लुभावने घोषणा पत्र देख लगता है कि केन्द्र और राज्यों के चुनाव साथ हों...

संपादकीय
29 जनवरी 2017


पांच राज्यों के चुनावों के मौके पर हर राजनीतिक दल हर राज्य के लिए अलग-अलग घोषणा पत्र जारी कर रहे हैं, और बाकी गैर-चुनावी राज्यों के मतदाता ठगे से देख रहे हैं और ट्वीट कर रहे हैं कि महज पंजाब में ही रियायती घी क्यों दिया जाएगा, हरियाणा में भी तो भाजपा की ही सरकार है। लेकिन ऐसी बातों के बीच यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक जाकर खारिज हो आया कि चुनावों के बीच केन्द्र सरकार को बजट पेश करने से रोका जाए। बाकी पार्टियों का कहना है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन ऐसी लुभावनी घोषणाएं कर सकता है जिससे चुनावी-राज्यों के वोट प्रभावित हों।
ऐसे में एक बार फिर वह बात जायज लगती है कि संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं ताकि पूरे पांच बरस केन्द्र या राज्य सरकारें कहीं न कहीं होने वाले चुनावों को देखकर लुभावनी घोषणाओं पर ही जनता का खजाना खर्चने को बेबस न हों। व्यवहारिक दिक्कतों के साथ भी यह एक बेहतर स्थिति हो सकती है कि सारे चुनाव एक साथ हों। इसके साथ एक बात की गारंटी भी करनी होगी कि राज्य सरकारों को भंग करने के केन्द्र के अधिकार को खत्म किया जाए, उसके बिना एक साथ चुनाव महज किताबी बात होगी।
पिछले बरस जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  संसद, विधानसभाओं, और म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव एक साथ करवाने की मंशा जाहिर की थी तब हमने लिखा था कि प्रधानमंत्री की सोच अच्छी है, और उनके पहले भी कुछ लोग ऐसी राय दे चुके हैं, लेकिन तराजू के एक पलड़े में दो दर्जन मेंढकों को एक साथ तौलने की तरह का काम आसान नहीं होगा, और हो सकता है कि मुमकिन भी न हो। इसकी एक वजह यह है कि जब कभी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर राज्य विधानसभा के चुनाव कराने की बात होगी तो कई ऐसे विधानसभाएं होंगी जिनका कार्यकाल पूरा होने के पहले ही वहां चुनाव कराने पड़ेंगे। ऐसे में वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यकाल को घटाने के खिलाफ होगी। दूसरी बात यह भी है कि सांसदों और विधायकों की पेंशन भी सदन के कार्यकाल के साथ जुड़ी हुई होती है। अगर सदन पांच बरस पूरे नहीं कर पाया, तो सांसद-विधायक की पेंशन पर फर्क पड़ता है।
लेकिन सारे राजनीतिक दलों को मिलकर इसका रास्ता निकालना चाहिए। और जिस तरह से कई राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, और कांग्रेस की सरकारें घटती जा रही हैं, कांग्रेस को इस पर शायद अधिक नुकसान न हो। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि एक साथ चुनाव होने से पूरे देश में जिस नेता या पार्टी का माहौल रहेगा, उसकी हवा संसदीय सीट से लेकर वार्ड और पंचायत तक असर डालेगी। अब ऐसे में नरेन्द्र मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जिनका असर देश भर में सबसे अधिक फैला हुआ, सबसे अधिक ताकत वाला दिखता है। हो सकता है कि एक साथ चुनाव की उनकी सोच के पीछे यह भी एक वजह हो, लेकिन हम एक साथ चुनाव के हिमायती इसलिए भी हैं क्योंकि इससे सरकारें जनता को लुभाने के अनावश्यक दबाव के बिना पांच बरस तक कड़े फैसले लेकर भी काम कर सकती हैं।
राष्ट्रपति अगर ऐसे किसी मामले में दिलचस्पी लें, और पहल करें, तो शायद सभी पार्टियों को बिठाकर वे ऐसा करवा सकते हैं। राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के चलते ऐसा करें इसमें शक है, लेकिन ऐसा होने पर देश का फायदा होगा, इसमें हमें कोई शक नहीं है। मोदी जैसे नेता तो आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन देश में चुनाव व्यवस्था में अगर ऐसा बड़ा सुधार हो सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए।

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