...महज अतीत के गौरव पर भविष्य निर्माण नहीं हो सकता

संपादकीय
12 जनवरी 2017


विवेकानंद जयंती पर आज देश भर में कार्यक्रम हो रहे हैं, और नौजवानों को विवेकानंद की याद दिलाई जा रही है। उन्हें आगे बढऩे के लिए एक प्रेरणा दी जा रही है कि नौजवान रहते हुए ही विवेकानंद किस तरह विश्व धर्म संसद में पहुंचकर एक ऐतिहासिक प्रभावशाली भाषण देकर भारत का नाम रौशन कर चुके थे। यह बात सही है कि विवेकानंद कम उम्र में ही दुनिया के बीच भारत के धर्म और दर्शन को असरदार तरीके से रख चुके थे लेकिन आज उनकी जयंती के समारोहों के बीच यह सोचने की जरूरत है कि अतीत की स्मृतियों के बीच ही क्या भविष्य का निर्माण हो सकता है?
भारत सहित कुछ और देशों में भी एक यह दिक्कत लगातार बनी रहती है कि इतिहास के कुछ गौरवशाली पन्नों को लेकर समारोह चलते रहते हैं, और उन्हीं पन्नों को भविष्य भी मान लिया जाता है, वर्तमान भी मान लिया जाता है। स्मृतियों पर गौरव अच्छी बात है, लेकिन स्मृतियों से ऊपर उठकर, आगे जाकर आगे बढऩा भी जरूरी है, उसके बिना ऐसा गौरव पूरी की पूरी पीढिय़ों को झांसे में रख देता है। हमें आज के अपने काम ऐसे रखने चाहिए जिन पर आने वाले कल को गौरव हो सके, लेकिन आज ऐसा करने की फिक्र छोड़कर इतिहास के गौरव पर ही जीने वाली पीढ़ी कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं पा सकती।
आज भारत में जलसों और समारोहों में जितना उत्साह दिखता है, उतना उत्साह मौजूदा नौजवान पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ठोस काम करने में नहीं दिखता। ऐसा इसलिए है कि अतीत के गौरव के समारोह एक आरामदेह सोफा की तरह रहते हैं जिन पर बैठ जाएं या सो जाएं, अच्छा ही अच्छा लगता है। दूसरी तरफ वैसा ही गौरव, या उससे आगे का गौरव हासिल करना हो, तो एक बड़ा लंबा और कड़ा सफर तय करना पड़ता है जो कि आसान काम नहीं होता। ऐसे लंबे सफर के लिए रास्ता तैयार करने की जिम्मेदारी सरकार और समाज की होती है, लेकिन वे भी इतनी मेहनत-मशक्कत करने के लिए तैयार नहीं रहते, ऐसे में अतीत का गौरव बड़ी सहूलियत के मौके जुटा देता है। आज अगर कोई यह कहे कि विवेकानंद जितने तरह की विविध विचारधाराओं और धर्म-दर्शन की विविधताओं को पढऩे के बाद स्वामी बन पाए थे, सम्मान के लायक बन पाए थे, तो वैसी विविधता के लिए, वैसी मेहनत के लिए कोई सम्मान आज लोगों की नजर में रह नहीं गया है। राष्ट्रीय युवा उत्सव को मनाना तो ठीक है, लेकिन यह बात समझ लेने की जरूरत है कि विविधता को समझे बिना, उसके सम्मान बिना, उससे गुजरे और उसे भोगे बिना, विवेकानंद कभी स्वामी न बने होते। समुद्र मंथन की जो कहानी है, उसमें जब तक पानी को मथा नहीं जाता है, उसमें से अमृत तो अमृत, विष भी नहीं निकलता। इसलिए आज युवा उत्सव के मौके पर, विवेकानंद को याद करते हुए, उनका सम्मान करते हुए, उनको प्रेरणा मानते और बताते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि महज एक विचारधारा के कीर्तन में बैठ-बैठकर कोई विवेकानंद नहीं बन सकते, इसके लिए अलग-अलग सोच को समझना भी पड़ता है, तब कहीं जाकर एक ऐसी समझ विकसित होती है, जिसे सुनने के लिए दुनिया की धर्म संसद चौकन्नी होकर बैठे। अगर विवेकानंद उस संसद में जाकर महज किसी एक धर्म का नारा लगाते, और धर्मान्धता की बातें करते, तो वे कोई इतिहास नहीं रच पाते। इसलिए युवा दिवस के मौके पर नौजवानों को एक खुले दिमाग के साथ दुनिया को देखने और समझने का मौका देना भी तय करना चाहिए। वरना महज अतीत के गौरव पर भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता।

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