अपनी मंजिल, इरादे, और कसमें कुदरत देख तय करें...

संपादकीय
01 जनवरी 2017


नए साल का मौका बहुत सी नई बातों को तय करने का भी रहता है। हम पिछले बरसों में साल बीतने के कुछ दिन पहले पाठकों को उकसाते आए हैं कि वे तय करें कि कौन-कौन सी बुरी बातें या खामियां नए बरस में छोड़ देंगे, और कौन-कौन सी अच्छी बातें या खूबियां अपना लेंगे। सोशल मीडिया पर यह मजाक भी बरसों से चले आ रहा है कि गुजरते हुए साल का आखिरी हफ्ता लोग जिम जाना तय करते हैं, कसरत की कसम खाते हैं, दारू या दूसरे नशे से तौबा कर लेते हैं, और नए साल में एकदम नए इरादों के साथ वे दुनिया को बदल देने की नीयत से सोकर उठते हैं। ये इरादे कुछ दिन तो जरूर चलते हैं, लेकिन फिर दारू-मुर्गा खाना-पीना शुरू हो जाता है, सिगरेट और तम्बाकू लौट आते हैं, और कसरत के लिए सुबह उठना धरे रह जाता है।
अब आज साल के पहले दिन थोड़ी सी चर्चा दुनिया की हिंसा से परे, समाजवाद के नाम पर एक-दूसरे को साइकिल से धकेलकर गिराते हुए बाप-बेटों से परे, और हिन्दुस्तान को कुचल देने वाली नोटबंदी से परे भी कर ली जाए। दुनिया में नए संकल्पों, नई कसमों, और नए इरादों के साथ आखिर क्या गड़बड़ा जाता है कि वे पूरे नहीं हो पाते? इसके पीछे की एक बड़ी वजह तो यह रहती है कि कसम इतनी बड़ी खा ली जाती है कि वह गले की हड्डी बनकर फंस जाती है, और न निगलते बनती, न उगलते बनती। मंजिल इतनी दूर की तय कर ली जाती है कि उसकी उतनी दूरी तय कर पाने के पहले दम टूटने लगता है। कसमों का बोझ इतना बड़ा उठा लिया जाता है कि आधा कोस तो उसे उठाकर चलना मुमकिन रहता है, लेकिन उसके बाद कंधे, पीठ, और कमर पांव सहित जवाब देने लगते हैं। इसलिए हमारा तजुर्बा यह कहता है कि नए साल के संकल्प, और नए साल के लिए अपने तय किए हुए इरादे ऐसे रहने चाहिए जिन्हें कम से कम आधा पूरा करना मुमकिन लगता हो। दो किलोमीटर चलने की ताकत दिखती हो, और बीस किलोमीटर की मंजिल छांट ली जाए, तो सफर बीच में टूटना ही टूटना है।
इसलिए लक्ष्य हमेशा वास्तविक और हासिल करने लायक तय करना चाहिए। लेकिन ऐसा लक्ष्य बहुत नाटकीय नहीं रहता, और आसपास के लोगों से उसकी अधिक चर्चा करके उनका ध्यान खींचना भी मुमकिन नहीं रहता, इसलिए लोग हमेशा ऐसी बातें तय करते हैं जिन्हें आसपास के लोगों को सुनाया जा सके, और उनसे वाहवाही पाई जा सके। लेकिन पल भर की वाहवाही मिलने के बाद जब कसम टूट जाती है, और अपने आपके भीतर एक निराशा होने लगती है, तो वह एक बड़ी कसम खाने के बाद फायदे से अधिक नुकसान जैसी रहती है। छोटे-छोटे वक्त के लिए छोटी-छोटी कसमें अधिक बड़े फायदे देती हैं। इसलिए नए बरस पर लोगों को चाहिए कि वजन घटाने से लेकर, खर्च घटाने तक, बुरे ऐब छोडऩे से लेकर, अच्छी बातें अपनाने तक की कसमों को साल भर के बजाय महीने भर के लिए तय करें, टोकरा भर तय करने के बजाय लोटा भर तय करें, और फिर जब इसमें कामयाबी मिल जाए, तब अगली कसम का आकार और वजन थोड़ा-थोड़ा बढ़ाते चलें। कोई भी लंबी और बड़ी मंजिल एक साथ छांटना खतरनाक होता है। कोई भी पेड़ बीज से बरगद बनने तक एक लंबा वक्त लेता है, और कुदरत की रफ्तार और तौर-तरीकों को देखकर अगर लोग अपने इरादे तय करें, तो उनमें कामयाबी की गुंजाइश अधिक रहेगी। 

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