पतझड़ की पत्तियों से रवानगी सीखने की जरूरत इंसानों को

संपादकीय
07 जनवरी 2017


भारतीय क्रिकेट के सबसे कामयाब कप्तान रहे महेन्द्र सिंह धोनी ने एक-एक करके हर तरह की क्रिकेट की कप्तानी से सन्यास ले लिया है, और अब वे महज एक खिलाड़ी की हैसियत से खेलना जारी रखेंगे, तब तक जब तक कि चयनकर्ता उन्हें चुनते रहेंगे। कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है कि इतने कामयाब लोग भी धक्का देकर हटाने के बजाय खुद होकर महत्व की किसी जगह को कैसे छोड़ पाते हैं। लेकिन लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने अपने परिवार को अधिक समय देने के लिए इस्तीफा देने की घोषणा की है, और कहा है कि उनके बच्चे उनके पीएम रहने से एक अनावश्यक तनाव में काम करते हैं, और वे उन्हें एक सुकून देने के लिए वे इस्तीफा दे रहे हैं। दुनिया के कई ऐसे अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां पर किसी विभाग का प्रमुख बनने के बावजूद वहां के प्राध्यापक विश्वविद्यालय के सामने यह शर्त रख देते हैं कि वे लगातार विभाग-प्रमुख का काम नहीं देखेंगे, क्योंकि उनका पढ़ाना और शोधकार्य प्रभावित होते हैं। ऐसे में वहां पर सबसे वरिष्ठ दो-तीन प्राध्यापक बारी-बारी से विभाग-प्रमुख का जिम्मा उठाते हैं।
खेलों में कभी-कभी ऐसा देखने में आता है कि खिलाड़ी या कप्तान अपने करियर की ऊंचाई पर रहते हुए या तो मुकाबलों से सन्यास ले लेते हैं, या फिर कप्तानी से, और हो सकता है कि किसी ने इन दोनों से भी एक साथ सन्यास लिया हो। हमारा यह मानना है कि जहां टीम में रहना या कि कप्तान बनना दूसरे लोगों पर निर्भर करता हो, वहां पर अपनी ऊंचाई पर रहते हुए ही लोगों को खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन जहां निजी प्रदर्शन की बात हो, वहां पर लोगों को खेलना तब तक जारी रखना चाहिए जब तक वे अच्छा रिकॉर्ड कायम रख सकें, और जहां उनकी रफ्तार घटने लगे, उनके धीमेपन से टीम पर असर होने लगे, तब उन्हें खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। भारतीय क्रिकेट टीम ने ऐसे भी खिलाडिय़ों को देखा है जो कि किसी रिकॉर्ड पर पहुंचने के लिए खेलते चले जाते हैं, उनका खेल धीमा हो चुका रहता है, वे खुद डरे-सहमे खेलते हैं, लेकिन सन्यास नहीं ले पाते। ऐसे लोगों में कुछ महान खिलाड़ी भी रहे हैं, जिनकी महानता को याद करते हुए कोई उन्हें यह याद भी नहीं दिला पाते कि अब उनका जाने का वक्त आ गया है।
यह बात जिंदगी के हर दायरे में लागू होती है कि लोगों को वक्त रहते अपनी जगह दूसरों के लिए खाली कर देनी चाहिए। ऐसा कारोबार में बाप-बेटे के बीच भी हो सकता है, या कि राजनीति में दो पीढिय़ों के बीच हो सकता है, और कुनबों से परे भी ऐसी बात अलग-अलग लोगों के बीच हो सकती है। अब जैसे कल की ही बात है भाजपा में मार्गदर्शक मंडल नाम के वृद्धाश्रम में भेज दिए गए लालकृष्ण अडवानी भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में तो पहुंचे, लेकिन अनमने ढंग से कुछ देर में ही वहां से निकल गए, और कार्यक्रम में रूके ही नहीं। आज की भाजपा की राजनीति में उनकी कोई जगह बची नहीं है। ऐसे में यह अनमनापन छोड़कर उन्हें वनागमन की सोचना चाहिए, और अपने आपको पार्टी की राजनीति से अलग करके देश के हित में लिखना-पढऩा चाहिए, और समकालीन भारतीय राजनीतिक इतिहास के खुलासे करने चाहिए। इंसानी जिंदगी में तो यह हो नहीं पाता कि घर-परिवार में कोई इस्तेमाल न बचने पर लोग खुद होकर चल बसें, लेकिन लोगों को सार्वजनिक जगहों से रवानगी सीखनी चाहिए।
धोनी ने कामयाबी को छूकर, वहां पर कायम रहकर, और कप्तानी छोड़कर खेल जारी रखने की जो एक नई और ताजा मिसाल सामने रखी है, उससे बहुत से लोगों को सबक लेना चाहिए, राजनीति में भी, कारोबार में भी, समाजसेवी संस्थाओं में भी, और धर्म या आध्यात्म के संगठनों में भी। आज तो भारत में समाजसेवी संस्थाओं और दूसरे ट्रस्ट-समितियों से भी लोग मरने के बाद भी रिटायर नहीं हो पाते, और अपने आल-औलाद को वहां पर काबिज करवाकर ही आखिरी सांस लेते हैं। कुदरत से कुछ सीखने की जरूरत है, नए मौसम की पहली पत्तियों को जगह देने के लिए हर पेड़-पौधे की पुरानी पत्तियां पतझड़ में खुद होकर रवानगी डाल देती हैं।

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