रविशंकर प्रसाद की कही बातें और मुस्लिमों के जख्म हरे...

संपादकीय
22 अप्रैल 2017


देश में मुस्लिमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी नेताओं और उनके सहयोगी संगठनों के लोगों की कही बातों से पैदा होने वाली गलतफहमियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक तरफ जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने राज्य में कश्मीरी छात्रों पर बार-बार होने वाले हमलों को लेकर कड़ी कार्रवाई की बात कह रही हैं, और कश्मीरी बच्चों को अपना बच्चा कह रही हैं, तब दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद खुद होकर मुस्लिमों के बारे में एक ऐसी बात कह रहे हैं जिससे खुद उनकी कही हुई बात के खिलाफ माहौल बन रहा है। राजस्थान की बात का लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह कहा है कि कश्मीर के लोग देश के परिवार के लोग हैं, और उन्हें पूरी सुरक्षा दी जाएगी, लेकिन ऐसे माहौल में रविशंकर प्रसाद की कही हुई एक बात से मुस्लिमों का फिर भड़कना, और उनके जख्म फिर हरे हो जाना तय है। कांग्रेस के एक बड़े मुस्लिम नेता सलमान खुर्शीद, और मुस्लिम राजनीति करने वाले ओवैसी ने रविशंकर प्रसाद के बयान पर कड़ा हमला किया है।
कल रविशंकर प्रसाद ने एक कार्यक्रम में मंच से यह कह दिया कि मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट नहीं करते हैं, लेकिन भाजपा की सरकारें उन्हें पर्याप्त इज्जत देती हैं। उन्होंने कहा कि देश में भाजपा के 13 मुख्यमंत्री हैं, और देश पर भी भाजपा का राज है, लेकिन क्या कभी किसी नौकरीपेशा या व्यापार करने वाले सज्जन मुसलमान को प्रताडि़त किया गया है? रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े नामी वकील हैं, और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि उनकी कही बातें कम से कम तर्कसंगत और न्यायसंगत तो होनी ही चाहिए। लेकिन यहां पर वे चूक कर गए, और देश में आज घायल चल रही एक बिरादरी के बारे में उन्होंने गैरजिम्मेदारी की बात कही क्योंकि कोई वोट किसी को दे या न दे, निर्वाचित सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह सबके साथ बराबरी का बर्ताव करे, और ऐसा करना किसी बड़प्पन की बात नहीं है, यह संवैधानिक जिम्मेदारी की बात है, और इसे गिनाना एक ओछेपन की बात है। फिर जब कभी ऐसी बात गिनाई जाती है तो कहने वाले की नीयत पर एक शक भी होता है कि क्या जुबानी जमाखर्च के लिए ऐसी सफाई दी जा रही है?
आज हम देख रहे हैं कि कश्मीर में एक स्थानीय मुस्लिम नौजवान को थलसेना के सैनिकों ने किस तरह गाड़ी पर सामने बांधकर बहुत से गांवों से गुजारा ताकि वहां सेना पर होने वाले आम पथराव से गाडिय़ों के काफिले को बचाया जा सके। आज देश में समझ न रखने वाले कई लोग सेना की इस बात को यह कहकर सही ठहरा रहे हैं कि जब कश्मीर के बहुत से नौजवान रात-दिन सैनिकों पर पथराव करते हैं, तो उसके जवाब में सैनिकों का ऐसा करना क्या गलत है? इसमें बुनियादी तौर पर गलत यह है कि कश्मीरी पत्थरबाजों ने संविधान की शपथ नहीं ली है, और न ही वे सरकारी नियमों से बंधे हुए हैं, इसलिए उनका जुर्म करना एक आम मुजरिम की तरह है, और उसके लिए वे सजा के हकदार भी हैं। दूसरी तरफ जब सेना देश के कानून के खिलाफ, मानवाधिकार के खिलाफ, इंसानियत के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है, तो उससे पूरे लोकतंत्र की साख पर आंच आती है, सरकार की फजीहत होती है, और देश भर में जनता का भरोसा सेना पर से उठता है कि वह भी जुल्म और ज्यादती करने वाली एक फौज है। इसलिए जब आज देश में कहीं गाय के नाम पर किसी गौपालक मुस्लिम को सड़कों पर पीटकर मारा जा रहा है, कहीं मुस्लिम समाज के अपने धार्मिक नियमों के तहत प्रचलित तलाक की एक बुरी प्रथा को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, तो ऐसे नाजुक माहौल में सरकार को, सत्ता से जुड़े हुए लोगों को बहुत जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए, क्योंकि देश में अगर धार्मिक आधार पर लोगों को ऐसा लगने लगे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है, तो यह बहुत खतरनाक बात है।

आजादी का अधिकार बिना जिम्मेदारी नहीं

संपादकीय
21 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश की वाराणसी की खबर है कि जिला प्रशासन ने आदेश निकाला है कि वाट्सएप के ग्रुप में जो बातें उसके सदस्य पोस्ट करते हैं, उसके लिए ग्रुप के एडमिन जिम्मेदार होंगे। अभी यह एक अफसर का आदेश है और आगे चलकर इसे अदालतों में चुनौती भी मिलेगी, लेकिन तब तक उन लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए जो कि आज मुफ्त के इस संचार-औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं, जमकर कर रहे हैं।
लोगों को अपने समूह में मनचाही बातें करने, लिखने, और भेजने की आजादी तो है, लेकिन कोई भी आजादी कुछ जिम्मेदारियों के साथ ही आती है। बीती रात दिल्ली में एक स्कूली छात्र ने कार से सड़क किनारे सोए लोगों को कुचल डाला, एक की मौत हो गई, कई जख्मी हो गए। अब उसके परिवार के खिलाफ भी जुर्म दर्ज हो रहा है जिसके नाम कार थी? बिना ड्राइविंग लाइसेंस यह लड़का गाड़ी चला रहा था। एक गाड़ी कुछ शर्तों के साथ मिलती है, सड़क पर उसे चलाने के कुछ नियम रहते हैं, और कुछ बुनियादी जिम्मेदारियां भी रहती हैं। कार एक मशीनी औजार है जिसके इस्तेमाल का हक जिम्मेदारी की शर्तों के बिना नहीं मिलता। यह ठीक वैसा ही है कि पिस्तौल का लाइसेंस इस शर्त के साथ आता है कि कोई दूसरा उसे इस्तेमाल न करे, उसका बेजा इस्तेमाल न हो।
वाट्सएप जैसी संचार-सुविधा से आज पल भर में दुनिया भर में कोई वीडियो, कोई तस्वीर, या कोई लेखन फैलाया जा सकता है, और उसका विस्तार फिर बेकाबू हो जाता है। इसलिए ऐसे समूहों में जो पोस्ट होता है उसकी जिम्मेदारी किसी को तो लेनी ही होगी। कोई अपनी लाइसेंसी बंदूक चौराहे पर छोड़कर जिम्मेदारी से बच तो नहीं सकते। इसलिए सरकारों के भारत के बहुत कड़े आईटी कानून के तहत यह गारंटी करनी चाहिए कि ऐसे समूहों में पोस्ट होने वाली बातों के लिए उनके एडमिन को जवाबदेह और जिम्मेदार बनाया जाए। आज हिंदुस्तान में अचानक नफरत और बर्बादी पर भरोसा रखने वाले लोग रातों रात अभिव्यक्ति की एक ऐसी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिनकी सोच इस देश के कानून के ठीक खिलाफ है। नए औजार और नई तकनीक किसी को लोकतंत्र और इंसानियत को तबाह करने का हक नहीं दे देते। इसलिए देश के कानून को अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए। संचार साधनों पर एक बार किए गए पोस्ट का सुबूत जुटाना आसान रहता है, सरकारी एजेंसियां कुछ सौ लोगों को सजा दिला देंगी तो बाकी को भी सबक मिलेगा। आज सोशल मीडिया और ऐसे समूहों पर रात-दिन लोगों को हत्या और बलात्कार की धमकी दी जा रही है, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं।

जनता की नफरत की एक वजह, लालबत्ती खत्म...

संपादकीय
20 अप्रैल 2017


कल सुबह इसी वक्त जब हमने इसी जगह लिखा था कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लाल बत्तियां बंद करवा देनी चाहिए क्योंकि वे सत्ता को जनता से दूर कर रही हैं, तब ऐसी कोई चर्चा भी नहीं थी कि दोपहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में लाल बत्तियां खत्म करने जा रहे हैं। इस पहली मई, मजदूर दिवस से अंग्रेजी सामंतवाद का यह एक बोझ खत्म होने जा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से लगातार इस बात की वकालत कर रहे थे और हाल में कुछ मुख्यमंत्रियों ने ऐसा किया भी था। प्रधानमंत्री की इस पहल को सरकार में एक सादगी, किफायत और जनसेवा के रूप में देखते हुए देश की बाकी सरकारों को भी अपने-अपने स्तर पर तय करना चाहिए कि कौन सी बातें उन्हें जनता से दूर ले जाती हैं और उन बातों को खत्म करना चाहिए। कुछ दिन पहले जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचीं तो उन्हें लेने नरेन्द्र मोदी बिना सुरक्षा, बिना लालबत्ती, सादी गाड़ी में, बिना टै्रफिक रोके एयरपोर्ट गए थे, वह बात शायद इस फैसले का एक ट्रायल थी।
प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने राष्ट्रपति के संबोधन में महामहिम लिखना बंद करवाया, बाद में राज्यों के राज्यपालों को भी यह बात माननी पड़ी। राष्ट्रपति भवन से लेकर छत्तीसगढ़ के इक्कीसवीं सदी में बने राजभवन तक में कार्यक्रमों के लिए दरबार हॉल हैं। ऐसे सामंती नाम भी खत्म होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में दरबार शब्द महज व्यंग्य और गाली की तरह इस्तेमाल हो सकता है, किसी सम्मान के लिए नहीं। कुछ हफ्ते पहले हमने भारत की गर्मी और जनता के पैसों पर एयरकंडीशनिंग की चर्चा करते हुए लिखा था कि अंग्रेजों की छोड़ी गंदगी को भारतीय अदालतों में काले कोट और काले लबादों की शक्ल में ढोना बंद करना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी भारतीय आत्मगौरव दिखाते हुए अंग्रेजी पोशाक की ऐसी बंदिश फेंक देनी चाहिए जिसकी वजह से वकील और जज इंग्लैंड के मौसम में जीते हैं।
सत्ता के लोगों को सायरन, पायलट गाड़ी, और गाडिय़ों के काफिले भी खत्म करना चाहिए। जगह-जगह सत्ता के लिए जनता को चौराहों पर रोका जाता है और इससे सड़क पर कोई मरीजों की मौत भी हुई है, घायल भी अस्पताल नहीं पहुंच पाए। सत्ता को पता नहीं जनता की उस नफरत का अहसास होता है या नहीं जो फंसी हुई जनता के मन से निकलती है। छत्तीसगढ़ की जनता को याद है कि राजधानी के सांसद ने अपने ही शहर में बिना लालबत्ती या सायरन निकलने से मना कर दिया और सरकार पर दबाव डालने का सार्वजनिक बयान भी दिया था। अपने ही शहर में लोग सायकल से किस तरह सायरन तक पहुंचते हैं इसकी और भी बहुत सी मिसालें हैं। छत्तीसगढ़ का अकेला एयरपोर्ट राजधानी रायपुर में होने से बिलासपुर हाईकोर्ट के जज भी लालबत्ती, सायरन, और पायलट गाड़ी के साथ आते-जाते दिखते रहते हैं मानो एयरपोर्ट पहुंचते ही उन्हें फैसला सुनाने की हड़बड़ी हो। जब देश की बड़ी अदालतें ही अपने ऐसे अलोकतांत्रिक ताम-झाम का मोह नहीं छोड़ पातीं, तो उनके पास जाकर कौन गुहार लगा सकते हैं कि सरकार में सादगी लाई जाए।
सरकारों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तरों के खर्च में भी कटौती करनी चाहिए। इसके लिए हर राज्य को एक किफायत कमेटी बनानी चाहिए जो निजी कामों के लिए कर्मचारियों, गाडिय़ों, बिजली, और बाकी खर्च की सीमा तय करे। सत्ता को जनता के रूख को पहचानना चाहिए, जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों राज्यों में मौजूदा सरकारों को पलट दिया, इससे जनता की नाराजगी साफ दिखती है और कोई पार्टी या नेता इससे नहीं बच पाए। दीवारों पर लिखी इस बड़ी-बड़ी लिखावट को अनदेखा करना ठीक नहीं।
भारत की हिंदुस्तानी जुबान में लालबत्ती शब्द अच्छा नहीं रहा। लालबत्ती इलाका या रेड लाईट एरिया सबसे बुरे माने जाने वाले धंधों का रहा। इससे छुटकारा ही ठीक है। यह एक और बात है कि प्रधानमंत्री के हाथ पूरे देश के लिए नियम बदलना है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले दिन से ही लालबत्ती हटा दी थी। देर से ही सही, भारतीय सत्ता को बदनाम रेड लाईट छोडऩी चाहिए।

सरकारी अमले को मठाधीश जैसा नहीं जनसेवक बनना होगा

संपादकीय
19 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भयानक गर्मी के बीच हफ्तों चलने वाले अपने सालाना दौरे में अपनी अभूतपूर्व गर्मी दिखाई है। उन्होंने सरगुजा में दो कलेक्टरों को मौके पर ही बदलने की घोषणा की, और एक जिला पंचायत अध्यक्ष को भी हटा दिया। उनके ऐसे तेवर उनके पिछले तेरह-चौदह बरस में कभी नहीं दिखे थे और इससे राज्य के बाकी सरकारी अमले में एक सिहरन दौड़ जानी चाहिए। खुद मुख्यमंत्री के लिए यह मौका अभी नहीं तो कभी नहीं किस्म का है क्योंकि दो बरस बाद के चुनावों में जीत या हार कुछ हद तक कलेक्टरों की काबिलीयत पर भी टिकी रहेगी। कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदे हमेशा ही मुख्यमंत्री की निजी पसंद से भरे जाते हैं और छोटे से राज्य में मुख्यमंत्री की सीधी नजर भी इन ओहदों पर रहती है।
राज्य सरकार के ढांचे में वैसे तो जिलों के प्रभारी सचिव भी बनाए जाते हैं जो कि राज्य के बड़े अफसर होते हैं और कलेक्टरों के साथ संपर्क में रहते हैं। हर जिले का कोई न कोई प्रभारी मंत्री होता है जो कि आमतौर पर दूसरे जिले का होता है। हर कुछ कलेक्टरों के ऊपर एक संभागीय कमिश्नर होता है जिसे खुद भी कलेक्टरी का खासा तजुर्बा होता है। इनके अलावा जिले के पक्ष-विपक्ष के विधायक होते हैं जो कि सरकारी कामों पर नजर रखते हैं। शासन, प्रशासन और राजनीतिक निगरानी की इतनी सतहों के बाद भी अगर किसी जिले में काम खराब होता है तो वह फिक्र की बात है। इसलिए भी कि हर आईएएस अफसर का सपना एक अच्छी कलेक्टरी रहता है, और उसकी स्मृतियां भी कभी अपनी जिला-पोस्टिंग से परे नहीं रह पातीं।
लोकसुराज जैसा जनसंपर्क कार्यक्रम हो या कि मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टरों तक के जनदर्शन कार्यक्रम, इन सबमें भीड़ इस बात की भी सुबूत होती है कि शासन-प्रशासन में अपनी रोजाना की जिम्मेदारी ठीक से पूरी नहीं हो रही। और इस ठीक का ठीक होना आसान नहीं होता। इसके लिए मंत्रियों और अफसरों का जनसेवा के लिए समर्पित होना भी जरूरी होता है। और यह समर्पण सरकारी नियमों से या मंत्री पद की शपथ से नहीं आ जाता? इसके लिए लोकतंत्र और जनकल्याण की एक गहरी आस्था भी जरूरी होती है जिसकी बहुत कमी आज के अधिकतर नेताओं और अफसरों में दिखती है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों पर कोई तोहमत लगाना बेकार है।
छत्तीसगढ़ में सरकार को लीक से हटकर एक मौखिक पहल करने की जरूरत है। जिला कलेक्टरों का यह नाम तब तो ठीक था जब वे अंग्रेजी राज में टैक्स कलेक्ट करते थे, आज तो वे जितना कलेक्ट करते हैं, उससे अधिक खर्च करते हैं इसलिए यह नाम जाना चाहिए। कलेक्टरों को जिलाधीश भी कहा जाता है जो कि मठाधीश जैसा लगने वाला नाम है और यह नाम भी जाना चाहिए। अधिकारी शब्द की जगह सेवक शब्द आना चाहिए, जैसे कि जिला जनसेवक। जब तक कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक नहीं होगा तब तक सेवा की सोच नहीं आ पाएगी। इसके अलावा सरकार को मंत्रियों और अफसरों की गाडिय़ों से लाल-नीली बत्तियां भी हटानी चाहिए, सायरन और बत्तियां बददिमागी बढ़ाते हैं और मंत्री-अफसर जनता से कट जाते हैं। सरकार को फाइलों पर लगने वाले पदनाम लाल फीतों को भी बदलना चाहिए। लाल रंग ट्रैफिक को रोकने वाला होता है और लाल फीताशाही की सोच ऐसी ही रहती है। इसे बदलकर हरा रंग करना चाहिए ताकि फाइलें आगे बढ़ सकें। अफसरों और मंत्रियों का बुरा बर्ताव भी सख्ती से बंद करवाना चाहिए और आए दिन मीडिया में आने वाली खबरों पर पार्टी संगठन को भी ध्यान देना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक हैरतअंगेज ताकत के साथ काम करते हैं। उनकी मेहनत में कुछ और मौलिक सुधारों से अधिक असर आ सकता है। देश में जगह-जगह अलग-अलग मुख्यमंत्री सादगी और सुधार की बातें करते रहे हैं। आने वाला वक्त जनता की कड़ी कसौटी का है, छत्तीसगढ़ के सरकारी अमले को भी मठाधीश के बजाय जनसेवक बनना चाहिए। 

किसी भी धर्म को शोर और हल्ले की आजादी क्यों हो?

संपादकीय
18 अप्रैल 2017


फिल्म और टीवी कलाकार सोनू निगम ने एक नए विवाद को शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि सुबह-सुबह मस्जिद के अजान की आवाज लाउडस्पीकर पर आकर उनकी नींद खराब करती है। यह बात वैसे तो बहुत मासूम है लेकिन आज हिन्दुस्तान की हवा में इतनी सनसनी फैली हुई है कि लोग हर बात के पक्ष और विपक्ष में लाठी लेकर टूट पड़ते हैं। इनकी इस बात पर कई लोगों ने खूब हमला किया, कई तटस्थ लोगों ने याद दिलाया कि रात-रात भर दूसरे धर्मों के भजन और रतजगे का शोर भी झेलना पड़ता है। ऐसे माहौल के बीच में लोगों को ठीक उसी तरह हाथ साफ करने का मौका मिलता है जिस तरह सड़क पर किसी की पिटाई होती रहे तो आते-जाते तमाम राहगीर दो-दो हाथ लगाते चलते हैं।
सोनू निगम ने न तो कोई गलत बात कही क्योंकि सदियों पहले कबीर इसी बात को तब कह गए थे जब लाउडस्पीकर बना भी नहीं था, और उन्होंने कहा था कि मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला इस तरह बांग देता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। यह बात कहने का हौसला उन्हीं का था, और आज हिन्दुस्तान में यह बात कहना आसान नहीं है। और तब से लेकर अब तक धीरे-धीरे लाउडस्पीकर बढ़ते चले गए, और मस्जिदों से परे भी मंदिर, गुरुद्वारे, और धार्मिक जलसों पर घर-घर से धार्मिक संगीत निकलकर मीलों तक फैलने लगा। अब जैसे-जैसे आबादी घनी होती चली गई यह शोर परेशान करने लगा और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी धार्मिक या किसी भी तरह के शोरगुल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म दिए हुए हैं। यह एक अलग बात है कि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हाल परिवार के उस बुजुर्ग सयाने की तरह का होकर रह गया है जो कि बोलता बहुत अच्छी बातें है, लेकिन परिवार में उसकी बात सुनता-मानता कोई नहीं है।
हमारा ख्याल है कि किसी एक धर्म की चर्चा किए बिना, पूरे देश से सभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर को हटा देना चाहिए, और दूसरी बात यह भी है कि ऐसे लाउडस्पीकर पर सरकार एक नियम बनाकर लाइसेंस भी लागू कर सकती है कि उसका इस्तेमाल करने के पहले अगर इजाजत न ली गई, तो कितना बड़ा जुर्माना हो सकता है, और कितनी कड़ी कैद हो सकती है। फिर यह जुर्माना और कैद न सिर्फ लाउडस्पीकर किराए पर चलाने वाले लोगों के लिए हो, बल्कि उन लोगों के लिए भी हो जो कि धर्मस्थलों के प्रभारी हैं, या जिनके घरों पर इनको लगाया जाता है। यह एक खतरनाक नौबत है कि दूसरों का जीना हराम करते हुए धर्म के नाम पर, या कि किसी और नाम पर इस तरह का कोलाहल किया जाता है कि बीमार तो बीमार, पढऩे वाले बच्चे तक थककर आत्महत्या की कगार पहुंच जाते हैं। भारत में जितना शोर है, उतना शायद ही किसी और देश में देखने मिलता होगा, और धर्म से आगे बढ़कर अब यह शादियों में, निजी कार्यक्रमों में भी इस हद तक देखने मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अपने ही आदेशों को लेकर शर्म से डूब मरें कि उनकी कोई सुनवाई इस देश की सरकारों में नहीं रह गई है।

अफसोस कि वे हुए ही क्यों?

आजकल
17 अप्रैल 2017
अभी दो दिन पहले डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जन्मतिथि आई, तो अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग नेताओं ने उसे अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया। बौद्ध समाज के लोग अंबेडकर के अनुयायियों में सबसे अधिक हैं, और उनके लिए भी यह दिन गौरव का एक दिन रहता है, और उन पर होती ज्यादतियों के खिलाफ यह दिन प्रतिरोध की एकजुटता का भी रहता है। लेकिन इन सबसे परे जो कुछ बातें इस बरस चर्चा में आईं उनमें से एक यह कि राजस्थान में इस मौके पर अंबेडकर प्रतिमा को सार्वजनिक रूप से बाल्टी भर दूध से नहलाया गया।
दूध से किसी प्रतिमा को नहलाने का एक मतलब यह भी होता है कि उतने दूध को बर्बाद करना। और फिर यह स्विटजरलैंड तो है नहीं जहां पर कि दूध इतना अधिक होता है कि उसे चॉकलेट बनाकर, मक्खन बनाकर पूरी दुनिया में बेचना पड़े, यह तो वह देश है जिसमें दसियों करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और जहां के बच्चों को दूध-मक्खन महज कृष्ण की कहानियों में नसीब होता है। ऐसे में दलित गरीबों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमा को दूध से धोना उसी हिन्दू-रिवाज का एक सिलसिला है जिसके कि खिलाफ अंबेडकर ने बगावत की, और दलितों को उस हिन्दू धर्म से बाहर निकालकर बौद्ध बनाया, और सम्मान की, समानता की एक जिंदगी दिलवाई।
लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें रीति-रिवाज इस तरह हावी हो जाते हों। एक पुरानी मिसाल कबीर की है जिन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के ढकोसलों के खिलाफ एक दमदार बगावत की, सारे पाखंडों को चकनाचूर करने का साहस दिखाया, और उसके बाद आज उन्हीं के नाम का मूर्तिकरण करके, उनको उपासना का केन्द्र बनाकर, उनको सजाकर-बिठाकर एक ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया गया है जिसके खिलाफ कबीर हमेशा रहे।
कुछ ऐसा ही हाल गांधी का किया गया, और गांधी के नाम पर पलने वाले, गांधी के नाम की खाने वाले कांग्रेसियों ने भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड कायम किए, गांधी की सादगी को घूरे पर फेंक दिया, और गांधी के नामलेवा भी बने रहे। गांधी से सबसे दूर जाने वाले ऐसे कांग्रेसियों ने गांधी की प्रतिमाएं तो खूब बनवा दीं, लेकिन गांधी की इज्जत घटा दी। जिन लोगों ने गांधी के काम को नहीं जाना है, और जो लोग ऐसी ही गांधी-संतानों को देखकर गांधी के बारे में अंदाज लगाते हैं, उनकी नजर में गांधी की इज्जत जरूरत से बहुत कम रह गई है। लेकिन गांधी के साथ यह ज्यादती महज कांग्रेसियों ने नहीं की है, उन लोगों ने भी की है जो कि गांधी के हत्यारों के हमकदम रहे, हमख्याल रहे, और हमदर्द रहे। उन लोगों ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए अपनी दीवारों पर गांधी को टांग लिया, गांधी का नाम लिया, और इससे जितना फायदा पा सकते थे, उतना फायदा पा लिया, पा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही भगत सिंह के साथ किया गया, उसकी शहादत, उसकी बहादुरी, उसकी समझ, और उसकी इंसानियत इन सबको कुचलकर उसके ऊपर उसकी प्रतिमाएं जगह-जगह खड़ी कर दी गईं, और भगत सिंह की बातों को सोच-समझकर साजिश के तहत खत्म करने की कोशिश की गई। भगत सिंह ने अपने आपको जिंदगी भर एक नास्तिक कहा, एक नास्तिक की जिंदगी जीते रहे, और जमकर लिखा कि वे नास्तिक क्यों हैं। लेकिन आज उनकी प्रतिमा पर अंग्रेजी टोपी लगे, या कि सिक्ख पगड़ी लगे, इसे लेकर शास्त्रार्थ चलता है, बहस होती है, और उन लोगों के बीच होती है, जिनको भगत सिंह के सिद्धांतों और उनके मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी तरफ यह भी होता है कि जिस शहर में मैं रहता हूं, वहां पर जब भगत सिंह की याद में जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर कोई सार्वजनिक कार्यक्रम होता है तो सड़क किनारे या चौराहे पर होते हुए कार्यक्रम में भी अधिकतर लोग सिक्ख ही रहते हैं, बाकी लोगों को मानो हिन्दुस्तान की आजादी अब तक मिली नहीं है, और उन्हें भगत सिंह की शहादत से कोई फायदा हुआ नहीं है। जो राजनीतिक दल भगत सिंह के घोषित वामपंथ के ठीक खिलाफ हैं, वे राजनीतिक दल भी भगत सिंह की शोहरत को दुहने में जुट गए, और अब तो साम्प्रदायिक ताकतें भी मानो भगत सिंह की सबसे बड़ी भक्त हो गई हैं।
कुछ ऐसा ही अंबेडकर के साथ हो रहा है जिनकी याद में महाराष्ट्र के विदर्भ में हर गांव, हर मुहल्ले में अंबेडकर की प्रतिमाएं दिखती हैं, और कई जगह तो उनके मंदिर भी दिखते हैं। मंदिरों की जिस सोच के खिलाफ अंबेडकर ने हिन्दू समाज के भीतर बगावत की, उन्हीं मंदिरों के ढांचे बनाकर अंबेडकर को बिठा दिया जा रहा है, उनकी प्रतिमाओं को बनाकर मानो इस बात को काफी मान लिया जा रहा है कि अंबेडकर के संघर्ष का पूरा सम्मान हो गया। और अब रही-सही कसर पूरी करने के लिए उनकी प्रतिमाओं को दूध से धोया जा रहा है, और हो सकता है कि अधिक वक्त न लगे कि आसपास तुलसी और गंगाजल का इस्तेमाल भी होने लगे।
जिन लोगों को शिर्डी के सांई बाबा की जिंदगी की थोड़ी जानकारी, वे भी जानते हैं कि सांई बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम थे यह भी किसी को नहीं पता था, और वे जिंदगी भर किसी पेड़ के नीचे या किसी सार्वजनिक जगह पर पड़े रहे। लेकिन आज शिर्डी में उनके साथ यह हुआ कि उनकी प्रतिमा से लेकर वहां की उपासना तक, इन सबका इस कदर हिन्दूकरण कर दिया गया है कि वहां पहुंचकर किसी दूसरे धर्म के लोगों को असुविधा लगने लगे। और न सिर्फ शिर्डी में, देश भर में भी जगह-जगह उनके मंदिर बनाए गए, जो अपने आपमें एक हिन्दू प्रतीक हैं, भीतर उनकी प्रतिमा बनाई गई, जो कि जाहिर तौर पर इस्लाम के तहत बुतपरस्ती में आती है, और भीतर आरती, माला, दिया, और इस तरह के दूसरे हिन्दू प्रतीकों से उन्हें घेर दिया गया। हिन्दू और मुस्लिम एकता का एक बड़ा प्रतीक धीरे-धीरे एक भगवाकरण का कैदी होते चले गया, और हो सकता है कि कुछ अरसे बाद मुस्लिमों को यह लगने लगे कि सांई बाबा तो हिन्दुओं के ही थे।
आज जरा देर के लिए यह सोचें कि अगर कबीर, गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, या कि सांई बाबा कहीं पर होंगे, और वे उनकी आज इस्तेमाल हो रही स्मृतियों के बारे में सोचेंगे, तो हक्का-बक्का रह जाएंगे कि वे कहां फंस गए हैं। इनमें से हर कोई अपने आज के भक्तों के घेरे से निकलकर भागने को उतारू दिखेंगे, और शायद यह अफसोस भी करने लगेंगे कि वे हुए ही क्यों?

आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है...

संपादकीय
17 अप्रैल 2017


देश में आज अचानक मुस्लिमों के तीन तलाक का मामला बहुत जोर पकड़ता दिख रहा है। उत्तरप्रदेश में, जहां कि देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, वहां पर भाजपा को जितनी बड़ी जीत मिली है उसे देखते हुए भाजपा बहुत उत्साह में है, और चुनाव के पहले उसने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की बेइंसाफी से बचाने के लिए जो चुनावी वायदा किया था, अब उसे पूरा करने में उसके ऊपर किसी वायदाखिलाफी की बात भी नहीं आ सकती, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इस चुनाव में भाजपा को मुस्लिम-बहुल इलाकों से भी जो अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बहुमत मिला है, वह मुस्लिम महिलाओं का है। हम इस बात पर कोई भरोसा नहीं करते कि उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत ईवीएम की दिलवाई हुई है, क्योंकि अगर ऐसा मुमकिन होता तो भाजपा बाकी राज्यों में अपने मुख्यमंत्री क्यों खोती, पंजाब में अपनी ऐसी दुर्गति क्यों करवाती? इसलिए मोदी के विरोधियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि कौन सी बातों ने भाजपा को इतना जनमत दिलाया है।
हमारा मानना है कि मुस्लिम समाज को एक वोट बैंक मानकर चलना एक घिसीपिटी सोच है जो कि सच नहीं है। और खासकर तब जब मुस्लिम महिला के हक का मामला, और मुस्लिम आदमी की धाक का मामला आमने-सामने हो। इस देश में मुस्लिम महिला को उसका पति तीन बार तलाक कहकर छोड़ सकता है, और मुस्लिम समाज के जो धार्मिक ठेकेदार हैं, वे अपने लोगों, खासकर अपने मर्दों की इस तानाशाही को घटाने को तैयार नहीं हैं, और इक्कीसवीं सदी में आकर भी वे गुफा की तरह जीना चाहते हैं। ऐसे में जब भाजपा से मुस्लिम महिलाओं को यह उम्मीद दिखी कि वह ऐसे अमानवीय तलाक से उसे आजादी दिला सकती है, तो उन्होंने भाजपा को वोट दिया। बाकी राज्यों में मुस्लिम आबादी इतनी बड़ी नहीं थी कि वहां भाजपा को इसका कोई फायदा मिलता।
आज बाकी पार्टियों को भी यह समझने की जरूरत है कि कोई पहल अगर हिन्दुत्व वाली भाजपा कर रही है, तो उसका मतलब यह नहीं कि बाकी पार्टियां उसका विरोध करने लगें। अगर कोई मुद्दा सही है, तो आज भाजपा की तरह बाकी पार्टियों को भी खुलकर सामने आना पड़ेगा, और मुस्लिम महिला का साथ देना पड़ेगा। इस बात का कोई न्यायसंगत तर्क नहीं हो सकता कि मुस्लिम मर्द अपनी पत्नियों को अमानवीय हालत में रखते रहें, और अल्पसंख्यक नाराज न हों, इसलिए बाकी पार्टियां चुप बैठी रहें। वामपंथी हों या कांग्रेसी, उन्हें यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यक तो मुस्लिम महिला भी है, और वह मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा भी है, अगर उसे अपने साथ सदियों से चले आ रहे जुल्म से छुटकारा पाने का एक रास्ता दिखेगा तो वह उस तरफ जाएगी ही जाएगी।
कांग्रेस का पुराना इतिहास बहुत ही खराब रहा है, और विदेश में पढ़े हुए, पायलट रहे हुए, एक नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जिस तरह अपने ऐतिहासिक संसदीय-बाहुबल से एक अकेली शाहबानो का गला घोंट दिया था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में संविधान संशोधन करवा दिया था, आज दिन उसका ठीक उल्टा दिख रहा है। आज अपने ऐतिहासिक बहुमत, और हैरान करने वाली लोकप्रियता के बीच नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी अगर तीन तलाक जैसी दकियानूसी बात से मुस्लिम महिला को आजाद कर सकते हैं, तो देश की महिलाएं, न सिर्फ मुस्लिम महिलाएं, बल्कि बाकी महिलाएं भी उनके साथ रहेंगी, और लोग आज इस साफगोई को पसंद कर रहे हैं कि जो कहा सो किया। आज बाकी राजनीतिक दलों को और सामाजिक संगठनों को मुस्लिम महिला का साथ देते हुए खुलकर सामने आना चाहिए। आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है। 

आतंक की फंडिंग और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वालों का धर्म

संपादकीय
16 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कल कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनके बारे में पुलिस ने कहा कि ये लोग कश्मीर के आतंकियों के लिए आने वाली पैसों के खाते सम्हालते थे, और इनके खातों में बाहर से बड़ी रकम आती थी, और ये लोग उन्हें आतंकियों तक पहुंचाने का काम करते थे। पुलिस ने यह बात गिरफ्तार लोगों के बयानों की बुनियाद पर कही है, और बैंकों के खातों की जानकारी भी निकाल ली है। पुलिस का यह भी कहना है कि छत्तीसगढ़ के ही कुछ और लोग इसी आतंक-फंडिंग के जुर्म में फरार हैं, और उनकी तलाश की जा रही है। कश्मीर में ये लोग आतंकियों तक पैसा पहुंचाने के लिए जिन लोगों तक रकम पहुंचाते थे, उनमें से दो लोगों के नाम सामने आए हैं, और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे के सारे नाम हिन्दू नाम हैं, और इनके बारे में पुलिस ने बताया है कि ये लोग पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी का काम करते थे।
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही मध्यप्रदेश की पुलिस ने वहां के एक भाजपा पदाधिकारी सहित कुछ दूसरे लोगों को गिरफ्तार किया कि वे लोग पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी कर रहे थे। इसमें भाजपा का जो पदाधिकारी पकड़ाया था, उसकी तस्वीरें भी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उसके फेसबुक पेज पर सजी हुई थीं। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है, और ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि यहां की पुलिस हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने और आतंकियों तक पैसे पहुंचाने का झूठा आरोप लगाकर उनके खिलाफ झूठे केस बनाएगी। और ये सारे नाम हैरान करने वाले भी हैं, क्योंकि अगर ये नाम मुस्लिमों के होते तो उन्हें गद्दार कहते हुए उन्हें फांसी देने, चौराहों पर पत्थरों से मारने, और पाकिस्तान भेज देने जैसी मांग उठने लगती। अब चूंकि भाजपा की पुलिस ने ही इन्हें गिरफ्तार किया है, इसलिए ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ पाकिस्तानपरस्त होने की बात भी नहीं उठ रही है।
लोगों को यह समझना चाहिए कि धार्मिक कट्टरता और आतंक के लोग किसी मजहब से जुड़े हो सकते हैं, किसी धर्म से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि वे उस आतंक के पैसों के हाथ बिके हुए हों जो कि किसी दूसरे धर्म का है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ये मामले इसी बात का सुबूत हैं, और इन दोनों ही राज्यों में इतने लंबे समय से भाजपा की सरकारें चली आ रही हैं कि ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ कोई झूठे सुबूत गढऩे का वक्त भी इन बरसों में किसी को नहीं मिला होगा, न ही किसी को सूझा होगा, और न ही इन सुबूतों में कोई कमी दिख रही। इस बात पर चर्चा आज इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया सहित भारतीय राजनीति में बहुत से लोग लगातार एक सवाल उठाते हैं कि जहां कहीं आतंकी हमला होता है, वहां पर उसमें कोई मुस्लिम शामिल क्यों पाया जाता है। हमारे इन दो राज्यों से परे भी देश में जगह-जगह भाजपा की सरकारों वाले राज्यों में ऐसे अनगिनत हिन्दू गिरफ्तार हुए हैं जो कि तरह-तरह के आतंक में लगे हुए थे। कर्नाटक में जब भाजपा की सरकार थी, वहां पर पाकिस्तान के झंडे फहराकर साम्प्रदायिक दंगा करवाने की कोशिश में कुछ हिन्दुओं को, और हिन्दू संगठनों के सक्रिय लोगों को भाजपा की ही पुलिस ने गिरफ्तार किया था जिन पर अभी मुकदमा चल ही रहा है। अभी-अभी राजस्थान का एक फैसला आया है जिसमें अजमेर दरगाह पर बम विस्फोट करने के जुर्म में कुछ लोगों को सजा हुई है, और ये तमाम हिन्दू लोग निकले हैं, और अदालत के बाहर की जो तस्वीरें आई हैं उनमें वे भगवा पहने हुए भी दिख रहे हैं, माथे पर तिलक लगाए हुए भी दिख रहे हैं।
इसलिए विविधताओं से भरे हुए इस देश में किसी धर्म या किसी जाति, किसी क्षेत्र या किसी भाषा के लोगों को किसी पूर्वाग्रह के साथ देखना और दिखाना ठीक नहीं है। और यह भी समझने की जरूरत है कि लगातार हिन्दू संगठनों में सक्रिय रहने वाले लोग भी मुस्लिम आतंकी संगठनों, मुस्लिम देश की आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसी के हाथों कैसे बिक जाते हैं, और यह भी समझने की जरूरत है कि इनमें से कोई भी भूख से मरते हुए हिन्दू नहीं थे कि जिनके सामने जिंदा रहने के लिए जासूसी करना या आतंक का साथ देना जरूरी रहा हो। इसी सिलसिले में एक आखिरी बात यह कि जो लोग सोशल मीडिया पर हिंसक बातों को करने के लिए रात-दिन सक्रिय रहते हैं, वे लोग अपने धर्म के लोगों की गिरफ्तारी के बाद जुबान क्यों सिल लेते हैं?

स्मृति अवकाशों की समाप्ति की योगी की राय सही

संपादकीय
15 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंबेडकर जयंती के एक समारोह में कहा कि महान लोगों के जन्मदिन पर स्कूलों में होने वाली छुट्टियों को खत्म करना चाहिए क्योंकि ऐसी छुट्टियां इतनी बढ़ती जा रही हैं कि साल में कुल सवा सौ दिन पढ़ाई हो पाती है, जबकि सरकारी लक्ष्य सवा दो सौ दिनों का है। योगी की और कई बातों से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यह एक बात उन्होंने पते की की है जिससे स्कूलों की हालत सुधर भी सकती है। आज तो गुजर चुके महान लोगों का सम्मान करने के नाम पर कहीं चबूतरों पर उनकी प्रतिमाएं खड़ी कर दी जाती हैं, जिनमें जनता का पैसा लगता है, तो कहीं पर उनके जन्मदिन पर या पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज बंद रहते हैं, और कुछ तारीखें ऐसी भी रहती हैं जिनमें सरकारी दफ्तर भी बंद रहते हैं। यह सिलसिला खत्म करना बहुत जरूरी इसलिए है कि ऐसे दिनों पर छुट्टी से इन महान लोगों के सम्मान बढऩे का, या कि उन्हें याद करने का कोई काम नहीं होता बल्कि लोग ऐसे तमाम काम करने लगते हैं जो उजागर हो जाएं तो महान लोगों का अपमान होने लगे। फिर स्कूल और कॉलेज को धार्मिक, राजनीतिक, और जातिगत वजहों से शुरू की गई ऐसी छुट्टियों से आजाद रखना चाहिए, और ऐसी बातों को उनकी किताबों से भी बाहर रखना चाहिए। ऐसा न होने पर सत्ता में आई राजनीतिक पार्टी अपनी मर्जी से पढ़ाई के दिन घटाती जाएगी, और किताबों को ऐसे पाठों से लादती जाएगी।
दरअसल भारत में स्कूली पढ़ाई को, स्कूलों को, और स्कूली किताबों को तय करने का काम शिक्षा के जानकार लोगों के बजाय सत्तारूढ़ नेता और सत्ता चला रहे अफसर करते हैं। न तो इनके पास शिक्षा की जरूरतों की समझ होती, और न ही बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी होती। ऐसे में आए दिन यह भी देखने मिलता है कि कोई भी अफसर अपनी मर्जी से स्कूली बच्चों के जुलूस निकालकर उन्हें जानवरों के रेवड़ की तरह हांकने का काम करने लगते हैं, किसी भी मंत्री-मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में स्कूलों से निकालकर बच्चों को झोंक दिया जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में प्रौढ़ साक्षरता का इम्तिहान चल रहा था, और परीक्षा दे रही महिलाओं को वहां से निकालकर किसी मंत्री के कार्यक्रम में भेज दिया गया था।
किसी भी महान व्यक्ति की स्मृति में उनके जन्मदिन या उनकी पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज में बच्चों के बीच दस-पन्द्रह मिनट का कोई भाषण हो सकता है जिससे कि उन्हें जानकारी मिल जाए। छुट्टी से न किसी की जानकारी में कोई इजाफा होता, और न ही कोई सम्मान बढ़ता। सम्मान करने के नाम पर उत्पादकता को खत्म करने का सिलसिला पूरी तरह गलत है। और हम इस बात को पढ़ाई को बढ़ाने के लिए नहीं कह रहे, स्कूलों में पढ़ाई कितनी हो, खेलकूद कितना हो, और बाकी काम कितने हों, इसे तय करना विशेषज्ञों का जिम्मा होना चाहिए। हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि स्कूलों में जाने के दिन बढऩे चाहिए, और स्मृति-अवकाश का सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। इस देश में स्थानीय परंपराओं के मुताबिक त्यौहार, और स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे दो मौके काफी हैं, इनसे परे की छुट्टियां खत्म होनी चाहिए।

दुनिया के सबसे बड़े वर्दीधारी गुंडे ने गिराया सबसे बड़ा बम

संपादकीय
14 अप्रैल 2017


कल रात अफगानिस्तान-पाकिस्तान सरहद पर अफगानिस्तान की जमीन पर आईएस के अड्डे पर अमरीका ने एक बड़ा बम गिराया जिसे वह दुनिया के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा गैरपरमाणु बम कह रहा है। करीब दस हजार किलो वजन का यह बम अमरीकी फौज ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और युद्धोन्मादी, नफरतजीवी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने अपनी फौज को खुली छूट दी है कि वे दुनिया में अलग-अलग जगहों पर तैनात अमरीकी फौज की कार्रवाई खुद तय करें। इस बम ने दुनिया को हैरान इसलिए किया है कि ट्रंप या अमरीका ने पिछले कई महीनों में अफगानिस्तान में आईएस की ऐसी मौजूदगी की कोई बात नहीं कही थी कि उसकी वजह से अफगान गांवों के इस इलाके में ऐसी बड़ी कार्रवाई की जाए। अभी इस बम को चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं, और वहां की जमीनी हालत अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के रूख से यह समझ पड़ता है कि इतना हमलावर कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति आज तक आया नहीं होगा। अभी चार दिन ही हुए हैं जब चीनी राष्ट्रपति से बात करते हुए, केक खाते हुए ट्रंप ने सीरिया पर पांच दर्जन बड़े मिसाइल गिराए थे, और यह दावा था कि सीरिया अपने लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी तरफ सीरिया के राष्ट्रपति असद ने खुलकर कहा है कि ऐसे किसी रासायनिक हथियार के बारे में सीरिया को मालूम भी नहीं है और शायद यह गढ़े हुए सुबूतों के आधार पर किया गया अमरीकी हमला है। लोगों को याद होगा कि अमरीका ने जब इराक पर हमला किया था, तब भी राष्ट्रपति बुश ने यह झूठा दावा किया था कि उसके पास इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के हथियार हैं, और बाद में इराक को तबाह करके भी ऐसा कोई सुबूत न अमरीका को मिला, न दुनिया के सामने आया, और अमरीकी दावा झूठा साबित हुआ।
दूसरी बात यह कि दुनिया से अगर अलकायदा या आईएस जैसे धर्मान्ध और कट्टर आतंकियों को खत्म करना है, तो उसके लिए साथ में बेकसूरों को मारने की एक सीमा होनी चाहिए। सीरिया में जिस जगह मिसाइलें गिराई गईं, वहां पर कितने लोगों की मौत हुई यह अभी सामने भी नहीं आया है, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में जहां यह बम गिराया गया है, वहां अमरीकी फौजों की पहुंच थी, और उसके बावजूद इतनी व्यापक तबाही करने वाले बम को गिराने की कौन सी मिलिट्री मजबूरी थी, यह भी साफ नहीं है। लोगों का मानना है कि जब खुद अमरीका कह रहा है कि सात-आठ सौ लोग ही आईएस में रह गए हैं, तब उनमें से कुछ दर्जन लोगों को मारने के लिए इतनी तबाही वाले बम को गिराना एक अंतरराष्ट्रीय गैरजिम्मेदारी की बात है। किसी भी कार्रवाई के अनुपात का भी न्यायोचित होना जरूरी रहता है, और अमरीका हमेशा से पूरी दुनिया पर ऐसे मनचाहे और अनचाहे हमले करते आया है जो कि नाजायज अधिक रहे हैं, गैरजरूरी अधिक रहे हैं, बदनीयत अधिक रहे हैं।
हिन्दुस्तान के एक जासूसी उपन्यास के नाम की तरह आज अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा वर्दीधारी गुंडा हो गया है। फिर ऐसे हमलावर देश में आज ट्रंप नाम का एक ऐसा राष्ट्रपति आ गया है जो कि दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ धकेल रहा है। अफगानिस्तान आज इस हालत में भी नहीं है कि वह अमरीकी फौजी कार्रवाई का कोई विरोध करे, और अभी तो यह भी साफ नहीं है कि वह इसके खिलाफ है या नहीं। दूसरी तरफ कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि अफगानिस्तान के एक कम बसाहट के इस कथित आतंकी-ठिकाने पर अमरीकी बमबारी का एक दूसरा मकसद है कि वह उत्तरी कोरिया के तानाशाह की परमाणु युद्ध की हसरतों को एक चेतावनी देना चाहता है। उसने अपने जंगी जहाज उत्तर कोरिया के आसपास तैनात कर दिए हैं, और जिस तरह उसने अपने जहाज से सीरिया पर मिसाइलें गिराई थीं, अपनी वायुसेना से अफगानिस्तान पर बम गिराया है, हो सकता है कि यह उत्तर कोरिया को एक चेतावनी हो। फिलहाल पाकिस्तान को भी इसे एक चेतावनी मानना चाहिए क्योंकि अफगानिस्तान के बहुत से लोगों ने कहा है कि यह बम तो पाकिस्तान पर गिराना चाहिए था जहां से आईएस आतंकी अफगानिस्तान भेजे जा रहे हैं।

संसद में संस्कृति मंत्री का सीता पर बयान महत्वपूर्ण

संपादकीय
13 अप्रैल 2017


संसद में मोदी सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने भाजपा के ही एक सदस्य के सवाल के जवाब में कहा कि बिहार की सीतामढ़ी में सीता की जन्मस्थली का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने कि सीता की जन्मस्थली आस्था का विषय है जो प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। इस मुद्दे पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित बहुत से सांसद चढ़ बैठे और मंत्री से माफी की मांग की।
भाजपा के सदस्य और मोदी सरकार के मंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश के कई हिस्सों में आस्था और प्रमाण का झगड़ा चल रहा है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार अयोध्या में राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाते आई है, और अयोध्या से दूर, रामकथा की लंका में भी जाने के रास्ते पर रामसेतु का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। राम जन्मभूमि का मुद्दा हिन्दू और मुस्लिम, दो समुदायों के बीच उस जमीन पर हक की लड़ाई है जो कि हिन्दुओं के मुताबिक राम जन्मभूमि है, और मुस्लिमों के मुताबिक बाबरी मस्जिद। लेकिन रामसेतु का मामला भारत सरकार और हिन्दू संगठनों के बीच की कानूनी लड़ाई है, जिसमें भारत से श्रीलंका के बीच के समंदर के पानी के नीचे डूबे हुए एक ढांचे को हिन्दू संगठन राम की सेना का बनाया हुआ पुल बताते हैं, और भारत सरकार ने उसे एक प्राकृतिक ढांचा बताया था। अब मोदी सरकार के आने के बाद हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रूख कुछ बदला हो।
विपक्ष में रहते हुए भाजपा का रूख राम जन्मभूमि पर जो था, अब सरकार में आने के बाद वह रूख चुप बैठा हुआ है, और सीता जन्मभूमि को लेकर सरकार का जवाब यह साफ करता है कि जब प्रमाण की बात आती है, तो आस्थाओं के कोई प्रमाण नहीं होते हैं। संसद से लेकर अदालत तक केन्द्र सरकार का यह रूख जगह-जगह काम आएगा, इस्तेमाल किया जाएगा, हालांकि मंत्री ने यह साफ किया है कि आस्था प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करती। लोकतंत्र में कई बार यह देखने में आता है कि विपक्ष में रहते हुए किसी पार्टी का जो भी रूख रहता हो, सत्ता में आने के बाद सत्ता की जिम्मेदारियां कुछ फेरबदल जरूर ला देती हैं। अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही देखें, उन्होंने सरकार सम्हालने के बाद से गैरजिम्मेदारी की वैसी कोई बातें नहीं कही हैं जो कि बरसों से उनकी पहचान बनी हुई थीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखें तो सत्ता में आने के पहले तक वे लगातार दिन में कई बार चुनावी सभाओं में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भारत में बिरयानी खिलाने को लेकर हमला करते थे, और एक-एक हिन्दुस्तानी सैनिक की मौत पर दर्जन भर पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने का दावा करते थे। लेकिन सत्ता में उन्हें सियासती हकीकत सिखाई, और वे खुद बिना बुलाए जाकर नवाज शरीफ के घर पर सालगिरह और शादी की मिठाई खाकर आ गए।
हम रूख के ऐसे बदलाव को लेकर ताना कसने के खिलाफ हैं, और हम पुराने बयानों की याद दिलाकर यह उलाहना भी देना नहीं चाहते कि उस वक्त के वायदे के मुताबिक अब हिंसा क्यों नहीं की जाती, अब हमला क्यों नहीं किया जाता। सोच में ऐसा फर्क कोई बुरी बात नहीं है, अगर यह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते, और इंसाफ के भले के लिए हो। हमारा ख्याल है कि संसद में संस्कृति मंत्री का आस्था और प्रमाण को लेकर दिया गया बयान अदालत में भी उन लोगों के काम आएगा जिन पर आस्था के नाम पर अब तक हमले होते रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि लोकतंत्र में कभी भी आस्था प्रमाणों पर हावी नहीं हो सकती, और आस्था को उन प्रमाणों का विकल्प नहीं माना जा सकता जो कि मौजूद नहीं है। राम जन्मभूमि एक ऐसा ही विवाद है, और इसे भी ऐसी ही सोच के साथ निपटाने की जरूरत है। संस्कृति मंत्री के बयान के दो तरह के मतलब निकाले जा सकते हैं, और हम इसमें से वह मतलब निकाल रहे हैं जो कि लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में जाता है।

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच मौत की एक सजा का तनाव और

संपादकीय
12 अप्रैल 2017


भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया है, वहां पर गिरफ्तार किए गए भारत के एक रिटायर्ड नौसेना अफसर को भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने के आरोप में वहां की एक फौजी अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। पाकिस्तान का कहना है कि कुलभूषण नाम का यह भारतीय वहां पर जासूसी कर रहा था, और पिछले बरसों में कुलभूषण के कुछ ऐसे वीडियो भी पाकिस्तान में जारी किए थे जिसमें वह इस काम का जुर्म मानते हुए दिखाई देता है।
भारत की संसद इस मुद्दे को लेकर उबल पड़ी है, और सत्ता पक्ष और विपक्ष में इस पर एकता का हाल यह है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कांग्रेस पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े जानकार शशि थरूर से भारत के विरोध-प्रस्ताव को तैयार करने का अनुरोध किया है। भारत के किसी व्यक्ति को पाकिस्तान में मौत की सजा हो, तो भारत के लोगों का उबलना स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह उबलना जायज भी है, इस बारे में सोचने की जरूरत है। भारत का कहना है कि पिछले बरसों में पाकिस्तान में मौजूद उसके राजनयिकों ने एक दर्जन से अधिक बार वहां की सरकार से यह अपील की थी कि भारत के इस नागरिक से उन्हें जेल में मिलने का मौका दिया जाए, लेकिन एक बार भी उन्हें यह मौका नहीं मिला। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों के तहत शायद पाकिस्तान की यह मनाही जायज नहीं थी, और भारत अपने एक नागरिक की मदद नहीं कर सका। दूसरी तरफ अब भारत का यह कहना है कि पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए कुलभूषण पर वहां मुकदमा एक फौजी अदालत में चलाया गया, और उस पर फौज का कोई आरोप नहीं था, और यह अदालती कार्रवाई जायज नहीं थी। भारत ने यह भी कहा है कि वह लीक से हटकर भी कार्रवाई करेगा ताकि अपने इस नागरिक को बचा सके। पाकिस्तान का यह कहना है कि कुलभूषण के पास अभी वहां की ऊंची अदालत में अपील करने के लिए छह महीने का समय है, और उसे इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों पर कार्रवाई इस बात पर टिकी रहती है कि दोनों सरकारों के बीच संबंध कैसे हैं? अगर संबंध अच्छे रहते हैं तो गलती से सरहद पार करके आ गए बच्चे या बड़े भी वापिस पहुंचा दिए जाते हैं, या कि एक-दूसरे की समुद्री सरहद में पकड़ाए गए मछुआरे लौटा दिए जाते हैं। लेकिन जब सरकारों में तनातनी चलती रहती है, तो न तो क्रिकेट हो पाती है, न फिल्में रिलीज हो पाती हैं, और न ही एक-दूसरे देश में जाकर फिल्मी कलाकार काम कर पाते हैं। आम नागरिकों को भी तीर्थयात्रा के लिए, या कि रिश्तेदारी में आने-जाने के लिए मौका नहीं मिलता है, क्योंकि दोनों ही देश वीजा देने के मामले में तंगदिली दिखाने लगते हैं। और अभी कुल पौन सदी पहले तक तो दोनों ही देश एक थे, और दोनों के बीच रिश्तेदारी से लेकर कारोबार तक, और खेल से लेकर कला तक, इस तरह के जटिल अंतरसंबंध बने हुए हैं कि सरकारों के बीच की सारी तनातनी के बावजूद वे कायम रहते हैं।
हमारा ख्याल है कि कुलभूषण के मामले को अलग-थलग करके देखना मुमकिन नहीं होगा, और दोनों देशों की सरकारों को तनाव कम भी करने होंगे। जब आपस में टकराव अधिक रहता है, तो उसका नतीजा सरहद के दोनों तरफ की जमीन पर भी दिखता है। पिछली चौथाई सदी में सबसे कम मतदान भारत के कश्मीर में अभी इसी हफ्ते दिखाई पड़ा है। कश्मीर में तनाव का सीधा रिश्ता भारत और पाकिस्तान के तनाव से रहता है, और सरहद के इस राज्य की हकीकत को अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज भारत और पाकिस्तान दोनों को यह भी समझना चाहिए कि दुनिया की दो बड़ी फौजी ताकतें, अमरीका और चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच दखल देकर, और दोनों तरफ अलग-अलग भी अपनी ताकत बढ़ाने में लगी हुई हैं, इससे इन दोनों देशों के बीच आपसी मतभेदों को आपस में निपटाने की चली आ रही लंबी और पुरानी सहमति भी खत्म होने का एक खतरा है, और दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ अंधाधुंध फौजी खर्च भी कर रहे हैं। अगर रिश्ते ठीक रहें तो यह खर्च घटेगा, और कारोबार से दोनों ही देशों की कमाई भी बढ़ेगी। यह एक मौका आया है जब दोनों देशों को तनाव घटाने की एक और कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि जनता के हित में शांति के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

आधी प्लेट में भरता पूरा पेट और बाजार दुगुना बेचता हुआ

संपादकीय
11 अप्रैल 2017


भारत सरकार एक कानून बनाकर देश के रेस्त्रां में खाने की प्लेट को छोटा भी करने की सोच रही है। आज आमतौर पर होटल-रेस्त्रां में दो अलग-अलग आकार की प्लेट में खाना नहीं बेचा जाता, और लोगों को मजबूरी में अधिक खाना बुलवाकर उसे जूठा छोडऩा पड़ता है। कई बार यह भी होता है कि पैसे तो खर्च हो ही चुके हैं इसलिए टेबिल पर आ गए खाने को खत्म करने की इच्छा भी रहती है, और लोग जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। खाना या तो प्लेट में खराब होता है, या पेट में। ये दोनों ही नौबत बहुत खराब है और अमरीका जैसे पूंजीवादी देश की बाजार व्यवस्था का यह असर है कि लोगों को न छोटी बोतल बेची जाए, और न ही खाने के सामान की छोटी पैकिंग या छोटी सर्विंग बेची जाए।
आज भी देश में मध्यम दर्जे के कई ऐसे रेस्त्रां रहते हैं जो कि आधी प्लेट के हिसाब से भी खाने के सामान सर्व करते हैं। इंडियन कॉफी हाऊस जैसे कई जिम्मेदार संस्थान हैं जो कि एक इडली, या एक वड़ा, या कि आधा प्लेट चावल भी देते हैं, और न लोगों का पैसा बर्बाद होता, और न ही उनका पेट बर्बाद होता। देश में इतनी भुखमरी है कि यहां पर खाने की बर्बादी एक जुर्म से कम नहीं है, और ऐसे में भारत अगर एक कानून बनाकर कारोबार को मजबूर करता है कि वे आधे प्लेट में भी सामान बेचें, तो यह एक बेहतर इंतजाम होगा।
अमरीका में हर चीज खूब बड़े आकार की बेची जाती है, और उसका नतीजा यह है कि अमरीकियों का खुद का आकार बहुत बड़ा हो चला है, और भयानक मोटापे के शिकार होकर वे तरह-तरह की बीमारियों से घिर भी रहे हैं। यह अमरीका में एक बहुत फिक्र की बात तो हो गई है, लेकिन वहां का बाजार चीजों को बड़ी-बड़ी पैकिंग में बेचना, बड़ी-बड़ी बोतल और गिलास में सर्व करना बंद नहीं करता है। हिंदुस्तान जैसे देश से जो लोग पहली बार अमरीका जाते हैं, वे रेस्त्रां में जरूरत से दुगुना ऑर्डर कर बैठते हैं, उन्हें यह अंदाज ही नहीं रहता कि एक-एक प्लेट में कितना कुछ आएगा।
दूसरी तरफ भारत सहित दुनिया के कई देश डायबिटीज जैसी बीमारियों को बढ़ते देख रहे हैं, और इसके पीछे खानपान एक बड़ी वजह है। भारत में लोगों को अभी से सावधान करने की जरूरत है वरना पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ बाजार यहां पर खाने में अंधाधुंध मक्खन, घी, नमक, और रसायन परोस रहा है। कोकाकोला किस्म के जो कोल्डड्रिंक भारत के बाजार में हैं, उनकी एक-एक बोतल में इतनी अधिक शक्कर होती है कि उसे अलग से दिखाया जाए तो लोगों की पीने की हिम्मत भी न हो। इसलिए पैकिंग पर यह भी लिखा जाना जरूरी है कि इन सामानों में फैट कितना है, शक्कर कितनी है, और नमक कितना है। अभी भी बहुत छोटे अक्षरों में इसे लिखा जाता है, लेकिन ग्राहक की सेहत के हित में यह होगा कि खानपान की चीजों के सेहतमंद होने के अलग-अलग दर्जे तय किए जाए जैसे कि आज शाकाहारी और मांसाहारी चीजों के हैं। इसके साथ-साथ भारत सरकार को बिना देर किए रेस्त्रांओं पर यह नियम लागू करना चाहिए कि वे हर चीज को आधी प्लेट में भी बेचें।

मीडिया की सुर्खियों में शब्द घटाने कोई अभियुक्त नहीं, सीधे मुजरिम

आजकल
10 अप्रैल 2017
अभी कुछ दिन पहले देश के एक सबसे बड़े अखबार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पिछले बरस से लापता चल रहे छात्र, नजीब, के बारे में पहले पन्ने पर एक बड़ी सी खबर छापी कि दिल्ली पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया है कि नजीब इंटरनेट पर आईएसआईएस में शामिल होने के तरीके ढूंढ रहा था। अब यह बात पुलिस की जांच के बारे में थी इसलिए इसमें किसी अटकलबाजी की गुंजाइश नहीं थी। अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने औपचारिक रूप से कैमरों के सामने इस बात का खंडन किया और कहा कि दिल्ली पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है।
लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि दिल्ली पुलिस उस केन्द्र सरकार के तहत काम करती है जो जेएनयू से एक गहरा और चौड़ा वैचारिक मतभेद रखती है और जेएनयू के बागी तेवरों के छात्रों के लिए, उनकी साख बचाने के लिए, दिल्ली पुलिस पर कोई दबाव नहीं हो सकता था। लेकिन इस बड़े अखबार की इस खबर के चलते जेएनयू के छात्रों के आईएसआईएस से रिश्ते जोडऩे की एक बड़ी कोशिश, और पूरी तरह बेबुनियाद कोशिश हुई थी। इस कोशिश से देश के अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की साख पर भी एक आंच लाई जा रही थी जिसके कुछ लोगों के बारे में देश के कुछ दूसरे तबकों की राय रहती है कि वे गद्दार हैं। लेकिन स्वघोषित राष्ट्रवादियों के ऐसे नारों से परे जब एक बड़ा अखबार ऐसी खबर प्रमुखता के साथ छापता है, तो यह अखबारनवीसी से परे की एक बात हो जाती है। और दिल्ली शहर में सबसे बड़े अखबार को यह सहूलियत तो हमेशा ही रहती है कि वे पुलिस से अपनी ऐसी सनसनीखेज जानकारी पर बात कर ले।
लेकिन अखबारनवीसी और अब उसके और बुरे मीडिया-संस्करण, टीवी चैनलों को देखें तो लगातार यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, और किसी की साख को चौपट करने में पल भर भी नहीं लगता। छत्तीसगढ़ में ही हम रोजाना देखते हैं कि नक्सल आरोपों पर किसी को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें मीडिया नक्सली लिख देता है। ऐसे लोग निहत्थे रहते हैं, गरीब और आदिवासी रहते हैं, शहरों से दूर जंगलों में बसे रहते हैं, और उनके पास अपनी साख को बचाने के लिए किसी वकील की कोई सहूलियत नहीं होती। ऐसे लोगों को नक्सल-आरोपी या नक्सल संदेह से घिरे लिखने जितनी जहमत भी नहीं उठाई जाती। और यही हाल बलात्कार या हत्या के आरोप से घिरे हुए लोगों का होता है, और किसी अखबार या चैनल की सुर्खी में इस बात की जगह निकालना अब बंद हो गया है कि ये लोग आरोपी हैं, या अभियुक्त हैं, या कटघरे में खड़े हैं।
अभी कश्मीर या किसी और जगह के एक मुस्लिम नौजवान ने आतंक के आरोपों से तेरह बरस बाद बरी होने पर दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार में उसकी गिरफ्तारी के वक्त की खबरों की कतरनें जारी करते हुए पूछा कि तेरह बरस पहले इस अखबार ने उसे आतंकी करार दे दिया था, और बड़े-बड़े हर्फों में उसे एक बड़ी आतंकी घटना के लिए जिम्मेदारी आतंकी लिखा था। अब वह पूरी तरह से बरी हो चुका है, लेकिन ऐसी खबर की वजह से उसका और उसके परिवार का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
दरअसल भारत का मीडिया किसी की पगड़ी उछालने के पहले महज यह देखता है कि उसकी ताकत कितने बड़े वकील को रखने की है। एक बार यह समझ आ जाए कि जिसके खिलाफ लिखा जा रहा है, वह मामूली वकील भी नहीं कर सकता, तो मीडिया न केवल उसके खिलाफ मनमर्जी झूठ छापते और दिखाते चलता है, बल्कि वह अदालत और जज बनकर उसे कुसूरवार भी ठहरा देता है। ऐसी मीडिया-ट्रायल के खिलाफ भी पिछले कुछ समय से लगातार बात उठ रही है कि मीडिया का दायरा कहां खत्म होता है, और जिस तरह अदालतों को नसीहत दी जाती है कि वे अपने दायरे से बाहर जाकर काम न करें, क्या अदालतों का दायरा भी तय करने की जरूरत है?
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ अरसा पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से यह जानना चाहा है कि किसी मामले की छानबीन के चलते हुए उसकी कितनी जानकारी मीडिया को दी जानी चाहिए, और कौन सी जानकारियां ऐसी हैं जो जांच अफसर भी उजागर न करें, मीडिया को न बताएं, जांच में घिरे लोगों की इज्जत चौपट न करें।
लेकिन जैसा कि आसपास के माहौल का असर हर किसी पर होता है, भारत के अखबारों पर पहले तो असर टीवी चैनलों का पड़ा जो कि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में एक-दूसरे से कुछ मिनटों भी आगे रहने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं, और इस चक्कर में वे खबरों को चटपटा और सनसनीखेज बनाकर, आपाधापी में, जल्द से जल्द पेश करने के मुकाबले में रहते हैं। अखबारों ने भी धीरे-धीरे टीवी के इसी अंदाज को अपनाना शुरू कर दिया, और अब अखबार अपने वेबसाइटें भी रखते हैं, और उन पर तो और भी गैरजिम्मेदारी के साथ खबरें डाली जाती हैं।
इसके बाद आया सोशल मीडिया जो कि किसी भी तरह की जिम्मेदारी और जवाबदेही के बिना एक आजाद पंछी सरीखा है और जो जहां चाहे वहां से दाना चुग सकता है, जहां चाहे बैठ सकता है, और जहां चाहे बीट कर सकता है। ऐसे सोशल मीडिया का असर भी टीवी पर पड़ा और अखबारों पर भी पड़ा। नतीजा यह हुआ कि अब अखबार अपनी चूक को जायज और मासूम ठहराने के लिए सोशल मीडिया पर तोहमत जडऩे लगे हैं कि यह खबर तो सोशल मीडिया पर चारों तरफ थी, वॉट्सऐप पर चारों तरफ थी, और इसलिए इसे छाप दिया था। मामला इतना बिगड़ गया है कि एक टीवी चैनल ने तो वायरल सच या वायरल झूठ नाम से एक कार्यक्रम ही रोज सुबह दिखाना शुरू कर दिया है कि सोशल मीडिया पर या संदेशों पर जो बातें तैर रही हैं, उनमें सच क्या हैं, और झूठ क्या हैं?
सोशल मीडिया तो एक बेकाबू औजार है, और यही हाल मोबाइल फोन पर फैलने वाले संदेशों का है जो कि सोशल मीडिया न होते हुए भी थोक में सैकड़ों लोगों को भेजे जाने वाले संदेश रहते हैं, वीडियो रहते हैं, और तस्वीरें रहती हैं। लेकिन परंपरागत मीडिया को इस बारे में फिर से सोचना चाहिए कि क्या किसी संदेही को, किसी आरोपी को, किसी अभियुक्त को मुजरिम करार देने वाली भाषा लिखना जारी रखा जाए, या फिर उन लोगों का भी ख्याल रखा जाए जो कि महंगे वकील खड़े करके मीडिया पर मानहानि के मुकदमे नहीं कर सकते। भारत में न्यायपालिका सौ में से शायद 95 लोगों को बरी कर देती है, और गिने-चुने लोगों को ही सजा मिलती है। ऐसे में किसी का हक नहीं बनता कि वे अभियुक्तों को हत्यारा, बलात्कारी, नक्सली, आतंकी करार देते चलें।

शरणार्थियों से परे भी लोकतंत्र की बातों को समझने की जरूरत

संपादकीय
10 अप्रैल 2017


स्वीडन के प्रधानमंत्री का यह बयान सामने आया है कि वे अपने देश में आकर रह रहे (मुस्लिम) शरणार्थियों को अब तक जिस उदारता के साथ जगह देते आए हैं, ऐसा अब कभी नहीं करेंगे। राजधानी स्टॉकहोम में अभी एक शरणार्थी ने एक ट्रक को हाईजैक कर लिया, और उसे लोगों पर चढ़ा दिया। इसमें कई लोग मारे गए, और देश के भीतर सरकार के खिलाफ बड़ी नाराजगी हुई। योरप के एक-एक करके कई देशों में यह नौबत आ रही है कि जो सरकारें उदारता से शरणार्थियों को जगह दे रही थीं, वे अपने देश के अमन-पसंद लोगों या कि संकीर्णतावादी लोगों की आलोचना की शिकार हो रही हैं। दरअसल इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थी पहुंच रहे हैं कि उनके साथ वहां से आतंकियों के कुछ एजेंट भी अगर आ रहे होंगे तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। और फिर सीरिया या इराक में जो इस्लामी संगठन आतंक का राज कायम रखे हुए हैं, उन लोगों को भी यह बात नहीं जंचती है कि वहां के लोग निकलकर दूसरे देशों में जा बसें, इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर शरणार्थियों के साथ आ गए लोगों में कुछ आतंकी भी हों, और वे योरप के इन देशों में शरणार्थियों के खिलाफ भावना भड़काने के लिए आतंक की ऐसी वारदातें कर रहे हों।
इतनी दूर की इन घटनाओं पर लिखने की हमारी एक वजह यह भी है कि भारत में भी कई देशों के शरणार्थी समय-समय पर आकर बसे हैं, और इनमें से अधिकतर के खिलाफ किसी तरह की कोई नाराजगी नहीं रही है। आजादी के पहले का इतिहास अगर देखें तो ईरान से आए हुए पारसियों ने भी गुजरात से भारत में प्रवेश किया था, और यहां रहने की जगह पाई, कामयाबी पाई, और वे अब किसी भी दूसरे हिन्दुस्तानी से कम नहीं हैं। यहां तिब्बत से आए हुए लोग देश भर में सम्मान के साथ रह रहे हैं, और उनका कहीं भी अपमान नहीं होता है। 1971 की लड़ाई के वक्त बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आए, और उनके साथ किसी तरह का तनाव नहीं हुआ। आज भी असम जैसे राज्य में जिन बांग्लादेशियों के साथ तनाव की खबरें आती हैं, वे शरणार्थी नहीं है, और अवैध तरीके से भारत में आकर बसे हुए लोग हैं, और उन्हें वापिस भेजने की मांग जरूर उठती है। अभी सबसे ताजा मामला म्यांमार से आए हुए मुस्लिम शरणार्थियों का है जिन्हें कि हिन्दू-बहुल जम्मू के इलाके में बसा दिया गया था, और कश्मीर का यह हिस्सा वैसे भी धार्मिक अलगाव से गुजरते आया है, ऐसे में वहां पर म्यांमार के मुस्लिमों को ठहराना समझदारी का फैसला भी नहीं था, और उनका विरोध हुआ।
एक उम्मीद जो तनाव के बीच से निकलकर आए हुए लोगों से नहीं की जा सकती है, वह यह कि जिस देश में जाकर उन्हें रहने को जगह मिल रही है, उस देश के रीति-रिवाज का इतना सम्मान करें कि वे वहां घुलमिल जाएं। जहां-जहां वैसा होता है, वहां-वहां पर बाहर से आए हुए लोगों को दिक्कत नहीं होती है, वरना दूसरे देशों की क्या बात है, भारत के भीतर ही ओडिशा से मारवाडिय़ों को मारकर भगाया गया था। यही बात समाज में नसीहत की तरह ली जानी चाहिए कि जहां रहना है वहां पर स्थानीय परंपराओं, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय कानून का सम्मान करना चाहिए। मुस्लिम देशों से योरप पहुंच रहे शरणार्थियों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि उनके पहुंचने के पहले भी जो मुस्लिम आबादी इन देशों में है, उनके पहनावे को लेकर, उनकी शादियों के नियम-कानून को लेकर एक सामाजिक तनाव चले ही आ रहा था। एक के बाद एक देश की संसद पहरावे को लेकर मुस्लिम महिला को आजादी देने की कोशिश कर रही है, और कुछ लोग इसे आजादी मान रहे हैं, तो कुछ लोग पहरावे की आजादी को खत्म करना भी मान रहे हैं। ऐसे दोनों नजरियों से परे यह बात साफ है कि संस्कृतियों का टकराव, लोकतंत्र और धार्मिक आस्थाओं का टकराव, स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी, और बाहर से आए हुए लोगों के कामकाज का टकराव, और स्थानीय सरकार के बजट का बाहरी लोगों पर खर्च होने का मुद्दा, इन सबसे दुनिया के बाकी देशों के लोगों को भी सीखने की जरूरत है, क्योंकि जैसे-जैसे दुनिया के देशों में नए टकराव खड़े होंगे, वैसे-वैसे इन मुद्दों पर एक समझदारी दिखाने की जरूरत आती ही रहेगी। जो देश आज लोकतांत्रिक उदारता दिखा रहे हैं, वे आतंकी हमलों को झेलते हुए ऐसी उदारता छोडऩे पर मजबूर भी हो सकते हैं, हो रहे हैं, इसलिए हर संबंधित तबके को उदारता और अमन के महत्व को समझने की जरूरत है।

ठगी-जालसाजी वाले गांवों पर भी शिकंजा क्यों नहीं?

संपादकीय
9 अप्रैल 2017


पिछले कुछ दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि किस तरह देश के कुछ गिने-चुने शहरों में बैठकर पूरे देश में फोन करके लोगों को ठगने और बैंक-जालसाजी करने वाले लोग पकड़ में आ रहे हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि झारखंड के किसी एक गांव में अगर हजारों लोग यही काम कर रहे हैं, तो मोबाइल फोन पर धोखा देने के इस संगठित जुर्म को पकडऩे के लिए अलग-अलग राज्यों की पुलिस को क्यों मेहनत करनी पड़ रही है, जहां के लोग ठगे जा रहे हैं? केन्द्र सरकार या स्थानीय राज्य ऐसे संगठित अपराध पर सीधे कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे?
आज हिन्दुस्तान में जिस रफ्तार से लोगों का मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ा है, बैंक और उनकी बाकी सुविधाओं को आधार कार्ड से जिस रफ्तार से जोड़ा जा रहा है, और लोगों की तकनीकी समझ अब तक जितनी सीमित है, इन सबके चलते एक खतरनाक नौबत आकर खड़ी हो गई है, और बैंकवाला बनकर ठग लोगों को फोन करते हैं, उनके नंबर पूछ लेते हैं, और उनके खातों से रकम निकाल लेते हैं। आज केन्द्र सरकार नगदी को घटाकर लोगों के हर तरह के कामकाज में बैंक खाते को जिस आक्रामक तरीके से बढ़ावा दे रही है, उतनी आक्रामकता न तो लोगों को जागरूक करने में दिखती, और न ही ऐसे साइबर क्राईम को पकडऩे की तैयारी में दिखती। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि भारत में ठगी और जालसाजी जैसे आर्थिक अपराधों की रिपोर्ट होने के बाद उनकी जांच और कार्रवाई में बहुत देर हो जाती है, और तब तक लोग तो लुट चुके रहते हैं। ऐसे में आर्थिक अपराधों के लिए एक खुफिया निगरानी तंत्र होना चाहिए जो कि ऐसे अपराध होने के पहले ही, या होना शुरू होते ही उन्हें रोक सके ताकि लुटने वाले लोगों की गिनती न बढ़े।
अब जब टेलीफोन नंबरों की शिनाख्त के बाद उनके इलाके को जाना जा सकता है, तब यह बात हमारी समझ से परे है कि एक-दो गिने-चुने बदनाम गांव-कस्बे ऐसे कैसे हो सकते हैं कि जहां हजारों लोगों का पेशा ही ठगी-जालसाजी, और साइबर जुर्म हो? ऐसे गांव पर कार्रवाई आसान हो सकती है, वहां के नंबरों से होने वाले कॉल की रिकॉर्डिंग हो सकती है, वहां से चलने वाले बैंक खातों पर नजर रखी जा सकती है, और अगर सरकार ऐसा नहीं कर पाती है, तो उसे डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने का कोई अधिकार भी नहीं है। डिजिटल इंडिया जैसे-जैसे शक्ल लेता जाएगा, वैसे-वैसे बेकसूर लोग और भी अधिक शिकार होते जाएंगे। इस सिलसिले को तुरंत रोकने की जरूरत है, और यह मामला ऐसा है जिसमें भारत के बाहर बसे हुए साइबर-विशेषज्ञ भारतवंशी लोग भी मदद कर सकते हैं। भारत सरकार को बिना देर किए एक अभियान इसी पर चलाना चाहिए, और उसे आगे भी जारी रखना पड़ेगा क्योंकि साइबर-सुरक्षा में सरकार जितना भी आगे बढ़ेगी, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलने के रास्ते निकालते ही रहेंगे।

तरूण विजय से परे भी रंगभेद पर खुली चर्चा की जरूरत...

संपादकीय
8 अप्रैल 2017


भारतीय जनता पार्टी सांसद और आरएसएस के अखबार पांचजन्य के संपादक रहे हुए तरूण विजय के लिए टीवी पर बोलना या अखबारों में लिखना कोई नई बात नहीं है, वे लगातार मीडिया से मुखातिब रहते हैं, और उनसे हड़बड़ी या दबाव में कुछ गलत कहने की उम्मीद नहीं की जाती है। ऐसे में जब उन्होंने भारत में विदेशी अश्वेतों पर हुए हमलों पर चल रही एक टीवी बहस में कहा कि भारत में कोई नस्लवाद या रंगभेद नहीं है, और इसके सुबूत के रूप में उन्होंने यह कहा कि भारतीय, दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं, उन्होंने कहा कि अगर भारतीय नस्लवादी होते तो वे दक्षिण भारतीयों के साथ कैसे रह पाते? उनकी इस बात में एक-दो शब्द इधर-उधर हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने भारत के रंगभेदी न होने के सुबूत के रूप में अपने दिमाग के रंगभेद को पेश कर दिया। अब आज का सोशल मीडिया का वक्त ऐसा है कि ऐसा कहकर किसी का बच निकलना तो मुमकिन हो नहीं सकता, इसलिए ट्विटर पर उनकी वह धुलाई हो रही है कि उन्हें खुद अपनी इस गलत बात पर बार-बार, लगातार माफी मांगनी पड़ रही है।
दरअसल दिमाग में जो सोच रहती है, वह कभी-कभी इस तरह से सामने आ भी जाती है। भाजपा के एक बड़े पुराने और जाने-माने चेहरे के रूप में तरूण विजय की यह बात दक्षिण भारतीयों के लिए अपमानजनक तो है ही, इससे उनकी यह सोच भी सामने आती है कि दक्षिण भारत मानो भारत का हिस्सा ही न हो। भाजपा के ये राज्यसभा सदस्य हों, या कि कोई और, एक बात यह समझ लेनी चाहिए कि दिल्ली पर उत्तर-पूर्व का, दक्षिण भारत का, या कि कश्मीर का उतना ही हक है, जितना कि उत्तर भारत का है। कश्मीर के लोगों को हमेशा से यह शिकायत रहते आई है कि बाकी हिन्दुस्तान के लोग कश्मीर को अलग-थलग गिनकर चलते हैं, और इसकी प्रतिक्रिया में कश्मीर के लोग भी अपने आपको कश्मीर और बाकी भारत को इंडिया कहते हैं। इसी तरह उत्तर-पूर्व की चर्चा भी बाकी हिन्दुस्तान के लोग इसी अंदाज में करते हैं कि उधर वह उत्तर-पूर्व है, और बाकी हिन्दुस्तान है। उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश में जगह-जगह भेदभाव होता है, दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक उन पर हमले होते हैं, और ऐसी घटनाओं से वहां के लोग बाकी देश की मूलधारा के साथ जुड़ नहीं पाते, या कि बाकी देश अपनी मूलधारा में ऐसी सरहदी राज्यों को, वहां के लोगों को जोडऩा नहीं चाहता।
तरूण विजय ने जो कहा है, वह हिन्दी फिल्मों में आधी सदी से भी अधिक से चली आ रही एक रंगभेदी सोच है जिसमें किसी दक्षिण भारतीय को दिखाने के लिए उसे एकदम काले रंग का दिखाया जाएगा, उसकी हिन्दी को टूटी-फूटी और बेहूदी बनाया जाएगा, उसे लुंगी पहना दी जाएगी, और उसे मद्रासी कहा जाएगा। भारत में रंगभेद की जड़ें समाज में इतनी गहरी हैं कि शादियों के विज्ञापनों में बहुत से ऐसे रहते हैं जिनमें गोरे रंग की शर्त जुड़ी रहती है। इस देश में गोरे बनाने की क्रीम का बहुत बड़ा बाजार है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारे इसे बेचने का काम करते हैं। काले रंग के लिए देश के बहुत से लोगों के मन में एक हिकारत है, और किसी का जिक्र करते हुए उसे काली-कलूटी कहा जाता है। ऐसे देश में जब काले रंग का इस्तेमाल विरोध करने के झंडों में होता है, किसी आंदोलन करने के लिए कपड़ों पर काली रिबन बांध ली जाती है, काले बैनर लगाए जाते हैं, तो काले रंग को एक नकारात्मक रंग की तरह पेश करने का काम भी होता है। लोग बोलचाल में यह कहते हैं कि फलां के काम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होंगे, काला अक्षर भैंस बराबर, यह बात अपमान के रूप में कही जाती है, हालांकि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि गोरी गाय पढ़ी-लिखी होती है।
तरूण विजय ने एक बहुत ही शर्मनाक बात कही है, और उसके लिए लोकतंत्र में माफी मांग लेने, और माफ कर देने के अलावा कोई बहुत अधिक विकल्प नहीं बचते हैं, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में फतह पाने की उम्मीद लगाई हुई भारतीय जनता पार्टी को वहां नुकसान पहुंचाने के लिए, गोमांस के विवाद के बाद अब यह काले रंग का विवाद और जुड़ गया है, और आने वाले चुनावों में दक्षिण में इसका क्या मुद्दा बनता है, यह देखना होगा। लेकिन हमारा यह मानना है कि तरूण विजय के इस विवाद के साथ अब हिन्दुस्तान के भीतर के रंगभेद पर खुलकर चर्चा हो ही जानी चाहिए।

मोदी बिना ट्रैफिक रोके दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे!

संपादकीय
7 अप्रैल 2017


दिल्ली पहुंचीं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना ट्रैफिक को रोके हुए अघोषित तरीके से एयरपोर्ट पहुंचे। यह एक अलग बात है कि यह कदम आम शिष्टाचार नियमों से ऊपर था, और बांग्लादेश को एक अलग महत्व देने वाला था, लेकिन उससे भी अलग बात यह है कि मोदी ने यह दिखा दिया कि दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में भी प्रधानमंत्री आम लोगों के ट्रैफिक के बीच से उसी तरह निकलकर जा सकता है। पिछले कुछ हफ्तों में पंजाब के मुख्यमंत्री का यह फैसला सामने आया है कि वे गाडिय़ों में लालबत्ती नहीं लगाएंगे, और सादगी की इस पहल पर हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह लिखा भी है। लेकिन अब प्रधानमंत्री की इस पहल के बाद अब देश के बाकी मुख्यमंत्रियों और केन्द्र के मंत्रियों के सामने भी यह एक नैतिक दबाव रह सकता है कि वे भी ऐसा करें।
आज भारतीय लोकतंत्र में नेता जनता से कटते चले गए हैं, और जनता के मन में नेताओं के ठाठ-बाट देखकर हिकारत बढ़ती चली जा रही है। इसलिए यह जरूरी है कि जनता के बुनियादी हकों को कुचलने का काम खत्म किया जाए। दो ही दिन पहले एक वीडियो आया है जिसमें एक एम्बुलेंस में कोई मरीज दम तोड़ते दिख रहा है, और उसे रियायती कार-काफिले के लिए रोक दिया गया है। प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह एक बार जब चंडीगढ़ गए थे तो वहां के सबसे बड़े अस्पताल, पीजीआई, में कार्यक्रम था, और चारों तरफ एम्बुलेंस दूर-दूर रोक दी गई थीं, और भयानक नजारा मीडिया में सामने आया था। दुनिया के जितने सभ्य लोकतंत्र हैं, वहां पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बिना ऐसे काफिलों के निकल जाते हैं, और योरप के तो कई ऐसे देश हैं जिनमें प्रधानमंत्री साइकिल से दफ्तर आते-जाते हैं। भारत में ही मुगलों और अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही सामंती सोच खत्म नहीं होती है, और सुरक्षा-जरूरतों से आगे बढ़कर लोग अपनी शान-शौकत के लिए बड़े-बड़े काफिले लेकर चलते हैं, और शायद सरकार के भीतर की फाइलों में इसे सही ठहराने के लिए अपनी सुरक्षा पर खतरा भी लिखवा लेते हैं।
यह सिलसिला थमना चाहिए, लेकिन जनता इसे लेकर अदालत भी नहीं जा सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज खुद भी लालबत्तियों लगी हुई गाडिय़ों में, और कम से कम छत्तीसगढ़ में हमें दिखता है कि पुलिस की सायरन बजाती पायलट गाड़ी के साथ चलते हुए गुजरते हैं। उनका हाल यह रहता है कि फायर ब्रिगेड की तरह उन्हें अदालत पहुंचकर तुरंत ही बेइंसाफी की आग बुझानी है, यह एक अलग बात है कि मामले पूरी-पूरी पीढ़ी तक अदालत में घिसटते रहते हैं, और जजों के लिए ट्रैफिक रोक दिया जाता है। लोकतंत्र में सामंतवाद का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज अगर लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाला आए, तो उसे तुरंत यह बात समझ आएगी कि जजों को लालबत्ती और सायरन की कोई जरूरत नहीं रहती है, और उन्हें सरकार के सामने, नेताओं के सामने एक मिसाल रखनी चाहिए।

भारत की जमीन पर विदेशियों से बुरे सुलूक के लंबे नतीजे

संपादकीय
6 अप्रैल 2017


दिल्ली से लगे उत्तरप्रदेश के नोएडा में कुछ दिन पहले एक अफ्रीकी नागरिक को एक मॉल में इस बुरी तरह पीटा गया कि उसका वीडियो देखते भी नहीं बनता था। लेकिन दिल्ली शहर में भी कुछ बरस पहले ऐसी वारदातें हुई हैं, और उस वक्त भी अफ्रीका के इन देशों ने इसका विरोध किया था। अब अफ्रीकी देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इसे नस्लवादी हमला बताते हुए शिकायत की है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर आपत्ति की है, और कहा है कि भारत के भीतर की इस घटना को लेकर संयुक्त राष्ट्र क्यों जाना चाहिए। पहले भी भारत के कुछ इलाकों में कुछ विदेशी नागरिकों के साथ हिंसा हुई है, और उसकी भी प्रतिक्रिया पर्यटकों के आने में कमी के अलावा भी कई और तरह से हुई।
भारत में विदेशियों के साथ बुरा सुलूक करने वाले लोगों को यह समझ नहीं रहती कि उन देशों के साथ भारत के संबंधों पर इसका क्या असर पड़ता है, भारत की साख पर इसका क्या असर पड़ता है, और सबसे बड़ी बात यह कि उन देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों को इससे क्या-क्या खतरे झेलने पड़ते हैं। अफ्रीका में पहले भी कई देशों से हिन्दुस्तानियों को भगाया जा चुका था, और उन्हें अपना कारोबार छोड़कर निकलना पड़ा था। यह बात जाहिर है कि दूसरे देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानी भारत के लिए एक बड़ी कमाई भी करते हैं, और वे वहां पर भारत के अघोषित प्रतिनिधि भी रहते हैं। ऐसे में आज यह मुद्दा भी उठ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत जिस सदस्यता के लिए दशकों से कोशिश किए जा रहा है, उसके लिए अफ्रीकी देशों का समर्थन उसके लिए बहुत मायने रखता है, और अगर वहां से आकर भारत में पढ़ रहे छात्रों के साथ ऐसी हिंसा होती है, तो इससे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के महत्व पर खतरे खड़े होंगे।
हिन्दुस्तान में बसे हुए इस देश के लोगों में से जिन लोगों के रिश्तेदार दूसरे देशों में काम करते हैं, या रहते हैं, वे शायद ही कभी विदेशियों के साथ इस तरह की हिंसा करेंगे क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने घरवालों पर खतरे साफ दिखते रहेंगे। जो लोग दुनिया के दूसरे देश घूमने जाते हैं, वे लोग भी ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें बाहर अपने साथ भी ऐसे सुलूक का खतरा दिखेगा। लेकिन दुनिया से कटे हुए, अनजान, एक सुरंग या कुएं जैसी सीमित सोच और समझ रखने वाले लोग अपनी भीड़ की ताकत से ऐसी हिंसा पर उतर जाते हैं, और उसका नुकसान लंबे समय तक इस देश को और यहां से बाहर जाकर काम करने वाले लोगों को झेलना पड़ता है।
विदेशी नागरिकों के अलावा एक और बात जो भारत के लोगों की साख को दूसरे देशों में लगातार घटाती है, वह है यहां धर्म या जाति के नाम पर, लोगों के साथ की जाने वाली हिंसा। गौरक्षक बनकर जो लोग गाय लेकर जाते किसी भी मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोगों को सड़कों पर मार डाल रहे हैं, वे गाय को नहीं बचा रहे हैं, वे इस देश की एक संभावना को मार रहे हैं। गाय को ही बचाने की ताकत अगर ऐसे स्वघोषित गौरक्षकों में होती, तो फिर बात ही क्या थी। गाय तो जैसे ही दूध देना बंद करती है, उसके लिए जिंदा रहने को खाने के लिए महज घूरे बच जाते हैं। अपनी मां कही जाने वाली गाय को इस तरह लंबी जिंदगी के लिए कचरे पर जीने की बेबसी देने वाले लोग एक पाखंडी धार्मिक कट्टरता दिखाते हुए भीड़ की ताकत से हिंसा करते हैं, और पूरी दुनिया में इस देश का नाम बदनाम करते हैं। इसलिए न सिर्फ दूसरे देशों से आए हुए विदेशी नागरिक, बल्कि अपने देश के नागरिकों के साथ भी ऐसी सार्वजनिक हिंसा हिन्दुस्तान को बहुत पीछे कर दे रही है। आज अगर सरकार को विदेशों से संबंध और कारोबार का नुकसान दिखाई नहीं दे रहा है, तो मोदी सरकार के इस कार्यकाल के भीतर ही यह दिखने लगेगा। आज जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नस्लवादी और हिंसक अंदाज में विदेशियों के साथ अमरीकी धरती पर भेदभाव कर रही है, तो भारत के पास इसके खिलाफ बोलने के लिए मुंह भी नहीं बचता है क्योंकि यह देश अपने आपमें ऐसा ही कर भी रहा है। भेदभाव और हिंसा के खिलाफ मुंह खोलने के लिए जो नैतिक ताकत लगती है, उसे भारत अपनी घरेलू हिंसा की ऐसी घटनाओं के साथ खोते चल रहा है।

किसानों की कर्जमाफी और उससे जुड़े हुए दूसरे मुद्दे...

संपादकीय
5 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार ने अपने वायदे के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है, और इससे एक तो पार्टी और दूसरे नए मुख्यमंत्री, इन दोनों की साख बढ़ी है। अब दूसरी तरफ महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने भाजपा की भागीदार शिवसेना ने इसकी तारीफ करते हुए राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री से किसानों की कर्जमाफी महाराष्ट्र में भी मांगी है। आगे-पीछे देश के बाकी राज्यों में भी ऐसी मांग उठने लगेगी, और खासकर भाजपा के शासन वाले राज्य इस गर्मी को कुछ अधिक महसूस करेंगे। एक राष्ट्रीय पार्टी एक राज्य में अलग नीति, और दूसरे राज्य में कोई दूसरी नीति नहीं रख सकती, हालांकि केन्द्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्जमाफी जिस राज्य को करनी है, उसे अपने ही साधनों से यह काम करना होगा, और इसमें केन्द्र कोई मदद नहीं करेगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, एसबीआई की मुखिया ने किसानी-कर्जमाफी को अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया था, और इसका विरोध किया था। देश के अर्थशास्त्रियों में दोनों तरह के लोग हैं, कुछ लोग यह मानते हैं कि जब बड़े-बड़े कारखानेदारों को हजारों करोड़ के कर्ज लेने के बाद दीवालिया होने की छूट दी जाती है, तब छोटे-छोटे किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए उनको ऐसी रियायत क्यों नहीं मिलती?
दुनिया के अधिकतर देशों में किसानों को किसी न किसी तरह की सरकारी रियायत मिलती है, इसकी एक वजह यह भी है कि बाकी तमाम चीजें तो कारखानों में बन सकती हैं, अनाज अभी तक कारखानों में नहीं उग रहा है। इसलिए किसानों का जिंदा रहना बाकी दुनिया के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। भारत में हम देखते हैं कि बाजार में चीजों के दाम सरकार और जनता के काबू के बाहर रहते हैं, सोना कभी आसमान पर चले जाता है, तो कभी धरती पर गिर जाता है, और कारोबारी भी इस पर कोई काबू नहीं रख पाते। लोग महंगे सामान, महंगी गाडिय़ां, महंगे ऐशोआराम में तो मोलभाव नहीं करते, लेकिन फल-सब्जी पर खूब मोलभाव होता है, और किसान को मिलने वाली रियायत या मदद लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाती है। भारत में भी लोगों को यह समझने की जरूरत है कि बाकी चीजों के बिना तो वे कुछ दिन गुजार सकते हैं, लेकिन अनाज के बिना उनका काम नहीं चल सकता। अभी आधी सदी पहले तक की ही बात है जब देश में जरूरत से कम अनाज होता था, और अमरीका से मदद में बहुत रद्दी किस्म का गेहूं आता था, और लोग राशन दुकानों में लाईन में लगकर उसे लेते थे। इसलिए यह याद रखना चाहिए कि अगर किसान जिंदा नहीं रहेगा, तो बाकी आबादी भी जिंदा नहीं रहेगी।
हम किसानी या किसी और किस्म के कर्ज को माफ करने की कोई अंधी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन इतना जरूर कह रहे हैं कि अगर सरकार को किसी की भी कर्जमाफी करनी है, तो वह मजदूर, फुटपाथ के व्यापारी, और छोटे किसान होने चाहिए। जो जितना कमजोर है, जो जितना गरीब है, उसे उतनी ही अधिक मदद मिलनी चाहिए, और अब इस पैमाने को कैसे तय किया जाए, कर्जदारों को इस पर कैसे परखा जाए, और कैसे इस मदद को लोगों की लत न बनने दिया जाए, यह सरकार और अर्थशास्त्रियों की बात है। छत्तीसगढ़ में भी हम पिछले बरसों में यह देखते हैं कि सरकार किसानों की लगभग पूरी उपज बाजार से अधिक दाम पर खरीदती है, और गरीब लोगों को बाजार से पांच फीसदी दाम पर अनाज देती है। ये दोनों किस्म की सब्सिडी खासा बड़ा बोझ है, लेकिन इन्हीं दोनों के चलते हुए किसानों की आत्महत्या किसानी की वजह से, कर्ज की वजह से, कम सुनाई देती है, और भूख-कुपोषण की वजह से लोगों की भुखमरी अब इस राज्य में बिल्कुल भी सुनाई नहीं पड़ती। जब कभी एक व्यापक नीति के तहत पूरे राज्य स्तर पर किसी तबके की मदद करनी है, तो उसकी बारीक छानबीन भी होनी चाहिए, क्योंकि यह जनता के हक का पैसा रहता है, और इसे महज लुभावनी राजनीति के लिए लुटाना ठीक नहीं है। गरीबी और मुसीबत, कर्ज न चुका पाने की हालत, इन सबको परखने का अच्छा पुख्ता इंतजाम होना चाहिए, और उसके बाद जहां जरूरत हो, वहां मदद जरूर करनी चाहिए।

अलग-अलग राज्यों में भाजपा की अलग-अलग नीतियों का राज

संपादकीय
4 अप्रैल 2017


गौहत्या और बीफ के मामले में देश में शुरू से आक्रामक रही भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दो बरस में देश के अलग-अलग प्रदेशों में अपनी रीति-नीति अलग-अलग रखी है। इसी को लेकर अब भाजपा पर यह ताने कसे जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मम्मी, और उत्तर पूर्व में यम्मी, यानी मजेदार स्वाद वाली। उत्तर पूर्व में भाजपा ने यह साफ किया है कि वह बीफ के खिलाफ नहीं रहेगी। दूसरी तरफ, देश के एक अलग सिरे पर केरल में अभी दो दिन पहले भाजपा के एक लोकसभा-उपचुनाव उम्मीदवार ने सार्वजनिक रूप से मतदाताओं से वायदा किया है कि वे साफ सुथरा बूचडख़ाना मुहैय्या कराएंगे, और लोगों को बीफ हासिल रहेगा। भाजपा के ही राज वाले गोवा में लगातार भाजपाई मुख्यमंत्री कहते रहे हैं, और आज भी कहते हैं कि वहां न बीफ पर रोक लगेगी, न शराब पर। इसके अलावा वहां के पर्यटकों पर पोशाक की भी कोई बंदिश नहीं लगेगी, यह भी साफ किया गया है।
भाजपा के राज वाले अलग-अलग राज्यों में बीफ से लेकर शराब तक, और संस्कृति तक, अलग-अलग तस्वीरें देखने मिलती हैं। मोदी के गुजरात में नवरात्रि पर डांडिया की रातों में लड़कियों की दुस्साहसी पोशाकें देखने मिलती हैं, और यह आम बात रहती है कि नौजवान लड़के-लड़कियां होटलों में घंटों के हिसाब से कमरे लेते हैं। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा का राज आते ही लड़के-लड़कियों को साथ दिखने पर सड़कों और बाग-बगीचों में इस तरह पीटा जा रहा है कि हिंदुस्तान के इतिहास में पे्रम कभी रहा भी न हो। यहां तक कि जवान भाई-बहन भी सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, और उन्हें छोडऩे के लिए पुलिस रिश्वत ले रही है। उत्तरप्रदेश से जिस तरह के वीडियो आ रहे हैं, वे भयानक हैं, और लग रहा है कि लोकतंत्र की इस देश में कोई जगह नहीं बची है।
अब अगर भाजपा के खुद के सीधे राज वाले प्रदेशों को देखें, तो वहां पर स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के मुताबिक जिस तरह की विविधता भाजपा अपनी नीति में कर रही है, और सरकारी फैसलों में जैसा फेरबदल कर रही है उसे देखकर लगता है कि जब स्थानीय स्तर पर चुनाव जीतने की बात आती है तो भाजपा इन प्रदेशों में पर्याप्त लचीलापन दिखाती है। लेकिन जब किसी प्रदेश में बहुमत पाने के लिए उसकी नीतियां काफी हैं, तो वह अपनी तंगनीतियों पर कायम रहती है। इस फर्क को समझते हुए देश की विविधता को भी समझना होगा, और एक किस्म के खानपान, एक किस्म के पहरावे, एक किस्म संस्कृति को सब पर लादना बंद करना होगा। यह लोकतंत्र में वैसे भी गैरकानूनी और नाजायज बात है, लेकिन कहीं पर राज्य के कानून बनाकर, तो कहीं पर गैरकानूनी तरीके से सत्ता का संरक्षण देकर जिस तरह की एक सांस्कृतिक तानाशाही लादी जा रही है, वह भारत के लिए ठीक नहीं है। यह समझ लेना चाहिए कि चुनाव में बहुमत पाकर सत्ता में आने का यह मतलब नहीं होता है कि आबादी का बहुमत विविधता वाली आजादी के खिलाफ है। कई बार मुकाबले में खराब उम्मीदवार और खराब पार्टी के रहने से भी चुनाव जीते जाते हैं।

अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए

आजकल
3 अप्रैल 2017 

अभी एक साधारण से विश्वविद्यालय में हुए एक सरकारी समारोह में जाना हुआ, तो पूरा सभागृह तो ठंडा नहीं था, लेकिन स्टेज पर दोनों तरफ बड़े-बड़े टॉवर-एसी लगा दिए गए थे, ताकि मंच पर सूट-बूट और टाई में जकड़े हुए लोग चैन से बैठ सकें। इन दिनों बड़ी-बड़ी आमसभाओं में भी जहां लोग चिलचिलाती धूप में घंटों बैठते हैं, वहां कुछ देर के लिए मंच पर आने वाले लोगों के लिए भी किनारों पर इस तरह एसी लगाए जाते हैं कि नीचे के लोगों को न दिखें। और ऐसे तमाम मंचों पर लोग या तो जॉकेट और कोट में रहते हैं, या टाई पहने रहते हैं, बूट तो पहने ही रहते हैं।
दूसरी तरफ अभी कुछ दिन पहले खबर आई कि बढ़ती हुई गर्मी को देखते हुए छत्तीसगढ़ की अदालतों में वकीलों के काले कोट पहनने पर कुछ समय के लिए छूट दी गई है। लेकिन हम रोज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तस्वीरें खबरों में देखते हैं जिनमें वकील काले कोट से लदे हुए दिखते हैं, और जज तो पता नहीं कैसे जादूगरों से काले लबादे भी ओढ़े हुए रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में शायद कुछ या सभी वकीलों को अदालत के भीतर जजों के सामने ऐसे लबादे भी ओढऩे होते हैं। 
रेलवे स्टेशनों पर देखें तो टीटीई भरी गर्मी में, खुले प्लेटफॉर्म पर भी काले कोट से लदे रहते हैं, और सरकारी कार्यक्रमों में एसी हॉल में पहुंचने वाले अफसर, एसी कार से जाते हुए सूट-बूट और टाई में रहते हैं। कारोबार की दुनिया में जो बड़े लोग रहते हैं, उनसे भी यह उम्मीद की जाती है कि वे इसी तरह की पोशाक में रहें जो कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लिए न बनी थी, और न ही आज काम की है। 
हिन्दुस्तान के इतिहास की तस्वीरों को अगर देखें तो लखनऊ, बनारस, और कोलकाता के असली रईस लोग कुछ सौ बरस पहले हिन्दुस्तानी मौसम के लिए माकूल धोती-कुर्ते या पजामे में दिखते थे, और ठंड के मौसम में जरूरत के मुताबिक जाकिट पहन लेते थे। शायद अंग्रेजों के आने के बाद से इस तरह की पोशाक का चलन बढ़ चला जिसे कि अंग्रेज पहनते थे अपने देश में, लेकिन वे जब यहां आए तो वे वही पोशाक जानते थे। फिर एक शासक अपने गुलाम देश की पोशाक तो अपना भी नहीं सकता था, इसलिए अंग्रेज यहां की गर्मी में भी अपने ही अंग्रेजी कपड़ों में बने रहे, और चूंकि शासक समाज के स्तर के पैमाने तय करता है, इसलिए उसके नीचे के सारे गुलाम हिन्दुस्तानी वैसे ही कपड़ों का इस्तेमाल करने लगे, और हिन्दुस्तान जैसी भयानक गर्म जगह में भी लोग कोट और टाई पहनने लगे। 
नतीजा यह हुआ कि आज गली-मोहल्लों में खुलने वाली छोटी-छोटी अंग्रेजी स्कूलों के छोटे-छोटे बच्चों के गलों में भी दुमछल्ले की तरह एक टाई टांग दी जाती है, और मैनेजमेंट जैसी महंगी पढ़ाई करवाने वाले कॉलेज या इंस्टीट्यूट एक महंगा माहौल बनाने के लिए गर्म शहरों में भी छात्र-छात्राओं को कोट और टाई में बांधकर रखने लगे हैं। 
यह पूरा सिलसिला निजी प्रताडऩा का तो है ही, इसकी वजह से देश की बाकी जनता का भी एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। गर्म जगह या गर्म मौसम में सरकार, राजनीति, अदालत, या जनता के पैसों पर चलने वाले दूसरे पेशों में लोग जब गर्म कपड़े पहनकर बैठते हैं, तो जाहिर है कि वे कमरों को बेहद ठंडा बनाकर रखते हैं, ऐसे कपड़ों के बिना जितने ठंड की जरूरत न पड़ती हो, उतना ठंडा। नतीजा यह होता है कि जनता के पैसों की बिजली अंग्रेजों की छोड़ी हुई उतरन को ढोने के लिए खर्च हो रही है, और देश का एक बड़ा हिस्सा जब एक पंखे की बिजली भी नहीं पाता है, तब देश का यह चुनिंदा शासक वर्ग कोट और टाई के भीतर भी बदन को ठंडा रखने के लिए अंधाधुंध एयरकंडीशनिंग का इस्तेमाल करता है। 
पिछली यूपीए सरकार के वक्त केन्द्र में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने जब दिल्ली में अपने मंत्रालय की इमारत बनवाना शुरू किया, तो उन्होंने पहली शर्त यह रखी कि यह इमारत साल भर में बिजली का शून्य उपयोग करेगी। अगर कुछ महीनों में कुछ बिजली लेगी, तो बाकी महीनों में उससे ज्यादा बिजली सौर ऊर्जा से बनाकर उसे इलेक्ट्रिक ग्रिड में वापिस लौटा देगी। उन्होंने इमारत डिजाइन करने वाले लोगों को उसे ठंडा रखने के लिए कई तरकीबें बताईं, और ठंड में गर्म रखने के लिए भी कई तकनीकों का इस्तेमाल करवाया। इसके साथ-साथ उन्होंने दफ्तर और मीटिंग-रूम्स का तापमान 27 डिग्री से नीचे न रखने के लिए इंतजाम करवा दिया। उनका कहना था कि लोग गर्मी में भी कोट और टाई पहनकर काम करते हैं, इससे ज्यादा अच्छा है कि वे कोट-टाई टांग दें, और साधारण कपड़ों में कम ठंड के बीच काम करें। 
कहने में यह बात छोटी लगती है कि अदालतों और सरकारी दफ्तरों, या जनता के पैसों पर मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल करने वाले लोग अगर इस देश के वातावरण, यहां की गर्मी-ठंडी के मुताबिक कपड़े पहनें तो काफी बचत हो सकती है। सरकारी बचत से परे निजी दफ्तरों और घरों में भी ऐसी बचत हो सकती है क्योंकि बिजली की कमी तो देश भर में है, और बिजली को बचाने का मतलब पर्यावरण को बचाना भी है। 
ठीक इसी तरह का एक दूसरा मुद्दा यह भी दिखता है कि लोग अपने घरों के खुले आंगन, छतों पर, और दीवारों या बाल्कनी में ऐसे पौधे लगा देते हैं, ऐसे लॉन लगाते हैं जो कि खूब पानी पीते हैं। फिर इन्हें जिंदा रखने के लिए लोग बहुत सा पानी इंतजाम करके लाते हैं, और हरियाली की वजह से पर्यावरण-प्रेमी कहलाते हैं। बहुत से लोग तो ऐसी असंभव किस्म की घरेलू हरियाली की वजह से पर्यावरण के पुरस्कार भी पा लेते हैं। हकीकत यह है कि जिस देश-प्रदेश में जैसे पेड़ लगने चाहिए वह तो कुदरत ने ही बता दिया है। लेकिन लोग अपनी जगह से हटकर दूसरी तरह के पेड़-पौधे लगाकर लोग एक अनोखापन दिखाते हैं, और वाहवाही पाते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए वे कुदरत के खिलाफ जाकर कई तरह के खर्च करते हैं, और पानी खर्च करके कुदरत को ही बर्बाद भी करते हैं। ऐसा ही हाल उन लोगों का रहता है जो गर्म इलाकों में ऐसे कुत्ते पालते हैं जो कि ठंडे इलाकों की नस्लों के रहते हैं, और अपने बड़े-बड़े बालों की वजह से, ठंड की अपनी जरूरत की वजह से वे गर्मी में बदहाल रहते हैं, उन्हें रखने के लिए कूलर और एसी पर बिजली पर खर्च की जाती है, उन्हें नहलाने में ढेरों पानी खर्च होता है, और वे दिखावटी नस्ल के ऐसे प्राणी बनकर रह जाते हैं जो खुद भी तकलीफ पाते हैं, पर्यावरण पर भी बोझ रहते हैं, और वे महज सजावट के सामान की तरह, एक महंगे सामान की तरह साबित होते हैं। 
आज जब पर्यावरण के लिए लोगों में एक जागरूकता आ रही है, और जिम्मेदारी का एक एहसास हो रहा है, तो इन कुछ बातों को छोडऩा जरूरी है। भारत में मुगलों के वक्त तो गर्म पोशाकों की ऐसी नकल नहीं हुई, लेकिन अंग्रेजों के वक्त से तो जो नकल शुरू हुई, वह आज तक खत्म नहीं हुई। लोग इस बात को भी नहीं समझ रहे हैं कि एप्पल कंपनी खड़ी करने वाले स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक बनाने वाले मार्क जुकरबर्ग तक अनगिनत ऐसे खरबपति लोग हैं जिनकी सूट-बूट में शायद ही कोई तस्वीर दिखती हो। जो अपनी कंपनी के सबसे बड़े जलसे में भी टी-शर्ट और जींस में मंच पर रहते हों। इसलिए पोशाक की गुलामी-सोच से छुटकारा पाने की जरूरत है, और अपने इलाके के मौसम के मिजाज के मुताबिक कपड़े पहनकर धरती को बचाने की जरूरत भी है। 
कुछ महीने पहले जब छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बस्तर आए तब एक जिले के कलेक्टर को राज्य सरकार से इस बात के लिए नोटिस दिया गया कि उसने प्रधानमंत्री की अगवानी करते हुए परंपरागत पोशाक-नियम का पालन नहीं किया, और बंद गले का कोट नहीं पहना। हमारा ख्याल है कि भयानक गर्मी के बीच खुली धूप में बंद गले का कोट पहनने का नियम बनाना भी मानवाधिकार के खिलाफ है, और किसी को इस बात को चुनौती देनी चाहिए। इस अफसर को मिले नोटिस में यह भी जिक्र था कि उसने धूप का चश्मा लगा रखा था। हकीकत यह है कि तेज धूप में धूप का चश्मा लगाने की सिफारिश चिकित्सा विज्ञान करता है, और यह हिन्दुस्तान जैसा देश ही सोच सकता है कि धूप का चश्मा लगाना बेअदबी है। 
अंग्रेजों के छोड़े हुए इस टोकरे को ढोना बंद करना चाहिए, और हिन्दुस्तान को अपने आपमें एक देश की तरह जीने का आत्मविश्वास दुबारा हासिल करना चाहिए। जब भयानक गर्मी में लोग परेशान हों, तब किसी भी तरह की कोट या जाकिट क्यों इस्तेमाल की जाए? और खासकर जनता के पैसों पर? और खासकर इस देश में जहां एक बड़ी आबादी बिजली के बिना अंधेरे में, गर्मी में रहती है, और काम के औजार भी नहीं चला पाती है। अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए। 

तीन तलाक खत्म करने का वक्त

संपादकीय
3 अप्रैल 2017


तीन बार कहकर तलाक दे देने की मुस्लिम समाज की प्रथा के खिलाफ मोदी सरकार एक सहमति और जनमत तैयार करने की कोशिश कर रही है, और जो लोग भाजपा या संघ परिवार से परे के हैं, और जो लोग मुस्लिमों के बचाव की कोशिश करते रहे हैं, वे आज दुविधा में हैं कि क्या करें? अगर तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की बात करें, तो मुस्लिम समाज के मर्द और मुल्ला नाराज हो सकते हैं, और यह बात उन लोगों को ठीक नहीं लगती जिन लोगों ने राजीव गांधी के वक्त संविधान संशोधन करके शाहबानो की हत्या की थी। शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट ने उसका हक दिलाया था, और मुस्लिम समाज की नाराजगी का हौव्वा दिखाकर कांग्रेस के दकियानूसी नेताओं ने विदेश में पढ़े हुए नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी से संविधान संशोधन करवा दिया था। लेकिन मुस्लिम समाज महज मर्दों से बना हुआ नहीं है, और उसकी आधी आबादी महिलाओं की भी है इसलिए भाजपा को आज उत्तरप्रदेश की चुनावी जीत के बाद यह जरूरी लग रहा है कि वह इस मुद्दे को उठाए क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव के पहले से उठाए गए इस मुद्दे के चलते हुए मुस्लिम महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था।
दरअसल कुछ मुद्दों की साख और विश्वसनीयता इस बात को लेकर कम हो जाती है कि उन्हें कौन उठा रहे हैं। कश्मीर से वहां के पंडितों को आतंक और बलात्कार की धमकी देकर अलगाववादियों ने बेदखल कर दिया था, और आज दशकों बाद भी उनकी अपनी ही जमीन पर वापिसी नहीं हो पा रही है। लेकिन इस मुद्दे का हिन्दू-मुस्लिमकरण ऐसा हो गया था कि भारत के वामपंथियों ने, कांग्रेस पार्टी ने कभी इस नाजुक मुद्दे को छुआ नहीं, और यह मुद्दा मानो हिन्दू संगठनों और जनसंघ-भाजपा का मुद्दा होकर रह गया था। यह सिलसिला ठीक नहीं है। किसी एक धर्म से जुड़े हुए लोगों, या कि उस धर्म के महज मर्दों को खुश रखने के लिए उस धर्म की महिलाओं के हक कुचलते चलना ठीक नहीं है। भारत लगातार कई ऐसे फैसले लेते रहा है जो कि दुनिया के कई मुस्लिमों देशों ने भी नहीं लिए। सलमान रूश्दी की किताब पर रोक लगाने वाला भारत दुनिया का पहला देश था। इसी तरह भारत में आकर शरण लेने वाली लेखिका तसलीमा नसरीन को बंगाल में वामपंथियों की सरकार ने या ममता की सरकार ने घुसने की भी इजाजत नहीं दी क्योंकि उन्हें अपनी मुस्लिम आबादी की नाराजगी का ख्याल था।
लोकतंत्र में यह भी जरूरी रहता है कि किसी समाज को उसकी भावनाओं की आक्रामकता से बाहर लाकर लोकतंत्र और आज के वक्त की नजाकत को समझाया जाए। ऐसा परिवार के भीतर भी जरूरी होता है, और देश के भीतर भी जरूरी होता है। अल्पसंख्यक समुदाय को उसके धार्मिक अधिकारों पर कोई बात हमला न लगे, इसलिए नाजायज बातों को भी जारी रखा जाए, यह बिल्कुल ठीक नहीं है। इस देश में कानून की अदालत ने कई मंदिरों और दरगाहों में महिलाओं का दाखिला करवाया है, सतीप्रथा बंद करवाई है, बाल विवाह बंद करवाए हैं। तीन तलाक का मामला पहला धार्मिक मामला नहीं है जिसमें सरकार, संसद, या सुप्रीम कोर्ट की दखल हो रही है, अलग-अलग समय पर कहीं जानवरों की बलि को रोकने के लिए अदालतें सामने आई हैं, तो कहीं आर्य समाज जैसे संगठन ने धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास को रोकने का काम किया है। आज वक्त आ गया है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके हक दिए जाएं, उन्हें बराबरी का दर्जा दिया जाए। इसलिए तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत है और इसमें किसी धार्मिकता या साम्प्रदायिकता के तर्क आड़े नहीं आने देने चाहिए। 

अदालत या सरकार के फैसले और जमीनी हकीकत उल्टी...

संपादकीय
2 अप्रैल 2017


देशभर में बीते कल से हाईवे के किनारे शराब दुकानों और शराबखानों  पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लागू हो गई है, लेकिन इससे बचने के लिए कई राज्य अपने प्रदेश के प्रादेशिक राज्यमार्गों से यह दर्जा हटा ले रहे हैं, ताकि वहां दारू बिकती रहे। राज्य सरकारों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब के धंधे से आता है, और राजमार्गों के किनारे बनी बड़ी-बड़ी होटलों और शराबखानों पर इस अदालती फैसले की वजह से होटल-बार का कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है। वैसे तो किसी भी जगह बार का लायसेंस आमतौर पर एक-दो बरस के लिए ही मिलता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि होटल-बार पर पूंजी निवेश करने वाले कारोबारियों का अगर कोई नुकसान होने जा रहा है, तो इसके लिए सरकार या अदालत जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बिना शराबखाने के महंगी होटलों का चलना मुश्किल है और छत्तीसगढ़ में ही इस रोक की वजह से दर्जनों बड़ी-बड़ी होटलें दीवालिया हो सकती हैं। देशभर में यह गिनती दसियों हजार कारोबार तक पहुंचेगी।
अदालत के बहुत से फैसले जाहिरतौर पर जनहित के होते हैं, लेकिन उनको लागू करने की रफ्तार, और उसके तरीके जमीनी हकीकत के साथ मेल नहीं खाते। अब जैसे तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुराने इंजनों वाली गाडिय़ों की बिक्री पर एक अप्रैल से रोक की घोषणा कर दी। कारखानों से निकलकर डीलरों तक पहुंच चुकी गाडिय़ों को औने-पौने में दो दिन के भीतर बेचने की कोशिश की गई, और कंपनियों से लेकर डीलरों तक इससे होने वाले नफे-नुकसान के बारे में अदालत ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया।  इससे कारोबार की अर्थव्यस्था में एक ऐसा भूचाल आया जिससे हो सकता है कि कई लोग ना उबर सकें। ऐसा ही एक दूसरा फैसला अखबारों के कर्मचारियों के वेतनमान को लेकर है। वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों की सारी याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें कड़ाई से लागू करने को कहा है। यहां पर दो बातें है, एक तो यह है कि समाचार पत्र उद्योग एक निजी कारोबार है, और इसके वेतन-भत्तों को इतनी बारीकी से तय करके वेतन आयोग ने इस कारोबार के अनगिनत प्रकाशनों के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी की है जिन्हें की यह कारोबार नहीं उठा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इमानदारी और कड़ाई से लागू करने पर कर्मचारियों का जितना भला होगा, उससे कहीं अधिक नुकसान कर्मचारियों का होने जा रहा है। देशभर में अखबार मालिकों ने कई जगह संस्करण बंद कर दिए, और कई जगहों पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, नियमित कर्मचारियों को ठेका-कर्मी बना दिया, और उनकी नौकरी की सुरक्षा खत्म हो गई।
इसी तरह का एक और फैसला यह हुआ है कि महिला कर्मचारी को 6 महीने का प्रसुति अवकाश देने का कानून बना लिया गया है। संसद ने इसे लागू कर दिया है, और अभी से अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों के बीच यह फिक्र खड़ी हो गई है कि क्या इससे लोग महिलाओं को काम पर रखना ही कम कर देंगे? महिलाओं को अधिक अधिकार देने की यह सोच तो अच्छी है, लेकिन यह बाजार की इस हकीकत से मेल नहीं खाती कि किसी संस्थान में महिला कर्मचारियों को रखने के पहले मैनेजमेंट ऐसी प्रसुती के बारे में सोचकर हिचक जाएगा। किसी भी देश में मजदूर के भले के लिए बनाए जा रहे कानून अगर दिखने में आकर्षक हों, और उन्हें लागू करना मुश्किल हो, या की उनकी वजह से लोग किसी खास किस्म के कर्मचारियों को रखने से ही कतराएं, तो उससे समाज का फायदे से अधिक नुकसान होने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के हाईवे के किनारे शराबखाने बंद करने के फैसले से दुर्घटनाओं में कितनी कमी आएगी, यह तो बाद की बात है, लेकिन इससे करीब 10 लाख रोजगार खत्म होने का अंदाज नीति आयोग के जानकार लोगों ने सामने रखा है। अदालत हो या केंद्र सरकार, उनके फैसले जमीनी हकीकत का अंदाज लगाकर ही लिए जाने चाहिए और लागू करने चाहिए।

नक्सल मोर्चे पर बहादुरी का ईनाम 40-50 रूपये !

संपादकीय
1 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव के एक सवाल के जवाब में दर्जनों पन्नों की एक लिस्ट दी है कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में पुलिस और सुरक्षा बल जवानों को बारी के पहले पदोन्नति और ईनाम कैसे-कैसे दिए गए हैं। ऐसी पदोन्नति तो गिने-चुने जवानों की हुई है, लेकिन इस लिस्ट में सैकड़ों ऐसे जवान हैं जिन्हें नक्सल मोर्चे पर मुठभेड़ का पुरस्कार नगद दिया गया है, और यह रकम 40-50 रूपये भी है। चूंकि गृहमंत्री ने विधानसभा में यह जवाब दिया है, इसलिए हम सरकारी आंकड़ों पर शक भी नहीं कर रहे, और बीबीसी के संवाददाता ने ऐसे पुलिस वालों से बात भी की है जिन्हें नक्सल मुठभेड़ के बाद 40-50 रूपए पुरस्कार मिला, और वे इसे अपना अपमान मान रहे हैं।
लोगों को याद होगा कि बहुत से प्रदेशों में किसानों को बाढ़ मुआवजा, फसल बर्बादी का किसी और किस्म का मुआवजा, इसी तरह 10-20 रूपये भी मिला है। सरकार में बैठे लोग कभी-कभी कुछ और तरह की राहत राशि भी 10-20 रूपये के चेक बनाकर बांटते हैं। अब छत्तीसगढ़ के इन आंकड़ों के संदर्भ में हम यह देखकर हैरान हैं कि नक्सल प्रभावित जिलों में तैनात पुलिस का अगर इस तरह से अपमान किया जा सकता है, तो फिर बाकी पुलिस के साथ तो और भी बुरा सुलूक हो सकता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने पंजाब के नामी-गिरामी पुलिस-प्रमुख रह चुके के.पी.एस. गिल को राज्य का सुरक्षा सलाहकार बनाया था, और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह बताया था कि किस तरह बस्तर में तैनात बड़े-बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देकर छोटे पुलिस वाले अपना तबादला नक्सल इलाकों से बाहर करवा लेते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ और भी बहुत कुछ लिखा था, लेकिन बाकी बातें फिर कभी।
राज्य सरकार को तुरंत अपनी दी हुई इस जानकारी के पीछे की वजहों को देखना चाहिए, क्योंकि आज बस्तर या किसी जंगल वाले इलाके में तैनात पुलिस को 50 रूपए में एक महीने मच्छर भगाने की दवा भी नहीं मिलती। ऐसे में अपने कर्मचारियों का मनोबल इस तरह गिराना ठीक नहीं है, और ये आंकड़े अपमानजनक हैं। कुछ जानकार अफसरों का कहना है कि नगद पुरस्कार की यह परंपरा अंग्रेजों के समय से चली आ रही है, और हो सकता है कि यह ईनाम नक्सल इलाकों में बिना नक्सल मुठभेड़, अच्छे कामकाज के लिए दिए गए हों। लेकिन इस तर्क पर भी हमारा मानना है कि एक पुलिस कर्मचारी को 40 रूपये का पुरस्कार देने के लिए जितने तरह के कागज तैयार किए गए होंगे, चेक बनाया गया होगा, या खाते में रकम डाली गई होगी, उसका सरकारी खर्च ही इससे अधिक हो गया होगा। और फिर आज के जमाने में जब 40 रूपए में एक वक्त का नाश्ता ही किया जा सकता है, तब ऐसा पुरस्कार चाहे अंग्रेजों का शुरू किया गया हो, उसे बंद कर देना ठीक है।
लगे हाथों हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जब पुलिस के सम्मान की बात होती है, तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि पुलिस का अपमान रोज कहां-कहां होता है। अफसरों के बच्चे घुमाने से लेकर, अफसरों के कुत्तों को नहलाने तक, पुलिस को कई तरह के अपमानजनक काम में लगा दिया जाता है। राज्य की जनता के पैसों के बेहतर इस्तेमाल के लिए, और पुलिस के सम्मान के लिए यह जरूरी है कि पुलिस का गैर-पुलिसिया इस्तेमाल तुरंत खत्म किया जाए, मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर पुलिस की तैनाती केवल सुरक्षा वजहों से की जाए, और उनका केवल सुरक्षा का काम रहे। शान-शौकत के लिए पुलिस का इस्तेमाल बहुत ही अपमानजनक भी है, और जनता के पैसों की बर्बादी भी है। यह सिलसिला तुरंत थमना चाहिए, और सरकार पुरस्कार की रकम के बारे में बारीकी से सोचे, और या तो रकम बढ़ाए, या ऐसा पुरस्कार खत्म करे।