बेवफाई के पहले आज के खतरों की सोच लेना जरूरी

संपादकीय
31 जनवरी 2017


इन दिनों लगातार इंटरनेट के सोशल मीडिया पर बदला लेने के लिए पोस्ट की गईं तस्वीरें और वीडियो बढ़ते चल रहे हैं। लोग अपने बेवफा साथियों से बदला लेने के लिए बेवफाई के सबूत फैलाकर उनके लिए शर्मिंदगी खड़ी कर रहे हैं, रिश्ते तो टूट ही रहे हैं, समाज में इज्जत भी खत्म हो रही हैं। लेकिन टेक्नॉलॉजी और इस तरह और इतनी रफ्तार से खतरनाक होती जा रही है कि ऐसे खतरे बढ़ते ही चलना है। आज ही एक खबर आई है कि सबसे लोकप्रिय मैसेंजर वॉट्सऐप पर एक नई सहूलियत शुरू हो रही है कि आप अपने करीबी लोगों के साथ यह सुविधा बांट सकते हैं कि आप जहां हैं, आपके फोन से आपकी लोकेशन उन लोगों को दिखती रहे। आज भी फेसबुक जैसे मैसेंजर में यह सुविधा है कि आपके दोस्तों में से कोई अगर आपके आस-पास कहीं हैं, तो आप उन्हें अपने फोन पर देख सकते हैं। मतलब यह कि आप कहां पर हैं, यह बात अब दूसरों तक अपने आप पहुंच सकती है, और आप अपने करीबी लोगों का फोन हाथ लगते ही उनके फोन पर ऐसी सेटिंग कर सकते हैं जिससे बाद में आपको उनकी लोकेशन दिखती ही रहे।
एक वक्त था जब अपने जीवनसाथी या पे्रमी-पे्रमिका पर नजर रखने के लिए लोगों को निजी जासूसों पर खर्च करना पड़ता था। लेकिन आज इंटरनेट पर यह सहूलियत मुफ्त में हासिल है। एक-दूसरे के फोन, एक-दूसरे के सोशल मीडिया अकाउंट, और एक-दूसरे के कम्प्यूटर पर नजर रखकर सब कुछ देखा और जाना जा सकता है, और सारे सुबूत भी जुटाए जा सकते हैं जो कि तलाक से लेकर सजा तक हर किसी बात में काम आ सकते हैं। रोजाना ऐसे कई तलाक हो रहे हैं, और दुनिया भर में शायद लाखों रिश्ते हर दिन टेक्नॉलॉजी की मदद से टूट भी रहे हैं।
यह एक खतरनाक दौर चल रहा है जिसमें सोशल मीडिया और इंटरनेट मिलकर लोगों को बेवफाई के लिए उकसा भी रहे हैं, रास्ते भी सुझा रहे हैं, और जोडिय़ां भी बना रहे हैं। यह सिलसिला बढ़ते जा रहा है, और ऐसी बेवफाई को पकडऩे के औजार भी बढ़ते जा रहे हैं। किसी को इतने भरोसे में नहीं जीना चाहिए कि वे तो बेवफाई कर लेंगे, और उनके जोड़ीदार को पता नहीं लगेगा। आज सार्वजनिक जगहों पर जो कैमरे लगे हैं, उन तक भी लोगों की पहुंच होने लगी है। लोग एक-दूसरे के मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स निकालने लगे हैं, एक-दूसरे के फोन या कम्प्यूटर पर मिटाई जा चुकी चीजों को आसानी से दुबारा हासिल किया जा रहा है।
कुल मिलाकर हम जिस बात पर आना चाहते हैं, वह यह है कि वफादारी ही आज रिश्तों की अकेली गारंटी हो सकती है, और बेवफाई के शौकीन लोगों को रिश्ते खत्म होने और सार्वजनिक जीवन में इज्जत खाने की कीमत पर ही ऐसा खतरा उठाना चाहिए। आज दुनिया में हर दिन कहीं न कहीं सड़क किनारे ऐसे पोस्टर-बैनर लगते हैं जिनमें बेवफाई से जख्मी जीवनसाथी बेवफाई के सुबूतों के साथ आरोप फुटपाथों पर चिपका देते हैं। बेवफा लोगों को ऐसी जगह पर अपनी तस्वीर की कल्पना कर लेना चाहिए, उसके बाद ही निजी जिंदगी में दुस्साहस की सोचना चाहिए।

मुलायम जीवाश्म बन रहे, वैचारिक-वानप्रस्थ बेहतर

संपादकीय
30 जनवरी 2017


उत्तरप्रदेश में कल समाजवादी पार्टी के नए नौजवान मुखिया अखिलेश यादव और कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी के बीच जिस खुले दिल से एका सामने आया, वह भारतीय राजनीति में एक नई शुरुआत है। इसे देखकर यह भी लगता है कि ऐसी किसी नई पहल के लिए एक नई पीढ़ी की जरूरत भी जरूरी होती है जो कि पूर्वाग्रहों से मुक्त हो और खुले दिमाग से सोच सके, आज की भी, और आने वाले कल की भी। दूसरी तरफ कल ही समाजवादी पार्टी से हटाए गए और हार गए अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने इस ताजा गठबंधन पर कहा है कि वे इसके खिलाफ हैं और इसके लिए चुनाव-प्रचार नहीं करेंगे। इन दो अलग-अलग रुखों पर एक साथ नजर डालने की जरूरत है।
बहुत से विचारक यह मानते हैं कि आगे की सोचने के लिए पहले का सीखा हुआ भूलना भी जरूरी होता है। स्लेट को क्लीन किए बिना स्कूली बच्चे भी अगले दिन कुछ नहीं सीख पाते। मुलायम सिंह की स्लेट एक लंबे राजनीतिक जीवन की लिखावट से भरी हुई है। उनके दशकों के अनगिनत तजुर्बे हैं और अनगिनत अधूरी हसरतें हैं। आज भारत के लोकतंत्र में जिस तरह नए राजनीतिक गठबंधनों की बेबसी जरूरी हो गई है, मुलायम सिंह उसे अनदेखा करके अतीत के दंभ में जी रहे हैं। उनके पास बीता हुआ कल है और आने वाले कल को लेकर शायद प्रधानमंत्री बनने की निजी हसरत है। दूसरी तरफ राहुल और अखिलेश के पास आज है, और आने वाले कल के लिए संभावनाएं हैं। ऐसे में मुलायम एक बेहतरीन मिसाल हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर तकरीबन सभी हिंदुस्तानी नेताओं को सक्रिय चुनावी राजनीति से संन्यास लेकर वैचारिक-वानप्रस्थ के लिए क्यों चले जाना चाहिए। मोदी ने भाजपा के भीतर उम्र की यह सीमा लागू कर दी है जो कि बहुत बुरी भी नहीं है।
हमारा मानना है कि आज जमाना जिस रफ्तार से बढ़ और बदल रहा है, उसके साथ-साथ या उसके आगे चलने के लिए महज तजुर्बे का बोझ काफी नहीं हो सकता। ताजा वक्त की जरूरतों और भविष्य की संभावनाओं के लिए एक खुला दिमाग भी जरूरी है। राजनीति में आधी सदी गुजार चुके अधिकतर लोग पूर्वाग्रहों के जीवाश्म होकर रह जाते हैं। ऐसे जीवाश्म पार्टी संग्रहालय के लिए तो ठीक रहते हैं, भविष्य बनाने में अधिक लंबा साथ नहीं दे पाते। कोयले की तरह ऐसे जीवाश्मों को एक आखिरी बार जलकर अपनी पार्टी को ऊर्जा देनी चाहिए लेकिन इतिहासजीवी दंभी नेताओं से सोच बन नहीं पाता।
अखिलेश और राहुल ने एक नई संभावना सामने रखी है और एक सायकिल के दो पहियों जैसी उदार बात कही है। ये दोनों पार्टियां वैचारिक रूप से अप्राकृतिक गठबंधन नहीं बना रहीं, और ये मिलकर अगलेआम चुनाव में एक किसी बड़े गठबंधन की बुनियाद भी बन सकती हैं। देश की भाजपा विरोधी ताकतों को इस गठबंधन के महत्व को समझना चाहिए और इससे तजुर्बा भी लेना चाहिए।

लुभावने घोषणा पत्र देख लगता है कि केन्द्र और राज्यों के चुनाव साथ हों...

संपादकीय
29 जनवरी 2017


पांच राज्यों के चुनावों के मौके पर हर राजनीतिक दल हर राज्य के लिए अलग-अलग घोषणा पत्र जारी कर रहे हैं, और बाकी गैर-चुनावी राज्यों के मतदाता ठगे से देख रहे हैं और ट्वीट कर रहे हैं कि महज पंजाब में ही रियायती घी क्यों दिया जाएगा, हरियाणा में भी तो भाजपा की ही सरकार है। लेकिन ऐसी बातों के बीच यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक जाकर खारिज हो आया कि चुनावों के बीच केन्द्र सरकार को बजट पेश करने से रोका जाए। बाकी पार्टियों का कहना है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ऐसी लुभावनी घोषणाएं कर सकता है जिससे चुनावी-राज्यों के वोट प्रभावित हों।
ऐसे में एक बार फिर वह बात जायज लगती है कि संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं ताकि पूरे पांच बरस केन्द्र या राज्य सरकारें कहीं न कहीं होने वाले चुनावों को देखकर लुभावनी घोषणाओं पर ही जनता का खजाना खर्चने को बेबस न हों। व्यवहारिक दिक्कतों के साथ भी यह एक बेहतर स्थिति हो सकती है कि सारे चुनाव एक साथ हों। इसके साथ एक बात की गारंटी भी करनी होगी कि राज्य सरकारों को भंग करने के केन्द्र के अधिकार को खत्म किया जाए, उसके बिना एक साथ चुनाव महज किताबी बात होगी।
पिछले बरस जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  संसद, विधानसभाओं, और म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव एक साथ करवाने की मंशा जाहिर की थी तब हमने लिखा था कि प्रधानमंत्री की सोच अच्छी है, और उनके पहले भी कुछ लोग ऐसी राय दे चुके हैं, लेकिन तराजू के एक पलड़े में दो दर्जन मेंढकों को एक साथ तौलने की तरह का काम आसान नहीं होगा, और हो सकता है कि मुमकिन भी न हो। इसकी एक वजह यह है कि जब कभी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर राज्य विधानसभा के चुनाव कराने की बात होगी तो कई ऐसे विधानसभाएं होंगी जिनका कार्यकाल पूरा होने के पहले ही वहां चुनाव कराने पड़ेंगे। ऐसे में वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यकाल को घटाने के खिलाफ होगी। दूसरी बात यह भी है कि सांसदों और विधायकों की पेंशन भी सदन के कार्यकाल के साथ जुड़ी हुई होती है। अगर सदन पांच बरस पूरे नहीं कर पाया, तो सांसद-विधायक की पेंशन पर फर्क पड़ता है।
लेकिन सारे राजनीतिक दलों को मिलकर इसका रास्ता निकालना चाहिए। और जिस तरह से कई राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, और कांग्रेस की सरकारें घटती जा रही हैं, कांग्रेस को इस पर शायद अधिक नुकसान न हो। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि एक साथ चुनाव होने से पूरे देश में जिस नेता या पार्टी का माहौल रहेगा, उसकी हवा संसदीय सीट से लेकर वार्ड और पंचायत तक असर डालेगी। अब ऐसे में नरेन्द्र मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जिनका असर देश भर में सबसे अधिक फैला हुआ, सबसे अधिक ताकत वाला दिखता है। हो सकता है कि एक साथ चुनाव की उनकी सोच के पीछे यह भी एक वजह हो, लेकिन हम एक साथ चुनाव के हिमायती इसलिए भी हैं क्योंकि इससे सरकारें जनता को लुभाने के अनावश्यक दबाव के बिना पांच बरस तक कड़े फैसले लेकर भी काम कर सकती हैं।
राष्ट्रपति अगर ऐसे किसी मामले में दिलचस्पी लें, और पहल करें, तो शायद सभी पार्टियों को बिठाकर वे ऐसा करवा सकते हैं। राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के चलते ऐसा करें इसमें शक है, लेकिन ऐसा होने पर देश का फायदा होगा, इसमें हमें कोई शक नहीं है। मोदी जैसे नेता तो आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन देश में चुनाव व्यवस्था में अगर ऐसा बड़ा सुधार हो सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए।

घर के भीतर बहाए जाते लहू को थामने परामर्शदाता चाहिए

संपादकीय
28 जनवरी 2017


पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के रायपुर के अखबार कुछ ऐसे हैं कि उन्हें निचोड़ें तो लहू टपकने लगेगा। और यह लहू भी किसी नक्सल या पेशेवर मुजरिमों के जुर्म से बहने वाला लहू नहीं है, यह परिवार के भीतर निजी जिंदगी में अपनों पर की गई हिंसा का ऐसा लहू है जो कि दिल दहला देता है। अभी दो दिन पहले ही किसी बड़ी अदालत ने यह कहा या लिखा था कि जब तक किसी महिला की दिमागी हालत सामान्य रहती है, वह कभी अपने बच्चों को नहीं मार सकतीं। लेकिन छत्तीसगढ़ में दो दिनों में अपनों पर ही ऐसे जुर्म हुए कि उन्हें ऐसी अदालती परिभाषा से नहीं समझा जा सकता।
एक महिला ने अपनी इकलौती संतान को अपने ही घर की छत पर पानी की टंकी में डुबाकर मार डाला, क्योंकि वह महिला एक स्कूली दोस्त से शादी के बाद भी प्रेम करती थी, और प्रेमी उसे संतान सहित मंजूर करने को तैयार नहीं था। प्रेमी के पास जाने के लिए उसने इकलौती बच्ची को डुबाकर मार डाला। कल ही एक मजदूर ने अपने दो बच्चों को इसलिए फावड़े से मार दिया क्योंकि पत्नी ने साथ में प्रदेश के बाहर के ईंट भ_े पर मजदूरी के लिए जाने से मना कर दिया था क्योंकि वहां पति नशे में उसे पीटता था, गुस्सा उतरा बच्चों पर और उन्हें बाप गणतंत्र दिवस पर स्कूल ले जाने के नाम पर लेकर निकला और सोच-समझकर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया। यह किसी क्षणिक आवेश का नतीजा नहीं था, बल्कि ठंडे दिल-दिमाग से सोचकर ऐसा किया गया। एक दूसरे मामले में पति की मौत से दुखी महिला ने छोटे बेटे के नाम चि_ी छोड़ी कि वह पति के बिना जी नहीं पा रही है, और वह छोटी बच्ची को लेकर फांसी पर झूल गई। इस किस्म की कुछ और घटनाएं भी हैं, जो कि एक साथ सामने आने की वजह से सोचने पर, और यहां लिखने पर मजबूर करती हैं।
छत्तीसगढ़ आमतौर पर कई किस्म के जुर्म से बचा हुआ प्रदेश माना जाता है। यहां पर पंजाब की तरह नशे की लत नहीं है जो कि वहां जानलेवा साबित हो रही है। इस राज्य में केरल की तरह राजनीतिक हिंसा भी नहीं होती कि आरएसएस और सीपीएम के लोग एक-दूसरे का कत्ल करते रहें। यह राज्य मजदूर हिंसा से भी आजाद है, और छत्तीसगढ़ के मजदूर जगत में अगर अकेली हत्या हुई है, तो वह मालिकों ने  एक मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी की करवाई थी, उत्तर-पूर्व या हरियाणा की तरह यहां मजदूर मालिकों या मैनेजरों की हत्या नहीं करते। लेकिन निजी हिंसा और निजी जुल्म यहां पर कम नहीं हैं। इसकी वजह शायद यह है कि इंसानी मिजाज मोटे तौर पर अधिकतर जगहों पर एक सा रहता है, और पति-पत्नी के बीच तनाव में यह राज्य भी पीछे नहीं है। शादी से परे के अवैध कहे जाने वाले संबंध यहां बड़ी आम बात हैं, किसी भी दूसरे राज्य की तरह, और बहुत से मामलों में ऐसे संबंध कत्ल की अकेली वजह रहते हैं। समाज में वैसे तो शादीशुदा जिंदगी के भीतर वफादारी की उम्मीदें अव्यवहारिक होती हैं, और उनका टूटना बहुत से मामलों में सामने आते रहता है, ऐसे में कुछ शादियां टूट जाती हैं, और लोग अपनी-अपनी राह लग लेते हैं, लेकिन कुछ मामलों में लोगों को इतनी नाराजगी होती है, उनका खून इतना खौलता है कि मामला कत्ल तक पहुंच जाता है। ऐसे अधिकतर मामलों में सामान्य समझबूझ के मुजरिम भी यह अंदाज लगा सकते हैं कि कुछ ही दिनों में पुलिस उन तक जरूर पहुंच जाएगी, लेकिन फिर भी लोग ऐसा जुर्म करते हैं।
इस मामले पर लिखने की वजह यह है कि समाज या सरकार, या दोनों मिलकर ऐसे परामर्श केन्द्र उपलब्ध कराएं जहां पर प्रेम संबंधों या वैवाहिक संबंधों के तनाव सुलझाए जा सकें। आज जुर्म के बाद तो पुलिस, अदालत, और जेल का सिलसिला ही रह जाता है, और कैद काटकर निकले हुए लोगों के लिए शायद ही कोई भविष्य बचता है। ऐसे में हत्या या आत्महत्या जैसे तनाव से बचाने के लिए लोगों को सहज-सुलभ परामर्श बहुत कारगर हो सकता है। ऐसे परामर्शदाता जरूरी नहीं है कि मनोचिकित्सक ही हों, क्योंकि उनकी संख्या ही मानसिक रोगियों की जरूरत पूरी नहीं कर पाती है। इनके लिए ऐसे मनोविश्लेषक और परामर्शदाता जरूरी हैं जो कि पारिवारिक संबंधों के भीतर के तनाव को कम करने के रास्ते सुझा सकें। आज जगह-जगह से इम्तिहान की नाकामयाबी के बाद की खुदकुशी सुनाई पड़ती है। हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर भी आ जाती है कि पसंदीदा मोबाइल फोन न मिल पाने पर घर के भीतर नाराज बच्चे ने खुदकुशी कर ली। प्रेम-प्रसंग में तो प्रेमी-जोड़े जगह-जगह पेड़ों पर टंगे दिख जाते हैं। वैध-अवैध प्रेम-संबंध और उसमें कत्ल भी बड़ी संख्या में हो रहे हैं। यह नौबत सरकार को खतरनाक नहीं भी लग सकती है, लेकिन सामाजिक तनाव को आज घटाना शुरू करेंगे, तो उसका असर दिखने में बरसों लग जाएंगे। इसलिए राज्य सरकार को राज्य के विश्वविद्यालयों में परामर्श के कोर्स शुरू करने चाहिए, और मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान के साथ परामर्श की तकनीक पढ़ाकर, सिखाकर समाज को ऐसे लोगों की सेवाएं उपलब्ध करानी चाहिए। 

सेक्स हमले के आरोप वाले राज्यपाल की बर्खास्तगी हो, और जांच के बाद सजा भी..

संपादकीय
27 जनवरी 2017


मेघालय के राजभवन से निकलकर जब वी. षणमुगनाथन कल गणतंत्र दिवस पर मेघालय और अरुणाचल दो राज्यों के राज्यपाल के नाते झंडा फहराने जा रहे थे, तब मेघालय के अखबार उनके सेक्स स्कैंडल की खबरों से भरे हुए थे। उन पर एक महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है कि राजभवन में नौकरी के लिए इंटरव्यू लेते हुए राज्यपाल ने खुद उसे देर शाम अकेले में बुलाया, बाकी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी, और बंद कमरे में उस पर झपट पड़े। इसके साथ ही राजभवन के करीब सौ कर्मचारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पांच पेज की एक लंबी शिकायत भेजी है जिसमें उन्होंने राज्यपाल के सनसनीखेज तौर-तरीकों को खुलासे से गिनाया है कि किस तरह वे रात में केवल महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाते हैं, और किस तरह राजभवन में उनका बेडरूम उनकी चुनिंदा महिलाओं के किसी भी समय आने-जाने की जगह हो गई है। इन कर्मचारियों ने एकमुश्त लिखकर यह मांग की है कि राजभवन की गरिमा को बचाने के लिए तुरंत ही राज्यपाल को बर्खास्त किया जाए। इसके चलते राज्यपाल ने अपना इस्तीफा केन्द्र को भेज दिया है।
राजभवन में अपने किस्म का यह एक अनोखा सेक्स स्कैंडल है जिसमें राज्यपाल खुद महिला कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए बंद कमरे में उनके अलग-अलग इंटरव्यू लेते हैं, अपने निवास से पुरूष कर्मचारियों को हटाकर दफ्तर तक सीमित कर देते हैं, और पूरी रात अपने निवास पर केवल महिला कर्मचारियों की ड्यूटी लगाते हैं और किसी महिला को पुलिस थाने पहुंंचकर राज्यपाल पर सेक्स-हमले के रिपोर्ट लिखाना पड़ता है। इसके पहले भी आन्ध्र के राजभवन से नारायण दत्त तिवारी के सेक्स-टेप फैलने का मामला सामने आया था, और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन उन पर किसी ने देह शोषण का आरोप नहीं लगाया था, और उनके साथ सेक्स-टेप पर जो महिलाएं थीं, वे शायद उनकी परिचित थीं, या पेशेवर वेश्याएं थीं। देह शोषण का किसी राज्यपाल के खिलाफ यह पहला ही मामला हमें याद पड़ता है।
बड़े-बड़े संवैधानिक ओहदों पर पहुंचने वाले लोग जिनके पास यह सहूलियत रहती है कि वे किसी दूसरे देश जाकर सेक्स की अपनी जरूरतों को पूरी कर सकें, जिन्हें कि सरकार जनता के पैसों से इतनी तनख्वाह भी देती है कि वे आपसी सहमति से खरीदे जा सकने वाले सेक्स को खरीद लें, वे लोग भी जब बेरोजगारों का, या बहुत ही नीचे के ओहदों पर काम करने वाले बेबस कर्मचारियों का शोषण करने लगते हैं, और इतने खुले तरीके से राजभवन को बदनामी दिलाते हैं, तो इससे अधिक शर्मनाक और क्या बात हो सकती है? भारत के इतिहास में यह भी याद नहीं पड़ता कि किसी राजभवन के कर्मचारियों ने राज्यपाल पर इस तरह के सेक्स-आरोप लगाकर केन्द्र सरकार को शिकायत भेजी हो, और राजभवन की इज्जत के लिए उसकी बर्खास्तगी मांगी हो। केन्द्र सरकार को न सिर्फ तुरंत इस राज्यपाल को हटाना चाहिए, बल्कि राज्य की पुलिस को इस महिला की शिकायत पर कार्रवाई भी करनी चाहिए। जब मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में वहां के तत्कालीन राज्यपाल का नाम आया था, तब भी हमने उस राज्यपाल की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग की थी। ऐसा न होने पर लोकतंत्र तो वैसे भी जनता के बीच मखौल बना हुआ है, और राजभवनों को भ्रष्टाचार और सेक्स का ऐसा अड्डा बनाने पर लोग राजनीति से, और संवैधानिक-लोकतांत्रिक संस्थाओं से और अधिक नफरत करने लगेंगे। कोई एक राज्यपाल सेक्स-हमले के जुर्म में जेल चले जाए, तो हो सकता है कि उससे देश की और सैकड़ों-हजारों महिलाएं ऐसे हमलों से बच जाएं। 

ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब

संपादकीय
25 जनवरी 2017


बिहार के सत्तारूढ़ जदयू के मुखिया शरद यादव ने एक बार फिर महिलाओं के बारे में एक ओछी बात कहकर यह साबित किया है कि संसद के भीतर वे और बहुत से मुद्दों पर देश में सबसे अधिक समझदारी की बात करने वाले नेता तो हैं, लेकिन वे महिलाओं के बारे में बात करते हुए अक्सर बहक जाते हैं, और शायद कोई मनोविश्लेषक यह बता सके कि क्या इसके पीछे उनकी कोई कुंठा काम करती है जो उनसे ऐसी बकवास करवाती है। उन्होंने वीडियो कैमरों के सामने मंच और माईक पर यह कहा कि वोट की इज्जत बेटी की इज्जत से बढ़कर है। अब इसके बाद जब हंगामा मचा तो कुछ घंटों के भीतर ही उन्होंने इस पर जवाब तो दिया लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और कहा कि वोट और बेटी के लिए मोहब्बत एक सी होनी चाहिए। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा के एक और बड़बोले और बकवासी नेता विनय कटियार ने चुनाव प्रचार में प्रियंका गांधी के बारे में पूछने पर यह कहा कि भाजपा के पास प्रियंका गांधी से कहीं ज्यादा सुंदर प्रचारक हैं। यह कहने का बड़ा साफ मतलब यह है कि प्रियंका गांधी का महत्व उनकी सुंदरता के अलावा कुछ नहीं है, और ऐसा कहकर विनय कटियार ने एक कट्टरतावादी-पुरूषवादी सोच की एक घटिया मिसाल ही सामने रखी हैं।
आमतौर पर तो शरद यादव देश की कई घोर दकियानूसी, साम्प्रदायिक, और महिला विरोधी पार्टियों के मुकाबले कुछ बेहतर राजनीति करते दिखते हैं। उनकी पार्टी ने अभी बिहार में शराबबंदी जैसा एक सकारात्मक फैसला लागू किया है। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं को कभी वे परकटी कह देते हैं, और कभी कोई और ओछी बात कह बैठते हैं। इस एक बयान पर आज हम यहां न लिखते, अगर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आज टीवी की खबरों में और अखबारों में इसी तरह की कुछ और खबरें छाई हुई न होतीं। एक दूसरी खबर बस्तर की है जहां पर पुलिस के सबसे बड़े अफसर पर यह तोहमत लगी है कि वहां काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए जब उन्हें एक दूसरी सामाजिक कार्यकर्ता ने एसएमएस भेजा, तो उसके जवाब में उन्होंने संक्षिप्त शब्दों में एक गाली लिख भेजी। यह वही बस्तर है जहां पुलिस और सुरक्षाबलों पर महिलाओं से बड़ी संख्या में बलात्कार के आरोप राष्ट्रीय महिला आयोग ने सही पाए हैं, और उनकी जांच शुरू की है। इसके पहले अदालतों ने भी यह पाया है कि बस्तर मेें तमाम आदिवासियों, और खासकर महिलाओं के साथ सुरक्षा बल की कई तरह की हिंसा चल रही है। इसी बस्तर में कल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह संविधान लागू होने की सालगिरह के गणतंत्र दिवस का झंडा फहराएंगे, और यही पुलिस उनको सलामी भी देगी। अब सवाल यह उठता है कि बीते कल बालिका दिवस मनाया गया, और उसी दिन बस्तर पुलिस का सबसे बड़ा अफसर एक बेकसूर महिला आंदोलनकारी के एक लोकतांत्रिक संदेश के जवाब में उसे सबसे गंदी गाली लिखकर भेज रहा है, तो ऐसे में किसी संविधान का जलसा मनाने का क्या मतलब रह जाता है?
भारत में जब तक कानून के लिए लोगों के मन में सम्मान न रहे, यह बेहतर होगा कि वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का जलसा न मनाएं। इस देश में जो सबसे कमजोर तबके हैं, उनके साथ सबसे अधिक जुल्म है। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, और गरीबों के साथ जुल्म की कहानियां खत्म ही नहीं होती हैं। सरकार की अनगिनत एम्बुलेंस मौजूद हैं, और देश के कई प्रदेशों में लगातार लोग अपने बीमार को ढोकर ले जाते दिखते हैं, अपने मुर्दों को ढोकर ले जाने को मजबूर रहते हैं। सरकारी अफसर कुर्सियों पर बैठे, या कुर्सियों से नदारद रहकर जनता का पैसा बर्बाद करते हैं, और जो सबसे कमजोर जनता है, उसके मानो कोई हक ही नहीं रहते। इस देश का संविधान ऐसी व्यवस्था के लिए नहीं बनाया गया था, और दुनिया भर के लोगों को इस देश में बुलाकर, इसके प्रदेशों में बुलाकर आत्मप्रशंसा के भाषणों से देश की बदहाली और हैवानियत की तस्वीरें नहीं छुपती हैं। स्वतंत्रता दिवस हो, या गणतंत्र दिवस, जब कभी ऐसे मौकों पर संविधान का गुणगान किया जाता है, तो वह गुणगान इतना पाखंडी लगता है कि लोगों को संविधानतले कुचलने से हुए जख्म और याद आने लगते हैं। इस देश में सत्ता को जनता के बुनियादी हकों का सम्मान करना सीखना होगा, वरना संविधान के सम्मान का कोई मतलब नहीं है।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में जिसके हाथ सत्ता की ताकत आ जाती है, वे मोटे तौर पर जुल्मी होने लगते हैं। ताकत लोगों को खूंखार बना देती है, बेरहम बना देती है, और हिंसक बना देती है। संविधान नाम की किताब को सत्ता पर बैठे लोग मेज के नीचे पांवों को रखने के लिए बनाए गए पटे की तरह इस्तेमाल करते हैं, और ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब है। 

कर्नाटक में मंत्री-नेता से मिले 162 करोड़ से उठे सवाल

संपादकीय
24 जनवरी 2017


कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और वहां पर लघु उद्योग मंत्री, और कांग्रेस की महिला शाखा की प्रदेश अध्यक्ष पर आयकर के छापे पड़े जिसमें 41 लाख रूपए नगद मिले, एक दर्जन किलो से अधिक सोना मिला, और करीब 162 करोड़ की संपत्ति मिली है। यह बात महज कांग्रेस तक सीमित नहीं है, और महज कर्नाटक तक सीमित नहीं है। अभी तो जितनी दौलत मिली है, इससे कई गुना अधिक खर्च कर्नाटक में भाजपा के मंत्री रहे हुए रेड्डी ने अपने घर की शादी में अभी पिछले महीनों में ही किया है, ऐसी खबरें हैं। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कर्नाटक का सबसे बड़ा खनिज माफिया बने हुए रेड्डी बंधु, अपने सिर पर सुषमा स्वराज का हाथ रखे हुए तस्वीरें सहेजकर रखे हुए हैं, और एक वक्त वे कर्नाटक में भाजपा की सरकार को गिराने की हालत में थे। इसलिए इतनी बड़ी रकम और इतनी दौलत मिलना केवल कांग्रेस का कुकर्म नहीं है, राजनीति और सरकार में बहुत से लोग ऐसे हैं जो इस तरह सैकड़ों करोड़ के मालिक बने हुए हैं। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश में आईएएस अफसरों का एक जोड़ा इसी तरह से सैकड़ों करोड़ की रकम और पूंजी निवेश के साथ पकड़ाया था।
अब सवाल यह उठता है कि केन्द्र सरकार काले धन पर जिस मार और वार की बात करती है, क्या वह इसी रफ्तार से चलेगा कि लोग जब लाखों-करोड़ कमा लेंगे, तब जाकर सैकड़ों करोड़ जब्त किए जाएंगे, और जब्ती के ऐसे अधिकतर मामले इंकम टैक्स से आखिर में छूट जाएंगे। कालेधन पर कार्रवाई का नारा बड़ा सुहावना है, और इसके चलते जब नोटबंदी की कई-कई दिन-रात चलने वाली कतारें लगीं, तो भी लोगों को लगा कि कालेधन पर कार्रवाई देशद्रोहियों पर कार्रवाई है, और इसलिए लोगों ने कतार में लगने की तकलीफ को राष्ट्रप्रेम मान लिया, और तकलीफ बर्दाश्त कर ली। लेकिन बाजार के जानकारों का यह अंदाज है कि सैकड़ों काले-अरबपतियों में से दर्जन भर पर भी कार्रवाई नहीं होती है, और वह कार्रवाई ऐसे वक्त पर ऐसे अंदाज में होती है कि उसमें से अधिकतर लोग अपना अधिकतर कालाधन बचा लेते हैं।
भारत में टैक्स लगाने के तरीके, टैक्स चोरी पर निगरानी और उसे पकडऩे के तरीके, और पकडऩे के बाद उसे जुर्माने या सजा तक पहुंचाने के तरीके बहुत ही कमजोर है। हालत यह है कि तनख्वाह पाने वाले लोग एक पैसा भी टैक्स छुपा नहीं पाते, बचा नहीं पाते। दूसरी तरफ उनसे सैकड़ों गुना अधिक कमाने वाले लोग टैक्स देने से ही बच जाते हैं। भारत में टैक्स की पूरी प्रणाली को ऐसा बनाने की जरूरत है जिससे कि इस किस्म की सारी चोरी रूक सके जो कि कारखानों से आबकारी शुल्क की चोरी से शुरू होती है, और आयकर की चोरी तक लगातार जारी रहती है। ऐसे में कालेधन पर कार्रवाई का नारा महज चुनावी और राजनीतिक नारा अधिक रहता है, भारत की टैक्स व्यवस्था में कालेधन पर कोई कार्रवाई मुमकिन ही नहीं दिख रही है। आयकर विभाग का पूरा ढांचा इतना बड़ा नहीं है कि वह देश भर के टैक्स चोरों पर नजर भी रख सके, या कार्रवाई कर सके। इसलिए सरकार को एक बुनियादी फेरबदल के बारे में सोचना चाहिए जिससे कि टैक्स चोरी की शुरूआत ही न हो सके। ऐसे मामले में अमरीका जैसे देश से कुछ सीखा जा सकता है, जहां पर कि टैक्स चोरी आमतौर पर सुनाई नहीं देती है, और टैक्स चोरी पकड़ाने पर जहां कैद की सजा का इंतजाम है।
लेकिन कर्नाटक में जो मामला सामने आया है वह आयकर विभाग ने पकड़ा जरूर है, लेकिन वह राजनीति और सरकार में भ्रष्टाचार का एक सुबूत दिखता है। यह पूरा का पूरा मामला टैक्स चोरी से अलग सीधे भ्रष्टाचार का है, और ऐसे भ्रष्टाचार के बारे में हम बार-बार यह लिखते आए हैं कि इसके लिए कैद का इंतजाम जब तक सरकार नहीं करेगी, तब तक रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को थामना मुमकिन नहीं होगा। राजनीति की सत्ता वाली कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को ऐसे आर्थिक अपराधों के लिए, भ्रष्टाचार और टैक्स चोरी के लिए अधिक और कड़ी सजा का इंतजाम करना होगा, तब जाकर कैद में बैठे हुए कुछ लोगों को सही अक्ल आ सकेगी। आज देश भर में वामपंथियों को छोड़कर बाकी तकरीबन तमाम पार्टियों में ऐसे दर्जे का भ्रष्टाचार आम बात है, और देश को लूट लिया जा रहा है। ऐसी राजनीति के चलते हुए देश में कालाधन कभी खत्म नहीं हो सकता, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब तक सत्ता को रिश्वत देना कारोबार की मजबूरी रहेगी, तब तक कारोबार बिना कालेधन के नहीं चल सकेगा। इसलिए भ्रष्टाचार को गोमुख पर ही रोकना होगा, वरना हुगली तक पहुंचते हुए पानी ऐसा हो चुका रहता है कि उसे वहां पर साफ नहीं किया जा सकेगा। 

अपने खुद के ताने-बाने जलाते और दूसरों पर बम गिराते आभासी-लोकतंत्र

आजकल
23 जनवरी 2017  
अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने के पहले तक बाकी दुनिया के लोगों को, और खुद अमरीका के भीतर के वोटरों को ऐसा लगता था कि ट्रंप जीत नहीं पाएगा। जिस तरह से वह अमरीकी कानून का फायदा उठाकर कई बार अपने कारोबार को दीवालिया घोषित करके टैक्स का फायदा उठाते रहा, कैसिनो जैसा धंधा करते रहा, संकीर्णतावादी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी का नेता रहते हुए जिसका चाल-चलन बदनाम रहा, जिसकी हरकतें अश्लील, फूहड़, हिंसक, और अमानवीय रहीं, जिसकी सोच 18वीं सदी की, लोकतंत्र से पहले की रहीं, जिसका निजी जीवन संकीर्ण जीवन-मूल्यों से उल्टा रहा, वह चुनाव जीत गया, और आज अमरीका का राष्ट्रपति है। बहुमत ने उसे चुना, और बहुमत के फैसले को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हुए।
लोकतंत्र जिस बहुमत की पसंद की बुनियाद पर टिका हुआ है, क्या वह सचमुच लोकतंत्र है? यह सवाल अमरीका से परे हिन्दुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में और अलग-अलग लोकसभा या विधानसभा सीटों पर बार-बार उठ खड़े होते हैं। जिन लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तानी जनता एक काबिल और ईमानदार प्रतिनिधि चुनना चाहती है, उनकी यह सोच उनकी एक हसरत जरूर हो सकती है, हकीकत नहीं है। हकीकत तो यह है कि अधिकतर सीटों पर जीत को या तो ताजा भुगतान से नगद खरीदा जाता है, या फिर बिना नगदी के धर्म और जाति के आधार पर हासिल किया जाता है। कुछ अधिक पेशेवर सांसद और विधायक, और अब तो पार्षद और पंच-सरपंच भी, ऐसे होते हैं जो कि पांच बरस तक किस्तों पर ऐसी जीत को खरीदते हैं, और कुछ बकाया भुगतान आने वाले पांच बरस में भी धीरे-धीरे करते हैं।
ट्रंप को ही कोसना, और अमरीकी वोटरों को जाहिल कहना इसलिए ठीक नहीं है कि खुद हिन्दुस्तान में ऐसी अनगिनत वजहें हैं जो कि सारी की सारी बुरी हैं, लेकिन वे चुनाव जीतने के लिए काम बहुत आती हैं। और फिर हम जीत के आंकड़ों को देखें, तो किसी एक सीट से जीत से लेकर किसी प्रदेश या देश में किसी एक पार्टी या गठबंधन की जीत तक, नंबर एक और नंबर दो का फासला इतना कम रहता है, और जीतने वाले को भी मिले हुए वोट घर बैठे वोटरों की गिनती से इतने अधिक होते हैं, कि मतदाता की पसंद कही जाने वाली चीज के पास ऐसा कोई सुबूत नहीं होता कि वह सचमुच मतदाता की पसंद है। हिन्दुस्तानी चुनाव पसंद न बताने वाले घर बैठे वोटर तय करते हैं, मैदान में उतरे हुए दूसरे, तीसरे, और चौथे नंबर के उम्मीदवार वोटों को बांटकर, वोटकटवा होकर तय करते हैं, मैदान में उतारे गए फर्जी नीयत वाले उम्मीदवार टक्कर के उम्मीदवार के थोड़े-बहुत धर्म-जाति-आधारित वोटों को नोंचकर तय करते हैं। इसलिए भारत की चुनावी जीत का देश के मतदाताओं के बहुमत से कोई लेना-देना नहीं रहता। जीत का यह झांसा कुछ उसी तरह का रहता है जिस तरह कि कोई भारत-सुंदरी बन जाती है, जो कि देश की सबसे खूबसूरत युवती कहलाती है, हालांकि वह महज उन लोगों के बीच अधिक सुंदर रहती है, जो कि मुकाबले में उतरी होती हैं, न कि देश की बाकी युवतियों से अधिक सुंदर।
हम फिर से चुनावों की तरफ लौटें तो यह बात साफ दिखती है कि भारत की अधिकतर सीटों पर नतीजे इस बात से तय होते हैं कि उम्मीदवार का धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है, वह लोगों पर कितना खर्च करने की ताकत रखता है, और वह बाहुबल से या सरकार पर अपने दबदबे से कितने गलत फैसले करवा सकता है, कितने गुनहगार छुड़वा सकता है, कितने बेकसूर अंदर करवा सकता है। चुनाव के वक्त वह कितना खर्च कर सकता है, और चुनाव के बाद उसके पास जाने पर वह जरूरतमंद को कहां से कितना पैसा दिला सकता है, या दे सकता है। ये सारी बातें वोटरों के बीच भारी मायने रखती हैं। इसलिए अब हिन्दुस्तानी चुनाव न सिर्फ वोट के वक्त दी गई रिश्वत से तय होते हैं, बल्कि पिछले बरसों में नेता के किए हुए पूंजी निवेश से भी तय होते हैं, और आने वाले बरसों के लिए लोगों को मिलने वाले दिलासे से भी तय होते हैं।
ऐसे में भारत जैसा लोकतंत्र वोटर लिस्ट से लेकर वोट मशीन तक के मामले में तो एक माहिर मशीन बन चुका है, लेकिन बाकी बातों को अगर ध्यान से देखा जाए तो किसी एक सीट से लेकर पूरे प्रदेश या पूरे देश तक का फैसला निहायत ही अलोकतांत्रिक बातों से तय होता है। दिक्कत यह है कि भारत में चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र महज इसलिए मान लिया जाता है कि इसकी मशीन के कलपुर्जे अब ऐसे कस चुके हैं कि वे बड़ी चिकनाई से अपना काम करते हैं, और मशीन को लोकतंत्र मानने का झांसा लोग अपने आपको देते रहते हैं।
हम मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ को लें, जहां पर कि पिछले विधानसभा चुनाव में जीतने वाली पार्टी भाजपा, और हारने वाली पार्टी कांग्रेस के बीच वोटों का फासला महज पौन फीसदी था। अब लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र को अगर देखें कि वहां पर कौन सी नाजायज बातों से पौन फीसदी का ऐसा फासला बना होगा, तो हर सीट पर ऐसे दो-दो, चार-चार मुद्दे दिख जाएंगे जिनकी वजह से ऐसा फासला हुआ होगा। इसलिए चुनावी जीत को लेकर अगर अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा था कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, तो वह बात एक हद तक सही है। वह बात दिग्विजय सिंह को बड़ी आलोचना इसलिए दिला गई थी कि वह लोगों के लोकतंत्र पर घमंड को चोट पहुंचाती थी, लेकिन हकीकत यह है कि वही बात हकीकत है, और घमंड में कोई सच्चाई नहीं है, लोकतंत्र कहीं भी देश को सचमुच की पसंद नहीं देता, बेहतर पसंद नहीं देता, और सबसे अच्छी पसंद तो बिल्कुल भी नहीं देता। इसीलिए बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार के वे हकदार होते हैं।
आज भारत के लोकतंत्र में चुनाव लडऩा, जीतकर आना, और फिर अगले चुनाव की जीत की संभावना बनाए रखना, यह सब कुछ इतना मुश्किल काम हो गया है, और ऐसे कड़े मुकाबले का काम हो गया है कि उससे ईमानदारी बाहर हो गई है। इसे समझना हो तो कारोबार की जुबान में समझ सकते हैं कि जिस औद्योगिक-बाजार में अधिकतर कारखाने चोरी की बिजली पर चलते हों, चोरी और टैक्स चोरी के कच्चे माल पर चलते हों, जहां वे एक्साईज-चोरी पर चलते हों, जहां वे मजदूर कानूनों, पर्यावरण कानूनों को तोड़कर चलते हों, वहां पर कोई अगर यह सोचे कि वह ईमानदारी से और सारे नियम-कायदों के तहत कारखाना चला ले, तो उनका धंधा बंद होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। भारत के लोकतांत्रिक चुनावों में ठीक ऐसी ही नौबत रहती है जहां सारे कायदों को तोड़कर, सारी ईमानदारी को छोड़कर लोग चुनाव लड़ते हैं, और उन्हीं तमाम बातों की मदद से जीतते हैं, जिन बातों को लोकतंत्र नाजायज मानता है।
ट्रंप से लेकर हिन्दुस्तान तक, लोकतंत्र एक झांसा बन गया है, एक ऐसा झांसा जो कि अपने भीतर अपने लोगों के बीच नफरत की लपट से ताने-बानों को जलाने पर उतारू है, जलाते चल रहा है, और दूसरी तरफ अपने इस आभासी (वर्चुअल) लोकतंत्र का दंभ भरते हुए जो दूसरे देशों पर बम गिराकर लाखों बेकसूर भी मार रहा है।

महिला कर्मचारी की प्रताडऩा पर बड़े रेल अफसर जेल भेजे जाएं

संपादकीय
23 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रेलवे के एक बड़े दफ्तर के कर्मचारियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम में जब देर रात एक महिला कर्मचारी ने एक बड़ी अफसर के साथ गाना गाने से यह कहकर इंकार किया कि इस गाने की उसकी तैयारी नहीं है, तो उसे अनुशासनहीनता मानकर नोटिस दिया गया, और उसका तबादला कर दिया गया। इस नोटिस की जुबान देखें तो ऐसा लगता है कि उस महिला ने कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया। उसे यह गिनाया गया कि उसे सांस्कृतिक कोटे से नौकरी मिली थी, इसलिए वह गाना गाने से मना नहीं कर सकती। अभी तक की जो खबरें हैं उनमें ऐसी चर्चा है कि इस महिला को रेलवे के सबसे बड़े एक अफसर के साथ एक बहुत ही अश्लील और फूहड़ गाना गाने के लिए मजबूर किया जा रहा था, और उसने इससे इंकार कर दिया। यह बात मीडिया मेें आई तो अफसरों के हाथ-पांव फूले, और आनन-फानन इस कार्रवाई को रद्द किया गया।
राज्य के महिला आयोग ने इस घटना का नोटिस लेने में बहुत देर की, जबकि उसे जितने साधन-सुविधा मिले हुए हैं, उसे तुरंत ही इस महिला तक पहुंचना था, और उसका साथ देना था। दूसरी बात यह कि रेलवे के इस अफसर के खिलाफ कई तरह के जुर्म दर्ज होने चाहिए। महिला आयोग को तो जुर्म दर्ज करना ही चाहिए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को भी इस मामले पर इन अफसरों को अदालत में खड़ा करना चाहिए, और इन पर प्रताडऩा का मुकदमा अदालत को खुद को शुरू करना चाहिए। इस महिला के मामले में तो रेलवे बुरी तरह फंस गया है, और उसे तुरंत अपने तौर-तरीके सुधारने पड़े, और कार्रवाई वापिस लेनी पड़ी, लेकिन महिला कर्मचारियों के साथ केन्द्र के संस्थानों मेें, राज्य सरकार के संस्थानों मेें, और निजी संस्थानों में भी शोषण और ज्यादती एक आम बात है। छत्तीसगढ़ में ही एक महिला सिपाही ने आईजी स्तर के इतने बड़े अफसर के खिलाफ शिकायत की, वह शिकायत सही निकली, लेकिन राज्य सरकार उस पर कोई कार्रवाई करने से कतरा रही है। फाइलें एक टेबिल से दूसरे टेबिल पर जा रही है, और इससे राज्य की महिला कर्मचारियों के बीच संदेश यही जाता है कि उनकी शिकायत से किसी बड़े अफसर का आसानी से कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। ऐसी कितनी महिला कर्मचारी हो सकती हैं जो कि ऐसी लंबी और कड़ी चढ़ाई वाली लड़ाई लडऩे का दमखम रखती हों?
राज्य सरकार को महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपनी नीति एकदम साफ करनी चाहिए। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और इससे कामकाजी महिलाओं के बीच आत्मविश्वास पैदा नहीं हो सकेगा। एक तरफ तो राज्य सरकार महिलाओं के सरकारी नौकरी में दाखिले की उम्र सीमा में बहुत बड़ी छूट देकर उन्हें बढ़ावा देना चाहती है, दे रही है, दूसरी तरफ महिलाओं की प्रताडऩा करने वाले मंत्री, विधायक, या अफसर खुले घूमते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं दिखने पर सामाजिक असमानता बढ़ते चलती है। हमारा तो यह भी मानना है कि रेलवे कर्मचारी पर ऐसी कार्रवाई की खबर आने पर राज्य सरकार को भी इस बारे मेें केन्द्र सरकार को लिखना था, और कड़ी कार्रवाई की मांग करनी थी। लेकिन पहले राज्य सरकार अपने पास दर्ज मामलों पर कार्रवाई कर चुकी होती, तो उसे ऐसा नैतिक अधिकार भी होता। फिलहाल सामाजिक मोर्चों पर भी ऐसे मामलों को उठाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अकेली न रह जाएं।

इंटरनेट पर बच्चों का पोर्नो ढूंढते और बांटते हिन्दुस्तानी

संपादकीय
22 जनवरी 2017


इंटरनेट पर चीजों को ढूंढने पर आई एक रिपोर्ट में भारत के कई शहरों के नाम आए हैं कि वहां के लोग किस तरह बच्चों की नंगी तस्वीरों को आगे बढ़ाते हैं, बांटते हैं, ढूंढते हैं, और सहेज कर रखते हैं। ऐसे अलग-अलग लोगों की जानकारी जुटाकर अमरीका, और योरप के देशों में सरकारी जासूस लोगों तक पहुंचते हैं, और उन्हें गिरफ्तार भी करते हैं। जो आंकड़े अभी सामने आए हैं उनके मुताबिक देश में ऐसी सामग्री ढूंढने और दूसरों के साथ साझा करने वाले लोगों में अमृतसर सबसे आगे है, और उसके बाद दिल्ली, लखनऊ ऐसे शहर हैं।
इस बात से हिन्दुस्तान के लोगों को चौकन्ना होने की जरूरत इसलिए है कि आज भी इस देश में अगर बच्चे अपने यौन शोषण की शिकायत मां-बाप से करते हैं, तो उनमें से अधिकतर को झिड़की मिलती है, और डांटकर चुप करा दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि ऐसे बच्चे दुबारा ऐसा होने पर उसकी शिकायत करने का हौसला भी नहीं जुटा पाते। लेकिन अनगिनत ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें कहीं स्कूलों में शिक्षक ही बच्चों से बलात्कार कर रहे हैं, और अभी चार दिन पहले की खबर है कि किस तरह एक स्कूल में प्रिंसिपल और शिक्षकों ने मिलकर बलात्कार किया। इसलिए अच्छा लगे या न लगे, हिन्दुस्तानियों को यह मानना होगा कि बच्चों का यौन शोषण हिन्दुस्तान में अपनी खुद की एक हकीकत है, और यह विदेश से आयातित कोई बीमारी नहीं है, यह न तो शहरी है, और न ही आधुनिक जीवन से इसका कोई लेना-देना है। जहां-जहां बच्चे हैं, और जहां-जहां उनके साथ सेक्स सोचने वाले दिमागी रूप से बीमार लोग हैं, वहां-वहां बच्चे खतरे में हैं।
आज हिन्दुस्तान में लगातार सेक्स-शिक्षा के खिलाफ झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाने वाले लोग दिखते हैं। वे ऐसी शिक्षा को या सावधानी को पश्चिमी सभ्यता का असर मानते हैं, और किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों को भी उनके बदन के बारे में, बदन की जरूरत के बारे में जागरूक करने के खिलाफ हैं। ऐसी अवैज्ञानिक सोच के चलते हुए यह देश अपनी नौजवान पीढ़ी को, और उससे भी कमउम्र के बच्चों के पीढ़ी को खतरे में डाल रहा है। यह खतरा सिर चढ़कर नहीं दिखता, यह खतरा दबा-छुपा रहता है, और बच्चों की दिमागी हालत को बहुत बुरी तरह जख्मी करता है। इंटरनेट पर सर्च के जो आंकड़े कम्प्यूटर ही ढूंढकर निकाल देता है, वह अपने आपमें एक सुबूत है कि किस तरह हिन्दुस्तान के लोग इस तरह की मानसिक विकृति का शिकार हैं, और वे बाकी दुनिया से अलग किसी और दुनिया के इंसान नहीं हैं। ऐसी मानवीय कमजोरी और मानसिक बीमारी से निपटने के लिए सरकारी जासूस कहीं भी काफी नहीं हो सकते, इससे निपटने के लिए बच्चों को और किशोर-किशोरियों को जागरूक करना ही अकेला रास्ता है। यह जब तक नहीं होगा, तब तक भारत ऐसे खतरे झेलते ही रहेगा।

संघ नेता के आरक्षण विरोधी बयान का दाम भाजपा देगी

संपादकीय
21 जनवरी 2017


बिहार चुनाव के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख ने आरक्षण के खिलाफ एक बयान दिया था, और बाद में संघ और भाजपा उसे सुधारने की कोशिश करते-करते थक गए, लेकिन बात बनी नहीं। जो नुकसान होना था, वह विधानसभा चुनाव में भाजपा को झेलना पड़ा। अब उत्तरप्रदेश चुनाव के ठीक पहले जयपुर के एक साहितय महोत्सव में आरएसएस के मनमोहन वैद्य ने आरक्षण खत्म करने की चर्चा छेड़ते हुए कई बातें कहीं, और उन्हें लेकर एक नया बवाल खड़ा हो गया है। यह याद रखने की जरूरत है कि देश के किसी भी और राज्य के मुकाबले उत्तरप्रदेश में आरक्षण एक बहुत बड़ा मुद्दा है, और आरक्षित तबकों की राजनीति करने वाली बसपा की मायावती इसी प्रदेश से राज करने के लिए आती हैं। पहले भी वे यहां पर मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और उनकी पार्टी का सबसे बड़ा जनाधार इसी प्रदेश में है।
आज दिक्कत यह हो गई है कि विशुद्ध रूप से एक साहित्य के कार्यक्रम में भी संघ के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने एक निहायत सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे को छेड़कर न सिर्फ साहित्य महोत्सव पर चर्चा को मोड़ दिया, बल्कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा को इसका जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। इसकी एक और वजह भी है कि पिछले दो बरस में भाजपा और संघ परिवार के संगठनों ने लगातार गोरक्षा के मुद्दे पर, खानपान और पहरावे के मुद्दे पर जिस तरह की एक शुद्धतावादी और सवर्ण सोच को आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाया है, उससे भारत के अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, पिछड़े तबके के लोग, और महिलाओं के बीच एक बड़ी दहशत फैली है, और तनाव फैला है। ऐसा लगने लगा कि देश को 21वीं सदी से वापिस घसीटकर 18वीं सदी की ओर ले जाने की कोशिश हो रही है, और कुछ दिनों में हो सकता है कि सतीप्रथा के हिमायती भी बयान देने लगें।
यह पूरा माहौल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उन दावों के ठीक खिलाफ जाता है जिनमें वे भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में दुनिया के तीन सबसे बड़े देशों में पहुंचता हुआ बताते हैं। भारत के समाज को टुकड़ों में बांटकर, और बड़ी-बड़ी आबादी वाले तबकों को बुरी तरह से कुचलकर कोई अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। देश में सामाजिक तनाव बढ़ाया जा रहा है, और अर्थव्यवस्था इसकी वजह से चौपट हो रही है, लोगों का मनोबल टूट रहा है, और देश के भीतर वैज्ञानिक सोच खत्म हो रही है। ऐसे कई किस्म के नुकसान अनदेखा करके अब आरक्षण के खिलाफ जो बयान आया है, वह बहुत ही खराब है, सामाजिक समानता के खिलाफ है, और इसका नुकसान महज भाजपा को ही उठाना पड़ेगा, क्योंकि संघ खुद तो चुनाव लड़ता नहीं है।

दूसरों की त्रासदी, अपनी सेल्फी में बेजा इस्तेमाल

संपादकीय
20 जनवरी 2017


सेल्फी लेने की बीमारी के कुछ लोगों का इलाज दिल्ली के एम्स में चल रहा है। और पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान सेल्फी लेने के बावलेपन को एक मानसिक बीमारी मानकर लोगों को उससे आगाह कर रहा है। लोग रेल पटरियों पर कटने का खतरा उठाते हुए अपनी तस्वीरें खींच रहे हैं, और बहुत से लोग रेलगाडिय़ों की छत पर बिजली के तारों के नीचे जान देते हुए भी अपनी तस्वीरें ले रहे हैं। मोबाइल फोन के कैमरों ने लोगों को आत्ममुग्ध होने का एक औजार दे दिया है, जिसे कि लोग हथियार की तरह भी इस्तेमाल कर रहे हैं। अभी जर्मनी से बर्लिन के उस स्मारक की तस्वीरें आई हैं जहां पर हिटलर-राज के दौरान मारे गए लाखों यहूदियों के सम्मान में अफसोस की याद बनाई गई है, और वहां पर दफनाए गए यहूदियों की कब्रों पर कूद-कूदकर लोग अपनी तस्वीरें ले रहे हैं, और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। जर्मन इतिहास में लाखों बेकसूर यहूदियों को मारकर हिटलर ने दुनिया का एक सबसे बड़ा हत्याकांड किया था, और उसे महज मौज-मेले की जगह मानकर लोग तफरीह कर रहे हैं, और उस जगह की गंभीरता को समझे बिना, इतिहास की हैवानियत से नावाकिफ बने हुए अपनी सेल्फी ले रहे हैं, साथियों की तस्वीरें ले रहे हैं।
दरअसल इंसानी मिजाज होता ही ऐसा है। वह दूसरे लोगों के दुख-तकलीफ से जुड़ नहीं पाता। कुछ देर तक तो इंसान दूसरों से हमदर्दी का नाटक कर लेते हैं, लेकिन श्मशान में भी एक बार अर्थी को जमीन पर उतार दिया गया, तो उसके बाद लतीफे शुरू होने, अश्लील बातचीत का सिलसिला छिडऩे, और मृतक के परिवार के बारे में भी तमाम किस्म की बुरी बातें करने से किसी को परहेज नहीं रह जाता। लोग वहां पर हंसते और ठहाके लगाते भी देखे जा सकते हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि छत्तीसगढ़ में जब नसबंदी कांड में बिलासपुर में बड़ी संख्या महिलाएं मारी गई थीं, और मुख्यमंत्री उनको देखने अस्पताल पहुंचे थे, तो वहां के स्वास्थ्य मंत्री और स्थानीय मंत्री अस्पताल के भीतर ही जोरों से हंसते हुए समाचार-कैमरों पर कैद हुए थे, और टीवी की खबरों में उनकी हंसी कई दिन तक दिखती रही थी।
लोग दूसरों की तकलीफ से बहुत ही सतही तरीके से जुड़ते हैं। अंग्रेजी और हिन्दी, या उर्दू के कई ऐसे शब्द हैं जो ऐसे लोगों की सोच बताते हैं। अंग्रेजी में एक शब्द है सिम्पैथी, जिसका मतलब होता है हमदर्दी, और दूसरा शब्द है इम्पैथी, यानि सच की हमदर्दी। ऐसा फर्क बाकी भाषाओं में भी रहता है, लेकिन असल जिंदगी में लोग हमदर्दी जताने को हमदर्द होना मान लेते हैं। हमदर्द होना एक अलग ही खूबी रहती है, और वह हर किसी में नहीं रहती। जो लोग बर्लिन के इस नस्लीय कत्लेआम के स्मारक पर जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम रहता है कि वहां किस तरह इतिहास का सबसे खूनी पन्ना दफन है। फिर भी उन्हें वह तकलीफ छू नहीं जाती। और जब ऐसी संवेदनशून्यता के साथ लोगों में अपनी तस्वीरों को खींचने और फैलाने का मोह जुड़ जाता है, तो वह समाज मानवीयता के पैमानों को खोने लगता है।
आज हर किसी को अपने आपको, अपने बच्चों को, अपने साथियों को एक सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी समझाने और सिखाने की जरूरत है। इसके बिना लोगों में एक-दूसरे के लिए नफरत उसी रफ्तार से बढऩे लगेगी, जिस रफ्तार से लोगों में अपनी सेल्फी लेने की चाह बढऩे लगी है। लोगों का आत्ममुग्ध होना एक सीमा तक तो मानवीय कमजोरी है, लेकिन इसके बाद वह धीरे-धीरे एक मानसिक बीमारी में तब्दील होने लगता है, और जब तक लोगों को यह समझ आए, तब तक तो बहुत से लोगों की बीमारी लाइलाज भी होने लगेगी। फिलहाल जो लोग दूसरों की त्रासदी को अपनी सेल्फी में इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनकी तस्वीरें जहां दिखें, वहां उन्हें धिक्कारने की जरूरत है।

नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी..

संपादकीय
19 जनवरी 2017


कल जिस तरह अपने बुढ़ापे में माने हुए बेटे के लिए कांग्रेस के बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी ने कांग्रेस का पल्ला छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, वह कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन राजनीति में इस तरह की बातें हर चुनाव के पहले सामने आती हैं, और एक पार्टी की गंदगी को दूसरी पार्टी ले जाकर अपनी तश्तरी में सजाती है। यह अधिकतर पार्टियों के साथ चलता है, शायद वामपंथियों के अलावा। लेकिन कुछ लोग यह भी सोच सकते हैं कि जिस नारायण दत्त तिवारी को कांग्रेस ने कई बार मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल, सब कुछ बनाया, और हैदराबाद के राजभवन से निकले हुए जिनके अश्लील वीडियो भी पार्टी ने बर्दाश्त की है, जिनकी शादी के बाहर की अवैध कही जाने वाली संतान के साथ उनकी बरसों की मुकदमेबाजी भी पार्टी ने बर्दाश्त की, उस पार्टी को इस बुजुर्ग नेता ने अपने आखिरी दिनों में इस तरह छोड़ दिया जैसे वह पार्टी अब अचानक अवैध संतान बन गई हो।
भारत में कई किस्म के दल-बदल होते हैं। चुनावों के ठीक पहले जिन लोगों को अपनी पार्टी में टिकट नहीं मिलता है, वे लोग दूसरी पार्टियों की तरफ भागते हैं, और वहां पर उनकी अच्छी खातिरदारी भी होती है, और जीत की संभावनाओं को देखते हुए उन्हें चुनाव में टिकट भी दी जाती है। कांग्रेस के एक बड़े नेता रहे हेमवती नंदन बहुगुणा की दो औलादों को कांग्रेस ने सिर पर बिठाया, और इन भाई-बहनों ने उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में अपनी पार्टी की संभावनाओं का भ_ा ही बिठा दिया। इसके बाद दोनों ही भाजपा में चले गए, और अब उनकी अगली पीढ़ी भाजपा की टिकट से चुनाव मैदान में भी है। इस नौबत को लेकर कई तरह के कार्टून भी मीडिया में तैर रहे हैं कि अपने पुराने वफादार कांग्रेसी सांसद को कमल छाप पर वोट लगाकर फिर सांसद बनाएं।
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को विधि आयोग के साथ मिलकर देश के सामने ऐसी नौबत पर बहस शुरू करवानी चाहिए। ये संवैधानिक संस्थाएं कोई फैसला तो नहीं दे सकतीं, और जो संसद ऐसा कोई कानून बना सकती है, और जिसमें विधानसभाओं की मदद की जरूरत होगी, वहां पर दल-बदल का बड़ा सम्मान है। थोक में भी दल-बदल हो सके, उसी हिसाब से दल-बदल का कानून बनाया गया, और कई छोटे राज्यों में रातों-रात सरकार ने अपनी राजनीतिक जात ही बदल डाली। इसलिए ऐसी संसद से किसी सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती, और जनता में वैसी राजनीतिक समझ है नहीं कि दलबदलुओं को हरा सके। इसलिए समाज के भीतर एक जागरूकता लाने के लिए एक बहस की जरूरत है कि दलबदलुओं के चुनाव लडऩे पर किस तरह की रोक लग सके।
एक काल्पनिक विकल्प हमारी नजर में यह दिखता है कि चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद दल-बदल करने वाले लोगों के उस चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा कानून आसान नहीं होगा, और यह बात कहने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे कि लोकतंत्र को कानूनों से बांधकर नहीं चलाया जा सकता और इसके लिए गौरवशाली परंपराओं की जरूरत पड़ती है। लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में हम देखते हैं कि गौरवशाली परंपराओं की जगह एक गाली की तरह की गौरवसाली परंपराओं ने ले लिया है, और जितने भी चुनाव सुधार पिछले दशकों में हुए हैं, वे सारे के सारे चुनाव आयोग के कानूनी दायरे के बढऩे की वजह से हुए हैं, राजनीतिक दलों ने खुद होकर अकेले या सामूहिक रूप से किसी चुनाव-सुधार के लिए कोई पहल नहीं की है।
ऐसे में चुनाव आयोग को ही नब्बे बरस के हो चुके नेताओं के दल-बदल की हसरत की अर्थी निकालने का काम करना पड़ेगा।

मॉल्स में खरीददारी से नहीं मिलती महानता

संपादकीय
18 जनवरी 2017


पिछले दो-चार दिनों में उन एक दर्जन उपन्यासों की फेहरिस्त आई है जो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पसंद से छांटे हैं। अपनी पढ़ी हुई इन किताबों के अलावा उन्होंने उन किताबों को भी एक इंटरव्यू में गिनाया है जो उन्होंने अपनी बेटियों को पढऩे के लिए दी हैं। और इनमें से हर एक पसंद के लिए उन्होंने वजह भी गिनाई है। आज हिन्दुस्तान में ऐसे कितने लोग हैं जो कि अपने बच्चों के लिए किताबें छांटते हैं, और फिर उन्हें तोहफे में देते हैं कि वे पढ़ सकें? और बच्चों से परे भी ऐसे कितने लोग हैं जो कि खुद भी किताबें पढ़ते हैं? अभी कुछ समय पहले एक किसी प्रमुख व्यक्ति की जिंदगी की कहानी आई थी कि जब वे अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने गए थे तो वहां लड़के वालों के महल जैसे घर को देखकर भी बिना रिश्ता किए लौट आए थे, क्योंकि उन्हें वहां किताबें नहीं दिखी थीं। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ हफ्ते पहले दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया बिल गेट्स की बताई हुई एक लिस्ट छापी थी कि पिछले दिनों उन्होंने कौन-कौन सी किताबें पढ़ी थीं, और उनमें से वे कौन सी किताबों को पढऩे की सिफारिश करते हैं।
दिल्ली में अभी हुए विश्व पुस्तक मेले की खबरें बताती हैं कि प्रकाशक और किताबें दोनों घटते चले जा रहे हैं। शहरों में हम देखते हैं कि लोगों की खरीददारी और उनके वक्त गुजारने की जगह किताबों से परे की ही रहती हैं। जो संपन्न लोग हैं, उन्हें अपने बच्चों और मेहमानों को घुमाने-फिराने, दिखाने, और खरीददारी कराने के लिए मॉल्स ही मिलते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जो कि तोहफे में किताबें देने पर भरोसा रखते हैं। यह एक खतरनाक नौबत इसलिए है कि आज दुनिया में अधिकतर लोग अपनी पसंद से परे, और अपनी जरूरत से परे के मनोरंजन पर वक्त गुजारते हैं। कोई किताब तो अपनी पसंद की हो सकती है, लेकिन जब घर के साथ बैठकर लोग टीवी देखते हैं, तो उसमें न तो उनकी पसंद रहती, और न ही उनकी जरूरत रहती, और नतीजा यह होता है कि उनसे उनको हासिल भी कुछ नहीं होता।
किसी सभ्यता के विकसित होने में हजारों बरस से किताबों का एक बेमिसाल योगदान रहते आया है, और आज उस योगदान की जरूरत को बिल्कुल ही भुला दिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि लोगों के पास पढऩे को वक्त नहीं है, लेकिन आज लोग अपने फोन पर, अपने कम्प्यूटर पर, सोशल मीडिया पर इस कदर उलझे रहते हैं, कि अपनी जरूरत और अपनी पसंद तक वे पहुंच भी नहीं पाते। एक सुनामी के बेकाबू सैलाब की तरह अनचाही चीजें लोगों तक पहुंचती रहती हैं, और उन्हें पलटकर, देखकर, डिलीट करने में ही उनका वक्त निकल जाता है। किताबों के साथ जितनी गंभीरता से लोगों का रिश्ता बनता था, और पढऩे वालों के साथ आज भी बनता है, वह फोन और इंटरनेट पर नहीं बनता, जहां पर कि लोग फिजूल की बातों में उलझते ही रहते हैं।
आज किसी को यह सलाह देना पता नहीं काम की बात है या नहीं, लेकिन लोगों को अपने खर्च का एक हिस्सा, चाहे बहुत थोड़ा ही हिस्सा, किताबों पर खर्च करना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर महान और कामयाब लोग किताबों की सीढिय़ों से चढ़कर ही ऊपर तक पहुंचते हैं, मॉल्स में खरीददारी करके नहीं।

सपा के शहंशाह अकबर के पांव आखिर जमीन पर टिके

संपादकीय
17 जनवरी 2017


उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में चल रहे एक गैरफिल्मी दंगल का फिलहाल खात्मा सा दिखता है, और वह चुनाव आयोग का एक सही फैसला भी लगता है। मुलायम सिंह यादव शहंशाह अकबर के अंदाज में पार्टी नाम की अनारकली को दीवार में चुनवा रहे थे, लेकिन मामला चुनाव आयोग में जाने पर साबित हुआ कि उनके पास न ईंट थी, न रेत थी, न सीमेंट थी, और न ही राजमिस्त्री था। नतीजा यह हुआ कि समाजवादी पार्टी के जो विरोधी इसके चुनाव चिन्ह, साइकिल, के जब्त हो जाने की उम्मीद कर रहे थे, वे अब हताश होकर बैठ गए हैं। अब लोगों को यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि बाप-बेटे के बीच दंगल करवाने का ठेका अगर किसी राष्ट्रीय दलाल ने लिया था, तो उसे अब दलाली कहीं से मिलेगी, या नहीं मिलेगी? और आयोग के फैसले से मुलायम सिंह का वह नशा भी टूटा होगा जिसके चलते वे अपनी पार्टी को अब तक अपनी सनक की जागीर मानकर चल रहे थे, और अपने मुख्यमंत्री बेटे को घर में नंगे खेलने वाला टीपू मानकर चल रहे थे। चुनाव आयोग के सामने जमा किए गए सांसदों और विधायकों के सैकड़ों हलफनामों ने यह साबित कर दिया कि टीपू ही सुल्तान है, और मुलायम की जगह अब वृद्धाश्रम रह गई है।
समाजवादी पार्टी की कुनबापरस्ती के बारे में हम सौ बार लिख चुके हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश में मुलायम-अखिलेश का कुनबा एक राजनीतिक हकीकत है, और इन दोनों के बीच जब किसी को चुनने की बात आती है, तो जाहिर तौर पर समझदार लोग अखिलेश को चुनेंगे, क्योंकि मुलायम एक राष्ट्रीय दलाल के हाथों खेलते भी दिख रहे हैं, और वे उत्तरप्रदेश से एक बेहतर सरकार को खत्म करने की तरफ भी बढ़ रहे थे। यह समाजवादी पार्टी के भीतर एक अच्छी नौबत रही कि पार्टी नेताओं का बहुमत अपनी जीत की संभावनाओं को देखते हुए अखिलेश के साथ रहा, जिन्होंने खुलकर यह घोषणा पहले ही कर दी थी कि वे कांग्रेस के साथ गठबंधन के हिमायती हैं। दूसरी तरफ मुलायम अपने सलाहकारों के साथ बार-बार यह घोषणा कर चुके थे कि वे किसी भी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
फिलहाल उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति पर इससे होने वाला फर्क अगर देखें, तो यह साबित होता है कि एक नई पीढ़ी के, बेहतर सोच वाले अखिलेश यादव की पीढ़ी ने उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति को सम्हाल लिया है, और इस नौजवान में यह समझ भी है कि कांग्रेस पार्टी एक समविचारक पार्टी हो सकती है, और उसके साथ तालमेल करके चुनाव लडऩा बेहतर होगा। उत्तरप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस अपने दम पर सपा के पासंग भी नहीं बैठती, लेकिन इन दोनों के नौजवान नेताओं के साथ मिलकर चुनाव लडऩे से साम्प्रदायिकता-विरोधी वोटों के छिन्न-भिन्न होने की गारंटी नहीं रह जाएगी, और वहां सपा-कांग्रेस दोनों को खासा फायदा होगा। अब उत्तरप्रदेश की राजनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वहां भाजपा के विरोधी दो खेमे आपस में एक-दूसरे से सांप-नेवले जैसे संबंध रखते हैं, और जिनके बीच किसी तरह का तालमेल मुमकिन नहीं है, इसलिए भाजपा-विरोधी वोट वहां पर सपा गठबंधन और बसपा के बीच बंटेंगे, और भाजपा इसी को लेकर बड़ी उम्मीद लगा सकती है। उत्तरप्रदेश अब एक त्रिकोणीय मुकाबला जरूर देखने जा रहा है, और चुनाव के बाद हो सकता है कि अंकगणित के आधार पर एक त्रिशंकु विधानसभा भी बन जाए, और उस वक्त इन तीनों पार्टियों में से किसी का एक-दूसरे के साथ जाना एक अजीब के साथ हमबिस्तर होने सरीखा रहेगा, लेकिन वैसी नौबत भी देखना दिलचस्प होगा।
फिलहाल चुनाव आयोग ने उत्तरप्रदेश के चुनाव को साइकिल की रफ्तार से आगे बढ़ा दिया है, और आगे जनता सोचेगी कि उसे किसमें अपनी बेहतरी दिखती है।

निजी जिंदगी से लेकर राजनीति और सरकार तक अकेलेपन के घेरे में मोदी

आजकल
16 जनवरी 2017  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से ही खबरों में इस कदर हैं कि सारा मीडिया उनको छापने और दिखाने पर मजबूर और बेबस रहता है। वे शायद पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने विदेशी दौरों में मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया है। अब उनके साथ महज सरकारी टीवी और सरकारी रेडियो के लोग जाते हैं, और मोदी से खबरें इतनी निकलती हैं कि तमाम बड़े अखबार या छोटे-बड़े सभी किस्म के समाचार चैनल अपने खर्च पर अपनी टीम उनके पहुंचने के पहले उन विदेशी शहरों में पहुंचाकर वहां से रिपोर्टिंग शुरू कर चुके रहते हैं। इस मायने में मोदी से अधिक कामयाब समाचार-महत्व का नेता और कौन होगा जो न खिलाता है, न पिलाता है, न घुमाता है, और न ही विदेश से पत्रकारों को बिना कस्टम पटाए सामान लाने देता है, फिर भी सबसे अधिक कवरेज पाता है!
लेकिन हमारी हैरानी की ये बातें यहां पर थमती हैं, और यहां से आगे जब हम एक उलझी हुई हकीकत की बात करते हैं, तो यह लगता है कि मोदी अपनी निजी जिंदगी से लेकर अपनी राजनीति तक, और अपनी सरकार से लेकर अपनी नीतियों तक एक बहुत ही अकेले इंसान हैं, जिनके पास न बांटने को कोई है, न किसी से पाने के लिए उनके इर्द-गिर्द कोई है। हम मोदी की निजी जिंदगी को महज उनके व्यक्तित्व के इस जटिल पहलू को समझने जितना ही छू रहे हैं, और हमें दिख रहा है कि किस तरह वे शादी के तुरंत बाद से पत्नी से अलग रहे, अपनी मां और अपने भाईयों के परिवार से अलग रहे, एक संघ प्रचारक के रूप में शायद वे बिना परिवार रहने के आदी हो गए। इसके अलावा जब हम गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनको देखते हैं, तो वे गुजरात दंगों के लिए अपने रूख को लेकर शायद अकेले थे, और उनकी सरकार में भी उनके इर्द-गिर्द सामूहिक जिम्मेदारी वाली कोई बात न 2002 के दंगों के वक्त थी, और न शायद तब से लेकर अब तक उनके सत्ता के लगातार सफर में कभी रही। 
लोगों को यह अच्छी तरह याद है कि मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के समानांतर अपना एक ढांचा खड़ा कर लिया था, और वे उसी पर निर्भर बताए जाते थे, बल्कि उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद जैसे कई हिन्दू संगठनों को भी किनारे कर रखा था, और गुजरात के जानकार बताते हैं कि मोदी के कार्यकाल में तोगडिय़ा जैसे लोग हाशिए से भी और बाहर धकेल दिए गए थे। इस तरह मोदी परिवार से अलग, दोस्तों के बिना, पार्टी और सरकार में सामूहिक जवाबदेही वाली किसी टीम के बिना, और एकदम अकेले काम करने के आदी इंसान दिखते हैं। उनके बारे में जितनी जानकारी आम है, उनको जितना अधिक बारीकी से देखें, उतना ही अधिक यह बात सही लगती है कि वे अकेलेपन के इस कदर शिकार हैं कि भारतीय जनता पार्टी और केन्द्र सरकार दोनों अपनी दो जेबों में रहने के बावजूद उन्हें पार्टी चलाने के लिए अपने एक सबसे भरोसेमंद अमित शाह को पार्टी का मुखिया बनाना पड़ा, और अमित शाह से उनका घरोबा एक अकेलेपन सा घरोबा है, किसी टीम जैसा नहीं है। 
अब एक बात यह समझ आती है कि भाजपा के भीतर मोदी के अलावा बाकी किसी की कोई आवाज न रह जाने, और सरकार में मोदी से परे किसी की कोई ताकत न रह जाने का एक नतीजा यह भी है कि मोदी के तमाम फैसले उनके निजी फैसले दिखाई देते हैं, और उनमें से किसी के पीछे सामूहिक विचार-विमर्श, सामूहिक जिम्मेदारी की बुनियाद दिखाई नहीं देती है। उनके अब तक के कार्यकाल का रूख यही रहा है कि उनके लिए विदेश मंत्री का कोई अस्तित्व नहीं है, और तमाम विदेश नीति वे अकेले तय करते हैं, किसी देश से भारत लौटते हुए अचानक पाकिस्तान रूककर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाकर, उनके घर शादी की दावत पर जाकर, उनके परिवार से मिलकर, सारी विदेश नीति वे पल भर में खुद तय करते हैं। जाहिर है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज केन्द्र सरकार में एक बड़े ओहदे पर रहने के बावजूद अपनी उस ताकत का एक हिस्सा भी नहीं रखतीं जो कि वे लोकसभा में विपक्ष की नेता रहते हुए रखती थीं। 
कुछ ऐसा ही हाल वित्तमंत्री अरूण जेटली का है जो कि ओहदे के हिसाब से देश के सबसे ताकतवर आधा दर्जन मंत्रियों में से एक रहने चाहिए थे, लेकिन ऐसा लगता है कि नोटबंदी की घोषणा से उनको महज इतना ही समय मिल पाया होगा कि अपने लाख-दो लाख रूपए वे बैंकों से बदलवा सकें। भारत की इतिहास का यह अकेला ऐसा फैसला था जिसने जिंदगी को इस कदर उथल-पुथल कर दिया, और अब धीरे-धीरे यह खुलासा होते जा रहा है कि किसी जरा भी काबिल वित्तमंत्री को अगर ऐसे फैसले की समय रहते हवा लगती, तो देश में इतनी बदहाली, और इतनी बदइंतजामी नहीं हुई रहती, और लोगों की जिंदगी इस कदर जहन्नुम न बनी होती। 
लेकिन हम इन पुराने मुद्दों पर जाना नहीं चाहते हैं, हम मोदी का विश्लेषण कर रहे हैं जो कि एक बहुत ही अकेला इंसान पेश करता है। और इस अकेलेपन के साथ-साथ मोदी की कई और दिक्कतें भी हैं। पहली तो यह कि संसद और केन्द्र सरकार में आने के पहले उन्हें इन दोनों में काम का एक दिन का अनुभव नहीं था। नतीजा यह था कि जिस दिन वे पहली बार संसद में घुसे, उस दिन वे पहली बार संसद को भीतर से देख रहे थे, इसके पहले वे दर्शकदीर्घा से भी संसद की कार्रवाई देखे हुए नहीं थे। और केन्द्र सरकार में काम का तजुर्बा लोगों को अपने राज्य से बाहर बाकी हिन्दुस्तान को देखने-समझने का मौका देता है, और ऐसा मौका मोदी को कभी नसीब नहीं हुआ था, इसलिए भी वे इस सरकार में आने के बाद अपनी हिचक के कैदी रहे, और खबरें बताती हैं कि वे गुजरात में अपने साथ काम कर चुके अफसरों पर दिल्ली आकर भी बहुत आश्रित रहे, और उन्हें दिल्ली लेते आए। 
पार्टी के भीतर जिन राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्री थे, उनमें से कम से कम दो बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक उनके खिलाफ तेवर रखने वाले रहे। राजस्थान की वसुंधरा राजे, और मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह, इन्होंने तो मोदी के चुनाव प्रचार के वक्त भी मोदी की हस्ती को बहुत बाद में जाकर माना था, और पोस्टरों पर इजाजत दी थी। इन दो के मुकाबले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह मोदी के लिए अधिक सहूलियत के रहे जो कि पार्टी के भीतर किसी गुटबाजी से परे राष्ट्रीय नेतृत्व को बिना विवाद मानते आए हैं, और उन्होंने मोदी की लहर को न अनदेखा किया, न अनसुना किया, और न उसका अनादर किया। लेकिन कुल मिलाकर मोदी अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के बीच भी अकेले और अलग से रहे। 
भारत जैसे विविधता से भरे हुए, विभिन्न विचारधाराओं और धर्म-जातियों वाले समुदायों वाले इस देश पर एकमुश्त राज करने के लिए मोदी का तजुर्बा अकेले ही काफी नहीं हो सकता था, और इसीलिए उनकी सरकार आने के बाद से उग्र राष्ट्रवाद, उग्र साम्प्रदायिकता, उग्र ब्राम्हणवादी गौरक्षक हिंसा, उग्र असहिष्णुता का सैलाब सा आ गया, उनकी पार्टी के नेता और मंत्री गांधी को एक बार फिर मारने और गोडसे को एक बार फिर स्थापित करने में लग गए, और इसका भारत के विशाल नक्शे पर नुकसान मोदी सोच नहीं पाए, आज भी उन्हें इसका एहसास नहीं है। निजी जीवन से शुरू और राजनीतिक जीवन से लेकर सरकारी जिम्मेदारियों तक जो अकेलापन मोदी को घेरे हुए है, वह घेरा मोदी तक देश और दुनिया की समझ को भी ठीक से पहुंचने नहीं दे रहा है, और यह घेरा उनका अपना उसी किस्म का खोल है जिसके भीतर एक कछुआ अपने को महफूज पाता है। लेकिन भारत के लोकतंत्र के लिए ऐसा अकेला प्रधानमंत्री ठीक नहीं है जिसके इर्द-गिर्द बोलने की ताकत रखने वाले तजुर्बेदार नेताओं की पहुंच नहीं है। 
यहां यह समझना कुछ मुश्किल है कि इस अकेलेपन ने मोदी को आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध बना दिया है, या कि उनके आत्मकेन्द्रित और आत्ममुग्ध होने से वे मेले में अकेले रहते आए हैं। लोग उनकी जीवनशैली, उनकी कार्यशैली, और उनके व्यक्तित्व की कमजोरियों को लेकर उन्हें महत्वोन्मादी भी कहते हैं कि वे हर जगह, हर पल महत्व ढूंढते हैं, और विदेशी प्रमुख नेताओं के साथ उनकी गर्मजोशी को वे इसी का एक सुबूत मानते हैं। बॉडी लैंग्वेज के अधिक जानकार मोदी के तौर-तरीकों को बेहतर समझ और समझा सकते हैं, फिलहाल अपने ऐसे तमाम फैसलों के लिए, तौर-तरीकों के लिए मोदी अकेले ही जिम्मेदार दिखते हैं, क्योंकि उनके आसपास कोई सलाहकार तो मौजूद है नहीं।

ये तमाम बातें मोदी को कुछ दूरी से देखकर ही लिखी जा रही हैं, लेकिन ये बहुत ही आम जानकारी की बुनियाद पर किया गया एक विश्लेषण है, ऐसी आम जानकारी जो कि आसपास के सभी लोगों ने दूर-दूर से मोदी को देख-देखकर पिछले दशकों में लिखी हैं। मोदी को जो अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा सुहाते हैं, उनकी सरकार को भी वहां पर प्रशासन कहा जाता है जिसमें अनगिनत सलाहकार रहते हैं, विश्लेषक रहते हैं, और थिंक टैंक रहते हैं। मोदी के मुनादियों वाले फैसलों से लेकर देश के जलते मुद्दों पर उनकी ऐतिहासिक चुप्पी तक यह जाहिर करते हैं कि वे अकेले चलने की एक अनोखी मिसाल हैं, और भारत में तो आज राष्ट्रपति शासन प्रणाली भी नहीं है। ऐसा अकेलापन दुनिया के राज में, दुनिया के कारोबार में लोगों से अनगिनत आत्मघाती गलतियां भी कराता है, और मोदी भी इस नुकसान से बचे हुए नहीं हैं। दिक्कत यह है कि सत्ता पर बैठे लोग जब गलतियां करते हैं, तो उनके दाम जनता चुकाती है।

बांग्लादेश की हत्यारी पुलिस को थोक में फांसी की सजा, भारत में भी सरकारों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
16 जनवरी 2017


बांग्लादेश की एक अदालत में आज एक हत्याकांड में 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई है जिसमें एक भूतपूर्व अवामी लीग नेता भी शामिल है, और वहां की पुलिस के एक खास दस्ते के 17 अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल है। इन लोगों पर 7 लोगों के अपहरण और हत्या का आरोप था, मरने वालों की लाशें 2014 में एक नदी में तैरती मिली थीं। नारायण गंज हत्याकांड के नाम से कुख्यात इस जुर्म में बांग्लादेश रैपिड एक्शन बटालियन के 25 लोगों पर आरोप थे। लोगों को याद होगा कि पंजाब या कुछ और जगहों पर इसी तरह अपहरण और हत्या, या मुठभेड़-हत्याओं के मुकदमे चले हैं, और कई जगहों पर ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों को मौत की सजा थोक में हुई है। फिर इस तरह की हत्याओं से परे मुम्बई जैसे शहर में संगठित अपराधियों को मारने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर भी लगातार बेकसूरों को मारने के मामले चले हैं, और कुछ ऐसे कुख्यात अफसरों पर फिल्में भी बनी हैं। मुम्बई से यह बात सामने आई थी कि जुर्म के आरोपियों या फरार मुजरिमों को मारकर हीरो बनने वाले ऐसे पुलिस अफसर खुद किस तरह धीरे-धीरे जमीन-जायदाद के धंधे में भूमाफिया बनकर करोड़ों कमाने लगे। पंजाब की पुलिस के बारे में यह बात कई बार सामने आई कि आतंक के मोर्चे पर काम करने वाली पुलिस खुद किस तरह नशे की तस्करी का धंधा करने लगी, और किस तरह उसने मानवाधिकारों को कुचलते हुए बेकसूरों को मारा।
बांग्लादेश से लेकर पंजाब, मुम्बई, और दूसरी जगहों से होते हुए अगर बस्तर तक आएं, तो यहां की पुलिस भी इसी तरह के आरोपों से घिरी हुई है। पिछले बरसों में बस्तर के नक्सल मोर्चे पर काम करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को जिस तरह की छूट दी गई है, उससे मानवाधिकार कुचलने से लेकर बस्तियों को जलाने तक, बेकसूर नाबालिगों को नक्सली बताकर मारने तक, आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करने और बेकसूरों को नक्सली बताकर उनका समर्पण करवाने तक कई तरह के काम तरह-तरह की जांच में सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक ने इस बात को सही पाया है कि बस्तर में सुरक्षा बल और खासकर छत्तीसगढ़ की पुलिस इस तरह के सारे संगठित जुर्म में शामिल रही है। बांग्लादेश का यह ताजा फैसला न सिर्फ छत्तीसगढ़ पुलिस, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार के लिए भी फिक्र पैदा करने वाला होना चाहिए कि सरकारी सुरक्षा कर्मचारी जरूरत से अधिक आजादी और संविधानेतर अधिकार पाने पर, जवाबदेही न रहने पर किस तरह के जुर्म की लत में फंस जाते हैं, और बाद में इंसाफ का वक्त लौटने पर किस तरह वे सजा भी पाते हैं। हिन्दुस्तान की न्यायपालिका में दशकों बाद भी ऐसे फैसले हुए हैं जिनमें बड़े-बड़े दिग्गज और नामी-गिरामी पुलिस अफसरों को उनके वफादार मातहत कर्मचारियों के साथ फांसी और उम्रकैद जैसी सजा भी हुई है, जबकि उनका वक्त चलते समय उनके इलाकों में उनका कहा हुआ ही कानून रहता था। आज ऐसी बातों को लेकर छत्तीसगढ़ में खुले दिमाग से यह सोचने की जरूरत है कि क्या भविष्य में यह राज्य ऐसे ही किसी खतरे को झेलने नहीं जा रहा है?
फिर हमारा यह भी मानना है कि बलात्कारी या कातिल पुलिस को जितनी सजा जब मिलनी है, तब मिलती रहे, लेकिन उससे परे भी क्या सत्ता पर बैठे हुए बाकी नेताओं और अफसरों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि छत्तीसगढ़ के सबसे मासूम और सबसे सीधे-सरल इलाके बस्तर के आदिवासियों पर इस तरह की हिंसा और जुर्म की जो खबरें आती हैं, उन तमाम खबरों को नक्सल-हिमायतियों का शोर करार न देकर आरोपों की ईमानदारी और गंभीरता से जांच करवाई जाए। आज प्रदेश के भीतर या प्रदेश के बाहर, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, या मानवाधिकार आंदोलनकारी, यहां तक कि गरीब और बेबस आदिवासियों के मुकदमे मुफ्त में लडऩे वाले सामाजिक प्रतिबद्धता से समर्पित वकीलों को भी पुलिस नक्सल करार दे रही है, और उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल रही है। भारत के कानून के साथ दिक्कत यह है कि ऐसे मामलों में फंसाए गए बेकसूर को भी जेल से निकलने में बरसों लग जाते हैं, और यह पूरा सिलसिला बस्तर में एक निलंबित-लोकतंत्र का सुबूत बनकर दर्ज होते जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार और भारत के बाकी राज्यों की सरकारों को भी बांग्लादेश के इस ताजा फैसले को देखते हुए अपनी पुलिस और अपने सुरक्षा बल को दी गई अंधाधुंध छूट के बारे में फिर सोचना चाहिए कि भविष्य का इतिहास इसे किस तरह दर्ज करेगा। 

मौतों पर मुआवजों के लिए राष्ट्रीय नीति की जरूरत...

संपादकीय
15 जनवरी 2017


पटना में एक नाव हादसे में दो दर्जन के करीब मौतों के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए और मरने वालों को लिए अलग-अलग मुआवजों का ऐलान किया है। ऐसे हर हादसे पर मुआवजा एक सरीखा नहीं रहता, जबकि मौत तो मौत रहती है, और कोई एक मरे तो भी वह मौत है, और दर्जनों लोग एक साथ मरे तो भी वह मौत है। फिर इसके बाद यह भी रहता है कि किसी राज्य में या उसके पड़ोस में अगर चुनाव होने हैं तो कई बार मौत पर मुआवजे के रेट बढ़ जाते हैं। कभी-कभी यह भी होता है किसी जाति या धर्म की भीड़ की मौत होने पर उस समुदाय की एकजुटता और ताकत को देखते हुए भी उस पर गम कम या अधिक होता है, और ऐसा ही हाल मुआवजे का होता है।
भारत जैसे लोकतंत्र में जहां एक संघीय ढांचा है, और जहां केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसे हादसों पर हमेशा ही मुआवजे की घोषणा करती हैं, वहां इसमें एकरूपता की जरूरत है। एक किस्म की मौतों पर बिना किसी मुनादी के, बिना किसी राजनीतिक लुभावने फायदे के, सरकार की तरफ से एकमुश्त, एक मुआवजा घोषित हो जाना चाहिए, दिया जाना चाहिए, और इसके अलावा अलग-अलग कई मुआवजे बंद होने चाहिए। हमारा ख्याल है कि मुआवजे का जिम्मा और अधिकार राज्यों को दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत का हर हिस्सा किसी न किसी राज्य या केन्द्र प्रशासित प्रदेश के तहत ही आता है। भारत सरकार किसी मौत पर मुआवजा तभी दे जब ऐसी मौत देश के बाहर होती हो, और केन्द्र सरकार पर सीधे जिम्मा आता हो।
अब जरा बात मुआवजे की रकम पर हो जाए। भारत में मौतें प्राकृतिक विपदाओं के कारण होती हैं, और फिर मानव निर्मित दुर्घटनाओं में भी होती हैं। ऐसी मानव निर्मित दुर्घटनाएं कई बार सरकारों की तैयारी की नाकामयाबी से होती हैं, और कभी-कभी लोगों की निजी गलती से भी होती हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसे तमाम मुआवजों के लिए अलग-अलग दर्जे तय करना चाहिए, और मदद की रकम भी तय करना चाहिए। आज देश में जितने तरह की बीमा कंपनियां काम कर रही हैं, सरकारें अगर चाहें तो आम जनता की किसी भी तरह की मौत पर परिवार के बाकी लोगों को मदद के लिए मुआवजा देने का बीमा भी करवाया जा सकता है। हमारा ख्याल है कि किसी भी तरह के मुआवजे से आयकरदाता तबके को बाहर रखना चाहिए, क्योंकि वह तबका ऐसे नुकसान को उठा सकता है। इससे परे जब कोई गरीब परिवार किसी कमाऊ सदस्य को खोता है, तो परिवार पर मुसीबत टूट पड़ती है। ऐसे में सरकार को मुआवजे की रकम अधिक भी रखनी चाहिए। इसके लिए संसद में या विधानसभाओं में व्यापक विचार-विमर्श के बाद नियम-शर्तें और पैमाने तय करने चाहिए, ताकि मौतों पर मुआवजे का ऐलान राजनीतिक नफे की कोशिश जैसा न रह जाए। ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि इंसानी जान की कीमत एक जैसी लगानी चाहिए, मौत अकेले हो तो वह सस्ती है, और वह थोक में हो तो वैसी जिंदगियां महंगी हैं, यह बात न्यायसंगत नहीं है। यह बात विधानसभा और संसद शायद खुद होकर न उठे क्योंकि हर नेता को मुआवजे की ऐसी घोषणा करने में महत्व का अनुभव होता है, और वे शायद ही इस लालच को छोड़ सकें, ऐसे में जनता के बीच से यह बात उठनी चाहिए कि राष्ट्र की मुआवजा नीति क्या हो, और वह राज्यों की सहमति से कैसे बनाई जाए।

गांधी की अस्थियों को राजघाट से देशनिकाला भी दे दिया जाए

संपादकीय
14 जनवरी 2017


बीबीसी जंगली जानवरों पर एक फिल्म बना रही है और इस दौरान शूटिंग के लिए उसने राजस्थान के जंगलों में बंदरों के बीच एक ऐसा बंदर का पुतला बनाकर बिठा दिया जिसके भीतर दूर से नियंत्रित कैमरे लगे हुए थे, और उसके आसपास बंदरों की जिंदगी और हरकत के फिल्मांकन के लिए यह कोशिश की गई थी ताकि बंदरों को कोई बाहरी चीज वहां न दिखे और वे अधिक से अधिक स्वाभाविक रहें। लेकिन बंदरों को अचानक यह अहसास हुआ कि उनके बीच उनका एक बच्चा हिलडुल नहीं रहा है, और उसे छूकर देखकर जब उन्हें लगा कि उसमें जान नहीं है, तो उन्होंने यह मान लिया कि वह मर गया है, और इसके बाद वे गमगीन होकर सन्नाटे में बैठे रहे, एक-दूसरे से लिपटकर गम बांटते रहे। जिन जानवरों को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इंसानों की खराब हरकतों पर जब उन्हें जंगली कहा जाता है, तो यह अंदाज नहीं रहता कि वे किस तरह संवेदनशील रहते हैं।
अब इसी के साथ-साथ आज कई दूसरी खबरें भी हवा में तैर रही हैं, जिनमें से एक तो यह है कि किस तरह खादी ग्रामोद्योग आयोग ने अपने कैलेंडर से गांधी की चरखा चलाती परंपरागत तस्वीर हटाकर उसकी जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चरखा चलाती तस्वीर छापी है। यह कैलेंडर और डायरी एकदम से खबरों में आ गई हैं क्योंकि गांधी की जगह मोदी लोगों को एकदम से पच नहीं रहे हैं, और बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। आयोग की बड़ी दिलचस्प सफाई है कि पिछले बरसों में खादी की बिक्री लगातार गिरती जा रही थी, और प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद यह बिक्री एकदम से बढ़ी है, और इसलिए वे सबसे कामयाब ब्रांड एम्बेसडर हैं। यह बात सही है कि गांधी कोई कामयाब कारोबारी तो थे नहीं, और उन्होंने खादी को बिक्री के टारगेट के हिसाब से सामने नहीं रखा था, इसलिए अब जो अधिक बिक्री करवा दे, उसकी तस्वीर गांधी की जगह लगा देना एक नया गांधीवाद है, और इस पर कुछ बोलने की हिम्मत भी हमारी नहीं है।
लेकिन मानो यह काफी न हो, हरियाणा के एक मंत्री अनिल विज ने कहा है कि भारतीय रुपये का अवमूल्यन भी इसीलिए हुआ कि उस पर गांधी की तस्वीर थी, और अब धीरे-धीरे नोट से भी गांधी की तस्वीर हटा दी जाएगी। दो दिनों से कैलेंडर और डायरी खबरों में हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस बारे में कुछ नहीं कहा है। और अब उनकी पार्टी की एक राज्य सरकार के मंत्री ने दिल्ली के बगल हरियाणा में बैठकर गांधी को नोटों से भी धक्का देकर हटाने की बात कही है। हमारा ख्याल है कि इस मुद्दे पर बहुत अधिक शब्दों में कुछ कहने के बजाय महज एक सलाह हम दे सकते हैं कि यह सरकार राजघाट से गांधी की अस्थियों को भी देशनिकाला दे दे, क्योंकि गांधी मरने के बाद भी उन्हीं तमाम मूल्यों और सिद्धांतों को याद दिलाते रहेंगे, जो कि बहुत से लोगों को बर्दाश्त नहीं हो पाएंगे। गांधी को न कैलेंडर की जरूरत है, न नोट की, और न राजघाट की। वे पार्टियां और वे नेता अपना सोचें जिन्हें कि चुनाव के बीच विश्वसनीयता पाने के लिए गांधी की जरूरत पड़ती है। फिलहाल भारत का इतिहास मोदी की चुप्पी दर्ज कर रहा है, जो कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनकी एक बड़ी पहचान बन चुकी है।
इस देश के इंसानों को बीबीसी की फिल्म के बंदरों से कुछ सीखने की जरूरत है।

डकैतों को लूटने वाले की नौकरी जाने में लग गए पूरे सत्रह बरस

संपादकीय
13 जनवरी 2017


छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के लिए बदनाम अफसरों की लिस्ट में से एक आईपीएस को केन्द्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया है। बर्खास्तगी के लिए सरकारी भाषा में अनिवार्य सेवानिवृत्ति शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन बोलचाल की जुबान में उसका मतलब बर्खास्तगी के अलावा और कुछ नहीं होता। आईजी स्तर के इस अफसर राजकुमार देवांगन के खिलाफ सत्रह बरस से कार्रवाई होना बाकी थी, और मामलों में से एक मामला यह था कि जब यह अफसर एसपी था, तब वहां बड़ी एक डकैती में पकड़ाई रकम में पुलिस ने हाथ मार दिया था। अब डाके की रकम में लूट करने वाली पुलिस पर कार्रवाई करने में सरकार को सत्रह बरस लग गए। यह सोचें कि इन सत्रह बरसों में यह अफसर एसपी या एसपी से ऊपर की कुर्सियों पर ही रहा होगा, और जो डकैती में लूट की तोहमत वाला हो, उसने ऊपर की इन कुर्सियों पर आईजी तक बनते हुए, और एडीजी बनने की तैयारी तक क्या-क्या नहीं किया होगा?
सरकार के काम की रफ्तार उस समय धीमी हो जाती है जब बड़े-बड़े भ्रष्ट बड़े-बड़े अफसरों पर कार्रवाई की नौबत आती है। आज भी राज्य में बहुत से ऐसे अफसर हैं जो कि भ्रष्टाचार के मामलों में दस-पन्द्रह बरस पहले घिर चुके हैं, लेकिन आज तक वे एक से बढ़कर एक कमाऊ कुर्सियों पर बैठते आए हैं, और उनकी पुरानी जांच रिपोर्ट से उनके कमाने की मौजूदा संभावनाओं पर जरा भी आंच नहीं आई है। यह सिलसिला थमना चाहिए। जब भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाई गई एजेंसियां किसी पर छापा मारती हैं, उसके बाद किसी के खिलाफ अदालत में मामला चलाना चाहती हैं, तो कदम-कदम पर सरकार की इजाजत लगती है। जो सबसे बड़े अफसर रहते हैं, उनके लिए यह इजाजत केन्द्र सरकार से आती है, और उसके बाद फिर राज्य की एजेंसियां महीनों लगा देती हैं, लेकिन वे जेल जाते दिखते नहीं हैं। इसी तरह कुछ बिल्कुल ही नौजवान अफसर ऐसे पकड़ाए हैं जिन्होंने अपनी शुरुआती पोस्टिंग में ही कमाने के लिए जमकर चौके-छक्के लगाए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई हुई नहीं हैं। ऐसे में जनता इस बात पर हैरान होती है कि यह सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ कैसी जीरो टॉलरेंस की नीति है?
हमारा ख्याल है कि अफसरों की कमी रहने पर भी भ्रष्टाचार के मामलों से घिरे हुए अफसरों को किसी भी कमाऊ कुर्सी से दूर रखना चाहिए, क्योंकि एक नया अफसर लाना सस्ता पड़ेगा, बजाय एक भ्रष्ट को और कमाने का मौका देने के। दिक्कत यह है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से, कांग्रेस सरकारों के समय से भ्रष्ट अफसरों को लेकर जो सरकारी नरमी चली आ रही है, वह मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक, और देश के अधिकांश दूसरे राज्यों तक जारी है। और भ्रष्टाचार के मामले में भी छोटे कर्मचारियों और बड़े अफसरों के बीच एक बड़ा भेदभाव होता है। छत्तीसगढ़ में ही पटवारी और क्लर्क जैसे लोग तो तुरंत जेल चले जाते हैं, लेकिन नान घोटाले में फंसे हुए आईएएस अफसर भी शान से जेल के बाहर हैं, और उनकी गिरफ्तारी के आसार भी नहीं दिख रहे हैं। केन्द्र सरकार की मंजूरी आने के बाद भी, उनके खिलाफ पुख्ता सुबूत रहते हुए भी राज्य की जांच एजेंसी इनके आईएएस होने से इनके साथ खास नरमी बरत रही है। ऐसे रूख की वजह से सरकारी अफसरों का पूरे का पूरा तबका नाहक ही बदनाम होता है, जिसमें कि बड़ी संख्या में ईमानदार लोग भी रहते हैं, और इस दर्जे के भ्रष्ट अफसर कम रहते हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को अपने भ्रष्टाचार में फंसे हुए अफसरों को सरकारी कामकाज से अलग करके एक बड़े हॉल में एक साथ बिठाकर मुफ्त की तनख्वाह देना अधिक सस्ता पड़ेगा। यह राज्य गरीबों का राज्य है, जहां बहुत रियायती चावल मिलने से ही गरीब दो वक्त खा पा रहे हैं। ऐसे राज्य को खा लेने की इजाजत उन अफसरों को नहीं मिलनी चाहिए जिन्हें लाख-लाख रूपए महीने की तो तनख्वाह ही मिलती है, और इसके अलावा ढेरों सहूलियतें अलग से मिलती हैं। इसके बाद भी अगर किसी की कमाने की हवस पूरी नहीं होती, तो ऐसे लोगों के खिलाफ राज्य सरकार को कड़ा रूख अपनाना चाहिए।

...महज अतीत के गौरव पर भविष्य निर्माण नहीं हो सकता

संपादकीय
12 जनवरी 2017


विवेकानंद जयंती पर आज देश भर में कार्यक्रम हो रहे हैं, और नौजवानों को विवेकानंद की याद दिलाई जा रही है। उन्हें आगे बढऩे के लिए एक प्रेरणा दी जा रही है कि नौजवान रहते हुए ही विवेकानंद किस तरह विश्व धर्म संसद में पहुंचकर एक ऐतिहासिक प्रभावशाली भाषण देकर भारत का नाम रौशन कर चुके थे। यह बात सही है कि विवेकानंद कम उम्र में ही दुनिया के बीच भारत के धर्म और दर्शन को असरदार तरीके से रख चुके थे लेकिन आज उनकी जयंती के समारोहों के बीच यह सोचने की जरूरत है कि अतीत की स्मृतियों के बीच ही क्या भविष्य का निर्माण हो सकता है?
भारत सहित कुछ और देशों में भी एक यह दिक्कत लगातार बनी रहती है कि इतिहास के कुछ गौरवशाली पन्नों को लेकर समारोह चलते रहते हैं, और उन्हीं पन्नों को भविष्य भी मान लिया जाता है, वर्तमान भी मान लिया जाता है। स्मृतियों पर गौरव अच्छी बात है, लेकिन स्मृतियों से ऊपर उठकर, आगे जाकर आगे बढऩा भी जरूरी है, उसके बिना ऐसा गौरव पूरी की पूरी पीढिय़ों को झांसे में रख देता है। हमें आज के अपने काम ऐसे रखने चाहिए जिन पर आने वाले कल को गौरव हो सके, लेकिन आज ऐसा करने की फिक्र छोड़कर इतिहास के गौरव पर ही जीने वाली पीढ़ी कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं पा सकती।
आज भारत में जलसों और समारोहों में जितना उत्साह दिखता है, उतना उत्साह मौजूदा नौजवान पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ठोस काम करने में नहीं दिखता। ऐसा इसलिए है कि अतीत के गौरव के समारोह एक आरामदेह सोफा की तरह रहते हैं जिन पर बैठ जाएं या सो जाएं, अच्छा ही अच्छा लगता है। दूसरी तरफ वैसा ही गौरव, या उससे आगे का गौरव हासिल करना हो, तो एक बड़ा लंबा और कड़ा सफर तय करना पड़ता है जो कि आसान काम नहीं होता। ऐसे लंबे सफर के लिए रास्ता तैयार करने की जिम्मेदारी सरकार और समाज की होती है, लेकिन वे भी इतनी मेहनत-मशक्कत करने के लिए तैयार नहीं रहते, ऐसे में अतीत का गौरव बड़ी सहूलियत के मौके जुटा देता है। आज अगर कोई यह कहे कि विवेकानंद जितने तरह की विविध विचारधाराओं और धर्म-दर्शन की विविधताओं को पढऩे के बाद स्वामी बन पाए थे, सम्मान के लायक बन पाए थे, तो वैसी विविधता के लिए, वैसी मेहनत के लिए कोई सम्मान आज लोगों की नजर में रह नहीं गया है। राष्ट्रीय युवा उत्सव को मनाना तो ठीक है, लेकिन यह बात समझ लेने की जरूरत है कि विविधता को समझे बिना, उसके सम्मान बिना, उससे गुजरे और उसे भोगे बिना, विवेकानंद कभी स्वामी न बने होते। समुद्र मंथन की जो कहानी है, उसमें जब तक पानी को मथा नहीं जाता है, उसमें से अमृत तो अमृत, विष भी नहीं निकलता। इसलिए आज युवा उत्सव के मौके पर, विवेकानंद को याद करते हुए, उनका सम्मान करते हुए, उनको प्रेरणा मानते और बताते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि महज एक विचारधारा के कीर्तन में बैठ-बैठकर कोई विवेकानंद नहीं बन सकते, इसके लिए अलग-अलग सोच को समझना भी पड़ता है, तब कहीं जाकर एक ऐसी समझ विकसित होती है, जिसे सुनने के लिए दुनिया की धर्म संसद चौकन्नी होकर बैठे। अगर विवेकानंद उस संसद में जाकर महज किसी एक धर्म का नारा लगाते, और धर्मान्धता की बातें करते, तो वे कोई इतिहास नहीं रच पाते। इसलिए युवा दिवस के मौके पर नौजवानों को एक खुले दिमाग के साथ दुनिया को देखने और समझने का मौका देना भी तय करना चाहिए। वरना महज अतीत के गौरव पर भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता।

धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा और सामाजिक मूल्यों में टकराव

संपादकीय
11 जनवरी 2017


स्विटजरलैंड की खबर है कि वहां बचपन में ही हालैंड से आकर बसी हुई, और अब अधेड़ हो चुकी एक महिला को नागरिकता नहीं दी जा रही क्योंकि उसने वहां की स्थानीय परंपराओं के साथ तालमेल बिठाना नहीं सीखा। वह इस बात को लेकर आंदोलन करती रहती थी कि गायों के गले में एक राष्ट्रीय प्रतीक की तरह टंगी हुई बड़ी-बड़ी और भारी-भरकम घंटियों पर रोक लगाई जाए क्योंकि इससे उन गायों के गले पर बहुत बोझ पड़ता है, और घंटियों की सामूहिक आवाज उनको तकलीफ पहुंचाती है। आज की ही एक दूसरी खबर है कि स्विस सरकार ने वहां के स्कूलों पर यह नियम लागू किया है कि मुस्लिम लड़कियां भी बाकी लड़कियों की तरह लड़कों के साथ ही तैराकी सीखेंगी, और इसे यूरोपीय मानवाधिकार अदालत में भी आज जीत हासिल हुई है। लोगों को याद होगा कि पिछले कुछ बरसों में लगातार फ्रांस, जर्मनी सहित योरप के बहुत से देशों में इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच टकराव चल रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहना जाए या नहीं, और समुद्र तट पर मुस्लिम महिलाएं अपने बदन को पूरी तरह ढांके हुए कपड़े पहनकर नहाएं या नहीं। सरकारें लगातार मुस्लिम प्रतीक चिन्हों और रीति-रिवाजों के खिलाफ आदेश कर रही हैं, और यूरोपीय देशों की संसदें भी एक के बाद एक सरकार की लगाई ऐसी रोक को सही ठहरा रही हैं। ऐसे में आज यूरोपीय मानवाधिकार अदालत का फैसला स्विटजरलैंड के बाहर के दूसरे देशों के लिए भी एक मिसाल बनकर सामने आ गया है।
अब यह संस्कृतियों के टकराव का एक मामला है जिसका कोई आसान जवाब नहीं है। लोगों को याद होगा कि ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक, और ऑस्ट्रिेलिया से लेकर कनाडा तक जगह-जगह सिखों को कई बार नस्लवादी हमलों का शिकार होना पड़ता है, और ऐसे अधिकतर मामलों में यह पाया जाता है कि उनको दाढ़ी-पगड़ी वाला मुस्लिम समझकर लोगों ने हमले किए। दूसरी तरफ महिला अधिकारों और समानता की बारीकियों पर काम करने वाले यूरोपीय देशों ने यह महसूस किया है कि वहां बसी हुई मुस्लिम महिलाओं को अगर यूरोपीय महिलाओं की तरह की बराबरी का माहौल नहीं मिलेगा, तो उनका उस तरह से सांस्कृतिक मेल नहीं हो पाएगा। इसलिए उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के ऊपर देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की जरूरत को रखा, और कपड़ों की आजादी को एक किस्म से उन्होंने दकियानूसी धार्मिक रीति-रिवाजों से बाहर लाने की कोशिश भी की। यह सिलसिला एक टकराव इसलिए भी खड़ा कर रहा है कि अमरीका की अगुवाई में योरप के कई देशों की फौज ने जिस तरह इराक और अफगानिस्तान पर हमले किए, और लाखों मुस्लिमों को मारा, उससे संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो गया है।
ऐसे में एक बात और जुड़ गई कि सीरिया जैसे देश से निकलकर जो लाखों मुस्लिम शरणार्थी योरप में दाखिल हुए, और वहां पर जगह-जगह उन्हें बसाया गया, तो उनकी मुस्लिम संस्कृति का मेल स्थानीय संस्कृतियों के साथ नहीं बैठ पा रहा है, और इस वजह से जगह-जगह सामाजिक तनाव भी हो रहे हैं। हम इस सवाल को आसान नहीं मानते कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक एकरूपता में से ऐसे मामलों में किसे अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए, और साथ-साथ यह बात भी है कि दूसरे देशों से आए हुए शरणार्थियों को शरण देने वाले देशों को क्या यह आजादी होनी चाहिए कि वे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को लागू करने की शर्त पर ही ऐसी शरण दें? कुछ लोगों को यह लग सकता है कि ये देश अपनी ताकत की वजह से दूसरों की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म करने वाले नियम लागू कर रहे हैं, और कुछ दूसरे लोगों को यह भी लग सकता है कि उदार सामाजिक मूल्यों वाले देश वहां पर रहने वाली मुस्लिम महिलाओं के लिए ऐसे नियम लागू करके मुस्लिम समाज के भीतर ही उन्हें एक बेहतर माहौल दे रहे हैं।
यह एक बेहद उलझा हुआ मुद्दा है, और इस पर काफी बहस भी चल रही है। हम निजी आजादी के हिमायती हैं, लेकिन साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि जिन समाजों में आदमी और औरत के बीच बराबरी नहीं आ पा रही है, वहां पर इस बराबरी को लाने की जिम्मेदारी भी विकसित देशों और समाजों की है, और उसे निभाना चाहिए।

सुरक्षाबलों से जुड़े मुद्दे न तो देशपे्रम हैं, और न ही गद्दारी

संपादकीय
10 जनवरी 2017


बीएसएफ के एक जवान ने अपने अफसरों से शिकायत का एक वीडियो बनाया, और सरहद पर काम करने की बदहाली का नजारा दिखाते हुए प्रधानमंत्री से मांग की कि वे इसकी जांच कराएं कि ग्यारह-ग्यारह घंटे लगातार बर्फ पर तैनाती के पहले और बाद उन्हें किस तरह का बुरा खाना मिलता है। मीडिया में यह वीडियो आते ही केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीएसएफ से इस पर रिपोर्ट मांगी है, और बीएसएफ ने अपनी पहली सफाई में इस जवान के खिलाफ ही दुनिया भर का कहा है कि इसके खिलाफ बहुत शिकायतें पहले से चली आ रही थीं।
अब सोशल मीडिया दो तरह से उबल रहा है। बहुत से लोग इस वीडियो का पहली नजर में हकीकत मानकर यह कहते हुए टूट पड़े हैं कि देश की सरहद पर शहादत के लिए भी तैयार लोगों को अफसरी भ्रष्टाचार इस तरह झेलना पड़ रहा है। मीडिया ने भी पहली नजर में इस शिकायत को हकीकत मानते हुए बीएसएफ अफसरों को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मान ही लिया है। इस देश में जब कभी फौज, सरहद, देश की रक्षा, और शहादत जैसे शब्द किसी चर्चा में आते हैं, तो वहां पर फौज या वर्दीधारियों की की हुई ज्यादतियों की कोई चर्चा करना भी देश के साथ गद्दारी मान लिया जाता है। कश्मीर और मणिपुर बरसों से संघर्ष कर रहे हैं कि सशस्त्र बलों को उनके किसी जुर्म से भी बचाने वाले कानून को खत्म किया जाए, लेकिन ऐसे इलाकों में काम करने वाली फौज और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों का यह मानना है कि उन्हें झूठी शिकायतों का शिकार बनाया जा सकता है, और जब तक उन्हें खास कानूनी हिफाजत नहीं मिलेगी, उनका काम करना मुश्किल होगा।
आज जब हम यह बात लिख रहे हैं, छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह राज्य के तमाम पुलिस अफसरों की बैठक ले रहे हैं, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ताजा नोटिस को देखते हुए वे यह हिदायत दे रहे हैं कि नक्सल इलाकों में भी कार्रवाई करते हुए मानवाधिकारों का सम्मान किया जाए। हालांकि छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में तैनात पुलिस अफसरों के चेहरों पर इससे कोई शिकन नहीं पडऩी है, क्योंकि वे एक किस्म से लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही से पूरी तरह आजाद हैं, और कितनी ही हत्याओं और कितने ही बलात्कारों की तोहमत उन पर लगे, वे पूरी तरह महफूज हैं। दूसरी तरफ यह बात भी है कि बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात पुलिस और बाकी सुरक्षा बल बदहाली में ड्यूटी करते हैं, मच्छरों के हाथों भी मारे जाते हैं, और नक्सली उन्हें दर्जनों की संख्या में थोक में मारते हैं। जहां अपनी जान पर इतना भयानक खतरा हो, वहां पर जाहिर है कि सुरक्षाकर्मी मानवाधिकार की फिक्र को किताबों में छोड़कर काम करते होंगे।
सुरक्षाबलों को जब मुश्किल हालात में काम करना पड़ता है, तो उनका रवैया बहुत बार अलोकतांत्रिक हो जाता है, काम के तनाव में करीब-करीब हर हफ्ते ही ऐसे मोर्चों पर कोई न कोई आत्महत्या होती है। नक्सल मोर्चों पर देश में हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते हैं। ऐसे में सुरक्षाबलों की अपनी जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ, उनकी जवाबदेही भी तय करने की जरूरत रहती है। और देश की आबादी को इस खुशफहमी में जीना बंद कर देना चाहिए कि सुरक्षाबलों के भीतर भ्रष्टाचार या फौज की ज्यादती के मुद्दों को न उठाना देशप्रेम है। जहां कहीं सरकारी वर्दीधारी लोगों की ज्यादतियों को अनदेखा किया जाता है, वहां-वहां जनता के बीच भी बगावत और सत्ता के लिए नफरत पैदा होने लगती हैं। कुल मिलाकर सुरक्षाबलों का मुद्दा इन दोनों ही वजहों से अनदेखा नहीं करना चाहिए, न उन पर खतरे और दिक्कतों को अनदेखा करना चाहिए, और न ही उनकी ज्यादतियों को।

भूखों का पेट भरना, या महज आस्था-प्रदर्शन ?

संपादकीय
09 जनवरी 2017


शहरों में आए दिन सड़क किनारे धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का प्रसाद बंटते दिखता है। अपनी आस्था दिखाने के लिए लोग राह चलते लोगों को खिलाते-पिलाते हैं, और लोग हैं कि कुछ आस्था की वजह से, और कुछ मुफ्त मिलने की वजह से ऐसे स्टॉल पर टूट पड़ते हैं। जगह-जगह ट्रैफिक जाम तो होता ही है, यह खाना-पीना खत्म होने के बाद आसपास दूर-दूर तक जूठन बिखरी दिखती है, खाली पत्तल-दोना, प्लास्टिक की गिलासें और तरह-तरह की गंदगी अगली सुबह तक पड़ी रहती है। आयोजकों को लगता है कि वे ईश्वर को खुश करने में कामयाब हो रहे हैं, गरीबों को खाना खिला रहे हैं, भूखों को पेट भर रहे हैं, और ऐसी सोच के चलते गंदगी फैलाने में उन्हें कोई आत्मग्लानि नहीं होती।
अब सवाल यह है कि आस्था का ऐसा प्रदर्शन किस काम का जो किसी ईश्वर और गुरू के नाम पर ऐसी गंदगी छोड़ जाए, कि आस्थाहीन लोग, या भरे पेट वाले लोग वहां से गंदगी को गालियां देते हुए गुजरें? दूसरी बात यह है कि ऐसे जो आयोजक यह समझते हैं कि वे भूखों को खाना खिला रहे हैं, तो वे शहरी गरीबों को तो खाना खिला रहे हैं, लेकिन वे भूखे नहीं होते। शहरों में तो सड़क से गुजरते हुए भिखारी भी भूखे नहीं होते, और शहर में कमाई की जो संभावना रहती है, उसकेचलते हुए ही भिखारी भी किसी वृद्धाश्रम में जाने के बजाय सड़कों पर ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे शहरों में जब राह चलते लोगों को भूखा मानकर उन्हें खिलाया जाता है, तो वे मुफ्त का तो जरूर खा लेते हैं, लेकिन वे बेबस भूखे नहीं होते, शहरों में हर किसी को इतनी मजदूरी तो मिल ही जाती है कि उनका पेट भर जाता है।
ऐसे में आस्था का प्रदर्शन करने वालों को अपने ईश्वर या अपने गुरू के सम्मान के लिए कुछ बुनियादी बातों को तय करना चाहिए। पहली बात तो यह कि वे कोई गंदगी छोड़कर न जाएं, दूसरी बात यह कि वे रास्ता जाम न करें, और तीसरी बात यह कि वे इस बारे में भी सोचें कि क्या वे सचमुच गरीबों को खिला रहे हैं, या आम हिन्दुस्तानी अपनी आदत के मुताबिक राह चलते वहां पर कतारों में लग रहे हैं, या भीड़ बढ़ा रहे हैं? अगर सचमुच ही सबसे जरूरतमंद गरीब की मदद करनी है, तो इसके लिए लोगों को शहरों से दूर जाना पड़ेगा, और गांवों में जाकर बुजुर्गों को देखना पड़ेगा। हो सकता है कि शहरों में भी जरूरतमंद बुजुर्ग मिल जाएं, लेकिन हमारी सलाह में एक खतरा भी रहेगा कि ऐसे में आस्था का प्रदर्शन नहीं हो सकेगा।

भगत सिंह की सोच पर हमला, और नाम पर एक करोड़ ईनाम

संपादकीय
08 जनवरी 2017


एक खालिस हिंदुस्तानी खेल, कुश्ती पर इतिहास का सबसे बड़ा ईनाम हरियाणा की सरकार ने घोषित किया है। फ्री स्टाइल कुश्ती पर विजेता को एक करोड़ रुपये नगद दिए जाएंगे। एक करोड़ के अलावा पचास लाख और पच्चीस लाख के दूसरे और तीसरे ईनाम भी हैं। और ये पुरस्कार भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव, इन तीन महान शहीदों की याद में रखे गए हैं।
भगत सिंह का ऐसा सम्मान बहुत अच्छा लगता, अगर इसी हरियाणा से लगे हुए पंजाब में, और भाजपा की ही भागीदारी वाली अकाली सरकार के तहत लुधियाना में अभी तीन दिन पहले किताब की दुकानों से भगत सिंह की किताबें हटाने के लिए हिंदू संगठनों ने उग्र प्रदर्शन न किया होता, और तोडफ़ोड़ न की होती। इनकी शिकायत थी कि भगत सिंह की वह किताब बेची जा रही है जो उनके नास्तिक होने के बारे में है। उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई कि यह दुकान और यह किताब नास्तिकता फैलाने का काम कर रही है। इसी पंजाब में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भगत सिंह के नाम पर करने के लिए एक आंदोलन चल रहा है, और उसके खिलाफ भी भाजपा सरकार ने संघ के एक नाम को बढ़ाया है।
यह अकेला मौका नहीं है जब किसी शहीद या किसी महान के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए तो सरकारें या संगठन करते हैं, और जब उनकी विचारधारा की बात आती है, तो उसके ठीक उल्टे काम करते हैं। भगत सिंह की तस्वीरों को आज इस देश में ऐसी मंच पर टंगे देखा जाता है जहां से धर्मांधता और साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के अलावा कोई काम नहीं होता। मतलब यह कि भगत सिंह के नाम को, उसकी शहादत को, भगत सिंह के ही सिद्धांतों के खिलाफ पूरी तरह दुह लिया जाए। ऐसा ही जगह-जगह कबीर के नाम के साथ होता है। भारत सरकार ने कबीर के नाम पर एक सम्मान घोषित किया हुआ है, बुनकर सम्मान। अब कबीर का योगदान इस दुनिया को महज उनकी बुनकरी का रह गया हो यह बात सरकारों और राजनीतिक दलों को इसलिए भी माकूल बैठती है कि कबीर के बुने हुए कपड़े इस देश के नेताओं पर किसी पाखंड के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक चेतना नहीं थोपते। कपड़ा तो नर्म होता है, और कबीर की बानी तो धर्मांधता के खिलाफ कड़ा वार करने वाली थी।
विवेकानंद को इस देश का एक महानतम व्यक्तित्व साबित करने वाले अनगिनत हिंदू संगठन उनकी पोशाक से भगवा रंग तो पेश कर देते हैं, लेकिन विवेकानंद ने धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ जो कुछ लिखा था, उसे बहुत सोच-समझकर दफन कर देते हैं। ऐसा ही सावरकर की सोच के साथ किया जाता है। सावरकर तो एक वीर स्वतंत्रता सेनानी की तरह तो पेश किया जाता है, लेकिन गाय को काटने और गोमांस खाने के पक्ष में सावरकर के लंबे-चौड़े अनगिनत लिखित तर्कों को दबा दिया जाता है, अनसुना कर दिया जाता है।
यह देश बड़ा अजीब है, गांधी को समाज और सोच में जगह नहीं देता, नोटों पर जगह देता है, और गांधी के नाम पर नोट चलाए जाते हैं, और गोडसे की सोच के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। भगत सिंह को जानने वाले यह समझ सकते हैं कि उनकी सोच का कत्ल करने वाले लोग अगर उनके नाम पर दंगल में एक करोड़ रुपये का ईनाम रख रहे हैं, तो यह पंजाब में होने जा रहे चुनाव में उस समाज के वोटों को प्रभावित करने का तरीका है, जिस समाज में भगत सिंह पैदा हुए थे, और आगे चलकर जो नास्तिक हो गए थे।

पतझड़ की पत्तियों से रवानगी सीखने की जरूरत इंसानों को

संपादकीय
07 जनवरी 2017


भारतीय क्रिकेट के सबसे कामयाब कप्तान रहे महेन्द्र सिंह धोनी ने एक-एक करके हर तरह की क्रिकेट की कप्तानी से सन्यास ले लिया है, और अब वे महज एक खिलाड़ी की हैसियत से खेलना जारी रखेंगे, तब तक जब तक कि चयनकर्ता उन्हें चुनते रहेंगे। कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि इतने कामयाब लोग भी धक्का देकर हटाने के बजाय खुद होकर महत्व की किसी जगह को कैसे छोड़ पाते हैं। लेकिन लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने अपने परिवार को अधिक समय देने के लिए इस्तीफा देने की घोषणा की है, और कहा है कि उनके बच्चे उनके पीएम रहने से एक अनावश्यक तनाव में काम करते हैं, और वे उन्हें एक सुकून देने के लिए वे इस्तीफा दे रहे हैं। दुनिया के कई ऐसे अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां पर किसी विभाग का प्रमुख बनने के बावजूद वहां के प्राध्यापक विश्वविद्यालय के सामने यह शर्त रख देते हैं कि वे लगातार विभाग-प्रमुख का काम नहीं देखेंगे, क्योंकि उनका पढ़ाना और शोधकार्य प्रभावित होते हैं। ऐसे में वहां पर सबसे वरिष्ठ दो-तीन प्राध्यापक बारी-बारी से विभाग-प्रमुख का जिम्मा उठाते हैं।
खेलों में कभी-कभी ऐसा देखने में आता है कि खिलाड़ी या कप्तान अपने करियर की ऊंचाई पर रहते हुए या तो मुकाबलों से सन्यास ले लेते हैं, या फिर कप्तानी से, और हो सकता है कि किसी ने इन दोनों से भी एक साथ सन्यास लिया हो। हमारा यह मानना है कि जहां टीम में रहना या कि कप्तान बनना दूसरे लोगों पर निर्भर करता हो, वहां पर अपनी ऊंचाई पर रहते हुए ही लोगों को खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन जहां निजी प्रदर्शन की बात हो, वहां पर लोगों को खेलना तब तक जारी रखना चाहिए जब तक वे अच्छा रिकॉर्ड कायम रख सकें, और जहां उनकी रफ्तार घटने लगे, उनके धीमेपन से टीम पर असर होने लगे, तब उन्हें खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। भारतीय क्रिकेट टीम ने ऐसे भी खिलाडिय़ों को देखा है जो कि किसी रिकॉर्ड पर पहुंचने के लिए खेलते चले जाते हैं, उनका खेल धीमा हो चुका रहता है, वे खुद डरे-सहमे खेलते हैं, लेकिन सन्यास नहीं ले पाते। ऐसे लोगों में कुछ महान खिलाड़ी भी रहे हैं, जिनकी महानता को याद करते हुए कोई उन्हें यह याद भी नहीं दिला पाते कि अब उनका जाने का वक्त आ गया है।
यह बात जिंदगी के हर दायरे में लागू होती है कि लोगों को वक्त रहते अपनी जगह दूसरों के लिए खाली कर देनी चाहिए। ऐसा कारोबार में बाप-बेटे के बीच भी हो सकता है, या कि राजनीति में दो पीढिय़ों के बीच हो सकता है, और कुनबों से परे भी ऐसी बात अलग-अलग लोगों के बीच हो सकती है। अब जैसे कल की ही बात है भाजपा में मार्गदर्शक मंडल नाम के वृद्धाश्रम में भेज दिए गए लालकृष्ण अडवानी भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में तो पहुंचे, लेकिन अनमने ढंग से कुछ देर में ही वहां से निकल गए, और कार्यक्रम में रूके ही नहीं। आज की भाजपा की राजनीति में उनकी कोई जगह बची नहीं है। ऐसे में यह अनमनापन छोड़कर उन्हें वनागमन की सोचना चाहिए, और अपने आपको पार्टी की राजनीति से अलग करके देश के हित में लिखना-पढऩा चाहिए, और समकालीन भारतीय राजनीतिक इतिहास के खुलासे करने चाहिए। इंसानी जिंदगी में तो यह हो नहीं पाता कि घर-परिवार में कोई इस्तेमाल न बचने पर लोग खुद होकर चल बसें, लेकिन लोगों को सार्वजनिक जगहों से रवानगी सीखनी चाहिए।
धोनी ने कामयाबी को छूकर, वहां पर कायम रहकर, और कप्तानी छोड़कर खेल जारी रखने की जो एक नई और ताजा मिसाल सामने रखी है, उससे बहुत से लोगों को सबक लेना चाहिए, राजनीति में भी, कारोबार में भी, समाजसेवी संस्थाओं में भी, और धर्म या आध्यात्म के संगठनों में भी। आज तो भारत में समाजसेवी संस्थाओं और दूसरे ट्रस्ट-समितियों से भी लोग मरने के बाद भी रिटायर नहीं हो पाते, और अपने आल-औलाद को वहां पर काबिज करवाकर ही आखिरी सांस लेते हैं। कुदरत से कुछ सीखने की जरूरत है, नए मौसम की पहली पत्तियों को जगह देने के लिए हर पेड़-पौधे की पुरानी पत्तियां पतझड़ में खुद होकर रवानगी डाल देती हैं।