मौतों पर मुआवजों के लिए राष्ट्रीय नीति की जरूरत...

संपादकीय
15 जनवरी 2017


पटना में एक नाव हादसे में दो दर्जन के करीब मौतों के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए और मरने वालों को लिए अलग-अलग मुआवजों का ऐलान किया है। ऐसे हर हादसे पर मुआवजा एक सरीखा नहीं रहता, जबकि मौत तो मौत रहती है, और कोई एक मरे तो भी वह मौत है, और दर्जनों लोग एक साथ मरे तो भी वह मौत है। फिर इसके बाद यह भी रहता है कि किसी राज्य में या उसके पड़ोस में अगर चुनाव होने हैं तो कई बार मौत पर मुआवजे के रेट बढ़ जाते हैं। कभी-कभी यह भी होता है किसी जाति या धर्म की भीड़ की मौत होने पर उस समुदाय की एकजुटता और ताकत को देखते हुए भी उस पर गम कम या अधिक होता है, और ऐसा ही हाल मुआवजे का होता है।
भारत जैसे लोकतंत्र में जहां एक संघीय ढांचा है, और जहां केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसे हादसों पर हमेशा ही मुआवजे की घोषणा करती हैं, वहां इसमें एकरूपता की जरूरत है। एक किस्म की मौतों पर बिना किसी मुनादी के, बिना किसी राजनीतिक लुभावने फायदे के, सरकार की तरफ से एकमुश्त, एक मुआवजा घोषित हो जाना चाहिए, दिया जाना चाहिए, और इसके अलावा अलग-अलग कई मुआवजे बंद होने चाहिए। हमारा ख्याल है कि मुआवजे का जिम्मा और अधिकार राज्यों को दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत का हर हिस्सा किसी न किसी राज्य या केन्द्र प्रशासित प्रदेश के तहत ही आता है। भारत सरकार किसी मौत पर मुआवजा तभी दे जब ऐसी मौत देश के बाहर होती हो, और केन्द्र सरकार पर सीधे जिम्मा आता हो।
अब जरा बात मुआवजे की रकम पर हो जाए। भारत में मौतें प्राकृतिक विपदाओं के कारण होती हैं, और फिर मानव निर्मित दुर्घटनाओं में भी होती हैं। ऐसी मानव निर्मित दुर्घटनाएं कई बार सरकारों की तैयारी की नाकामयाबी से होती हैं, और कभी-कभी लोगों की निजी गलती से भी होती हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसे तमाम मुआवजों के लिए अलग-अलग दर्जे तय करना चाहिए, और मदद की रकम भी तय करना चाहिए। आज देश में जितने तरह की बीमा कंपनियां काम कर रही हैं, सरकारें अगर चाहें तो आम जनता की किसी भी तरह की मौत पर परिवार के बाकी लोगों को मदद के लिए मुआवजा देने का बीमा भी करवाया जा सकता है। हमारा ख्याल है कि किसी भी तरह के मुआवजे से आयकरदाता तबके को बाहर रखना चाहिए, क्योंकि वह तबका ऐसे नुकसान को उठा सकता है। इससे परे जब कोई गरीब परिवार किसी कमाऊ सदस्य को खोता है, तो परिवार पर मुसीबत टूट पड़ती है। ऐसे में सरकार को मुआवजे की रकम अधिक भी रखनी चाहिए। इसके लिए संसद में या विधानसभाओं में व्यापक विचार-विमर्श के बाद नियम-शर्तें और पैमाने तय करने चाहिए, ताकि मौतों पर मुआवजे का ऐलान राजनीतिक नफे की कोशिश जैसा न रह जाए। ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि इंसानी जान की कीमत एक जैसी लगानी चाहिए, मौत अकेले हो तो वह सस्ती है, और वह थोक में हो तो वैसी जिंदगियां महंगी हैं, यह बात न्यायसंगत नहीं है। यह बात विधानसभा और संसद शायद खुद होकर न उठे क्योंकि हर नेता को मुआवजे की ऐसी घोषणा करने में महत्व का अनुभव होता है, और वे शायद ही इस लालच को छोड़ सकें, ऐसे में जनता के बीच से यह बात उठनी चाहिए कि राष्ट्र की मुआवजा नीति क्या हो, और वह राज्यों की सहमति से कैसे बनाई जाए।

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