भगत सिंह की सोच पर हमला, और नाम पर एक करोड़ ईनाम

संपादकीय
08 जनवरी 2017


एक खालिस हिंदुस्तानी खेल, कुश्ती पर इतिहास का सबसे बड़ा ईनाम हरियाणा की सरकार ने घोषित किया है। फ्री स्टाइल कुश्ती पर विजेता को एक करोड़ रुपये नगद दिए जाएंगे। एक करोड़ के अलावा पचास लाख और पच्चीस लाख के दूसरे और तीसरे ईनाम भी हैं। और ये पुरस्कार भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव, इन तीन महान शहीदों की याद में रखे गए हैं।
भगत सिंह का ऐसा सम्मान बहुत अच्छा लगता, अगर इसी हरियाणा से लगे हुए पंजाब में, और भाजपा की ही भागीदारी वाली अकाली सरकार के तहत लुधियाना में अभी तीन दिन पहले किताब की दुकानों से भगत सिंह की किताबें हटाने के लिए हिंदू संगठनों ने उग्र प्रदर्शन न किया होता, और तोडफ़ोड़ न की होती। इनकी शिकायत थी कि भगत सिंह की वह किताब बेची जा रही है जो उनके नास्तिक होने के बारे में है। उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखाई कि यह दुकान और यह किताब नास्तिकता फैलाने का काम कर रही है। इसी पंजाब में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भगत सिंह के नाम पर करने के लिए एक आंदोलन चल रहा है, और उसके खिलाफ भी भाजपा सरकार ने संघ के एक नाम को बढ़ाया है।
यह अकेला मौका नहीं है जब किसी शहीद या किसी महान के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए तो सरकारें या संगठन करते हैं, और जब उनकी विचारधारा की बात आती है, तो उसके ठीक उल्टे काम करते हैं। भगत सिंह की तस्वीरों को आज इस देश में ऐसी मंच पर टंगे देखा जाता है जहां से धर्मांधता और साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के अलावा कोई काम नहीं होता। मतलब यह कि भगत सिंह के नाम को, उसकी शहादत को, भगत सिंह के ही सिद्धांतों के खिलाफ पूरी तरह दुह लिया जाए। ऐसा ही जगह-जगह कबीर के नाम के साथ होता है। भारत सरकार ने कबीर के नाम पर एक सम्मान घोषित किया हुआ है, बुनकर सम्मान। अब कबीर का योगदान इस दुनिया को महज उनकी बुनकरी का रह गया हो यह बात सरकारों और राजनीतिक दलों को इसलिए भी माकूल बैठती है कि कबीर के बुने हुए कपड़े इस देश के नेताओं पर किसी पाखंड के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक चेतना नहीं थोपते। कपड़ा तो नर्म होता है, और कबीर की बानी तो धर्मांधता के खिलाफ कड़ा वार करने वाली थी।
विवेकानंद को इस देश का एक महानतम व्यक्तित्व साबित करने वाले अनगिनत हिंदू संगठन उनकी पोशाक से भगवा रंग तो पेश कर देते हैं, लेकिन विवेकानंद ने धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ जो कुछ लिखा था, उसे बहुत सोच-समझकर दफन कर देते हैं। ऐसा ही सावरकर की सोच के साथ किया जाता है। सावरकर तो एक वीर स्वतंत्रता सेनानी की तरह तो पेश किया जाता है, लेकिन गाय को काटने और गोमांस खाने के पक्ष में सावरकर के लंबे-चौड़े अनगिनत लिखित तर्कों को दबा दिया जाता है, अनसुना कर दिया जाता है।
यह देश बड़ा अजीब है, गांधी को समाज और सोच में जगह नहीं देता, नोटों पर जगह देता है, और गांधी के नाम पर नोट चलाए जाते हैं, और गोडसे की सोच के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। भगत सिंह को जानने वाले यह समझ सकते हैं कि उनकी सोच का कत्ल करने वाले लोग अगर उनके नाम पर दंगल में एक करोड़ रुपये का ईनाम रख रहे हैं, तो यह पंजाब में होने जा रहे चुनाव में उस समाज के वोटों को प्रभावित करने का तरीका है, जिस समाज में भगत सिंह पैदा हुए थे, और आगे चलकर जो नास्तिक हो गए थे।

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