गांधी की अस्थियों को राजघाट से देशनिकाला भी दे दिया जाए

संपादकीय
14 जनवरी 2017


बीबीसी जंगली जानवरों पर एक फिल्म बना रही है और इस दौरान शूटिंग के लिए उसने राजस्थान के जंगलों में बंदरों के बीच एक ऐसा बंदर का पुतला बनाकर बिठा दिया जिसके भीतर दूर से नियंत्रित कैमरे लगे हुए थे, और उसके आसपास बंदरों की जिंदगी और हरकत के फिल्मांकन के लिए यह कोशिश की गई थी ताकि बंदरों को कोई बाहरी चीज वहां न दिखे और वे अधिक से अधिक स्वाभाविक रहें। लेकिन बंदरों को अचानक यह अहसास हुआ कि उनके बीच उनका एक बच्चा हिलडुल नहीं रहा है, और उसे छूकर देखकर जब उन्हें लगा कि उसमें जान नहीं है, तो उन्होंने यह मान लिया कि वह मर गया है, और इसके बाद वे गमगीन होकर सन्नाटे में बैठे रहे, एक-दूसरे से लिपटकर गम बांटते रहे। जिन जानवरों को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और इंसानों की खराब हरकतों पर जब उन्हें जंगली कहा जाता है, तो यह अंदाज नहीं रहता कि वे किस तरह संवेदनशील रहते हैं।
अब इसी के साथ-साथ आज कई दूसरी खबरें भी हवा में तैर रही हैं, जिनमें से एक तो यह है कि किस तरह खादी ग्रामोद्योग आयोग ने अपने कैलेंडर से गांधी की चरखा चलाती परंपरागत तस्वीर हटाकर उसकी जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चरखा चलाती तस्वीर छापी है। यह कैलेंडर और डायरी एकदम से खबरों में आ गई हैं क्योंकि गांधी की जगह मोदी लोगों को एकदम से पच नहीं रहे हैं, और बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। आयोग की बड़ी दिलचस्प सफाई है कि पिछले बरसों में खादी की बिक्री लगातार गिरती जा रही थी, और प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद यह बिक्री एकदम से बढ़ी है, और इसलिए वे सबसे कामयाब ब्रांड एम्बेसडर हैं। यह बात सही है कि गांधी कोई कामयाब कारोबारी तो थे नहीं, और उन्होंने खादी को बिक्री के टारगेट के हिसाब से सामने नहीं रखा था, इसलिए अब जो अधिक बिक्री करवा दे, उसकी तस्वीर गांधी की जगह लगा देना एक नया गांधीवाद है, और इस पर कुछ बोलने की हिम्मत भी हमारी नहीं है।
लेकिन मानो यह काफी न हो, हरियाणा के एक मंत्री अनिल विज ने कहा है कि भारतीय रुपये का अवमूल्यन भी इसीलिए हुआ कि उस पर गांधी की तस्वीर थी, और अब धीरे-धीरे नोट से भी गांधी की तस्वीर हटा दी जाएगी। दो दिनों से कैलेंडर और डायरी खबरों में हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस बारे में कुछ नहीं कहा है। और अब उनकी पार्टी की एक राज्य सरकार के मंत्री ने दिल्ली के बगल हरियाणा में बैठकर गांधी को नोटों से भी धक्का देकर हटाने की बात कही है। हमारा ख्याल है कि इस मुद्दे पर बहुत अधिक शब्दों में कुछ कहने के बजाय महज एक सलाह हम दे सकते हैं कि यह सरकार राजघाट से गांधी की अस्थियों को भी देशनिकाला दे दे, क्योंकि गांधी मरने के बाद भी उन्हीं तमाम मूल्यों और सिद्धांतों को याद दिलाते रहेंगे, जो कि बहुत से लोगों को बर्दाश्त नहीं हो पाएंगे। गांधी को न कैलेंडर की जरूरत है, न नोट की, और न राजघाट की। वे पार्टियां और वे नेता अपना सोचें जिन्हें कि चुनाव के बीच विश्वसनीयता पाने के लिए गांधी की जरूरत पड़ती है। फिलहाल भारत का इतिहास मोदी की चुप्पी दर्ज कर रहा है, जो कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनकी एक बड़ी पहचान बन चुकी है।
इस देश के इंसानों को बीबीसी की फिल्म के बंदरों से कुछ सीखने की जरूरत है।

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