहर घुल गया है, और वह लगातार बढ़ाया भी जा रहा है, इस हद तक कि वह दिल्ली के पटाखों के प्रदूषण को मात कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस पर रोक कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं लगा सकता, महज जनता लगा सकती है। और जनता के बीच चुनाव और लोकतंत्र में फर्क की जागरूकता लानी होगी। वरना यह बात तो दुनिया में समझदार लोग बहुत पहले से कह गए हैं कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार पाने के हकदार वे होते हैं।

बेटी की हत्या की तोहमत से बरसों बाद आजाद मां-बाप

संपादकीय
13 अक्टूबर 2017


(मई 2012 में इसी जगह हमने आरूषि हत्याकांड के तमाम पहलुओं को लेकर जो लिखा था, आज उसे फिर से प्रकाशित कर रहे हैं, सिर्फ इसका शीर्षक नया है-संपादक)
आज से अदालत में फिर आरूषि हत्याकांड की सुनवाई तेजी से आगे बढऩे वाली है। यह मामला दिल्ली का होने की वजह से खबरों में जरूरत से हजार गुना अधिक रहा और पूरे देश में इस पर चर्चा भी जरूरत से हजार गुना रही। नतीजा यह हुआ कि अखबारों में और टेलीविजन पर इस हत्याकांड में मां-बाप की गिरफ्तारी और उन पर सीबीआई का चलाया जा रहा मुकदमा खबरों में इस कदर रहा कि देश भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक तनाव झेलना पड़ा। अभी भी बहुत से बच्चे इस तनाव में जीते हैं कि उनके मां-बाप भी उन्हें मार सकते हैं। भारत में चूंकि बच्चों के मानसिक तनाव को लेकर किसी किस्म की चर्चा या सलाह-मशविरे का रिवाज नहीं है इसलिए कोई यह अंदाज लगाने वाले नहीं हैं कि दो कत्लों की यह खबर देश में कितना सामाजिक तनाव खड़ा कर गई है और बच्चों के दिल-दिमाग पर इन खबरों का कितना बुरा असर पड़ा है। इस बात पर आज यहां लिखना इसलिए भी ठीक और जरूरी लग रहा है क्योंकि सीबीआई ने इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ हासिल बताया है उसमें इस बच्ची के कत्ल के लिए मां-बाप के खिलाफ और कोई सुबूत नहीं दिखे हैं, केवल यही सुबूत दिखा है कि किसी और के खिलाफ कोई सुबूत नहीं हैं। पहली नजर में अभी तक कि सीबीआई की कही बातें ये हैं कि चूंकि और कोई कत्ल करने की हालत में नहीं था, किसी और की लाशों तक पहुंच नहीं थी, इसलिए मां-बाप ने ही यह किया होगा। हम अभी इस केस पर अधिक जाना नहीं चाहते क्योंकि वह तो अदालत में तय होगा, लेकिन एक बात पर बहुत तकलीफ के साथ लगती है कि हत्या के चार बरस बाद भी आज हर कुछ दिनों में मां-बाप अदालत में घसीटे जाते हैं, मीडिया के कैमरे उनको हर बार बाकी देश के सामने पेश कर देते हैं, और चार बरसों के लंबे अरसे के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि केस मां-बाप के खिलाफ कितना वजनदार है।
अब हम सिर्फ बहस के लिए एक ऐसी नौबत सोचते हैं जिसमें कि इस बच्ची के मां-बाप अदालत से बरी हो जाते हैं। आगे चलकर अगर ऐसा होता है, तो इन बीते चार बरसों में, या इनकी गिरफ्तारी के बाद के ढाई-तीन बरस में इनकी जो प्रताडऩा हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? जब भारतीय न्याय-व्यवस्था की भावना यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए, तो ऐसे में कत्ल की शिकार लड़की के मां-बाप की बरसों तक चली जांच और बरसों तक चली प्रताडऩा हमें एक बड़ी बेइंसाफी लगती है। मां-बाप पर शक करने की अगर कोई वजह है तो भी या तो यह जांच कुछ जल्दी होनी चाहिए थी, या फिर मां-बाप को इतने लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई के पहले जांच और अदालत की प्रताडऩा से दूर रखना चाहिए था। हो सकता है कि ऐसी नौबत देश में बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी आती हो, लेकिन उन सबके बारे में भी हमारा यही मानना है कि जुर्म साबित होने के पहले की प्रताडऩा, सामाजिक सजा की लंबाई कम होनी चाहिए। क्योंकि आज जिस रफ्तार से यह प्रताडऩा और सजा इस बच्ची के मां-बाप पा रहे हैं, वह न्याय की भावना के हिसाब से बहुत ही नाजायज है। किसी भी मां-बाप को इतनी लंबी प्रताडऩा से नहीं गुजारना चाहिए। यह कहते हुए हम यह भी जानते हैं कि इसी देश में तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं मां-बाप अपने बच्चों का कत्ल करवाते पकड़ा रहे हैं, और बहुत से मामले सही भी साबित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में जांच के दौरान की बरसों की जेल ठीक नहीं है। जांच एजेंसियों के सुबूत और गवाह तेजी से जुटाकर उनकी हिफाजत का इंतजाम कर लेना चाहिए और फिर संदिग्ध रिश्तेदारों को जमानत मिलने देना चाहिए जो कि उनका हक भी है।
यह मौका मीडिया के लिए यह सोचने का भी है कि दिल्ली में टीवी चैनलों के कैमरों की अंधाधुंध मौजूदगी की वजह से क्या इतना बड़ा कवरेज ठीक है जिससे कि बाकी देश पर एक बुरा असर पड़े? एक वक्त भारत में अपराध की कहानियों वाली कुछ पत्र-पत्रिकाएं देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं से भी अधिक बिकती थीं। आज टीवी के समाचार चैनल या तो पुलिस के हुलिए में, या किसी अपराधी के हुलिए में अपने स्टूडियो से अपराध की घटनाओं को उसी तरह पेश करने लगे हैं। ऐसे बुलेटिनों से परे भी जब मुख्य समाचार बुलेटिन हत्या के शक में गिरफ्तार मां-बाप को जरा-जरा सी अदालती घट-जोड़ के लिए दिखाते चलते हैं तो यह भी एक भयानक नौबत है। इस पर सभी तबकों को सोचना चाहिए।

पुराने सामानों का दान तो अच्छा है लेकिन किफायत से जीना और अच्छा

संपादकीय
12 अक्टूबर 2017


दीवाली का मौका घर, दुकान, या दफ्तर की सफाई का भी रहता है, और जो लोग बहुत तंगदिल नहीं रहते, वे ऐसे मौके पर अपना कुछ फालतू का सामान आसपास के जरूरतमंद लोगों को बांट भी देते हैं। लोगों की यह दरियादिली उनके करीब काम करने वाले लोगों की मदद तो हो जाती है, लेकिन वह सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच जाए, ऐसा नहीं हो पाता है। ऐसा करने के कुछ अलग-अलग तरीके हैं जो कम या अधिक हद तक कारगर हैं। इनमें से एक तरीका दुनिया के कई देशों में नेकी की दीवार के नाम से चल निकला है, और शहर में लोग अपने गैरजरूरी कपड़े ले जाकर उस दीवार पर टांगने लगते हैं, और जरूरतमंद लोग वहां से ले जाने लगते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सारे लोग सामाजिक सरोकार की जिम्मेदारी को समझ सकें, और जरूरत रहने पर ही कपड़ों को वहां से ले जाएं। यह निगरानी मुमकिन भी नहीं है, और इसके बिना भी शायद कुछ लोगों को तो कपड़े या दूसरे सामान यहां से मिल जाते हैं।
अभी कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन के शो, केबीसी पर एक ऐसे समाजसेवी को बुलाकर उससे लंबी चर्चा की गई थी जो कि देश भर में इस तरह का काम अधिक संगठित और व्यवस्थित रूप से कर रहा है। लेकिन इसके लिए किसी परमाणु तकनीक की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने स्तर पर, अपने-अपने शहर में भी ऐसा कर सकते हैं। कपड़े और दूसरे सामान इकट्ठा किए जा सकते हैं, उनमें कोई मामूली काम हो तो वह किया जा सकता है, और जरूरतमंद लोगों तक उसे पहुंचाने का भी कोई एक रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन इसी मुद्दे पर कल सोशल मीडिया में अमरीका में बसे एक भारतवंशी ने दो बातें लिखी हैं। उन्होंने लिखा कि पुराने कपड़ों को दान देना अधिक खतरनाक हो सकता है, क्योंकि ऐसे में लोग अपनी जरूरत से बहुत अधिक कपड़े खरीदते जा सकते हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने के बाद दूसरों को दे सकते हैं, और आत्मसंतुष्टि भी पा सकते हैं। इसके बजाय धरती के लिए बेहतर यह होगा कि लोग खुद ही कम कपड़े खरीदें, उनका अधिक से अधिक इस्तेमाल करें, और धरती पर सामानों का बोझ न बढ़ाएं।
यह बात एक नया नजरिया पेश करती है कि अपने गैरजरूरी सामान दूसरों को देना तो अच्छा है, लेकिन अपने इस्तेमाल के जरूरी सामानों के बाद और अधिक सामानों को लेना, धरती और पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचाना होता है। इसलिए लोगों के मन में दान देने की संतुष्टि अपने सामानों को बढ़ाते जाने के बाद उन्हें लोगों में बांटने से आना काफी नहीं है। अपने इस्तेमाल में किफायत बरतने के बाद दूसरों की मदद सीधे करना, उन गरीबों के भी अधिक काम का होगा, और धरती को भी उससे नुकसान घटेगा। और ऐसा भी नहीं है कि संपन्न लोगों में कुछ लोग ऐसी सोच के नहीं रहते हैं। कई बरस पहले गोदरेज कंपनी के मालिकान में से एक छत्तीसगढ़ आए थे, और वे फटे-पुराने सरीखे कपड़े पहने हुए थे, और वे साल भर अलग-अलग शहरों में जाकर वहां के समाज सेवा के अच्छे काम करने वाले संगठनों को दान देने का ही काम करते थे। भारत की दो-तीन सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों को बनाने वाले अजीम प्रेमजी या नारायण मूर्ति जैसे लोग विमान में साधारण दर्जे में सफर करते हैं, और गिने-चुने सामान का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के बहुत से ऐसे खरबपति हैं जिन्होंने पिछले कई दशक महज दो जोड़ी जूतों में निकाल दिए हैं। दो सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों के मालिकों को देखें, तो एप्पल बनाने वाले, अब गुजर चुके, स्टीव जॉब्स और आज फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग एक ही रंग की टी-शर्ट, और एक ही तरह की जींस में अपने सबसे बड़े समारोहों में मंच पर दिखते आए हैं। इनके पास और किस्म के कपड़े भी बहुत सीमित हैं या थे।
अपने अतिरिक्त सामानों को दूसरों को बांट देने की तसल्ली तो ठीक है, लेकिन अपनी जरूरतों को किफायत के साथ इस्तेमाल करना अधिक समझदारी है, और धरती का सम्मान करना भी है। अभी दुनिया में कई लोग ऐसे प्रयोग भी कर रहे हैं कि छह महीने या साल भर का वक्त वे कुल पचास सामानों के साथ गुजार रहे हैं, और एक भी दूसरा सामान इस्तेमाल नहीं करते। भारत में तो जैन धर्म से लेकर गांधी तक बहुत किस्म की सोच किफायत की जिंदगी सुझाती है, और लोगों को इस बारे में सोचना भी चाहिए। फिलहाल लोग जो सामान ले चुके हैं, और इस्तेमाल करके थक गए हैं, उनको दीवाली के मौके पर अपनी छाती से बोझ कम करना चाहिए। 

सुषमा-निर्मला की इंसानियत फौज से अधिक ताकतवर...

संपादकीय
11 अक्टूबर 2017


भारत की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पहली बार भारत-चीन सरहद पर पहुंचीं, तो चीनी हिस्से में वहां के सैनिक भी खड़े हुए थे। सिक्किम में वे भारतीय सैनिकों से मिलने गई थीं, लेकिन नाथू ला चौकी पर अपने इलाके में उत्सुकता के साथ खड़े हुए चीनी फौजी अफसरों से भी उन्होंने बात की। उन्हें नमस्ते किया, और नमस्ते का मतलब समझाया, नफरत और तनाव से दूर विनम्रता और मित्रता की जुबान में अनौपचारिक चर्चा की, और फिर इसका वीडियो खुद रक्षा मंत्रालय ने जारी किया। एक जरा सी दरियादिली और इंसानियत ने सरहद के दोनों तरफ लोगों का दिल जीत लिया, और भारत के साथ-साथ चीन के मीडिया ने भी निर्मला सीतारमण की बड़ी तारीफ की।
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह भारत के वायुसेना अध्यक्ष के उस भड़काऊ बयान के खिलाफ लिखा था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने की भारतीय वायुसेना की क्षमता का जिक्र किया था। पड़ोस के देशों से संबंध अच्छे और बुरे रखने में कुछ बुनियादी फर्क रहते हैं। रिश्ते अच्छे हों तो फौजी तैयारियों पर खर्च घटता है, और रिश्ते खराब हों, तो गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर हथियारों के कारखानों को दौलतमंद बनाया जाता है, सरहद के गांव तनाव में जीते हैं, लोग अपनी जिंदगी खोते हैं, और देश का ध्यान अपने असल और बुनियादी मुद्दों को छोड़कर जंग की सनक पर खर्च होता है। भारत के दो तरफ चीन और पाकिस्तान ऐसे देश हैं जिनके साथ पहले जंग हो चुकी है, और आज इन तीनों देशों की जंग की तैयारियों में कम से कम भारत और पाकिस्तान तो ध्यान में रहते ही हैं, पाकिस्तान की चीन के खिलाफ, और चीन की पाकिस्तान के खिलाफ कोई तैयारी नहीं रहती।
फौजी अफसर चाहे जिस देश में हो, उनको जंग का रास्ता इसलिए सुहाता है कि उन्हें अपने बची हुई नौकरी में जंग का एक तमगा मिलने की हसरत रहती है। लेकिन दूसरी तरफ हम देखें कि भारत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आए दिन यह ट्वीट करती हैं कि पाकिस्तान के किस परिवार को भारत में जीवनरक्षक ऑपरेशन के लिए वीजा दिया गया, और ऐसे परिवार इलाज के पहले या इलाज के बाद उनसे मिलकर शुक्रगुजार भी होते हैं। अब निर्मला सीतारमण ने भी वैसी ही इंसानियत वाली यह बहुत छोटी सी पहल की है, और देशों के बीच बंद कमरों की बड़ी-बड़ी बातचीत के मुकाबले इस छोटी सी बात ने सबको जीत लिया। इसलिए फौजी तैयारियां धरी रह जाती हैं, पेशेवर डिप्लोमेसी धरी रह जाती है, और आखिर में इंसानियत ही असरदार होती है। हम ऐसी छोटी-छोटी दोस्ताना बातों की अहमियत इसलिए बहुत मानते हैं कि इनके बढऩे से देशों के बड़े-बड़े खर्च घटते चलेंगे, और उसी की जरूरत भी है।
यह बात हर किसी को समझना चाहिए कि दुनिया भर में हथियारबंद आंदोलनों से लेकर देशों के बीच जंग तक को भड़काने में सबसे बड़ी दिलचस्पी हथियारों के कारखानेदारों की होती है। वे एक तरफ बागियों को हथियार बेचते हैं, और दूसरी तरफ उन देशों की सरकारों को। इसके साथ-साथ देशों की सरहद पर किसी तनाव के होने पर ये कारखानेदार दोनों ही देशों को हथियार खरीदने की तरफ धकेलते हैं, और खुद मोटा मुनाफा कमाकर उन देशों को कंगाल बनाते हैं। भारत, पाकिस्तान, और चीन को समझदारी दिखाते हुए सरहद के तनाव को घटाना चाहिए, आपस में दोस्ताना रिश्तों को बढ़ाना चाहिए, और जंग की हसरत पालने वाले अफसरों को काबू में रखना चाहिए। हम कई बार इस बात को लिखते हैं कि जंग की बातें उनको अधिक सूझती हैं, जो सरहदों से दूर राजधानियों में बसते हैं, और वहां बैठकर फैसले लेते हैं। यह बात भी समझनी चाहिए कि जंग का फैसला लेने वाले कभी भी सरहद पर नहीं मारे जाते, कभी भी किसी जंग में भी नहीं मारे जाते हैं, जंग में शतरंज की बिसात सरीखे छोटे प्यादे ही मारे जाते हैं, वजीर तो राजधानियों में बैठे हुए हथियार खरीदी में कमीशन खाते रहते हैं। हर देश में वहां की जनता को ही पड़ोसी देशों की जनता के साथ दोस्ताना रिश्ते इतने बढ़ाने चाहिए कि सरकारों को अपनी जनता को अनदेखा करना मुमकिन न रह जाए। हम सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण के ऐसे सकारात्मक कदमों का स्वागत करते हैं, और जनता को भी खुले दिल से, राजनीति को अलग रखकर अमन की तरफ बढ़ाए जाते ऐसे कदम की तारीफ करनी चाहिए ताकि ऐसे नेताओं का हौसला बढ़ सके।

बड़ी-बड़ी कामयाबियों के बीच छोटी-छोटी दिक्कतों का अंबार

संपादकीय
10 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ में सरकार एक-एक फैसले पर हजार-हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है, और कहीं किसानों को धान-बोनस दिया जा रहा है, तो कहीं गरीबों को स्मार्ट फोन देने के लिए हजार करोड़ से अधिक इस बरस के बजट में रखा गया है। यहां के शहरों को देखें तो उन पर बड़ी रकम खर्च हो रही है, और लोग अगर दस बरस बाद राजधानी रायपुर आ रहे हैं तो वे इसकी शक्ल को पहचान नहीं पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं होता जिसमें कहीं न कहीं बीमार को या लाश को खाट पर, कुर्सी पर, या ठेले पर लेकर जाते हुए लोग न दिखते हों। और अगर ऐसी एक तस्वीर सामने आती है, तो शायद उसके पीछे दर्जन भर ऐसे मामले और रहते होंगे जिनके आसपास कोई कैमरा न रहता हो। कमोबेश यही हाल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों का है, और उन सरकारी दफ्तरों का है जहां पर गरीबों का काम अधिक पड़ता है। ऐसी जगहों पर जब लोगों के काम नहीं होते हैं, तो उसी का नतीजा होता है कि लोग मुख्यमंत्री के जनदर्शन में पहुंचते हैं, और उनसे नीचे अब कलेक्टरों के जनदर्शन में भी सैकड़ों लोग पहुंचने लगे हैं।
एक तरफ तो मुख्यमंत्री या कलेक्टर अपने ऐसे जनदर्शन की भीड़ को, उसमें आने वाली समस्याओं के समाधान को एक बड़ी कामयाबी मान सकते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ यह भीड़ सबसे पहले तो इस बात का सुबूत है कि सरकार की नियमित व्यवस्था काम नहीं कर रही है, और इसीलिए लोग पूरे प्रदेश से चलकर मुख्यमंत्री निवास पहुंचते हैं, या कि पूरे जिले से चलकर कलेक्टर से मिलने आते हैं। यहां पहुंचे हुए लोगों की भीड़ उन निराश लोगों में से एक फीसदी से अधिक नहीं हो सकती जो कि सरकारी दफ्तरों के, अस्पतालों के, चक्कर काट काटकर थक चुके हैं। इसके साथ-साथ अगर पुलिस के पास पहुंचने वाली शिकायतों को देखें, तो उनमें से हर दिन कोई न कोई एक ऐसी आत्महत्या, या आत्महत्या की कोशिश की खबर आती है जिसमें कहीं कोई लड़की छेडख़ानी की शिकार है, और उसकी शिकायत पर गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। बहुत सी शिकायतें ऐसी भी रहती हैं जिसमें कोई लड़की या महिला बलात्कार की शिकायत के बाद पुलिस कार्रवाई का इंतजार करते-करते मरने की धमकी-चेतावनी देती है, तब जाकर कोई कार्रवाई होती है। हर हफ्ते शायद ऐसी खबर आती है कि सरकार की कार्रवाई के इंतजार में थक चुके आम नागरिक या सरकारी कर्मचारी ने इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी है।
हम दो बातों को जोड़कर एक साथ आज यहां इसलिए लिख रहे हैं कि एक तरफ तो सरकार जनसुविधाओं पर बहुत बड़ा खर्च कर रही है, और जनकल्याण के लिए लोगों को सीधे फायदा भी दे रही है। और दूसरी तरफ सरकरार के इस विशाल ढांचे, और विशाल खर्च के बावजूद सबसे कमजोर तबके के लोग किसी कार्रवाई या किसी इंसाफ के लिए भटकते रहते हैं। इससे एक बात खुलकर दिखती है कि सरकार का अपना ढांचा जवाबदेही से परे है, सरकार में काम करते लोग संवेदनाशून्य से हैं। और दिक्कत यह है कि बड़ी-बड़ी कामयाबी की खबरों के बीच बहुत छोटी-छोटी, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में नाकामयाबी की खबरें दब जाती हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग एक किस्म से आत्मसंतुष्ट भी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितना कुछ किया है, और इस करने के मुकाबले न की गई, या कि न की जा सकीं चीजें कितनी छोटी-छोटी हैं। ये चीजें छोटी जरूर हैं, लेकिन संख्या में बहुत बड़ी हैं।
हमारा यह भी मानना है कि सरकारी कामकाज में बेहतरी को लेकर कई बार इस्तेमाल होने वाला शब्द, प्रशासनिक-सुधार, यह एक कारगर शब्द तो हो सकता है, अगर इसे अच्छी नीयत और पक्के इरादे के साथ लागू किया जाए। लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव यह है कि राज्य में मुख्य सचिव रह चुके लोगों को प्रशासनिक सुधार का काम दिया जाता है, और अगर उनमें प्रशासनिक सुधार की क्षमता होती, तो राज्य के प्रशासनिक मुखिया रहते हुए इसे करने का पूरा मौका उनके पास था, और वे उसे नहीं कर पाए, या कि वह करना उनकी क्षमता और दिलचस्पी से परे का था। ऐसे चुक चुके लोगों को ऐसी जिम्मेदारी देने का मतलब उनके लिए किसी पुनर्वास का इंतजाम तो हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह के प्रशासनिक सुधार की संभावनाओं को खत्म कर देता है। सरकार को अगर सचमुच ही प्रशासनिक सुधार करना है तो उसे सरकार के बाहर के लोगों से राय मांगनी होगी, और जब तकलीफ पाकर भुक्तभोगी बने हुए लोग कोई सुझाव देंगे, तो उसे सुनने, उनमें से सही सुझावों को मानने, और उन पर ताकत से अमल करवाने से ही कुछ अच्छा हो सकता है। सरकार का विशाल ढांचा, विशाल बजट, उसकी बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं ये अगर जनता की बहुत ही नियमित, बहुत ही उजागर, छोटी-छोटी दिक्कतों को दूर करने के बारे में कुछ नहीं कर पाते, तो यह जनता को निराश करने वाली नौबत ही रहती है। 

नाम में क्या रखा है ! ?

9 अक्टूबर  2017

कुछ लोगों के लिए नाम में इतना कुछ रखा होता है कि बड़े-बड़े पंडित-पुरोहित नाम के पहले अक्षर तय करते हैं, और फिर साहित्य या संस्कृति के जानकार लोगों से पूछा जाता है कि इस अक्षर से शुरू होने वाला कोई अच्छा नाम बताएं। एक अखबारनवीस होने की वजह से मुझसे भी कई बार यह पूछा जाता है कि इस तरह के मतलब वाला और इस अक्षर से शुरू होने वाला कोई अच्छा सा नाम सुझाऊं, लेकिन मैं इसमें नाकामयाब हो जाता हूं क्योंकि साहित्यिक या पौराणिक जड़ों वाला कोई नाम मुझे सूझ नहीं पाता। लोगों के जब अच्छे-भले नाम रख दिए जाते हैं, तो फिर उन्हें कोई अंक ज्योतिषी आकर ऐसे हिज्जे सुझाने लगते हैं जिससे नाम के कुल अंक बदलकर कुछ और हो जाएं। ऐसा करके भी बहुत से लोगों को राहत मिलती है कि अब उनका भाग्योदय हो जाएगा। पता नहीं इससे किस्मत चमकती है या नहीं, लेकिन नाम में क्या रक्खा है?
अब अगर आज दुनिया के कुछ सबसे कामयाब नामों को देखें, तो इंटरनेट की शुरुआत में ही एक बड़ी कामयाब कंपनी रही, याहू। अब याहू शब्द शायद जंगल में टार्जन नाम के एक किरदार की लगाई गई आवाज से शुरू हुआ होगा, हालांकि अंग्रेजी भाषा का इतिहास बताता है कि गुलीवर की कहानियों में जिन यात्राओं का जिक्र है उनमें एक नस्ल या जाति का नाम अठारहवीं सदी में, 1726 में, याहू लिखा गया था। अब जो भी हो एक इंटरनेट कंपनी ने अपना नाम याहू रखा, तो यह नाम ऐसा चल निकला कि खासे अरसे तक यह कंपनी इंटरनेट की सबसे कामयाब कंपनी रही, जब तक कि बाजार के गलाकाट मुकाबले में गूगल जैसी दूसरी कंपनी ने उसे पीछे न छोड़ दिया, और धीरे-धीरे बाजार के बाहर न कर दिया।
भारत के एक रेलवे स्टेशन का नाम 28 अक्षरों का है.
 अब हम गूगल की ही देख लें, तो इस शब्द का कोई मतलब तो था नहीं, और जब इस कंपनी ने अपना यह नाम रखा, तो उसके पहले शायद किसी ने यह शब्द सुना नहीं था। लेकिन आज गूगल नाम से बढ़कर एक शब्द बन गया है जो कि किसी भी चीज की तलाश के लिए इस्तेमाल होने लगा है। आज लोग बातचीत में यह नहीं कहते कि इंटरनेट पर ढूंढो, लोग यह कहते हैं कि गूगल कर लो। एक नाम ब्रांड नाम से एक जेनेरिक नाम हो गया। ठीक उसी तरह जिस तरह कि हिन्दुस्तान में एक समय घर के किसी बच्चे का नाम टुल्लू होता था, और बाद में एक कंपनी ने अपने एक छोटे वॉटर-पंप का नाम टुल्लू रख दिया। बाद में यह ब्रांड नाम इस तरह चल निकला, और घरेलू इस्तेमाल में इस ब्रांड नाम का ऐसा एकाधिकार कायम हो गया कि अब म्युनिसिपलें नल में पंप लगाकर पानी खींचने के खिलाफ जो कानूनी नोटिस जारी करती हैं, उस नोटिस में पंप की जगह टुल्लू पंप लिखा जाता है, मानो कि दूसरी कंपनी के पंप लगाकर पानी चोरी करना कानूनी है।
भारत के एक रेलवे स्टेशन का नाम 2 अक्षरों का है।
अब एप्पल जैसा साधारण शब्द, जो अंग्रेजी में सेब के लिए है, उस नाम से आज दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर-सामान बनाने वाली कंपनी खड़ी हो गई है। और मजे की बात यह है कि इस कंपनी के मार्के में सेब पूरा भी नहीं दिखता है, और उसका एक हिस्सा खाया हुआ दिखता है, फिर भी यह जूठा सेब आज दुनिया का सबसे कामयाब और सबसे प्रतिष्ठित मार्का हो गया है, इसके मुकाबले कोई दूसरा ब्रांड आज दुनिया में नहीं है। अब भला किसी कम्प्यूटर कंपनी के नाम का एक सेब से, और वह भी एक जूठे सेब से क्या लेना-देना हो सकता था? लेकिन नाम चल निकला तो चल निकला।
आज हिन्दुस्तान की सड़कों के किनारे देखें, तो जो दो ब्रांड सबसे अधिक चमकते दिखते हैं, वे ओप्पो और विवो हैं। इन दोनों नामों का हिन्दुस्तान में न तो कोई मतलब है, और न ही कभी उनका चलन रहा, लेकिन रातों-रात ये नाम ऐसे चल निकले कि अब खबरें आती हैं कि कुछ लोग अपने बच्चों का नाम इन मोबाइल फोन ब्रांड पर रखने लगे हैं। इसलिए नामों का महत्व कहीं होता भी होगा, और बहुत से मामलों में नामों का कोई महत्व नहीं रह जाता।
अब ब्रांड और कंपनी से हटकर अगर इंसानों को देखें तो गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे के तो नाम में ही राम था। उसके नाम के बीचों-बीच राम बसे थे। लेकिन उसका काम राम सरीखे गांधी की हत्या करना था। अभी कुछ समय पहले हमने एक खबर छापी थी कि सामूहिक बलात्कार के एक मामले में पकड़ाए गए कई लोगों के नामों को देखें, तो उसमें यह बलात्कारी गिरोह सर्वधर्म का लगता था, उसमें हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी नामों के लोग थे, और आधा दर्जन लोग ऐसे थे जिनके नाम ईश्वर के नाम पर रखे गए थे। अब उनके नाम का उन पर क्या असर हुआ?
ऐसा भी नहीं कि नाम की कोई अहमियत नहीं होती। आज हिन्दुस्तान के किसी गांव में पैदा, गांव में पले-बढ़े हुए लोग भी पूरी दुनिया के किसी भी देश में पहुंच जाते हैं। और ऐसे में उनके नाम, उनके पारिवारिक नाम, इन सबका उन देशों की भाषाओं में क्या मतलब होता है, उन भाषाओं में इन नामों के क्या हिज्जे होते हैं, कैसा उच्चारण होता है इसको समझ लेना भी जरूरी है। यहां प्रचलित एक नाम ऐसा है जिसके अंग्रेजी हिज्जे, और अंग्रेजी उच्चारण इन दोनों का मतलब महिला के शरीर का एक हिस्सा होता है, और मैं यह कल्पना भी नहीं कर पाता हूं कि ऐसे नाम वाली कोई भारतीय लड़की किसी अंग्रेजी देश में जाकर वहां किस तरह की शर्मिंदगी और परेशानी झेलेगी। इसलिए आज लोगों को अपने बच्चों के नाम रखते हुए कम से कम अंग्रेजी दुनिया में तो उसके हिज्जे और उच्चारण के बारे में सोच ही लेना चाहिए।
भारत में बहुत से लोग अपने बच्चों के नाम साहित्य, संस्कृति, पुराण, इस तरह की कई बातों के चक्कर में ऐसा रख देते हैं कि उन बच्चों की जिंदगी न सिर्फ अंग्रेजी वालों को अपने नाम के हिज्जे बताने में गुजर जाती है, बल्कि हिन्दी वालों को भी अपने सही हिज्जे बताते हुए वे थक जाते हैं। ऐसे क्लिष्ट और ऐसे गरिष्ठ नाम अपने बच्चों को देना उनके सिर पर बाकी पूरी जिंदगी के लिए एक टोकरे के वजन भर देने सरीखे होता है। इसलिए नाम रखते हुए देस-परदेस में उसके मतलब, उसके हिज्जे, उसके उच्चारण के बारे में सोच लेना चाहिए या फिर इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि अपने राजा बेटे प्रद्युम्न का नाम अमरीका पहुंचते ही पैडी हो जाएगा, यानी धन उसके पास बाद में आएगा, वह धान (पैडी) पहले हो जाएगा।
इसलिए कंपनियों के नाम बताते हैं कि नाम में कुछ नहीं रखा है, कामयाबी ही सब कुछ है, दूसरी तरफ इंसानों के नाम बताते हैं कि उनके नाम में ईश्वर बसे हों, तो भी वे दुनिया के इतिहास के सबसे बुरे हत्यारे और सबसे बुरे बलात्कारी हो सकते हैं। इसलिए आज के इस कॉलम की हैडिंग में प्रश्नवाचक चिन्ह भी है, और विस्मयबोधक चिन्ह भी है, आप अपने हिसाब से मतलब निकालते रहिए।

सभी तरह के धार्मिक प्रदूषण कड़ाई से रोकने की जरूरत..

संपादकीय
9 अक्टूबर 2017


दिल्ली के राजधानी क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पटाखों की बिक्री पर कुछ तरह की रोक लगी है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग उबल पड़े हैं कि हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों पर ही अदालती वार होता है, और दूसरे धर्मों पर की परंपराओं पर कुछ नहीं होता। जब धार्मिक मामला आता है, तो लोग देखादेखी पर तेजी से उतर आते हैं, और इसमें न तो कुछ गलत है, न ही अस्वाभाविक। क्योंकि जब हवा में धर्मान्धता रहती है और साम्प्रदायिक तनाव रहता है तो लोग बात-बात में धर्म पर उतर आते हैं। लेकिन इस पहलू से परे भी इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत है कि दीवाली पर पटाखे, मस्जिदों से अजान के लाउडस्पीकर, किसी भी धर्म के जुलूसों से सड़कों पर ट्रैफिक जाम और मरीजों की मौत, नदियों और तालाबों में प्रदूषण, देश भर में ध्वनि प्रदूषण, इन सबके बारे में सोचना ही होगा। या तो एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म भी अधिक प्रदूषण की जिद पर अड़ जाए, और धर्मों की अलग-अलग सामूहिक ताकतों की दहशत में जीने वाले नेता कोई भी कार्रवाई करने से कतराएं, या फिर देश की बड़ी अदालतें और ग्रीन ट्रिब्यूनल कड़ाई से देश को प्रदूषण से बचाएं, यह सोचने की बात है।
चुनाव लडऩे वाली राजनीतिक पार्टियों की सरकारें कड़ी कार्रवाई का हौसला नहीं कर पाती हैं। और उनके मातहत काम करने वाले अफसर भी कुछ नहीं कर पाते, तब अदालतों को दखल देना पड़ता है। और अदालतों तक जनहित याचिका लेकर दौड़ लगाने वाले लोगों को देखें, तो उन्हें भी खासे सामाजिक दबाव और तनाव का सामना करना पड़ता है। बहुत से मामलों में उन्हें धमकियां मिलती हैं, और सोशल मीडिया पर लोग गालियां देते हैं। उनका एक किस्म से अघोषित सामाजिक बहिष्कार भी होने लगता है, और सरकारें भी उन्हें नापसंद करती हैं क्योंकि वे राजनीतिक असुविधा खड़ी करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सड़कों पर जुलूस से लेकर लाउडस्पीकर तक, और प्रतिमाओं के विसर्जन से लेकर दूसरे तरह के धार्मिक-प्रदूषण तक, अदालतों की दखल ही कोई फर्क ला पाई है, अदालतों से परे यह देश सुधार के लायक नहीं दिखता है।
आज देश में वैसे ही इतना बुरा प्रदूषण है कि दूसरे धर्म के मुकाबले अपने धर्म के अधिकार पर आमादा लोग पटाखे फोड़कर इस गलतफहमी में रहते हैं कि वे अपने धर्म का कोई भला कर रहे हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि वे सबसे पहले तो अपने ही मोहल्लों और इलाकों में हवा को इतना जहरीला कर देते हैं कि उनके बच्चे सबसे पहले इस प्रदूषण का शिकार होते हैं। लेकिन जब जनता की सोच का ध्रुवीकरण राजनीतिक, जातिगत, और धार्मिक आधार पर कर दिया जाता है, तो लोग आत्मघाती होकर भी प्रदूषण फैलाकर उसे अपनी जीत मानते हैं। हमारा मानना है कि सरकारों में हौसला हो न हो, अदालतों को बहुत कड़ाई से अपने फैसले लागू करवाना चाहिए, और जहां पर अदालती फैसले लागू नहीं हो पाते हैं, वहां पर समाज के जागरूक संगठनों को कार्रवाई करनी चाहिए, और एक तरफ तो उन्हें जनजागरण का काम करना चाहिए, दूसरी तरफ अदालती विकल्प की कोशिश भी नहीं छोडऩी चाहिए।
छत्तीसगढ़ में अभी चार दिन पहले ही राज्य सरकार ने धरती पर बढ़ते प्लास्टिक के प्रदूषण को रोकने के लिए एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। लेकिन जैसा कि किसी भी फैसले के साथ होता है, उसके अमल से उसकी कामयाबी होती है, उसके शब्दों से नहीं। देश के कई राज्यों में प्लास्टिक पर लगाई गई ऐसी रोक भ्रष्टाचार के चलते तबाह हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में ऐसी दुर्गति न हो, इसकी भी कोशिश करनी चाहिए। साथ-साथ पटाखों जैसे प्रदूषण, या किसी भी धर्म से जुड़े हुए किसी भी रीति-रिवाज के प्रदूषण को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। प्रदूषण के मामले में धर्म का जिक्र हमें बार-बार इसलिए करना पड़ रहा है कि धर्म के नाम पर किया गया कोई भी जुर्म धर्मान्धता के हथियार के साथ खड़ा होता है, इसलिए उस पर अधिक कड़ी कार्रवाई ही असरदार होती है। 

असत्य से कहीं अधिक खतरनाक होता है अर्धसत्य, यह याद रखें

संपादकीय
8 अक्टूबर 2017


सच हमेशा सच नहीं होता। कई बार सत्य, अर्धसत्य होता है जो कि आंखों से तो सच लगता है, लेकिन जब उसे पूरे संदर्भों से जोड़कर देखा जाए तो समझ आता है कि बात कुछ और है। अभी अरूणाचल में वायुसेना का एक हेलीकॉप्टर गिरा, उसमें सवार सात वायुसैनिक मारे गए। उनके शव जब पास के किसी शहर तक लाए गए, तो शवों की तस्वीरें लोगों को हक्का-बक्का करने वाली थीं। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग ने ट्विटर आज सुबह इसकी तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें शहीद होने वाले सात सैनिकों के शव पैकिंग के पुट्ठों में रस्सी से बांधकर भेजे गए। इस पोस्ट के साथ उन्होंने इस बात पर तकलीफ जाहिर की है कि मातृभूमि की रक्षा में शहीद होने वाले लोगों को इस तरह घर भेजा गया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर शहीदों के अपमान को लेकर काफी कुछ लिखा गया। चूंकि इन तस्वीरों के साथ शुरुआत थलसेना के एक सबसे बड़े अफसर रहे लेफ्टिनेंट जनरल की थी, इसलिए इसकी सच्चाई पर अधिक शक करने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन बारीकी से तफ्तीश करने पर पता लगा कि ये शव दुर्घटना स्थल से पहले शहर तक लाए गए थे, और उसके बाद ही उन्हें सेना की परंपराओं के मुताबिक ताबूतों में रखकर आगे ले जाया गया होगा।
बहुत से लोगों को यह लग रहा है और वे इस बात को लिख रहे हैं कि शहीदों के शवों के साथ अधिक सम्मान बरतना चाहिए था। लेकिन हमारा ख्याल है कि ऐसी नौबत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दुर्घटना स्थल से घायलों, और शवों को जल्द से जल्द किसी सुरक्षित जगह पर लाया जाए। देर होने पर अंधेरा भी हो सकता है, या बारिश आ सकती है, और वैसे में घायलों या शवों को निकालना मुश्किल भी हो सकता है। लोगों को यह समझना चाहिए कि बचाव के दौरान सम्मान और औपचारिकताओं का ख्याल एक सीमा तक ही रखा जा सकता है, उससे अधिक नहीं। इसलिए पुट्ठों में लपेटकर लाए गए वायुसैनिकों के शव फौज की औपचारिकताओं के शुरू होने के बाद के नहीं है, उसके पहले के हैं। जैसे किसी शहरी इलाके में किसी हादसे में महिलाएं जख्मी होती हैं, तो उन्हें उठाने और अस्पताल लाने के लिए महिला पुलिस का इंतजार करना इन महिलाओं को मौत की तरफ धकेलने जैसा होगा। महिला पुलिस की राह देखने के बजाय पुरूष पुलिस ही उन्हें उठाकर एम्बुलेंस और अस्पताल तक ले जाए, यही समझदारी होगी।
एक समय था जब परंपरागत अखबारी मीडिया के पास किसी तस्वीर या खबर को जांचने-परखने के लिए कई घंटों का समय रहता था। लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की वजह से पल-पल का गलाकाट मुकाबला चलता है, और ऐसे में जो बात सबसे अधिक सनसनीखेज दिखती है, जो बात सबसे अधिक भावनात्मक दिखती है, उसे फौरन जगह मिल जाती है। पहली नजर में पुट्ठों में बंधे हुए शहीदों के शव लोगों के तन-मन में आग लगा देते हैं, लेकिन मौके की बाकी बातों को समझने के बाद जो लोग यहां अंदाज लगा पाते हैं कि ऐसे हादसे के बाद बचाव की प्राथमिकताएं क्या होती हैं, वे बचाव दल की सीमाओं को समझ सकते हैं। और हमारी सलाह यह है कि सोशल मीडिया पर, या पेशेवर मीडिया पर भी तैरती हुई बातों को सतही तौर पर सही नहीं मान लेना चाहिए। उसे आगे तो तब तक नहीं बढ़ाना चाहिए जब तक दो-चार अलग-अलग जगहों से उस बात को सही न पा लिया जाए, जब तक उस बात पर संबंधित सभी पहलुओं का पक्ष न जान लिया जाए, क्योंकि जब कभी लोग किसी बात को आगे बढ़ाते हैं, उसके साथ उनकी अपनी साख भी जुड़ जाती है। इसलिए लोगों को दूसरों के साथ-साथ अपनी साख का ख्याल भी रखना चाहिए।
अर्धसत्य असत्य से भी अधिक खतरनाक होता है। लोगों की जिंदगी में उनके आसपास के लोग भी बहुत सी बातों को लेकर अनजाने में, या कि सोच-समझकर अर्धसत्य कहते हैं। बहुत से मामलों में किसी के खिलाफ भड़काने के लिए ऐसा किया जाता है, और अगर लोग एकतरफा बात सुनकर भड़क जाते हैं, तो वे अपना ही नुकसान करते हैं। इसलिए जब लोग दूसरे पक्ष को भी सुनते हैं, तो उन्हें समझ आता है कि उन्हें पहले परोसा गया सत्य, सत्य न होकर अर्धसत्य था। इसलिए जिंदगी में हमेशा ही इस एक शब्द, अर्धसत्य की संभावना या आशंका को ध्यान में रखना चाहिए।

प्लास्टिक पर रोक का यह छत्तीसगढ़ राज्य का अपना एक ऐतिहासिक फैसला...

संपादकीय
7 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है और कई तरह के प्लास्टिक और पॉलीथीन के सामानों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यह रोक प्रदेश में ऐसे सामानों के निर्माण, इनको प्रदेश के बाहर से लाने, और राज्य में इनके इस्तेमाल, इन सभी पर लागू हो रही है। इसमें निजी इस्तेमाल के पॉली बैग के अलावा प्लास्टिक के कप, ग्लास, प्लेट, कटोरी, और चम्मच जैसे सामानों पर भी लागू है, और इसके अलावा विज्ञापन-होर्डिंग्स पर लगने वाले सिंथेटिक फ्लैक्स, और पीवीसी जैसे पदार्थ से बने हुए बैनर पर भी रोक लगाई गई है। यह फैसला प्रदेश में सैकड़ों करोड़ के कारोबार और हजारों लोगों के रोजगार को तो प्रभावित करेगा, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि इससे इस धरती के बर्बाद होने की रफ्तार कम भी हो सकती है।
आज तो बाकी हिन्दुस्तान की तरह छत्तीसगढ़ में भी हालत यह है कि एक-दो दिनों तक टंगने वाले जन्मदिन, या स्वागत के बैनर, बोर्ड, और होर्डिंग उसके बाद घूरों से होते हुए कचरे में बाकी पूरी जिंदगी के लिए हमेशा के लिए बोझ बन जाते हैं। इसी तरह आज छोटे-बड़े किसी भी कार्यक्रम के बाहर हजारों कप-प्लेट, गिलास का प्लास्टिक का कचरा इक_ा हो जाता है, और जो कि कभी सड़ता नहीं, हजारों, शायद दसियों हजार बरस के लिए वह धरती की छाती पर बोझ बना हुआ पड़े रहता है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह एक अलोकप्रिय और साहसी फैसला है कि प्रदूषण पर एक साथ इतनी बड़ी और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अगर बाकी देश में इसी तरह कार्रवाई की जाती है तो धरती पर स्थायी प्रदूषण बहुत हद तक घट सकता है।
आज मशीनों से बनने वाले प्लास्टिक के सामान और मशीनों से होने वाली फ्लैक्स की छपाई का नतीजा यह हो गया है कि लोग इनका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। जो कार्यक्रम कुछ घंटों के रहते हैं, उनका मंच भी फ्लैक्स से सजा दिया जाता है जिसका कोई उपयोग उसके बाद नहीं रहता है। एक समय ऐसा था जब कपड़े पर कलाकार हाथ से ऐसी ही लिखावट और सजावट करते थे, जिससे रोजगार भी मिलता था, और उस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल भी हो जाता था। लेकिन मशीनों ने यह पूरा सिलसिला खत्म कर दिया था, और अब मिनटों के भीतर फ्लैक्स पर छपाई होकर पोस्टर और होर्डिंग बना दिए जाते हैं। इसी तरह अब गिलासों को धोकर इस्तेमाल करना, प्लेट को धोकर इस्तेमाल करना, यह सब खत्म हो गया, और अब अमीरों से लेकर धार्मिक कार्यक्रमों तक सब जगह यूज एंड थ्रो सामानों ने जगह बना ली है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल एक बहुत ही बड़ा फैसला है, और अगर इसमें कोई अदालती दखल न आए, सरकार किसी दबाव में अपना फैसला न बदले, तो यह पर्यावरण के हित में एक ऐतिहासिक फैसला रहेगा।

पाक परमाणु ठिकानों पर हमले की तैयारी का बयान नाजायज, बेमौके का

संपादकीय
6 अक्टूबर 2017


भारत के वायुसेना अध्यक्ष बी.एस. धनोआ ने कल एक बयान में कहा था कि अगर पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की जरूरत पड़ी तो भारतीय लड़ाकू विमान पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को निशाना बना सकते हैं, और उन्हें नेस्तनाबूद कर सकते हैं। इसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने चेतावनी दी है कि भारत अगर पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करता है, तो किसी को भी पाकिस्तान से संयम बरतने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भारतीय वायुसेना अध्यक्ष ने कल एक बयान में यह भी दावा किया था कि भारत की वायुसेना पाकिस्तान और चीन दोनों से एक साथ भी निपटने की ताकत रखती है।
भारतीय वायुसेना अध्यक्ष का यह बयान हमारी समझ से परे है, और हमारा मानना है कि आज सरहद पर बिना किसी बड़े तनाव के, ऐसा बयान निहायत ही नाजायज और गैरजरूरी था, जिसने कि पाकिस्तानी प्रतिक्रिया पैदा की। यह बात पूरी दुनिया जानती है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु हथियारों से लैस देश हैं, और यह बात भी सभी जानते हैं कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल इन दोनों देशों में से कोई भी एक आसानी से नहीं कर सकते क्योंकि इसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दबाव बहुत बड़ा रहेगा। लेकिन बैठे-ठाले शांति के माहौल में एक फौजी अफसर की ऐसी बयानबाजी दो देशों के बीच तनाव बढ़ाने के अलावा और कुछ भी नहीं है। यह बात पाकिस्तान की तरफ से आई होती तो भी समझ में आता क्योंकि वहां पर लोकतंत्र कमजोर है, और फौज सरकार के फैसलों में खासा दखल रखती है। लेकिन भारत में लोकतंत्र मजबूत है, और फौज का काम न तो फैसले लेना है, और न ही फौज को परमाणु हथियारों या परमाणु ठिकानों के बारे में कोई बात करनी चाहिए। अगर सरकारें ऐसा कोई फैसला लेती हैं, तो जाहिर है कि फौज वैसी कार्रवाई करेगी, और न तो उस कार्रवाई के वक्त मुनादी करके ऐसा किया जाएगा, और न ही आज हिन्दुस्तानी वायुसेना अध्यक्ष के ऐसे बयान से भारत के फैसले पर कोई असर पडऩा है।
इस तरह की बात जब न भारतीय प्रधानमंत्री कर रहे, न विदेश मंत्री कर रहीं, न रक्षा मंत्री कर रहीं, तब एक फौजी अफसर को ऐसा बड़बोलापन नहीं करना चाहिए। हम यह भी नहीं मानते कि भारत के एक आला फौजी अफसर ने ऐसा बयान अपनी सरकार की सहमति या अनुमति के बिना खुद दिया हो, लेकिन हम यह मानते हैं कि बयान देने के लिए फौज का ऐसा इस्तेमाल ठीक नहीं है, और खासकर किसी को भी परमाणु ठिकानों पर हमले, या परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की बेमौके की बात शुरू नहीं करनी चाहिए। आज दुनिया अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच ऐसी बातों को सुन-सुनकर तनाव में भी है, और थकी हुई भी है। लेकिन न तो उत्तर कोरिया के तानाशाह के मन में लोकतंत्र के लिए कोई इज्जत है, और न ही अमरीकी राष्ट्रपति के तौर-तरीके लोकतांत्रिक हैं। इसलिए दुनिया मान रही है कि वे बच्चों की तरह लड़ रहे हैं। हालांकि हमारा यह मानना है कि दुनिया के कोई भी बच्चे आपसी लड़ाई में ऐसी भयानक तबाही की सोचकर कभी कोई तैश की बात नहीं करते, इसलिए बच्चों की मिसाल देना ठीक नहीं है। परमाणु हथियारों से जुड़ी हुई किसी भी तरह की बात को दुनिया के तकरीबन सारे ही देश नापसंद करते हैं, और भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि ऐसी किसी चर्चा को उसका फौजी अफसर करे। यह कहे बिना भी सब लोग यह जानते हैं कि भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए तैयार बैठे हुए देश हैं, लेकिन यह भी समझना चाहिए कि ये बैठे हुए देश हैं, न कि ऐसा करने के लिए खड़े हुए देश हैं। दूसरी तरफ चीन के साथ जब सरहद का फौजी तनाव बातचीत से अभी-अभी सुलझा है, तो चीन के साथ हवाई जंग के लिए तैयार होने की भारत की बातचीत भड़काऊ है, और किसी भी अमन-पसंद देश को ऐसी बातों से बचना चाहिए। भारत की लोकतांत्रिक साख आधी-पौन सदी से चली आ रही है, और उसे इस तरह तबाह नहीं करना चाहिए।

अन्ना हजारे की खादी के भीतर कोई गांधीवाद नहीं

संपादकीय
5 अक्टूबर 2017


अन्ना हजारे अभी छत्तीसगढ़ आए, तो खबर के हिसाब से उनको कुछ महत्व मिल गया। लेकिन उनकी पूरी बातों को सुनें, तो अब वे किसी काम की रह गई नहीं दिखती हैं। अपने निजी जीवन के त्याग की बड़ाई बहुत लंबे समय तक किसी को महान नहीं बना सकती, इस देश में लाखों ऐसे साधू हैं जो कि घर-बार छोड़कर पूरी जिंदगी से अकेले गुमनाम जी रहे हैं, लेकिन उनका कोई महत्व नहीं है। दूसरी तरफ अन्ना हजारे की बातों को सुनें, तो यह साफ दिखता है कि यूपीए सरकार के समय बाबा रामदेव के साथ मिलकर उन्होंने दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ, और लोकपाल के लिए जिस तरह का आंदोलन चलाया था, उस आंदोलन को उन्होंने मोदी सरकार के आते ही छोड़ दिया, और जाकर इस अंदाज में सो गए कि अब जब कांग्रेस की सरकार दुबारा आएगी, तब वे अनशन और आंदोलन के लिए जंतर-मंतर, या रामलीला मैदान फिर आ जाएंगे।
अन्ना हजारे जैसे लोग गांधीवाद के नाम को भी तबाह करते हैं क्योंकि उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हमेशा कुछ चुनिंदा लोगों को निशाने पर लेकर चला, और बाद में रहस्यमय तरीके से वह आंदोलन खत्म हो गया। इससे कुछ हफ्तों या महीनों के लिए तो अन्ना हजारे की साख बढ़ गई, लेकिन खादी, गांधीवाद, और गांधीवादी आंदोलन की साख उन्होंने चौपट कर दी। जिस समय वे यूपीए सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हुए कर्नाटक के भी लोगों के साथ खड़े थे, उस वक्त भी अन्ना हजारे की जुबान से कर्नाटक के उस वक्त के भाजपा मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की सरकार के अपार भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ नहीं निकला था। इसलिए आज जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अन्ना हजारे को भाजपा का एजेंट कह रही है, तो यह बात देश के बहुत से दूसरे लोगों के मन में भी उठ रही है।
अन्ना हजारे के मुकाबले अरविंद केजरीवाल अधिक ईमानदार रहे, और उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को चुनावी राजनीति तक आगे बढ़ाकर खुलकर राजनीति की। अब जब वे पिछले कई बरस से एक राजनीतिक दल के रूप में काम कर रहे हैं, तो उनका काम और उनके फैसले, उनके विचार, ये सब राजनीतिक कसौटी पर कसे जा रहे हैं, और वे राजनीतिक रूप से देश की जनता के प्रति जवाबदेह भी हैं। लेकिन अन्ना हजारे जैसे लोग एक धूमकेतु की तरह दिल्ली आते हैं, और एक तंग नजरिए वाले आंदोलन को छेड़कर बीच में कभी भी घर चले जाते हैं। ऐसा लगता है कि बिना संगठन के, बिना किसी राजनीतिक दल के काम करने वाले अन्ना सरीखे लोगों के बजाय एक संगठन या दल के प्रति जवाबदेह लोग शायद अधिक जिम्मेदार होते हैं। एक अकेले इंसान पर टिके हुए आंदोलन के लिए गांधी सरीखा इंसान जरूरी है, हर किसी के बस का यह नहीं है कि पसंद-नापसंद से परे, खालिस सिद्धांतों पर आधारित आंदोलन चला सकें। अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में कुछ भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ चाहे जो किया हो, उनका सारा आंदोलन एक सीमित सोच, और सीमित निशाने वाला गैरगांधीवादी आंदोलन है, और उनके खादी पहनने से ही वे गांधीवादी नहीं हो जाते। कल तक एक आदमी को यह लगता था कि लोकपाल के बिना यह देश पल भर नहीं चल सकता, जिसके लिए वह जान देने को उतारू था, उस मुद्दे को मोदी सरकार आने के बाद से भूलकर वह घर बैठा हुआ है, यह गांधीवाद नहीं है।

मनमाने टैक्स के लिए जनता के बर्दाश्त का इम्तिहान न लें

संपादकीय
4 अक्टूबर 2017


पेट्रोल और डीजल के दाम सरकारी नियंत्रण से बाहर करना उदार अर्थव्यवस्था के तहत जरूरी था, लेकिन भारत उसके असर को झेल नहीं पा रहा है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने-बढऩे से भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम कम-ज्यादा होते, तो भी समझ आता, लेकिन आज तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम औंधे मुंह गिरा हुआ है, और जिस दिन से मोदी सरकार आई है उस दिन से उसे मिट्टी के मोल मिलने वाले पेट्रोलियम का फायदा मिल रहा है। लेकिन सस्ते में आते पेट्रोलियम पर केन्द्र सरकार ने अपनी ड्यूटी को बढ़ाकर आसमान पर कर दिया, और कहने को तो यह खुले बाजार की अर्थव्यवस्था का सामान है, लेकिन केन्द्र सरकार पेट्रोल-डीजल को दुह रही है। इससे इतनी बड़ी कमाई केन्द्र सरकार कर रही है कि 30 रूपए का पेट्रोल जनता को 80 रूपए में मिल रहा है, बाकी सारा टैक्स केन्द्र और राज्य की जेब में जा रहा है।
इस तरह अंधाधुंध टैक्स बढ़ाकर महंगाई को आसमान पर ले जाने का कोई न्यायोचित तर्क नहीं हो सकता। केन्द्र सरकार के कुछ हिमायती यह कहते हैं कि इस मोटी कमाई से केन्द्र सरकार की बाकी योजनाओं की लागत निकल रही है, दूसरी तरफ केन्द्र सरकार में ताजा-ताजा शामिल हुए केरल से आए एक केन्द्रीय मंत्री ने काम सम्हालने के दो दिनों के भीतर ही बड़ी गैरजिम्मेदारी से यह बयान दिया कि पेट्रोल का इस्तेमाल गरीब नहीं करते हैं। ऐसा बयान गरीब उत्तरप्रदेश या बिहार से आया कोई पेशेवर नेता देता तो भी समझ आता, यह तो उस केरल से आया हुआ एक गैरराजनेता बोल रहा था, जिस केरल में सबसे गरीब भी पेट्रोल-डीजल की गाड़ी पर ही चलते हैं, जहां निजी औसत संपन्नता खासी अधिक है। ऐसे में यह कहना कि गरीब पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करते, एक संवेदनाशून्य बयान है, और यह जनता की तकलीफों पर नमक रगडऩे जैसा है।
सरकार के टैक्स का ढांचा इस तरह नहीं होना चाहिए कि बाजार में ट्रांसपोर्ट के कारोबार में लगे लोग, गाडिय़ों पर चलने वाले कारोबार, और बस-टैक्सी, ऑटो में चलने वाले लोग इस उतार-चढ़ाव को झेलते हुए परेशान हो जाएं। यह बात समझना चाहिए कि हर कुछ दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम कम-ज्यादा होने से सड़क के मुसाफिरों को मनमानी भाड़ा देना होता है, और सामान का भाड़ा भी बढ़ते ही चलता है। टैक्स वसूलने का यह तरीका बहुत ही खराब है, और सरकार को पेट्रोलियम की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुताबिक टैक्स को इस तरह रखना चाहिए कि बाजार में पेट्रोल-डीजल का दाम तय रहे, और सरकार अपने टैक्स को कम-अधिक करती रहे। पिछली सरकार के राज में 60 रूपए लीटर के पेट्रोल पर मनमोहन सिंह को कोसते हुए नरेन्द्र मोदी के कई वीडियो इंटरनेट पर तैर रहे हैं, और आज पेट्रोलियम उन दिनों के मुकाबले सस्ता मिल रहा है, और उसका खुदरा दाम 80 रूपए लीटर तक पहुंचा दिया गया है। जनता बात-बात पर बगावत तो नहीं कर सकती, लेकिन सरकार की ऐसी मनमानी से जनता में भारी नाराजगी है, वह बहुत तकलीफ झेल रही है, और सरकार को मनमाने टैक्स वसूली के लिए जनता के बर्दाश्त का ऐसा इम्तिहान नहीं लेना चाहिए।

समाचार-विचार के ग्राहक तय करें कि उनको चाहिए कितना सच-कितना झूठ...

संपादकीय
3 अक्टूबर 2017


बलात्कार की कैद काट रहे बाबा राम-रहीम की बेटी कही जाने वाली हनीप्रीत के पुलिस के सामने समर्पण कर देने के बाद अब देश के बहुत से टीवी चैनलों के सामने सनसनी का अकाल पड़ जाएगा। अब तक बहुत से चैनल डेरा सच्चा सौदा से सच में या झूठ में जुड़े हुए किसी पुराने भक्त या कर्मचारी को ढूंढकर उसके सनसनीखेज बयान दिखा रहे थे, और दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा आंखें और मुंह फाड़े हुए उसे देख रहा था। दर्शकों का ऐसा हिस्सा पहले मनोहर कहानियां, और सच्ची कहानियां जैसी अपराध-कथा पत्रिकाओं का बड़ा समर्पित और निष्ठावान पाठक रहते आया है, और आज भी उसे सेक्स, अपराध, धर्म, ग्लैमर, अवैध संबंध की ऐसी मिली-जुली चटपटी चाट की भूख कायम रहती है। और यह महज हिन्दुस्तानी दर्शक-पाठक की बात नहीं है, पूरी दुनिया में लोगों की सबसे बड़ी भीड़ ढाई अक्षर के पे्रम के पीछे नहीं लगती, ढाई अक्षर के सेक्स के पीछे जरूर लग जाती है।
लेकिन आज की बात लोगों की नहीं, उनके टेस्ट को घटिया बनाए रखने पर आमादा मीडिया के एक हिस्से की है, जो कि अपने आसपास एक संक्रामक रोग की तरह सनसनी को फैलाते भी चलता है। आज देश का शायद ही कोई अखबार हो जो अपने न्यूज रूम में एक या अधिक टीवी चैनलों को लगातार न देखता हो, और आज छपे हुए अखबार भी  स्क्रीन पर कहने और दिखाने वाले टीवी चैनलों की आंधी की चपेट में आए हुए दिखते हैं। जो टीवी पर छाया हुआ है, उसे अनदेखा करना अखबारों के लिए मुश्किल होता है। इन चैनलों की वेबसाईटों से अखबारों को अपनी वेबसाईट का मुकाबला भी देखना होता है और टीवी पर खबरें देख चुके खबरों के ग्राहक के सामने कई घंटों बाद अखबार परोसते हुए यह भी देखना होता है कि ताजा अखबार भी पाठक को रद्दी सा न लगे।
दूसरी तरफ आज सोशल मीडिया और डिजिटल समाचार मीडिया इतने धमाके के साथ टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को चुनौती दे रहे हैं कि बहुत सी टीवी-खबरें इनसे प्रभावित रहती हैं, इन्हीं से निकलकर आती हैं। सोशल मीडिया पर पेशेवर मीडियाकर्मियों से परे भी बहुत से लोग लिखते हैं, और इस तरह मीडिया का समाचार और विचार पर एकाधिकार खत्म हो गया है। यह एक अभूतपूर्व स्थिति है जब संगठित मीडिया और असंगठित मीडिया, सोशल मीडिया सरीखा गैरमीडिया, और मीडिया की अलग-अलग किस्में एक-दूसरे को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। इन सबको एक-दूसरे के साथ मुकाबला भी करना पड़ रहा है, और एक-दूसरे के साथ जिंदा रहना भी सीखना पड़ रहा है। हालत यह है कि एक अखबार के छपे हुए पन्नों को उसकी ही अपनी वेबसाईट से मुकाबला करना पड़ रहा है, और वेबसाईट को मोबाइल फोन पर फैलने वाली अपनी ही खबरों से। यह पूरी नौबत बड़ी अजीब भी है, और परंपरागत मीडिया इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है, लेकिन वक्त के साथ बदलने को जो लोग तैयार नहीं होते हैं, वे डायनासॉर जैसे मजबूत होने के बावजूद, उसी तरह मिट जाते हैं। आज मीडिया के जो लोग बदलने को तैयार नहीं हैं, वे तेजी से बाजार से बाहर हो रहे हैं। लेकिन मीडिया की कई किस्मों के बीच के इस गलाकाट मुकाबले में सबसे बड़ा नुकसान पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों का हो रहा है। जल्द से जल्द, अधिक से अधिक सनसनीखेज, ध्यान खींच लेने के आक्रामक कोशिश से अब पत्रकारिता शब्द ही डायनासॉर की तरह चल बसा है, और अब महज मीडिया नाम का एक बिना जवाबदेही वाला शब्द रह गया है। आज समाचार और विचार के ग्राहकों को यह तय करना है कि कल वे कितना सच या कितना झूठ पाना पसंद करेंगे, ठीक उसी तरह कि बाजार में असली सामान और उसकी नकल दोनों मौजूद हैं, और दोनों के ग्राहक हैं।

इंसान और हैवान का डीएनए एक

2 अक्टूबर  2017

मुंबई में अभी एक रेलवे स्टेशन के पुल पर भगदड़ में दो दर्जन लोग मरे, तो उसका मीडिया कवरेज जाहिर है कि कुछ अधिक हुआ, क्योंकि वह मुंबई है, और यह वह मुंबई है जहां के सुरेश प्रभु अभी कल तक रेलमंत्री थे, और यह देश की कारोबारी राजधानी भी है, और सबसे बड़ा महानगर भी है। यहां पर हर दिन पौन करोड़ लोग लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, इसलिए ऐसी लोकल ट्रेन के एक स्टेशन पर हुए ऐसे हादसे की खबर-अहमियत कुछ अधिक होना जायज भी है। नतीजा यह है कि यह हादसा खबर से हट नहीं पा रहा है क्योंकि यह रेलवे की भटकी हुई प्राथमिकताओं की एक बड़ी मिसाल है।
लेकिन आज यहां इस पर लिखने का एक दूसरा मकसद है। दो दिन पहले खबर आई थी कि पुलिस को क्लोज्ड सर्किट कैमरों की ऐसी रिकॉर्डिंग मिली है जिनमें भगदड़ में मारे गए, या कि दम तोड़ते हुए मुसाफिरों के गहने उतारते दूसरे मुसाफिर दिख रहे हैं, या कि वे महिला मुसाफिरों की लाशों से उनके पर्स छीनकर भाग रहे हैं। आज एक जिम्मेदार अंग्रेजी अखबार की खबर है कि दम तोड़ती हुई एक लड़की की आखिरी सांसों के दौरान कुछ लोग उसके बदन से खेलते हुए, उसका देह शोषण करते हुए भी कैमरों में कैद हुए हैं। यह याद रखने की जरूरत है कि यह सब दिन की रौशनी में, हजारों दूसरे मुसाफिरों के बीच की गई हरकतें हैं। और लोग कहेंगे कि इनकी इंसानियत कहां गई।
दरअसल इंसानियत शब्द को हैवान के मुकाबले इंसान के सिलसिले में गढ़ा गया है कि हैवान तो सभी किस्म की हिंसक हरकतें करते हैं, और इंसान अच्छे काम करते हैं। हैवान को न तो किसी ने देखा है, और न ही उसका कोई सुबूत मिला है। जब लाखों बरस पुराने डायनासॉर के कंकाल चट्टानों के नीचे दबे निकलते हैं, तब भी कोई ऐसा कंकाल नहीं निकला जिसे कि हैवान का बताया जा सके। हकीकत यह है कि जब इंसान अपनी हरकतों पर शर्मिंदा होते हैं, या कि दूसरे लोग उन हरकतों को पकड़कर उन्हें शर्मिंदा करते हैं, तो इंसान अपने ऐसे मिजाज को अपना मानने से इंकार कर देते हैं, और उसे किसी हैवान की हैवानियत बता देते हैं। यह कुछ उसी तरह का मामला है जिस तरह कि किसी पार्टी का नेता या कार्यकर्ता जब बलात्कार करते पकड़ा जाता है, तो वह पार्टी उससे किनारा कर लेती है, और ऐसे सुबूत गढऩे लगती है कि उसे तो पहले ही पार्टी से अलग कर दिया गया था।
दरअसल अपनी खामियों को अपनी मानने से इंकार करने की सोच कोई नया सिर ढूंढती है जिस पर कि तोहमत मढ़ी जा सके। जिस तरह किसी घर में एक बच्चे को ऐसा शरारती मान लिया जाता है, और करार दिया जाता है कि वहां की तमाम गड़बडिय़ां वही बच्चा करता है, उसी तरह इंसानों ने हैवान नाम की एक ऐसी प्रतिमा गढ़ ली है जिसे कि अपनी हर अप्रिय गलती के लिए, गलत काम और जुर्म के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसी के तहत हैवानियत नाम का एक शब्द गढ़ा गया है, जो कि इंसानियत के भीतर का उसका अपना हिस्सा है, उसका अलग न किया जा सकने वाला हिस्सा है, जिसे महज दबाकर रखा जा सकता है, जब तक कि मौका न मिले, या कि जब तक कि उसे मौका देने की कोई वजह न आए। लोगों को याद रखना चाहिए कि अभी आए दिन पूरे हिन्दुस्तान से हर कुछ मिनटों में एक बलात्कार की शिकायत पुलिस तक पहुंच रही है। हमारा मानना है कि ऐसी हर शिकायत के पीछे, पुलिस तक न पहुंचने वाले सौ बलात्कार और होते होंगे, और ऐसे हर बलात्कार के पीछे हजारों बच्चों के तरह-तरह के यौन शोषण भी होते होंगे जो कि कभी सामने नहीं आते।
हैवानियत शब्द को गढ़कर इंसान अपनी इज्जत बचाने के फेर में एक चूक कर रहे हैं कि वे अपनी ही एक अपरिहार्य और अविभाज्य, अलग न की जा सकने वाली खामी को मानने से इंकार कर रहे हैं। किसी भी समस्या का समाधान निकालने की पहली जरूरत होती है उस समस्या के अस्तित्व को मानना। जब इंसान यही मानने से इंकार कर रहे हैं कि यह इंसान के भीतर की अपनी खामी है, तो वे किसी समाधान की तरफ बढ़ भी नहीं सकते। लोगों को यह मानना पड़ेगा कि उनके भीतर की हकीकत क्या है, वे अपने आपको कैसा चाहते हैं, यह हसरत हकीकत नहीं हो सकती। हसरत को हकीकत मान लेना एक बड़ी चूक की शुरूआत होती है। यह सिलसिला कुछ वैसा ही है कि जब घर का कोई बच्चा बाहर से शरारत करके लौटता है, तो घरवाले दूसरों सहित अपने मन को भी यह सफाई देते हैं कि वह गलत बच्चों की सोहबत में उठने-बैठने लगा है। यही सफाई उस बच्चों के तमाम साथियों के मां-बाप भी एक-दूसरे को देते हैं, और यह सवाल खड़ा होता है कि वे गलत बच्चे हैं कौन? इसी तरह यह समझ लेना चाहिए कि वह हैवानियत और कुछ नहीं है, वह अपने भीतर की इंसानियत का ही एक हिस्सा है, इंसानियत के साथ हैवानियत कुछ वैसी ही जुड़ी हुई है जिस तरह कि फूलों की पंखुडिय़ों के नीचे डंडी होती है, या कांटे होते हैं, या जिस तरह सीताफल (शरीफे) के भीतर बीज होते हैं, या अनानास के ऊपर कांटे होते हैं। इनमें से किसी को भी नकारने से कुछ साबित नहीं होता, और ये बीज या कांटे तो अलग किए भी जा सकते हैं, लेकिन इंसान को हैवानियत से अलग नहीं किया जा सकता, वह उसकी रग-रग में बसी हुई है।
अब सवाल यह उठता है कि हर इंसान हत्यारे क्यों नहीं हो जाते, हर इंसान बलात्कारी क्यों नहीं हो जाते, अगर इन सबके भीतर हैवान शामिल हैं? ऐसा इसलिए होता है कि समाज और सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक दबाव, कानून का खतरा, और प्रतिष्ठा का मोह, ये तमाम चीजें मिलकर इंसान के भीतर के हैवान को कैद करके रखती हैं, और इसमें कुछ लोग गांधी की तरह अधिक कामयाब हो जाते हैं, कुछ लोग गोडसे की तरह हत्यारे हो जाते हैं, और कुछ लोग निठारी के ऐसे हत्यारे और बलात्कारी हो जाते हैं जो कि छोटे-छोटे बच्चों को बलात्कार के बाद मार डालते हैं, और फिर उनकी लाश को पकाकर खा भी लेते हैं, और इसी समाज के भीतर तब तक जीते रहते हैं जब तक कि वे पकड़ा नहीं जाते। उन्हें देखकर कोई नहीं बता पाते कि उनके भीतर का हैवान उन पर काबू पा चुका है, और वही फैसले कर रहा है, और वही काम कर रहा है।
इंसानों को अपनी अनचाही बातों के लिए हैवानों को जिम्मेदार ठहराना बंद करना चाहिए। ऐसा किए बिना इंसानों से सावधानी बरतना शुरू ही नहीं हो पाएगा। आज पूरी दुनिया में यह जरूरत महसूस हो रही है कि बच्चों को या समझाया और सिखाया जाए कि बड़ों का कौन सा स्पर्श अच्छा होता है, और कौन सा बुरा। इसलिए बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी को यह एहसास कराना जरूरी है कि आसपास के इंसान ही हैवान भी हैं, और हैवान के सिर पर सींग नहीं होते, उसके नाखून बढ़े हुए नहीं होते, उसके दांत बाहर निकले हुए नहीं होते, हैवान इंसान की शक्ल में ही, इंसान के बदन में ही रहते हैं। इंसानों ने अपनी इज्जत बनाए और बचाए रखने के लिए हैवान नाम का एक शब्द गढ़ लिया, डिक्शनरी में हैवानियत जोड़ दिया, और हैवानियत को एक कुल कलंक मानते हुए उससे परिवार का नाता तोडऩे का हलफनामा दे दिया। लेकिन आधुनिक विज्ञान की तकनीक साबित करती है कि इंसान और हैवान के डीएनए में कोई फर्क नहीं है, दोनों का डीएनए एक ही है।

हिन्दुस्तानियों का मिजाज ही गंदगी में जीने का दिखता है

संपादकीय
2 अक्टूबर 2017


गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को देश भर में स्वच्छता अभियान एक बार फिर खबरों में आ रहा है। टीवी पर अमिताभ बच्चन लगातार विज्ञापनों और कार्यक्रमों के रास्ते स्वच्छता अभियान को बढ़ावा दे रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री बार-बार इसकी जरूरत को याद दिला रहे हैं।  केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री और अधिकारी सफाई अभियान चलाते हुए और झाड़ू लगाते हुए दिख रहे हैं।  हो सकता है कि जनता को इस अभियान में हिस्सेदारी में कुछ समय लगे, और यह भी हो सकता है कि लोग अपना घर भी साफ रखना न सीख पाएं, लेकिन यह मुद्दा देश के लिए, या किसी भी दूसरे देश के लिए बहुत अहमियत रखता है।
भारत जैसे देश में जहां पर कि शहरीकरण इतना बेतरतीब हुआ है, कि न तो गंदा पानी बाहर निकलने का पूरा शहरी ढांचा है, और न ही ठोस कचरे के निपटारे में शहरी म्युनिसिपल कामयाब हो पाए हैं। ऐसे ढांचे वाले देश में जब जनता एकदम ही गैरजिम्मेदार हो जाती है, तो वह घर के सामने की नाली को घूरे की तरह इस्तेमाल करती है, और अपने घर के कचरे को कोशिश करके सड़़क के दूसरी तरफ फेंकती है। हम अपने आसपास के रोज के तजुर्बे को देखें, तो शहरों में लोग मकानों को तोडऩे से निकला हुआ मलबा भी घूरों पर फेंकते हैं, और इतना ठोस कचरा-मलबा उठा पाना किसी भी म्युनिसिपल के बस का नहीं रह जाता है।
आज सरकारी दफ्तरों की खुद की सफाई बहुत अधिक मायने नहीं रखती, और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम अधिक है कि पहले अपना घर साफ करें, फिर शहर को साफ करने निकलें। लेकिन असल गंदगी शहरों के सार्वजनिक हिस्सों में है, जो कि अनुपात में इतनी अधिक है कि उसका निपटारा लोगों की आदतें सुधरने के साथ-साथ ठोस इंतजाम से ही हो सकेगा। हम सरकार की क्षमता और सीमा को समझते हैं, किसी भी देश या शहर की सरकार गंदे लोगों की गंदगी फैलाने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसे में महात्मा गांधी को याद करना जरूरी है जिन्होंने पौन सदी पहले इस देश में सफाई को जिंदगी की एक शैली बनाने को अच्छी तरह स्थापित किया था, और अपने आश्रमों के पखानों की सफाई खुद करना, अपने परिवार से करवाना भी शुरू किया था। यह सिलसिला भी जरूरी है, इसलिए कि जब लोग किसी जगह को खुद साफ करेंगे, तो लोग उसे गंदा करने से हिचकेंगे भी।
लेकिन शहरीकरण के साथ-साथ कचरा इतना अधिक पैदा होता है, और बदमिजाज लोगों की आबादी के बीच में वह इस कदर फैला और बिखरा रहता है, कि उसे उठाना और ठिकाने लगाना खासा महंगा पड़ता है। और हाल के बरसों में हमने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल का बदलता हुआ मिजाज देखा है, उनको नाली, पानी, सफाई, रौशनी की बुनियादी शहरी जरूरतों को पूरा करने के बजाय सैकड़ों करोड़ के निर्माण के ठेके-टेंडर में दिलचस्पी अधिक होने लगी है, बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स बनाना अच्छा लगने लगा है, और ऐसा क्यों होता है, यह सबको मालूम है। इस देश के शहरों में म्युनिसिपलों के तौर-तरीकों को, उनकी सोच को, और उनके काम के दायरे को बाजारू सोच से बाहर लाने की जरूरत है, उसके बिना कचरे का निपटारा वैसा ही ढीला पड़े रहेगा, जैसा कि पिछले एक बरस से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखने मिल रहा है।
गांधी जयंती के दिन पर सरकारी कार्यक्रमों में झाड़ू लगाते हुए बड़े-बड़े लोग तस्वीरें तो खिंचवा लेंगे, लेकिन यह अभियान, और इसका नारा, किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि उस पर अमल किस तरह से हो पाएगा, किस हद तक हो पाएगा। लेकिन अपनी तमाम आशंकाओं के साथ हम इस पहल का स्वागत करते हैं कि सौ मील का सफर भी शुरू तो पहले कदम से ही होता है। प्रधानमंत्री ने जो पहल की है, वह अगर इस देश के लोग आगे बढ़ाते हैं तो यह देश बाकी सभ्य और साफ-सुथरे देशों की हिकारत से बच सकेगा। आज तो हाल यह है कि प्रवासी भारतीय भी अपनी जन्मभूमि की गंदगी को देखते हुए यहां लौटकर बसना ठीक नहीं समझते। हिन्दुस्तानियों का मिजाज ही गंदगी में जीने का दिखता है।

नए ताजमहल बनने के मौकों पर लोगों को याद आती हैं कमियां..

संपादकीय
1 अक्टूबर 2017


मुंबई में एक लोकल रेलवे स्टेशन पर पटरी पार करने के संकरे पुल पर हुई भगदड़ में दो दर्जन मौतों के बाद अब मोदी सरकार के आलोचकों को यह मुद्दा मिला है कि वे रेल मुसाफिरों की सहूलियतों और हिफाजत को याद दिलाते हुए यह कहें कि इस देश की प्राथमिकता एक लाख करोड़ रूपए खर्च करने वाली बुलेट ट्रेन नहीं है, बल्कि देश भर में जगह-जगह रेल स्टेशनों को बेहतर बनाने, रेलगाडिय़ों को सुधारने, दुर्घटनाओं से बचाने, और सहूलियतें बढ़ाने को प्राथमिकता देना चाहिए। मुंबई शहर तक सीमित राजनीति करने वाले दोनों ठाकरे बंधुओं ने अलग-अलग मोदी सरकार पर निशाना लगाया है। इनमें से एक ने कहा है कि जब तक मुंबई में लोकल ट्रेन स्टेशनों में सुधार नहीं होता वे बुलेट ट्रेन योजना की एक ईंट भी मुंबई में नहीं रखने देंगे।
बुलेट ट्रेन को लेकर चल रही आलोचना पर हम भी पहले लिख चुके हैं कि यह बहुत ही खर्चीली लग रही है, और इसके बेहतर और सस्ते विकल्प आज अस्तित्व में हैं। दूसरी तरफ देश में जिस तरह इंसान और जानवर रेलवे पटरियों को जगह-जगह पार करते हैं, उसके किनारे जगह-जगह बसते हैं, उसे देखते हुए बहुत तेज रफ्तार की गाडिय़ों से दुर्घटनाओं के खतरे बढ़ेंगे। और अगर ये गाडिय़ां जमीन के नीचे या आसमान में पुलों पर दौड़ेंगी, तो जाहिर है कि उनकी लागत बहुत अधिक आएगी। आज दिक्कत यह है कि रेलगाडिय़ों मेें चलने वाले गरीब और मध्यम वर्ग के लोग साफ-सुथरे डिब्बे तक नहीं पा सकते, ट्रेन या स्टेशनों में उनके लिए साफ-सुथरे शौचालय तक नहीं है। इसके अलावा लोगों को अपनी जरूरत के समय पर ट्रेनों में आरक्षण नहीं मिल पाता, और लोग रिश्वत देकर टिकटें पाते हैं, इस दिक्कत को रेल विभाग सम्हालने वाले कई प्रभु अपने कार्यकाल में नहीं सुधार पाए।
यह समझने की जरूरत है कि नए-नए ताजमहल खड़े करने के बजाय आगरा की नालियों को साफ करना, वहां की सड़कों के गड्ढों को सुधारना, वहां रौशनी और साफ पानी का इंतजाम करना अधिक जरूरी है। लेकिन सत्ता पर बैठे हुए लोगों को अपने कार्यकाल में ताजमहल बनाना सुहाता है क्योंकि उससे ही उनका नाम अमर हो सकता है। इसलिए कोई साढ़े तीन हजार करोड़ खर्च करके सरदार पटेल की प्रतिमा बनाते हैं, तो कोई तीन हजार करोड़ से शिवाजी की प्रतिमा बनाते हैं, और अपने कार्यकाल में मायावती जैसे लोग अपने जिंदा रहते हुए सैकड़ों करोड़ की लागत से अपनी प्रतिमाएं भी बनवा लेते हैं। इसी तरह लोग सरकारी योजनाओं को ऐसा बनाते हैं कि इतिहास में उनका नाम इनके साथ दर्ज हो जाए। यह सिलसिला आत्मसंतुष्टि तो देता है, शायद लोगों के बीच गौरव भी देता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख देता है। जो महाराष्ट्र कुपोषण का शिकार है, जहां आदिवासी इलाकों में बच्चे बड़ी संख्या में मरते हैं, जहां पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वहां पर हजारों करोड़ रूपए एक प्रतिमा पर खर्च करना एक गरीब देश की अय्याशी के अलावा और कुछ नहीं है। लोकतंत्र के पहले जब राजा-महाराजा होते थे, तो वे भूख से मरती जनता को अपने हाल पर छोड़कर महल और ताजमहल बनवाते थे, आज भी लोकतंत्र आने के बाद सत्ता पर बैठे लोगों का वैसा ही रूख जारी है। और ऐसे मौके पर लोगों को वे तमाम कमियां और खामियां अधिक याद पड़ती हैं जिनको अनदेखा करते हुए नए ताजमहल शुरू किए जाते हैं। देश में बुलेट ट्रेन का फैसला कुछ इसी किस्म का है, और यह देश को खासा महंगा पड़ेगा ऐसा लग रहा है। 

मुंबई स्टेशन पर भगदड़-मौतें, लोगों की सोच से लेकर रेलवे की क्षमता तक सुधार जरूरी

संपादकीय
29 सितंबर 2017


भारत के सबसे बड़े महानगर और देश की कारोबारी राजधानी मुंबई के एक लोकल ट्रेन स्टेशन पर किसी अफवाह के चलते एक पुल पर भगदड़ हुई और कुचलकर 22 लोगों की मौत हो चुकी है, दर्जनों घायल हैं। आज ही नए रेलमंत्री पीयूष गोयल मुंबई पहुंचे थे, और वे इसी लोकल ट्रेन से सफर करने वाले थे। देश के सबसे अनुशासित माने जाने वाले मुंबई के लोगों के बीच ऐसी भगदड़ हैरान करने वाली है क्योंकि वहां हर दिन 75 लाख से अधिक लोग लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, और बहुत बुरी भीड़ के बीच भी डिब्बों के बाहर टंगे हुए रोज का सफर एक आम बात है, लेकिन ऐसी भगदड़ की बात कभी सुनी नहीं गई। लोग व्यस्त घंटों में बहुत ही धक्का-मुक्की के साथ ट्रेन में चढ़ पाते हैं, और हर कुछ मिनट में हर रास्ते पर चलने वाली लोकल ट्रेन भी मुंबई की जरूरत के मुताबिक कम पड़ती है, लेकिन ऐसा हादसा वहां कभी नहीं हुआ था।
देश में रेलवे स्टेशनों पर, या किसी मेले के दौरान नदी के घाट पर, नदी के पुल पर पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं। उनमें से अधिकतर हादसे किसी अफवाह के चलते हुए जिन्हें सुनकर लोग जान बचाकर भागने लगे, और इसी चक्कर में मौतें हुईं। भारत की आबादी जितनी अधिक है, और लोगों की भीड़ कुछ खास दिनों पर जिस तरह कुछ जगहों पर जुटती है, उससे भी भगदड़ की नौबत आती है। लेकिन मुंबई के लोग जो कि बहुत तेज और स्ट्रीट-स्मार्ट माने जाते हैं, वे भी एक अफवाह का शिकार हो गए, यह बात कुछ हैरान करने वाली है। यहां पर इस बात की चर्चा इसलिए जरूरी है कि अफवाहें उन्हीं जगहों पर अधिक फैलती हैं, जिन जगहों पर लोगों में वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति कम होने लगती हैं। आज पूरे देश में ऐसा माहौल है कि लोग अपनी सामान्य समझबूझ भी खो रहे हैं, और वे अंधभक्ति से लेकर धर्मान्धता तक अलग-अलग किसी न किसी बात के शिकार हो रहे हैं। इंसान का मिजाज टुकड़े-टुकड़े में समझदार और नासमझ नहीं बनता। लोग अगर समझदार रहते हैं तो हर बात में समझदार रहते हैं, और लोग अफवाहों पर भरोसा करने लगते हैं तो वे किसी भी तरह की प्रतिमा को दूध पिलाने भी पहुंच सकते हैं, और चोटी काटने के शक में लोगों की हत्या भी कर सकते हैं।
किसी देश को अपने लोगों के बीच जो खूबियां बढ़ानी चाहिए उनमें तर्कशक्ति, और वैज्ञानिक सोच-समझ बहुत अहमियत रखती हैं। इसके अलावा लोगों के बीच में अपनी जिम्मेदारी का एहसास बढऩा चाहिए, और दूसरों के अधिकारों के लिए सम्मान भी बढऩा चाहिए। जब हमारी राष्ट्रीय सोच-समझ न्यायप्रिय होने लगेगी, तो हम किसी भी तरह की अफवाह और भगदड़ से भी बचेंगे। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां लोग पहले दूसरों के अधिकार की फिक्र करते हैं, और जब उनका सम्मान हो जाता है, तब फिर वे अपने अधिकारों के बारे में सोचते हैं। हिन्दुस्तान में हाल इससे ठीक उल्टा है, यहां पर लोग पूरे वक्त अपने अधिकारों की न केवल फिक्र करते हैं, बल्कि अपने अधिकारों का दावा भी ठोंकते रहते हैं, और अपनी जिम्मेदारी की बात भी नहीं सोचते हैं। ऐसी सोच ही किसी भगदड़ में लोगों को औरों की जान बचाने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए बाकी लोगों को कुचलने का हौसला देती है। भारत में त्याग और जिम्मेदारी की एक समझ विकसित करने की बहुत जरूरत है क्योंकि धर्म और आध्यात्मिक गुरूओं की अंधश्रद्धा में फंसे हुए लोगों के बीच कभी कोई साम्प्रदायिक अफवाह फैलाई गई, तो उसे झूठा साबित करने के पहले बड़ी संख्या में मौतें हो जाएंगी।
मुंबई का यह हादसा रेलवे स्टेशनों की क्षमता की तरफ भी ध्यान खींचता है। देश को सबसे अधिक टैक्स और रोजगार देने वाला यह महानगर बुरी तरह से लदा हुआ है, और अपनी क्षमता खो चुका है। मुंबई को जीने लायक बनाने के लिए बहुत कुछ सोचने और करने की जरूरत है। यहां पर लाखों लोग रोज लोकल ट्रेन के दरवाजों पर लटककर सफर करने को मजबूर हैं, और सरकारें इसे लोगों की नियति मानकर जरूरतों को अनदेखा करते आई हैं। हो सकता है कि इस हादसे के बाद सुधार हो सके। अभी तो एलफिंस्टन रोड नाम के इस स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी रखा गया था, जब जरूरत क्षमता को बढ़ाने की थी, तब बरसों से चली आ रही मांग को अनदेखा करते हुए सरकार ने केवल स्टेशन के नाम को बदलकर प्रभादेवी कर दिया था। देवी का नाम तब तक किसी काम का नहीं है जब तक इंसान अपने खुद के इंतजाम को न सुधारे। रेलवे को इस हादसे से एक बड़ा सबक लेने की जरूरत है, और देश के ऐसे तमाम स्टेशनों पर नजर डालने की जरूरत है जहां क्षमता चुक चुकी है।

बाप-बेटे के बीच बहस छेडऩे से हकीकत नहीं बदलने वाली

संपादकीय
28 सितंबर 2017


अटल सरकार में वित्तमंत्री रहे, और अब तक भाजपा के सदस्य, यशवंत सिन्हा ने कल एक नई बहस शुरू की कि मोदी सरकार के आने के बाद से देश की आर्थिक नीति, अर्थव्यवस्था का क्या हाल हुआ है। उन्होंने एक अखबार में एक लंबा लेख लिखकर वित्तमंत्री अरूण जेटली पर तगड़ा हमला किया है कि नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक बहुत से मोर्चों और मुद्दों पर केन्द्र सरकार किस तरह तबाही लेकर आ रही है, देश बहुत बुरी नौबत में पहुंच चुका है, और इससे तेज रफ्तार से उबरने का कोई जरिया नहीं है। केन्द्र सरकार ने मानो इस हमले का जवाब देने के लिए यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा से एक लेख एक दूसरे अखबार में लिखवाया जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और आर्थिक स्थिति का बचाव किया गया है। अभी पिछले मंत्रिमंडल फेरबदल के पहले तक जयंत सिन्हा वित्त राज्यमंत्री भी थे, और वित्तमंत्री अरूण जेटली के सहयोगी के रूप में वे आर्थिक नीतियों के लिए कम या अधिक हद तक जवाबदेह भी थे।
लेकिन पिता-पुत्र के बीच के इस सार्वजनिक संवाद को छोड़ भी दें, तो भाजपा के भीतर इस बात को लेकर आज बहुत से नेताओं में इस बात पर बड़ा असमंजस है कि देश की आज की अर्थव्यवस्था को लेकर वे आम मतदाताओं को क्या जवाब दें? नोटबंदी से शुरू हुई आम जनता की तबाही जीएसटी से छोटे-बड़े कारोबारियों की तबाही तक जारी रही, सरकार और रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी से कोई काला धन सामने नहीं आया और तकरीबन सारे ही नोट बैंकों में लौट आए। दूसरी तरफ बिना तैयारी के जिस तरह जीएसटी को लागू किया गया, उससे बाजार आज भी नहीं उबर पाया है, कारोबारियों में दहशत है, और दीवाली के वक्त भी धंधा मंदा है। ऐसी नौबत में यशवंत सिन्हा की उठाई हुई बहुत सी बातों पर गौर करने की जरूरत है, और इसका कोई विकल्प जयंत सिन्हा के लिखे लेख के रूप में सामने नहीं आ सकता।
दरअसल पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी की अगुवाई भी कर रहे थे, और वे जिस ऐतिहासिक जीत के साथ सत्ता में आए, बाद में कुछ और राज्यों में भी उन्होंने अभूतपूर्व जीत हासिल की, उससे मिले आत्मविश्वास से उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो कि बाजार के पैमानों पर तो कमजोर थे, लेकिन जो देश के लिए जनता के त्याग का नारा लगाने वाले थे, और राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से उम्मीद करते थे कि वह तकलीफें झेल ले। लेकिन नारों से परे, भाषणों से परे, और सोशल मीडिया पर समर्थकों की एक बड़ी फौज की कोशिशों से परे, आज हकीकत यह है कि देश में बेरोजगारी बढ़ी हुई है, उत्पादन गिर गया है, कारोबार गिर गया है, नोटबंदी की वजह से रोज कमाने-खाने वाले लोगों के बहुत से दिन बर्बाद हुए जिसकी कोई भरपाई न होनी थी, न हुई है। इन तमाम बातों को अनदेखा करना न तो केन्द्र सरकार के लिए अच्छी बात है, न ही भारतीय जनता पार्टी के लिए। आज जिस तरह से चुनाव के करीब पहुंचते गुजरात में एक जुमला लोगों की जुबान चढ़ रहा है कि विकास पगला गया है। यह नारा मोदी और भाजपा के गुजरात के विकास के दावों के जवाब में उछला है, और अब जोर पकड़ते जा रहा है। भारत जैसे लोकतंत्र के चुनावों में हकीकत जितना ही वजन जनधारणा और नारों का रहता है, आज न तो ठोस कारोबारी और आर्थिक हकीकत सरकार की साख बचा पा रही है, न ही जनधारणा उसके पक्ष में है, और न ही अब नारे उसके साथ रह गए हैं। हम तो चुनावी नफे-नुकसान से परे भी देश की असली-जमीनी अर्थव्यवस्था की फिक्र करते हैं, जो कि आज सचमुच ही बहुत फिक्र के लायक है।
बाप-बेटों के बीच एक बहस छिड़वाकर देश की हकीकत को नहीं छुपाया जा सकता। इसलिए अब केन्द्र सरकार को दीर्घकालीन असर वाली योजनाओं को, नीतियों को, मनमाने नारों की तरह नहीं उछालना चाहिए, अब तक जो हो चुका है, देश उससे ही नहीं उबर पा रहा है। केन्द्र सरकार का कार्यकाल आधे से अधिक गुजर चुका है, और बाकी वक्त में उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे वह अपने कार्यकाल के दौरान पूरा न कर सके।

सरकार के पास मजबूत आधार, जनता की निजता पूरी निराधार, साइबर-मुजरिमों की चांदी

संपादकीय
27 सितंबर 2017


भारत में सरकार जिस तेजी से आधार कार्ड को अनिवार्य करते जा रही है, उसे देखकर यह हैरानी भी होती है कि क्या सचमुच ही देश के सुप्रीम कोर्ट में आधार की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिकाएं चल रही हैं, या फिर उनका निपटारा हो चुका है और सरकार को सारे हक दे दिए गए हैं? आज की ताजा खबर है कि आधार को हवाई सफर के लिए भी अनिवार्य किया जा रहा है, और हर किसी के मोबाइल फोन पर लगभग रोजाना ही ये संदेश आ रहे हैं कि आधार से जोड़े बिना किस तारीख से मोबाइल फोन काम करना बंद कर देंगे। अब जब पूरे देश को डिजिटल तकनीक से जोड़ा जा रहा है, और ऐसा कोई दिन नहीं है कि बैंक खातों और एटीएम की जालसाजी न हो, तब देश की साइबर-सुरक्षा को तौलने की जरूरत है। और देश की साइबर-सुरक्षा से हमारा मतलब सरकार के कम्प्यूटरों की साइबर-सुरक्षा नहीं, आम जनता के बैंक और दूसरे सरकारी कामकाज की सुरक्षा से है। आज तो विकीलीक्स के संस्थापक का यह संदेह डरावना लगता है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी की पहुंच भारत के आधार कार्ड से जुड़ी सारी जानकारियों तक है जिसमें लोगों के बायोमेट्रिक्स भी हैं, उनकी उंगलियों के निशान भी हैं। एक किस्म से यह डर भी लगता है कि आधार कार्ड से एक तरफ तो लोगों की निजता पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और दूसरी तरफ लोगों के बैंक और सरकारी रिकॉर्ड खतरे में आ गए हैं। एक तरफ आधार कार्ड, और दूसरी तरफ लगभग अनिवार्य हो चुके बैंक खातों को लेकर लोगों की कमसमझी की वजह से साइबर-जालसाज तरह-तरह से लोगों को लूट रहे हैं। ऐसे में लोगों की जानकारी मुजरिमों के हाथ एक बड़ा हथियार बन गई है।
कुछ समय पहले देश में एक बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखते हैं कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।
भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।
लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इक_ा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी। साइबर-मुजरिमों की बाकी कोशिशों के साथ-साथ अब आधार कार्ड से एक बड़ा खतरा देश की पूरी जनता पर ही आ गया है, और सरकार बिना इससे बचाव की तैयारी के इसे अधिक से अधिक अनिवार्य करते चल रही है।