हमको मालूम है तकलीफ की हकीकत लेकिन, धर्म ने सबको ऐसा बना रखा है

आजकल
2 जनवरी 2017
नोटबंदी के पचास दिन भी निकल गए, और अकेले नोटबंदी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात लोगों ने दो बार पौन-पौन घंटे सुन ली। एक बार जब नोटबंदी लागू हुई, और दूसरी बार जब नोटबंदी के पचास दिन पूरे हुए, और हिन्दुस्तान धड़कते दिल के साथ नए साल की शाम देख रहा था कि प्रधानमंत्री और क्या कहते हैं। प्रधानमंत्री के कहे और किए हुए पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, और हिन्दुस्तान में शायद पिछले दस-बीस बरस में पचास दिनों के भीतर इससे अधिक शायद ही किसी और मुद्दे पर लिखा गया हो, दिखाया गया हो। इसलिए इस मुद्दे के उन्हीं पहलुओं पर आज फिर पचास दिनों में पच्चीसवीं बार लिखने का मेरा इरादा नहीं है, और कुछ और पहलू इस मुद्दे से जुड़े हुए, हिन्दुस्तान से जुड़े हुए, ऐसे हैं जिन पर लिखना दिलचस्प है।
अगर हिन्दुस्तान का पूरा का पूरा मीडिया एकमुश्त मोदी का दुश्मन न हो गया हो, और उसमें गिरोहबंदी करके जनता की नोटबंदी की दिक्कतों को झूठा गढ़कर झूठा दिखाया न हो, तो यह देश सचमुच इन पचास दिनों में बड़ी तकलीफ और बड़ी बर्बादी से गुजरा है। प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम इन दो संदेशों में, उनकी मन की बात में, और उनके आमसभाओं या सम्मेलनों के भाषणों में कुल मिलाकर भी यह साफ नहीं हो पाया कि आतंक पर काबू के लिए, नशे के धंधे पर रोक के लिए, नकली नोटों को रोकने के लिए, या कि कालेधन को निकलवाने के लिए इस नोटबंदी की क्या जरूरत थी, और इससे क्या मदद मिली? सरकार का पिछले पचास दिनों का सारा बयान मिलाकर भी यह साफ नहीं कर पा रहा है कि नोटबंदी की घोषणा के बाद अगले कई दिनों तक सरकार उसका जो मकसद अलग-अलग निकालती रही, और बताती रही, उस मकसद के नारों से परे उस मकसद को हासिल करने के लिए नोटबंदी की ये दिक्कतें क्यों जरूरी थीं। लेकिन हम फिर नोटबंदी के बजाय नोटबंदी से जनता को हुई दिक्कतों और जनता के बर्दाश्त की चर्चा करना चाहते हैं।
हिन्दुस्तान की जनता को देखें तो उसने रात-रात बैंक और एटीएम के बाहर कतार में गुजार लीं, लेकिन एक भी एटीएम पर एक भी पत्थर नहीं चला। लोगों ने बेकाबू कतार पर चलती हुई पुलिस की लाठियां खा लीं, लेकिन किसी बैंक कर्मचारी पर हाथ नहीं उठाया, एक-दूसरे को लूटा नहीं। और जो मामूली इक्का-दुक्का मारपीट कतार के लोगों में हुई, उतनी तो मुहल्लों में नल पर लगी भीड़ में भी हो जाती है। अब लोगों के इस बर्दाश्त को मोदी कालेधन के खिलाफ अभियान को जनसमर्थन कहते हैं, और इसकी तारीफ करते हैं। इसकी तारीफ तो जायज है, क्योंकि दुनिया के बहुत से और ऐसे देश हो सकते थे जहां जनता अपने ही पैसे को न निकाल पाने पर, अपने बीमार का इलाज न करा पाने पर बगावत कर सकती थी, हिंसा तो कर ही सकती थी, लूटपाट तो करती ही करती। लेकिन सवा सौ करोड़ आबादी के इस देश में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि आम दिनों में जितने जुर्म होते थे, उससे कम ही हुए होंगे क्योंकि पेशेवर या शौकिया मुजरिम भी या तो कतारों में लगे होंगे, या फिर राह देख रहे होंगे कि लोगों के पास रकम आए, तब तो उसे लूटें। चोर भी सोच रहे होंगे कि घरों में नोट बचे नहीं हैं, ऐसे घरों में चोरी करें भी तो क्यों करें?
हिन्दुस्तानी जनता मोटे तौर पर आस्तिक और आस्थावान जनता है, उसे धर्म पर बड़ा भरोसा है, और बहुत से लोगों को धर्म के साथ-साथ संतों, साधुओं, और पीर-फकीर पर भी बड़ा भरोसा है। इस देश में लोग राह चलते किनारे के सिंदूर-पुते पत्थर पर भी सिर झुकाते चलते हैं, और धार्मिक प्रवचनकर्ताओं की मेहरबानी से यह मानकर चलते हैं कि इस जन्म में झेले हुए दुख-तकलीफ से अगले जन्म में स्वर्ग जैसे सुख की गारंटी रहती है, और अगला जन्म होने के पहले भी स्वर्ग तो मिलता ही मिलता है। लोगों को यह लगता है कि तकलीफ उठाना एक अच्छी बात है, और इसीलिए हिन्दुस्तान में किसी धर्म में लोग हठयोग को मानते हैं, गालों के आरपार भाले या त्रिशूल निकाल लेते हैं, सड़कों पर अपने आपको जंजीरों से हथियारों से जख्मी कर लेते हैं, और लहूलुहान करके वे अपने को मजहब के करीब पाते हैं। बहुत से धर्मों में लोग भूखे रहते हैं, लंबे उपवास करते हैं, और ऐसी तकलीफ से गुजरते हुए भी वे अपने को ईश्वर के करीब पहुंचता हुआ मानते हैं। यह वह देश है जहां पर नवरात्रि में कई लोग अपने बदन पर जवारा उगाकर नौ दिन लेटे रहते हैं, और मानते हैं कि इससे ही ईश्वर खुश होंगे। कुछ लोग आग पर चलते हैं, और कुछ लोग तो अपनी जीभ काटकर शंकर को समर्पित कर देते हैं कि इससे खुश होकर ईश्वर वरदान देंगे।
धर्म लोगों को तकलीफ पाकर खुश रहने के एक ऐसे झांसे में बनाए रखता है जिसमें बिना मतलब की तकलीफ से भी ईश्वर की उपासना कामयाब मान ली जाती है। कार्ल माक्र्स ने धर्म को अफीम कहा था। हिन्दुस्तान के पिछले पचास दिनों से अधिक बड़ी मिसाल दिखना मुश्किल है कि किस तरह लोगों के जेहन में समाया हुआ धर्म, और धार्मिक मान्यताएं उसे तकलीफ को बर्दाश्त करने के लायक तैयार करते हैं, और धर्मालु होने की वजह से लोगों को यह लगने लगता है कि जिस बात में तकलीफ मिल रही है, उससे आखिर में कुछ न कुछ तो अच्छा मिलेगा ही मिलेगा। ऐसे देश में कई तरह की कहावतें और मुहावरे मिलकर लोगों को इस बात के लिए तैयार करते हैं कि मेहनत का फल मीठा होगा, आग में तपकर ही सोना खरा होता है, वगैरह-वगैरह।
यह देश धर्म के साथ-साथ कुछ और बातों की वजह से भी तकलीफ को फायदेमंद मानने के एक झांसे में जीता है। भारत की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति बहुत सी कड़वी चीजों को खाने और पीने के फायदे गिनाती है। नीम से लेकर करेले तक बहुत सी कड़वी चीजों से सेहत को अनगिनत फायदे बताए जाते हैं। ये बातें कुछ या अधिक हद तक वैज्ञानिक रूप से सच हो भी सकती हैं, लेकिन इनकी वजह से लोगों की सोच में एक ऐसा बर्दाश्त पैदा और कायम हो जाता है कि कड़वी चीजें अच्छी होती ही हैं।
बहुत बरस हुए जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और वे छत्तीसगढ़ के दौरे पर उस वक्त के अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट गांवों में आए थे। उस वक्त मुझे इन दोनों गांवों में कैमरा लेकर पहले से जाने की सूझी थी, और एक नाला पार करके पहाड़ी पर बसे हुए कुल्हाड़ीघाट पहुंचने पर एक आदिवासी से मुलाकात हुई थी जो कि पत्तों की एक छत के नीचे शायद कुछ पालतू जानवरों के साथ पड़ा हुआ था, और न उसका कोई घर था, और न कोई सामान। बदन पर महज लंगोटी थी ऐसा याद पड़ता है। मेरे कंधे से टंगे कैमरे के बैग को देखकर उसे शायद यह धोखा हो गया था कि मैं सरकार का कोई स्वास्थ्य कर्मचारी हूं। उसने मुझसे कहा कि बुखार की दवाई दो। उस वक्त मेरे बैग में सिरदर्द-बुखार की कुछ गोलियां अपने लिए रखी हुई थीं क्योंकि रात-दिन की दौड़-भाग में कभी-कभी मुझे भी उनकी जरूरत पड़ती थी।
इसमें से दो गोलियां निकालकर मैंने उसे दीं, तो उसने उन्हें चबाना शुरू कर दिया,  बजाय पानी के साथ निगलने के। और जब ये गोलियां उसे खासी कड़वी लगीं, तो उसे एक तसल्ली मिली, और उसने शायद तारीफ में दो-चार शब्द कहे भी थे कि दवा अच्छी है, या ऐसी ही कोई और बात। मतलब यह कि कड़वाहट झेलना लोगों को एक किस्म की दिमागी राहत देती है कि इससे कुछ अच्छा ही होगा।
एक किसी धर्म में ऐसा भी सुना है कि गुरू की सीख मानते हुए कुछ लोग पीठ पर पत्थर की एक भारी सिल्ली बांधकर चलते हैं। गुरू का कहना शायद यह था कि लोगों को इतना सेहतमंद या फिट रहना चाहिए कि वे एक मन का बोझ उठाकर चल सकें, लेकिन कुछ लोग इन शब्दों को शाब्दिक अर्थ में लेकर इतना बोझ उठाकर चलने लगते हैं। तकलीफ हमारा धार्मिक मिजाज हो चुका है, और नोटबंदी के दौरान देश की जनता को जितनी तकलीफ हुई, उसे बर्दाश्त करने के पीछे भी लोगों की यह सोच मददगार साबित हुई कि जिस बात में तकलीफ हो रही है, उससे नतीजा अच्छा ही निकलेगा। कई लोग मिसाल के तौर पर गर्भवती महिला की तकलीफ की बात करते हैं कि प्रसव-पीड़ा के बाद ही नवजात शिशु के दर्शन होते हैं।
हिन्दुओं के किसी बड़े मेले में देखें, तो भभूत लगाए हुए कई लोग कांटों पर लेटे दिखेंगे, या कीलों के आसन पर बैठे रहेंगे, कुछ लोग एक पैर पर खड़े होंगे, तो कुछ लोग मचान से उल्टे लटके हुए दिखेंगे। जो जितनी अधिक तकलीफ पाते दिखेंगे, वे उतना ही अधिक सम्मान पाएंगे, और उतना ही अधिक चढ़ावा भी उन्हें मिलेगा। और यह बात दूसरे कई धर्मों के लोगों के साथ भी दिखेगी, और हिन्दुस्तान में इस जन्म की तकलीफ को अगले नामालूम जन्म में, या मौत के बाद के नामालूम स्वर्ग में सुख की गारंटी की पॉलिसी खरीदने जैसा भी माना जाता है।
धर्म लोगों को जिस तरह के बर्दाश्त के लिए तैयार करता है, और उसकी बेचैनी को खत्म करता है, और संघर्ष के उसके माद्दे को भी खत्म करता है, उसकी एक मिसाल इन पचास दिनों में देखने मिली है। कल ही सोशल मीडिया पर गुजरात में एक एटीएम की कतार का वीडियो देखने मिला जिसमें एक महिला दिन भर कतार में बैठकर हजार या दो हजार रूपए निकाल पा रही है, और अगले दिन फिर दिन भर कतार में बैठी है। बैठे-बैठे वह घर से सब्जियां ले आती हैं, और उन्हें छीलने-काटने का काम भी करते रहती है। लेकिन एक वीडियो कैमरे पर पैसों की इस तंगी का जिक्र करते हुए भी वह हॅंसती दिखती है, और उसे यह उम्मीद है कि इसका नतीजा कुछ अच्छा ही निकलेगा।
इसी तरह कतार में खड़े लोगों की हौसला अफजाई के लिए कई लोग सोशल मीडिया पर यह नारा लगाते दिखते हैं कि जब देश के जवान सरहद पर चौबीसों घंटे खड़े रहते हैं तो क्या जनता कुछ दिन भी कतार में खड़े नहीं रह सकती? यहां पर तकलीफ को धर्म से और अलग ले जाकर देशभक्ति से जोड़ दिया गया है कि जो देशभक्त हैं, वे तो तकलीफ की शिकायत कभी कर नहीं सकते।
यह सिलसिला देश के आर्थिक नुकसान, गरीबों के निजी नुकसान, और देश के कारोबार की तबाही का सही अंदाज सामने नहीं आने दे रहा है। अफीम का नशा कई किस्म की तकलीफों का दर्द दबा देता है। 

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