ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब

संपादकीय
25 जनवरी 2017


बिहार के सत्तारूढ़ जदयू के मुखिया शरद यादव ने एक बार फिर महिलाओं के बारे में एक ओछी बात कहकर यह साबित किया है कि संसद के भीतर वे और बहुत से मुद्दों पर देश में सबसे अधिक समझदारी की बात करने वाले नेता तो हैं, लेकिन वे महिलाओं के बारे में बात करते हुए अक्सर बहक जाते हैं, और शायद कोई मनोविश्लेषक यह बता सके कि क्या इसके पीछे उनकी कोई कुंठा काम करती है जो उनसे ऐसी बकवास करवाती है। उन्होंने वीडियो कैमरों के सामने मंच और माईक पर यह कहा कि वोट की इज्जत बेटी की इज्जत से बढ़कर है। अब इसके बाद जब हंगामा मचा तो कुछ घंटों के भीतर ही उन्होंने इस पर जवाब तो दिया लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और कहा कि वोट और बेटी के लिए मोहब्बत एक सी होनी चाहिए। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा के एक और बड़बोले और बकवासी नेता विनय कटियार ने चुनाव प्रचार में प्रियंका गांधी के बारे में पूछने पर यह कहा कि भाजपा के पास प्रियंका गांधी से कहीं ज्यादा सुंदर प्रचारक हैं। यह कहने का बड़ा साफ मतलब यह है कि प्रियंका गांधी का महत्व उनकी सुंदरता के अलावा कुछ नहीं है, और ऐसा कहकर विनय कटियार ने एक कट्टरतावादी-पुरूषवादी सोच की एक घटिया मिसाल ही सामने रखी हैं।
आमतौर पर तो शरद यादव देश की कई घोर दकियानूसी, साम्प्रदायिक, और महिला विरोधी पार्टियों के मुकाबले कुछ बेहतर राजनीति करते दिखते हैं। उनकी पार्टी ने अभी बिहार में शराबबंदी जैसा एक सकारात्मक फैसला लागू किया है। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं को कभी वे परकटी कह देते हैं, और कभी कोई और ओछी बात कह बैठते हैं। इस एक बयान पर आज हम यहां न लिखते, अगर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आज टीवी की खबरों में और अखबारों में इसी तरह की कुछ और खबरें छाई हुई न होतीं। एक दूसरी खबर बस्तर की है जहां पर पुलिस के सबसे बड़े अफसर पर यह तोहमत लगी है कि वहां काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए जब उन्हें एक दूसरी सामाजिक कार्यकर्ता ने एसएमएस भेजा, तो उसके जवाब में उन्होंने संक्षिप्त शब्दों में एक गाली लिख भेजी। यह वही बस्तर है जहां पुलिस और सुरक्षाबलों पर महिलाओं से बड़ी संख्या में बलात्कार के आरोप राष्ट्रीय महिला आयोग ने सही पाए हैं, और उनकी जांच शुरू की है। इसके पहले अदालतों ने भी यह पाया है कि बस्तर मेें तमाम आदिवासियों, और खासकर महिलाओं के साथ सुरक्षा बल की कई तरह की हिंसा चल रही है। इसी बस्तर में कल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह संविधान लागू होने की सालगिरह के गणतंत्र दिवस का झंडा फहराएंगे, और यही पुलिस उनको सलामी भी देगी। अब सवाल यह उठता है कि बीते कल बालिका दिवस मनाया गया, और उसी दिन बस्तर पुलिस का सबसे बड़ा अफसर एक बेकसूर महिला आंदोलनकारी के एक लोकतांत्रिक संदेश के जवाब में उसे सबसे गंदी गाली लिखकर भेज रहा है, तो ऐसे में किसी संविधान का जलसा मनाने का क्या मतलब रह जाता है?
भारत में जब तक कानून के लिए लोगों के मन में सम्मान न रहे, यह बेहतर होगा कि वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का जलसा न मनाएं। इस देश में जो सबसे कमजोर तबके हैं, उनके साथ सबसे अधिक जुल्म है। दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, और गरीबों के साथ जुल्म की कहानियां खत्म ही नहीं होती हैं। सरकार की अनगिनत एम्बुलेंस मौजूद हैं, और देश के कई प्रदेशों में लगातार लोग अपने बीमार को ढोकर ले जाते दिखते हैं, अपने मुर्दों को ढोकर ले जाने को मजबूर रहते हैं। सरकारी अफसर कुर्सियों पर बैठे, या कुर्सियों से नदारद रहकर जनता का पैसा बर्बाद करते हैं, और जो सबसे कमजोर जनता है, उसके मानो कोई हक ही नहीं रहते। इस देश का संविधान ऐसी व्यवस्था के लिए नहीं बनाया गया था, और दुनिया भर के लोगों को इस देश में बुलाकर, इसके प्रदेशों में बुलाकर आत्मप्रशंसा के भाषणों से देश की बदहाली और हैवानियत की तस्वीरें नहीं छुपती हैं। स्वतंत्रता दिवस हो, या गणतंत्र दिवस, जब कभी ऐसे मौकों पर संविधान का गुणगान किया जाता है, तो वह गुणगान इतना पाखंडी लगता है कि लोगों को संविधानतले कुचलने से हुए जख्म और याद आने लगते हैं। इस देश में सत्ता को जनता के बुनियादी हकों का सम्मान करना सीखना होगा, वरना संविधान के सम्मान का कोई मतलब नहीं है।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में जिसके हाथ सत्ता की ताकत आ जाती है, वे मोटे तौर पर जुल्मी होने लगते हैं। ताकत लोगों को खूंखार बना देती है, बेरहम बना देती है, और हिंसक बना देती है। संविधान नाम की किताब को सत्ता पर बैठे लोग मेज के नीचे पांवों को रखने के लिए बनाए गए पटे की तरह इस्तेमाल करते हैं, और ऐसे संवेदनाशून्य लोकतंत्र में संविधान पर जलसा बेमतलब है। 

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