धर्म की हिंसा के खिलाफ इंसाफपसंद धर्मालुओं को आगे आने की जरूरत

संपादकीय
28 फरवरी 2017


केरल के एक पादरी का बयान आया है कि जींस और टी शर्ट में चर्च पहुंचने वाली लड़कियों की वजह से लोगों का ध्यान उपासना से हटता है, और ऐसा करने वाली लड़कियों को समंदर में डूबा देना चाहिए। इस पादरी का यह भी कहना है कि इस तरह की लड़कियां केवल आकर्षण का केंद्र बनने के लिए ऐसा करती हैं।
केरल देश का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा राज्य है, और यहां पर महिलाओं की स्थिति बाकी देश के मुकाबले बेहतर है और यह शायद देश का अकेला राज्य है जहां पर लड़कों के मुकाबले लड़कियों की जन्म संख्या अधिक है। ऐसे राज्य में जब ऐसी दकियानूसी बात सामने आती है, तो यह धर्म के मुंह से ही निकलकर आ सकती है। भारत में हम लगातार इस बात को देखते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, या ईसाइ धर्मगुरू लगातार महिलाओं के खिलाफ अन्याय की, गैरबराबरी की, और हिंसा की बातें करते हैं। उत्तर भारत में जगह-जगह जाति और धर्म से परे शादी करने वाले लड़के-लड़कियों को उनके मां-बाप ही मरवा डालते हैं, और ऐसी हत्याएं धर्म और जाति से उपजी हुई कटरता की वजह से होती हैं। धर्म ने न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में लाखों हत्याओं को जारी रखा है, और धर्म का नाम लेकर अनगिनत मुस्लिम देशों में लगातार सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, और महिलाओं और लड़कियों को खरीदा-बेचा जा रहा है, इसके लिए धर्म का तर्क भी दिया जा रहा है कि धर्म में यह किस तरह जायज है।
धर्म पूरी दुनिया में खूनखराबे और अन्याय के लिए जिम्मेदार अकेला सबसे बड़ा कारण है, और दुनिया के नक्शे से धार्मिक-कत्ल हटा दिए जाएं, तो शायद 90 फीसदी कत्ल थम जाएंगे। ऐसा कातिल धर्म पढ़े-लिखे लोगों के दिल दिमाग पर भी राज करता है, और विज्ञान को पैर जमाने ही नहीं देता। इसके सबसे बड़े शिकार सारे कमजोर तबके होते हैं, गरीब, दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे और परंपरागत रूप से नीची समझी जाने वाली जातियों के लोग होते हैं। ऐसे में आस्थावान लोगों में, धर्मालु लोगों में जो लोग न्यायसंगत हैं, उन्हीं को पहल करनी होगी और धर्म को सार्वजनिक जगह से हटाकर घर के भीतर ले जाना होगा। जब धर्म निजी जिंदगी के बाहर आता है और एक संगठित ताकत की तरह होता है, तो वह किसी भी मुजरिम-बाहुबली की तरह का हो जाता है। नतीजा यह है कि हिंदुस्तान में आज इस बाहुबली की ताकत का इस्तेमाल चुनाव में करते हैं, किसी जमीन को खाली करवाने में करते हैं, बलात्कार और तस्करी में करते हैं।
भारत के सभी प्रमुख धर्मों के भीतर से जिस तरह की हिंसक बातें निकलती हैं, उनका विरोध करना अकेले नास्तिकों के बस का नहीं है। धर्म को मानने वाले लोगों के बीच से सुधार की आवाज उठनी चाहिए, और लोगों को याद होगा कि हर धर्म से कुछ लोग ऐसे पाखंड और ऐसी हिंसा के खिलाफ समय-समय पर खड़े हुए भी हैं। भारत में तो सती प्रथा और बाल विवाह को खत्म करवाने का काम धर्म से जुड़े हुए आस्थावान लोगों ने ही किया था, मुस्लिमों के बीच से असगर अली इंजीनियर जैसे सुधारवादी खड़े हुए थे, और ईसाईयों के बीच भी उदारवादी आंदोलनकारी हैं। इन सबके साथ समाज के उस मौन बहुमत को आगे आने की जरूरत है जो कि इंसाफपसंद तो है, लेकिन चुप है।

शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी देता हिंसक राष्ट्रवाद...

आजकल
27 फरवरी 2017  
दिल्ली के एक कॉलेज में होने जा रहे कार्यक्रम में कश्मीरी मुद्दों को उठाने वाले जेएनयू के छात्र उमर खालिद को भी बोलने के लिए बुलाया गया था। उमर खालिद को अलगाववादी करार देते हुए कुछ संगठन लगातार उसे देशद्रोही कहते आ रहे थे। इस कार्यक्रम में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी के नेताओं ने पहुंचकर खूब जमकर मारपीट की, और वहां मौजूद पुलिस उम्मीद के मुताबिक उसे देखती रही। अब इसे लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर देश के कुछ लोगों को गद्दार और देशद्रोही करार देने का सिलसिला शुरू हो गया है।
कारगिल में शहीद हुए एक हिन्दुस्तानी सैनिक की बेटी ने एबीवीपी की इस गुंडागर्दी के खिलाफ एक पोस्टर लेकर अपनी तस्वीर अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट की, और इस पोस्टर में लिखा था कि वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की गुंडागर्दी से नहीं डरती है, और पूरे देश के छात्र उसके साथ हैं। यह कारगिल में शहीद हुए एक फौजी कैप्टन की बेटी है, और अपनी इस तस्वीर के बाद से लगातार उसके फेसबुक पेज पर उसे गद्दार लिखा जा रहा है, देशद्रोही लिखा जा रहा है, और उसे बलात्कार की धमकियां दी जा रही हैं।
बलात्कार की धमकी उन लोगों का बड़ा पसंदीदा हथियार है जो कि इस देश की संस्कृति को जिंदा रखने का दावा करते हैं। हिन्दूवादी, राष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक, और हिंसक सोच के ठेकेदार लगातार उन सारे लोगों को देशद्रोही करार देते आ रहे हैं जो हिंसक-राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, और युद्धोन्माद पर भरोसा नहीं रखते। ऐसे लोग कश्मीर की आजादी के नारे को तो गद्दारी मानते ही हैं, ऐसे लोग विचारों की आजादी, असहमति की आजादी को भी देशद्रोह मानते हैं, और यह सिलसिला सरकार की मंजूरी से हो रही हिंसा तक फैले चले जा रहा है। कहीं दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत ही प्रतिष्ठित वकील प्रशांत भूषण का मुंंह काला करने तक यह सिलसिला फैल रहा है, तो कहीं कश्मीर में शांतिवार्ता के हिमायती दूसरे लोगों को पाकिस्तानी करार देने तक जा रहा है।
आज ही एक अंग्रेजी अखबार में नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का एक लंबा साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों में, और भारत में वैचारिक विविधता पर आधारित बहस के खात्मे पर फिक्र जाहिर की है। और यह फिक्र अकेले अमर्त्य सेन की नहीं है, सोचने-विचारने वाले, लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले, अंधविश्वासी पाखंड का विरोध करने वाले, इंसानियत पर भरोसा रखने वाले तमाम लोगों में है। आज असहमति का विरोध इतने हिंसक और इतने आक्रामक तरीके से हो रहा है कि बहुत से कमजोर दिल लोग मुंह खोलने या कि कुछ लिखने का हौसला भी नहीं जुटा पाते हैं।
दुनिया के ऐसे कोई देश लोकतंत्र के साथ महानता तक नहीं पहुंच पाते, जहां पर वैचारिक विविधता नहीं होती। जो लोग अपनी संस्कृति की बात करते हैं, जो हिन्दुस्तान में हिन्दुत्व से परे और कुछ न सोच पाते हैं, न बर्दाश्त कर पाते हैं, उन तमाम लोगों को कुदरत से भी कुछ सीखने की जरूरत है। जब धरती पर हिन्दुस्तान की कोई सरहद नहीं थी, और जब हिन्दू तो दूर, इंसान भी नहीं थे, और जब धरती पर कुदरत ने कदम रखा था या जन्म लिया था, जब पेड़-पौधे बने, और तरह-तरह के पशु-पक्षी और पानी के जानवर बने, जब नदियां बनीं, पहाड़ बने, और पानी बहा, तब से यह बात साफ है कि विविधता के बिना न कुदरत है, न धरती है, और न जीवन है। औरत और मर्द की विविधता न होती, तो इंसानी जिंदगी ही आगे न बढ़ी होती। ऐसी विविधता जिंदगी को लाने और बढ़ाने की पहली अनिवार्य शर्त रही है, और ऐसी विविधता को आज सिर्फ धर्म के आधार पर खत्म करने की यह सोच अप्राकृतिक है, और इससे विविधता की सारी संपन्नता तो खत्म हो ही रही है, पूरी तरह से अवैज्ञानिक, अमानवीय, अन्यायपूर्ण यह जिद, यह कट्टरता, खुद उस समाज को खत्म करने जा रही है, जिसकी शुद्धता का दावा करते हुए, जिसकी शुद्धता को बनाए रखने के लिए हिटलर के नस्लवादी अंदाज में भारत में असहमति को खत्म किया जा रहा है।
यह वह देश है जिसके हिन्दुत्व के दौर के इतिहास में भी शास्त्रार्थ की एक लंबी परंपरा रही है, और वैचारिक मतभेद पर खुलकर चर्चा यहां का इतिहास रहा है। असहमति की वजह से एक-दूसरे के सिर काटने का काम नहीं हुआ है, वह काम धर्म ने आकर जरूर शुरू किया, और धर्म से पहले तक असहमति से सिर नहीं कटे थे। अब ऐसे में आज इक्कीसवीं सदी में आकर मंगलयान भेज देने के बाद, पूरी दुनिया में हिन्दुस्तानियों को बसा देने के बाद, पूरी दुनिया में जगह-जगह भारतवंशियों के बीच भारतीय प्रधानमंत्री के अभूतपूर्व भाषणों के बाद जब इस देश की राजधानी में तंगदिल और तंगदिमाग लोग नफरत और कट्टरता से असहमति का गला घोंट देते हैं, तो उनको यह अंदाज ही नहीं है कि वे आज की पूरी दुनिया के बीच हिन्दुस्तान का कितना नुकसान कर रहे हैं।
आज अमरीका जैसा देश अगर कामयाब है तो उसके पीछे महज वहां के मूल निवासियों का राज नहीं है, पूरी दुनिया से वहां पहुंचे हर राष्ट्रीयता, हर नस्ल, हर धर्म और हर रंग के लोगों को तकरीबन बराबरी से बढ़ावा देने का दौर जब से अमरीका में बढ़ा, तब से अमरीका एक कामयाब मुल्क हुआ। धीरे-धीरे वहां पर आधुनिक लोकतंत्र ने मूल निवासियों को जरूर कुचलकर रख दिया, लेकिन वह काम तो आज हिन्दुस्तान में भी हो रहा है, और ऑस्ट्रेलिया से लेकर दक्षिण अमरीकी देशों में भी हो रहा है। अमरीका में जो सकारात्मक बात पिछली आधी सदी में हुई है, और जिसने अमरीका को चांद तक पहुंचाया, अमरीकी आंतरिक जीवन शैली को सबसे अधिक लोकतांत्रिक बनाया, उसके पीछे वहां की विविधता रही। अब जब मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उनके हिमायती लगातार भेदभाव करके समाज के भीतर नफरत फैला रहे हैं, और जिस नफरत की हिंसा का शिकार दो दिन पहले वहां पर एक भारतवंशी नौजवान हुआ है, उस हिंसा को अगर हिन्दुस्तान में एक जुड़वां भाई मिल रहा है, तो इससे हिन्दुस्तान का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होगा।
और तो और एक नामीगिरामी क्रिकेट सितारे वीरेन्द्र सहवाग ने इस हौसलामंद युवती के पोस्टर वाली फोटो का मजाक उड़ाते हुए एक घटिया हरकत की है, और अपनी फोटो सहित एक जवाबी पोस्टर अपने ट्विटर खाते पर डाला है। शहीद की इस बेटी ने करीब तीन दर्जन पोस्टर अलग-अलग नारों के साथ पोस्ट किए थे जिसमें से एक यह था कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं मारा, जंग ने मारा है। जो लोग जंग के खिलाफ हैं, वे इस हकीकत को जानते हैं। लेकिन जो लोग जंगखोर हैं, उनको यह बात समझ नहीं आएगी, और सहवाग उन्हीं में एक साबित हुए। लेकिन जैसा कि किसी भी मशहूर सितारे के साथ होता है, सहवाग की कही हुई बात लोगों को बड़ी सुहा रही है, और उनके उकसावे के बाद इस हौसलामंद लड़की को कोसने वाले लोगों में खासी बढ़ोत्तरी हो गई है।
अमरीका तो अपने भीतर के मजबूत लोकतंत्र, संघीय ढांचे में राज्यों की मजबूत आजादी, और लोगों के बीच लोकतांत्रिक लड़ाई के एक बेहतर हौसले के चलते ट्रंप से उबर जाएगा, लेकिन भारत लगातार दकियानूसी सोच का नुकसान झेल रहा है। आज सरहद के शहीदों का नाम लेकर राष्ट्रवादी उन्माद फैलाने वाले लोग एक शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी दे रहे हैं। अगर इनके कहे मुताबिक ये देश की संस्कृति के रखवाले हैं, तो इस देश को ऐसी संस्कृति और ऐसे रखवालों की कोई जरूरत भी नहीं है। दिक्कत यह है कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार सक्रिय रहते हैं, वहां पर उनके ट्विटर खातों से वे ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो चारों तरफ बलात्कार की धमकी को चौराहों पर बंटने वाले पर्चों की तरह बांटते रहते हैं। प्रधानमंत्री को कौन फॉलो करे, इस पर तो प्रधानमंत्री का काबू शायद नहीं हो सकता, लेकिन वे किस-किस को फॉलो करें, यह तो उनकी मर्जी और पसंद की बात रहती है। अगर वे ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो नियमित रूप से बलात्कार की धमकियां देते हैं, हत्या की धमकियां देते हैं, तो उनकी ऐसी पसंद से देश में नफरतजीवी लोगों की हौसलाअफजाई होती है, और अमन-पसंद लोग पस्त होते हैं।
लोकतंत्र में एक मुखिया को देश को एक राह भी दिखानी होती है, आज हिन्दुस्तान में ऐसे असरदार नेता रह नहीं गए हैं जो कि नफरत के खिलाफ एक लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दें, जो इंसाफ को बढ़ावा दें, और बराबरी को बढ़ावा दें। ऐसे में जब देश में वैचारिक असहमति का जवाब हिंसा से दिया जा रहा है, तो देश पर असर रखने वाले ऐसे नेता रह नहीं गए हैं जो कि लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत के मुताबिक, और उसके लिए, असहमति का सम्मान करें।
फिलहाल यह बात अच्छी है कि असहमति पर हिंसा करने वाले लोग एक शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी देकर अपने असली तेवर, अपना असली चाल-चलन उजागर कर चुके हैं, और इनके इस हिंसक पाखंडी राष्ट्रवाद का भांडफोड़ इसी तरह होगा। 

बैंकों में लगातार छुट्टियां, और हड़ताल से बुरा हाल

संपादकीय
27 फरवरी 2017


दो दिनों के बाद आज बैंक खुले, तो कल फिर बैंक हड़ताल की घोषणा सामने खड़ी हुई है। पिछले साल भर से भारतीय बैंकों में महीने में दो शनिवार बैंक बंद रहने लगे हैं, और नतीजा यह है कि जो कारोबार ऑनलाईन नहीं होते हैं, उन सबको बड़ी दिक्कत हो रही है। बैंकों का अधिक दिन बंद रहना, या लगातार बंद रहना, उन देशों में तो ठीक है जहां पर अधिकतर लोग क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं, या फिर ऑनलाईन बैंकिंग से सब काम हो जाता है। भारत जैसे देश में जहां लोग बैंकों में रोज नगदी जमा करते हैं, वहां पर बैंक के काऊंटर न खुलने पर कारोबार में बड़ी दिक्कत आ रही है। एक दिक्कत यह भी है कि बैंक को किसी भी दूसरे सरकारी दफ्तर की तरह मानकर सरकार ने हफ्ते में दो बार दो-दो दिनों के लिए बंद रखना शुरू कर दिया है, और बैंक कर्मचारी ऐसे ही दिनों के अगल-बगल के दिन हड़ताल के लिए चुन लेते हैं। साथ-साथ कई बार ऐसे शनिवार-इतवार से लगे हुए कोई त्यौहार आ जाते हैं, और बैंक तीन-चार दिन तक बंद रहते हैं।
चूंकि देश का कारोबार और छोटे-बड़े सभी तरह के लोगों की जिंदगी बैंकों पर जितनी टिकी हुई है, उसे डिजिटल इंडिया के नाम पर रातों-रात नहीं बदला जा सकता। ऐसे में बैंक की कुछ न्यूनतम सेवाओं को ऐसी छुट्टियों से परे रखने की जरूरत है, बल्कि देश के हित में यह भी होगा कि मामूली लेन-देन वाले बहुत से कामों के लिए बैंकों की कुछ शाखाओं में शाम या रात को भी कामकाज हो सके। ऐसा होने पर बैंकों तक आने-जाने वाले लोगों की भीड़ भी शहरी सड़कों को दिन में व्यस्त नहीं रखेगी, और लोग इत्मिनान से शाम को भी बैंकिंग कर सकेंगे। दिन की भारी भीड़ में बैंकों का बर्ताव भी बिगड़ जाता है, और लोग सार्वजनिक रूप से भारत के बैंकों के खिलाफ लिखने को मजबूर होते हैं, खासकर एसबीआई जैसे बैंक में लंच के लंबे घंटे लगातार आलोचना झेलते हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था आज मंदी की शिकार भी है। अधिकतर कारोबारी ऐसे हैं जिनके पास रोज का काम चलाने के लिए भी रकम नहीं रहती है। ऐसे में जब मामूली चेक दो-चार दिन तक खाते में नहीं आ पाते, तो लोगों का कामकाज चौपट हो जाता है। अगर संख्या में गिनें, तो भारत में दो-चार फीसदी लोग भी ऑनलाईन बैंकिंग नहीं करते होंगे, और ऐसे लोगों को जब दो-चार दिन लगातार बैंक बंद मिलते हैं, तो भारत की बैंक सुविधा की साख भी चौपट होती है। जिस तरह अस्पताल, फायर ब्रिगेड, या पुलिस की सेवा लोगों के लिए छुट्टी के दिन भी जरूरी है, उसी तरह बैंकों की कुछ सीमित सुविधाएं छुट्टियों के दिन भी चलनी चाहिए, और इसके लिए हर बैंक की हर शाखा का खुला रहना जरूरी नहीं हैं, अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग बैंकों को शाम-रात के लिए या छुट्टी के लिए खोलने का इंतजाम किया जाना चाहिए। दिन के व्यस्त घंटों से परे शाम के घंटों का कामकाज बैंकों के अलावा भी कई दूसरी जगहों पर शुरू करने की जरूरत है ताकि शहरी ट्रैफिक घट सके, लेकिन बैंकों में यह काम तुरंत सोचना चाहिए। लोगों के पास अपने खुद के पैसों तक पहुंच अगर अधिक रहेगी, तो उससे भारत की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा भी मिलेगा। 

दाखिले और नौकरी की ऐसी बिक्री से भी नक्सल सोच पनपती है...

संपादकीय
26 फरवरी 2017


एक तरफ बिहार में लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष, आईएएस अफसर गिरफ्तार हैं कि वहां नौकरियों के लिए इम्तिहान में घोटाला हुआ है, मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला बरसों से चले आ रहा है, दर्जनों लोग जेल में हैं, दर्जनों गवाह-आरोपी या जांच अफसर रहस्यमय तरीके से मारे गए हैं, छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के चयन के घोटाले पर हाईकोर्ट का हुक्म आ चुका है, और सारा चयन खारिज करने कह दिया गया है, और आज की ताजा खबर यह है कि महाराष्ट्र में आज होने जा रही सेना की भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हो गया, परीक्षा रद्द हो गई, 18 लोग गिरफ्तार कर लिए गए। ऐसा पता लगा है कि सेना की इस परीक्षा के पर्चे को लीक करने के लिए करोड़ों की कमाई की गई थी। इस मामले में अब तक तीन सौ छात्र भी हिरासत में हैं।
हिन्दुस्तान में एक तो सरकारी नौकरियों का वैसे भी टोटा है, और करोड़ों बेरोजगार नौजवान सड़कों पर भटक रहे हैं। कॉलेजों की पढ़ाई ऐसी है कि वहां से बेरोजगार पैदा होते हैं, कामगार पैदा नहीं होते। अब ऐसे देश में जब गिनी-चुनी नौकरियों के लिए सरकारों के जो संवैधानिक संस्थान काम कर रहे हैं, वे भी अगर भर्ती घोटाले के कारखाने बन जाएंगे, तो इससे होनहार बेरोजगारों के साथ ज्यादती भर नहीं होगी, उनके मन में लोकतंत्र के खिलाफ जो हिकारत और नफरत पैदा होगी, वह सड़कों पर और बाकी जगहों पर तरह-तरह की हिंसा की शक्ल में दिखाई पड़ेगी। हमारा ख्याल है कि जो लोग संगठित रूप से होनहार लोगों के हक की नौकरियों को, या कॉलेज की सीटों को बेचते हैं, ऐसे लोगों को उनकी ताकत और उनके ओहदों के मुताबिक खासी कड़ी सजा होनी चाहिए, और ऐसा करते हुए उनकी जो काली कमाई होती है, उसकी जब्ती के लिए भी कानून बनना चाहिए। ऐसा करना एक आम भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिकों के बुनियादी हक के खिलाफ एक हिंसक भ्रष्टाचार है जिसमें सरकार के हाथ दूसरे दर्जे के कर्मचारी लगते हैं, जो कि नौकरी में आने के पहले ही भ्रष्ट हो चुके रहते हैं, और जाहिर है कि नौकरी करते हुए उनका पहला मकसद इस पूंजीनिवेश को वापिस हासिल करना रहता होगा। दूसरी बात यह कि सरकार को अपने कामकाज के लिए जो सबसे होशियार लोग मिल सकते थे, उनकी जगह औसत और सतही दर्जे के भ्रष्ट लोग मिलते हैं, और इससे भी सरकार का कामकाज, उसकी उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित होती है।
इस देश में कहीं नक्सल हिंसा, तो कहीं कोई दूसरे किस्म की आतंकी हिंसा फैलने के पीछे इसी तरह के सामाजिक अन्याय का हाथ रहता है, और जब सबसे कमजोर लोगों को यह लगता है कि उन्हें न तो उनके हक मिलने वाले हैं, न ही उन्हें बराबरी के मौके मिलने वाले हैं, तो फिर उनको लगता है कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर तबकों के खिलाफ हिंसा के बिना भारतीय लोकतंत्र में कमजोर को इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है। नक्सलियों से परे भी बहुत से अहिंसक लोगों का भी यह मानना है कि यह लोकतंत्र अब ऐसा हिंसक-तंत्र बन चुका है कि इसमेें सबसे कमजोर की नियति कमजोर ही बने रहना बनी रहेगी। यह सिलसिला थमना चाहिए, और सरकारी नौकरियों में, दाखिलों में, संगठित अपराध करने वाले लोगों के लिए उम्रकैद जैसी कड़ी सजा का इंतजाम करना चाहिए, इसके बिना लोगों का गरीबों का हक बेचना बंद नहीं होने जा रहा।

नफरत को बढ़ावा देने का नतीजा अमरीका में सामने

संपादकीय
25 फरवरी 2017


अमरीका में कल एक भूतपूर्व फौजी ने एक भारतवंशी कामगार को गोली से मार दिया और यह नारा लगाया कि ये लोग देश छोड़कर निकल जाएं। बाद में यह सफाई सामने आई कि उसने इस हिन्दुस्तानी को अरब का निवासी समझ लिया था। अमरीका में बसा हुआ चाहे हिन्दुस्तानी हो, चाहे अरबी हो, अगर उसे जनता की तरफ से इस तरह की गोलियां खानी पड़ रही हैं, तो यह खुद अमरीका के लिए एक बहुत बड़ी फिक्र और बहुत बड़े खतरे की बात है क्योंकि वहां घर-घर में अनगिनत बंदूक-पिस्तौल है, और वहां के लोग आए दिन कहीं न कहीं गोली-बारी की वारदात देखते रहते हैं। इस मृतक की पत्नी ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप से यह सवाल किया है कि वे अमरीका में नफरत से होने वाली हिंसा पर कैसे काबू पाएंगे? यह सवाल जायज इसलिए है कि ट्रंप ने पिछले एक बरस में अपने चुनाव अभियान के दौरान बाहर से आए हुए लोगों के खिलाफ, मुस्लिमों के खिलाफ, मुस्लिम देशों के खिलाफ, हर किस्म के अल्पसंख्यकों के खिलाफ जिस किस्म की नफरत फैलाई है, अब उसकी फसल खड़ी हो रही है। और ऐसा भी नहीं है कि ट्रंप चुनाव के बाद अब राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी से एक बेहतर इंसान हो गए हैं, आज भी वे मुंह खोलते हैं, और नफरत की आग निकलती है।
आज अमरीका की पूरी व्यवस्था, वहां की अर्थव्यवस्था, वहां की समाज व्यवस्था, ये सब कुछ एक उदार नस्ल-नीति के आधार पर बनी हुई हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि भारत एक उदार विविधतावादी संस्कृति पर बना हुआ देश है। ठीक ट्रंप के अमरीका की तरह भारत में लगातार नफरत को और बंटवारे को बढ़ावा देने में कई लोग लगे हुए हैं, जिनमें बड़े-बड़े लोग मोदी सरकार के बड़े-बड़े ओहदों पर कायम हैं। जिस तरह आज अमरीका में यह खतरा दिख रहा है, उस तरह भारत में भी धर्म के आधार पर बंटवारे का एक बड़ा खतरा कायम है, मंडरा रहा है, और कई लोगों का यह मानना है कि वह बढ़ते भी चल रहा है। यह सिलसिला चाहे किसी देश में हो, उस देश को तबाह करने की ताकत रखता है। कोई हैरानी नहीं होगी कि ट्रंप की नफरतकी नीतियां अमरीका की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दे। हम पड़ोस के पाकिस्तान में यह देख ही रहे हैं कि किस तरह साम्प्रदायिक नफरत और आतंक की वजह से वह देश धमाकों में सैकड़ों जिंदगियां खो रहा है, और लगातार झुलस रहा है। नफरत को बढ़ाना आसान रहता है, काबू करना लगभग नामुमकिन। अमरीका ने भारत के तजुर्बे से कुछ नहीं सीखा, और ट्रंप को चुन लिया। अब भारत को कम से कम अमरीका के तजुर्बे से सीखना चाहिए, और नफरत को बढ़ावा देना बंद करना चाहिए। ऐसा न होने पर मोदी के सारे आर्थिक सपने भी धरे रह जाएंगे।

जो मार डाले, वह राष्ट्रीय पशु और जो सेवा करे, वह गाली!

संपादकीय
24 फरवरी 2017


कृश्नचंदर ने जब एक गधे की आत्मकथा लिखी तो उन्हें यह अंदाज नहीं रहा होगा कि एक दिन भारतीय राजनीति में गधे का महत्व इतना बढ़ जाएगा। भारत की लोकोक्तियों में कहावतों और मुहावरों में तो गधे का महत्व हमेशा से रहा है, किसी को मूर्खता के लिए गाली देने के लिए गधे से अधिक उपयुक्त कोई और नाम बोलियों को सूझा नहीं था। फिर हिन्दुस्तानी स्कूलों में भी कमसमझ बच्चों को कोसने के लिए गधे का ही इस्तेमाल होता है, और इंसान अपने बीच के लोगों की मूर्खता की सबसे बड़ी मिसाल गधे में ढूंढते हैं, क्योंकि गधा इंसानों को काटता और मारता नहीं है, वह पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है, चाहे वह धोबी के यहां रहे, चाहे वह कुम्हार के यहां रहे, और चाहे वह सिलबट्टा लादकर चले। और इंसान तो होते ही ऐसे एहसानफरामोश हैं कि जो जानवर उन्हें मारकर खा जाए, उस शेर को, सिंह को, बाघ को वे राष्ट्रीय पशु से लेकर राजकीय चिन्ह तक बना देते हैं, और जो गधा मरते दम तक इंसान की सेवा करे, उसे गाली की मिसाल के लायक ही माना जाता है। गधा इस किस्म का एहसानफरामोश भी नहीं होता है।
फिर हाल हिन्दुस्तानी चुनावी राजनीति में गधे पर निकली बात कुछ अधिक दूर तक निकल जा रही है। इसकी शुरुआत शायद उत्तरप्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की, और चुनावी सभा में  गुजरात के गधों पर तंज कसते हुए अमिताभ बच्चन से कहा कि वे गधों का इश्तहार न करें। अब यह तो हमें नहीं मालूम कि उनका इशारा नरेन्द्र मोदी या अमित शाह की तरफ था या नहीं, जो कि गुजरात से आकर देश और अब उत्तरप्रदेश पर भी राज करने की कोशिश में हैं, लेकिन यह बात आगे बढ़ गई, और प्रधानमंत्री ने अपने आपको गधे की तरह मेहनत करने वाला खुद ही कह दिया, क्योंकि मेहनत के सम्मान करने की एक बड़प्पन की बात है, और गधे को गाली की तरह इस्तेमाल करने से बहुत बेहतर बात भी है। अब आज गुजरात के नौजवान आरक्षण-आंदोलनकारी हार्दिक पटेल का बयान आया है जिसमें उन्होंने गुजरात के अपने समाज के सभी 44 पाटीदार विधायकों को गधा कहा है। हार्दिक पटेल ने पाटीदार समाज के आरक्षण के लिए एक लंबा और ऐतिहासिक आंदोलन चलाया है, और जेल के बाद प्रदेशबदर होकर वे अब गुजरात लौटे हैं, और आंदोलन की कामयाबी की वजह से उनको बाकी लोगों पर कुछ कहने का एक नैतिक अधिकार भी मिला है। अभी हार्दिक ने कहा- मुझसे लोग पूछते हैं कि इतने बड़े आंदोलन से आपको क्या मिला, तो मैं जवाब देता हूं कि हमें 44 पाटीदार गधे विधायक मिले जो 14 पाटीदार युवाओं की मौत के बाद भी कुछ नहीं बोल रहे हैं।
बात जब निकलती है तो फिर वह दूरतलक जाती है, और गधे पर चर्चा इतनी हो गई है कि कम से कम मेहनत पर चर्चा होने लगी है, मेहनतकश पर चर्चा होने लगी है, और इस बहाने गुजरात में उन जंगली गधों पर भी खूब चर्चा हो रही है जो कि दुनिया में दुर्लभ हैं, और गुजरात आने वाले वन्यजीवन प्रेमियों के लिए पर्यटन का एक बड़ा मुद्दा हैं। किसी जानवर को, पशु-पक्षी या मछली को गाली की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ एक जागरूकता की जरूरत है, और मोदी ने यह एक काम ठीक किया है कि उन्होंने गधे को गाली मानने से ही इंकार कर दिया, और उससे मेहनत की प्रेरणा पाने की बात कही है। लोकभाषाओं में हमेशा से ही कई तरह के सामाजिक अन्याय की मजबूत बुनियाद रही है, और यह परंपरा ताजा भाषाओं में भी चली आ रही है। लोगों को यह सिलसिला खत्म करना चाहिए।

भूखे बच्चों के देश-प्रदेश में सरकार से ईश्वर को चढ़ावा

संपादकीय
23 फरवरी 2017


तेलंगाना के मुख्यमंत्री टी.चंद्रशेखर राव अपने पूरे कुनबे के साथ दो सरकारी विमानों पर लदकर तिरूपति गए, और सरकारी खर्च पर भगवान बालाजी को साढ़े पांच करोड़ रूपए के गहने चढ़ाकर आए। यह पूरा सिलसिला जनता के पैसों के सरकारी खजाने के बेजा धार्मिक इस्तेमाल का है, और इसके खिलाफ कोई जनहित याचिका दायर करके इसकी वसूली मुख्यमंत्री से की जानी चाहिए। जवाहर लाल नेहरू के देश में आज सरकार का धर्म में ऐसा डूब जाना एक बड़ी शर्मिंदगी की बात है। इसी मुख्यमंत्री के बारे में यह भी खबरें हैं कि इन्होंने अपने निजी वास्तुशास्त्री को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे रखा है, और उसकी सलाह पर पचास करोड़ रूपए का अपना ऐसा महलनुमा मकान बनवाया है जो कि वास्तुशास्त्र के हिसाब से उनके लिए शुभ होगा। यह सब उस तेलंगाना में हो रहा है जो कि अभी-अभी नया राज्य बना है, और जिसमें गरीबी और शोषण के चलते हुए नक्सलियों को मौजूदगी के लिए जमीन मिली हुई है।
सरकार को धर्म में किस हद तक शामिल होना चाहिए, इसे लेकर अधिक अक्ल लगाने की जरूरत नहीं पडऩी चाहिए। धर्म के जो सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू हैं, उन पर तो जनता की जरूरत के हिसाब से हमेशा से ही सरकारें खर्च करती आई हैं, और उनको लेकर कोई विवाद भी नहीं होते। नेहरू के वक्त भी कुंभ का इंतजाम सरकार के पैसों से होता था, मुलायम के समय भी होता था, मायावती के समय भी होता था, और आज भी होता है। इसी तरह वैष्णो देवी से लेकर दूसरे तीर्थों तक सरकार बहुत सा इंतजाम अपने खर्च पर करती हैं। जो अल्पसंख्यक या गरीब तबके हैं, उनको एक खास रियायत की तरह हज यात्रा जैसी रियायत भी मिलती है, और इस हज सब्सिडी को बंद करने के लिए मुस्लिम समाज का भी एक बड़ा हिस्सा मांग करते आया है। हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि यहां राज्य बनने के बाद शुरू हुए राजिम कुंभ में सरकार हर बरस करोड़ों रूपए इंतजाम में खर्च करती है, और सरकारी जिम्मेदारी से कुछ बाहर जाकर भी साधुओं पर निजी खर्च करके जनता के पैसों का कुछ बेजा इस्तेमाल भी कर लेती है, लेकिन वह धर्म के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू के साथ मिले-जुले खर्च के रूप में खप जाता है।
सरकारों को अपने आपको धर्म पर खर्च से अलग रखना चाहिए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री का यह खर्च कोई सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू नहीं रखता। यह पूरी तरह से निजी आस्था की बात है, और गरीब जनता के पैसों से ऐसे खर्च से किसी का भला नहीं होने वाला। ईश्वर अगर ऐसे उपहार या रिश्वत पाकर किसी पर मेहरबानी करने लगें, तो फिर दुनिया के लोगों को काम करना ही क्यों चाहिए, महज प्रार्थना करके और चढ़ावा चढ़ाकर आशीर्वाद खरीद लेना चाहिए। यह सिलसिला बहुत भयानक है, लेकिन तेलंगाना राज्य बनने के आंदोलन से लेकर अभी तक इस राज्य में लोकतंत्र कुछ महत्वहीन सा पड़ा हुआ है, और नए राज्य बनने के एवज में नेता जनता से इस तरह की कई रियायतें कई जगहों पर पा जाते हैं। हमारा ख्याल है यह अदालत के दखल देने का एक पुख्ता मामला है, अगर कोई जनहित याचिका नहीं भी पहुंचती है, तो भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट खुद होकर इस समाचार पर राज्य सरकार से जवाब मांग सकती हैं, उन्हें मांगना चाहिए कि सरकार ने किस मद से ऐसा खर्च किया है, और ऐसा खर्च बाकी धर्मों के लिए भी किया जाएगा या नहीं? और सरकार का निजी आस्था पर ऐसा खर्च करना कौन से प्रावधान में आता है, और मुख्यमंत्री से इसकी वसूली क्यों न की जाए? भारत में अगर सरकारों को ऐसी छूट मिलती रही, तो यहां तो कई धर्म, आस्था के कई केन्द्र, और कई किस्म के ईश्वर हैं, इन सबको चढ़ावा चढ़ाते-चढ़ाते भूखे बच्चों को मर ही जाना होगा।

राजधानी के बीच बगीचे का शानदार ऐतिहासिक फैसला

संपादकीय
22 फरवरी 2017


छत्तीसगढ़ सरकार ने कल यह तय किया कि राजधानी रायपुर के एकदम बीच में मौजूद सरकारी कॉलोनी की जगह कोई नया निर्माण नहीं किया जाएगा, और चारों तरफ सड़कों के बीच की 19 एकड़ की इस जगह पर बगीचा बनाया जाएगा। अब तक रायपुर विकास प्राधिकरण इस जगह पर अरबों का बाजारू निर्माण करने पर आमादा था, और इस बात को भी पूरी तरह अनदेखा किया जा रहा था कि शहर का यह हिस्सा पूरे ही दिन चारों तरफ ट्रैफिक जाम का शिकार रहता है, और यहां पर लाखों फीट और निर्माण करके शहर के बीच एक नई मुसीबत खड़ी की जा रही थी। वैसे तो कहने के लिए इतने बड़े निर्माण के पहले केन्द्र सरकार के पर्यावरण नियमों के मुताबिक निर्माण के आसपास के इलाकों पर इससे होने वाले सभी तरह के प्रभाव का पहले से आंकलन जरूरी है, लेकिन इन सबको अनदेखा करके आरडीए इस निर्माण की जिद पर अड़ी हुई थी।
छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से और राज्य होंगे जहां पर स्थानीय संस्थाएं अपनी घोषित कमाई को बढ़ाने के लिए, और इन संस्थाओं में ताकत पर काबिज लोग अघोषित कमाई करने के लिए अंधाधुंध निर्माण में लगे रहते हैं। शहरों में कोई भी खाली जमीन हो, उस पर निर्माण के लिए म्युनिसिपल, स्थानीय विकास प्राधिकरण, या कोई और स्थानीय संस्था अपनी पूरी ताकत झोंक देती हैं, और शहर के भीतर खुली जगह खत्म होती चलती है। जो निजी जमीनें हैं उन पर निर्माण तो सरकार के काबू के बाहर का रहता है, और उन पर महज कुछ नियम लागू किए जा सकते हैं, लेकिन दमघोंटू हो चुके शहरों के बीच की सरकारी खुली जमीन हो तो सरकार को बख्शना चाहिए और शहरों को फेंफड़े रखने की इजाजत देनी चाहिए। राजधानी रायपुर में पुरानी मंडी की इससे भी बड़ी जमीन खाली पड़ी हुई है, और बरसों से वहां बड़ा सा बाजारू निर्माण करने के लिए म्युनिसिपल या आरडीए लगे हुए हैं, वहां भी चारों तरफ पूरे दिन ट्रैफिक जाम रहता है, और वहां भी सरकार को अपना खुद का एक इंच भी नया निर्माण नहीं करना चाहिए। सरकार ने यह बहुत अच्छा फैसला लिया है, इससे आने वाली पीढिय़ों को सांस लेने का हक मिल सकेगा, और हम पहले भी कई बार यह बात लिख चुके हैं कि जब नई राजधानी बन चुकी है, तो सरकार को अपना हर निर्माण वहीं करना चाहिए, क्योंकि उस सुनसान वीरान इलाके को बसाना भी सरकार का सरदर्द बना हुआ है, और पुराने शहर में खुली जगह बची नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार को एक नीतिगत फैसला यह लेना चाहिए कि बहुत ही जरूरी या इमरजेंसी जनसुविधाओं से परे ऐसा कोई निर्माण पुराने शहर में न किया जाए, जिसे यहां किए बिना इस शहर का काम न चल सके। आज भी ऐसा हो नहीं रहा है, और सरकार से लेकर स्थानीय संस्थाओं तक को देखा जा सकता है कि वे किसी तरह पुराने शहर में नए निर्माण के उत्साह से भरी हुई हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि एक बार जहां इमारतें बन गईं, वहां पर दुबारा कोई मैदान या बगीचा नहीं बन सकते।
इसके अलावा सरकार को पुराने रायपुर शहर से लगे हुए नया रायपुर के हिस्से पर ऐसी योजनाएं तुरंत बनानी चाहिए जिससे कि शहर के लिए सुविधाओं के लिए वहां तक विस्तार हो सके, शहर का काम निकल सके, और नया रायपुर की वीरानी खत्म भी हो। इसके लिए पुराने शहर से लगे हुए हिस्सों पर सरकार कई तरह के तालाब, बगीचे, पिकनिक-स्पॉट, और शादी के मैदान बना सकती है, और इससे पुराने शहर और नई राजधानी के बीच का एक रिश्ता भी कायम हो सकेगा। फिलहाल सरकार का यह फैसला बहुत अच्छा है कि शहर के बीचोंबीच 19 एकड़ का एक बगीचा बनाया जाएगा, लेकिन सरकार को इसके बीच किसी संग्रहालय, या किसी भी इमारत को बनाने का काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए, इस जगह पर महज पेड़ लगने चाहिए, और इससे शहर की तस्वीर एकदम ही बदल जाएगी। इस पर ऐसा बगीचा भी नहीं बनाना चाहिए जो कि मानवनिर्मित लगता हो, और जिसका महंगा रखरखाव हो, यहां पर खालिस देसी और स्थानीय नस्लों के पेड़ लगाने चाहिए, और लोगों को कुदरत के बीच कुछ सांस लेने का मौका मिलना चाहिए।

बाबूलाल के भ्रष्टाचार से राज्य को सबक की जरूरत

संपादकीय
21 फरवरी 2017


बिलासपुर के कुख्यात नसबंदी कांड की हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई में यह बात सामने आई कि ऑपरेशन में हुई मौतों के वक्त डो डॉक्टर सरकारी नौकरी में था, उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी नहीं ली गई थी, यह नहीं मिली थी, और इस वजह से अदालत में यह मामला आगे नहीं चल सकता। यह ऐसे बहुत से और दूसरे मामलों की कतार में एक और मामला दिखता है, जिसमें सरकार किसी कुसूरवार दिखते अफसर पर मुकदमे की इजाजत नहीं दे रही है। इसके साथ-साथ अभी दूसरी खबर यह आ रही है कि प्रदेश के सबसे भ्रष्ट कार्यकाल वाले स्वास्थ्य विभाग के सचिव रहे, और आज राज्य सरकार के प्रमुख सचिव बने हुए बाबूलाल अग्रवाल को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है, और उनपर यह आरोप है कि उन्होंने सीबीआई में उनके खिलाफ दर्ज एक मामले को वहां से राज्य के एसीबी में भिजवाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए रिश्वत का सौदा किया था और शायद आधी रकम दे भी चुके थे।
यह अफसर भ्रष्टाचार को लेकर बरसों से कुख्यात था, और उसके बावजूद यह सचिव से प्रमुख सचिव पदोन्नत किया गया था। इसके खिलाफ नकली चिकित्सा-जांच मशीनों की खरीदी से लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे, आयकर का छापा पड़ा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, और अभी उच्च शिक्षा सचिव रहते हुए ऐसे ही आरोपों का सिलसिला जारी था। अब यहां सोचने की एक बड़ी बात यह है कि इस भ्रष्ट अफसर ने सीबीआई के नाम पर दलाली करने वालों को डेढ़ करोड़ रुपए देना इसलिए तय किया कि उसका केस सीबीआई से राज्य के एसीबी को भेज दिया जाए। वैसे तो राज्य का एसीबी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाया गया है, लेकिन यहां पर अगर किसी रियायत की उम्मीद न होती तो एक भ्रष्ट अफसर अपने मामले को यहां लाने की ऐसी कोशिश क्यों करता कि आधा करोड़ से अधिक की रकम जा चुकी है, और खुद पत्नी के भाई के साथ जेल पहुंच चुका है। अभी हम राज्य की एसीबी या किसी दूसरी जांच एजेंसी की साख पर कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन एक भ्रष्ट और जानकार, राज्य के एक प्रमुख सचिव की कैसी उम्मीदें थीं, यह तो सीबीआई ने अपनी जांच में पकड़ ही लिया है, और मीडिया के सामने घोषित भी किया है।
किसी भी सरकार के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में खत्म हो जाता है, और यह भ्रष्टाचार महज कमीशनखोरी के कमीशन जितना नहीं रहता है, बल्कि घटिया काम, घटिया सामान, घटिया सेवा से पूरा का पूरा बजट ही तबाह हो जाता है। बाबूलाल अग्रवाल राज्य में अपने भ्रष्टाचार के लिए हमेशा से कुख्यात रहा ऐसा अफसर है जो कि अब तक जेल के बाहर रहकर दूसरों को हैरान करता था, और ईमानदार लोगों को निराश करता था। जब यह घड़ा पूरा भर गया, तब अब जाकर यह फूटा है, और इसे लेकर राज्य सरकार को ऐसे बाकी लोगों के मामले में सबक लेना चाहिए। 

मोहब्बत से कई गुना रफ्तार से दुनिया में बढ़ रही है नफरत...

आजकल
20 फरवरी 2017  
इन दिनों सोशल मीडिया पर समाज के हालात को आंकने का एक पैमाना मान लिया जाता है क्योंकि जो बिल्कुल ही अनपढ़ हैं, या कि इंटरनेट और कम्प्यूटर से दूर हैं, उनके अलावा बाकी लोग सोशल मीडिया से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर भारतीय प्रधानमंत्री तक, और आईएस जैसे आतंकियों से लेकर दूसरे किस्म के धर्मान्ध लोगों तक, किसी का भी काम सोशल मीडिया के बिना चलता नहीं है। दो दिन पहले ही फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने यह लिखा है कि फेसबुक के इस्तेमाल से किस तरह चुनाव जीता जा सकता है, उन्होंने सोशल मीडिया को लेकर और भी बहुत सी बातें लिखी हैं।
ट्विटर पर लोग छोटे-छोटे एक-दो वाक्य में ही अपनी बात कह लेते हैं, और साथ में अपनी पसंद की कोई तस्वीर भी पोस्ट कर लेते हैं। अभी इस बहुत ही लोकप्रिय सोशल मीडिया को लेकर एक अध्ययन का यह नतीजा है कि 2012 से लेकर अब तक ट्विटर पर श्वेत नस्लवादी-राष्ट्रवादी लोग आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन के मुकाबले भी अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, और इन चार बरसों में वे छह गुना हो चुके हैं। यह बात जानने के लिए हिन्दुस्तान के लोगों को अमरीका के इस अध्ययन को जानने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हिन्दुस्तान के भीतर भी सोशल मीडिया पर गांधी के हिमायती जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उससे कई गुना रफ्तार से नफरतजीवी, गोडसेवादी बढ़ते जा रहे हैं। साम्प्रदायिक नफरत को बढ़ाने और फैलाने में हिन्दुस्तान के कई संगठन उसी अंदाज में जुटे हैं।
अब पश्चिमी देशों को अगर देखें, तो वहां पर हिटलर के समर्थक और नस्लवादी लोग, कट्टरतावादी और युद्धोन्मादी लोग लगातार अधिक मुखर और हमलावर होते चल रहे हैं, और वे सोशल मीडिया पर अपनी नफरत फैलाने में खासा वक्त भी लगाते हैं, और अपनी नस्ल के दूसरे नफरतजीवियों को साथ में जोड़ते भी चलते हैं। देखकर यही लगता है कि दुनिया में मोहब्बत जितने लोगों को जोड़ सकती है, उससे कई गुना अधिक जोडऩे का काम नफरत कर सकती है, जो कि नफरतजीवियों को आसपास ले आती है।
लोगों को याद होगा कि अभी एक-दो हफ्ते पहले ही ऐसी खबर आई है कि एक नई डेटिंग वेबसाईट ऐसी बनी है जो कि लोगों को नापसंद के आधार पर, नफरत के आधार पर एक-दूसरे से जोड़ती है। हेटर्स नाम की यह वेबसाईट उस पर आने वाले लोगों से हर छोटी-बड़ी चीज के लिए उनकी नापसंद पूछती है, और ऐसे करीब तीन हजार पैमाने और सवाल इसकी वेबसाईट पर रहते हैं, और लोग जितने चाहें उतने सवालों के जवाब देकर अपने व्यक्तित्व की बारीकियों को, अपनी सोच को वहां दर्ज करवा लेते हैं। इसके बाद वेबसाईट का कम्प्यूटर नापसंद और नफरत के आधार पर लोगों को जोड़ीदार सुझाता है, और एक सी नफरत रखने वाले लोग आसानी से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
जिस तरह सच और अफवाह के बीच एक बड़ा फासला रहता है कि सच जब तक अपने जूतों के तस्में बांधते रहता है, तब तक अफवाह शहर का फेरा लगाकर लौट आती है, ठीक उसी तरह का हाल मोहब्बत और नफरत का रहता है। खादी को पसंद करने वाले चार लोग एक-दूसरे से जब तक मिलने की सोचें, तब तक गोडसे  के हिमायती गांधी की गढ़ी हुई फर्जी तस्वीरों से उनको बदचलन साबित करते हुए सोशल मीडिया पर बमबारी कर चुके रहते हैं। नेहरू की वल्दियत को लेकर, राजीव गांधी और संजय गांधी की वल्दियत को लेकर इंटरनेट सोचे-समझे और गढ़े हुए झूठों से पटा हुआ है, और नफरतजीवी लोग अपने असली सोशल मीडिया अकाऊंट से भी ऐसी बातों को फैलाने में जरा भी नहीं झिझकते।
जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में यह कहा जाता है कि बुरे लोग चुनावों में इसलिए जीतकर आ जाते हैं क्योंकि अच्छे मतदाता वोट डालने नहीं जाते, और घर बैठे रह जाते हैं। ठीक वैसा ही हाल सोशल मीडिया पर भी है, भारत में इंसानियत और लोकतंत्र का भला चाहने वाले लोग भले वोटरों की तरह घर बैठे रहते हैं, और नफरत फैलाकर जंग का रास्ता साफ करने में लगे हुए लोग सोशल मीडिया पर समर्पित भाव से ओवरटाईम करते रहते हैं।
खुद फेसबुक इस बात को लेकर परेशान है कि उस पर पोस्ट होने वाली झूठी खबरों पर वह किस तरह काबू करे। वह इसके तकनीकी रास्ते भी ढूंढ रहा है, और उसके कर्मचारी भी इसमें लगे हैं कि फेक-न्यूज कही जाने वाली खबरें जब फेसबुक पर आएं, तो उनकी किस तरह शिनाख्त हो, और उन्हें किस तरह हटाया जाए। आज दिक्कत यह भी है कि परंपरागत मीडिया के अखबार भी अपने को चटपटा बनाने के लिए सोशल मीडिया पर तैरती हुई फर्जी और फरेबी खबरों और तस्वीरों के शिकार हो जा रहे हैं, और बड़े-बड़े अखबारों में भी इंटरनेट का झूठ बड़ी इज्जत की जगह पा लेता है।
आज यह वक्त अमरीका में लोगों की जागरूकता को देखकर उससे कुछ सीखने का है। वहां सत्ता पर आ गए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नफरतभरी बातों के खिलाफ, फैसलों के खिलाफ आम अमरीकी जनता जिस बड़े पैमाने पर चारों तरफ यह आंदोलन कर रही है कि यह राष्ट्रपति उनका नहीं है, वह देखने लायक है। लोकतंत्र में वोटरों का बहुमत किसी को सत्ता पर तो ला सकता है, लेकिन आबादी के कम या अधिक लोगों के पास यह हक फिर भी कायम रहता है कि वे सत्ता के फैसलों का खुलकर विरोध कर सकें। आज अमरीका में जनता और मीडिया इन दोनों ने मिलकर न सिर्फ वहां की सरकार के गलत फैसलों का जबर्दस्त विरोध किया है, बल्कि समाज के भीतर भी जो लोग नफरत बढ़ाने का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ अमन-पसंद लोग एक होकर लाखों की संख्या में सड़कों पर आ रहे हैं, जिससे कि समाज में बेहतरी की संभावनाएं जिंदा रह सकें।
आज दुनिया में हर समझदार और जिम्मेदार की यह जिम्मेदारी है कि इंटरनेट या किसी और जगह पर अगर जहर घोला जा रहा है, तो उसके खिलाफ वे सच की मदद से हवा साफ करने की कोशिश करें। अगर लोग आज जहर का विरोध नहीं करेंगे, तो वे आने वाले पीढ़ी को पिछली सदी का जर्मनी बनाकर जाएंगे, जब हिटलर ने नस्ल के आधार पर लाखों लोगों का कत्ल किया था। नफरत का जहर हवा में इतना घना छाता चला जाएगा, तो वह अगली कई पीढिय़ों को अपना शिकार बनाएगा। इसलिए आज जो लोग अपनी अगली पीढ़ी के लिए मकान-दुकान छोड़कर जाना काफी समझते हैं, उनको यह भी समझना चाहिए कि इसके साथ-साथ, और बल्कि इससे अधिक जरूरी यह है कि अपने बच्चों के लिए नफरत के जहर वाली हवा छोड़कर न जाएं, बल्कि अपनी पूरी कोशिश इस जहर को साफ करने और खत्म करने में लगाएं। 

वोटों के लिए भी प्रधानमंत्री को बड़प्पन नहीं खोना चाहिए...

संपादकीय
20 फरवरी 2017


उत्तरप्रदेश की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब यह कहा कि राज्य सरकार जहां कब्रिस्तान बनाती है, वहां श्मशान भी बनाना चाहिए, और अगर ईद पर बिजली रहती है, तो दीवाली पर भी रहना चाहिए। उनके शब्द कुछ आगे-पीछे हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनका निशाना मुस्लिम और हिन्दू समाज के बीच का फर्क था, और वे यह साबित कर रहे थे कि राज्य सरकार चला रही समाजवादी पार्टी हिन्दू और मुस्लिम में फर्क कर रही है। उनकी इस बात को देश में बहुत से तबके एक साम्प्रदायिक भड़कावा मान रहे हैं, और यह भी मान रहे हैं कि अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में यह हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश।
प्रधानमंत्री की यह बात गलत और अटपटी दोनों लग रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनकी पार्टी भाजपा उत्तरप्रदेश में या तो सत्ता में रही है, या फिर विपक्ष में। ऐसे में अगर समाजवादी पार्टी ने सचमुच ही कब्रिस्तान और श्मशान के बीच ऐसा कोई फर्क किया था, और हिन्दू त्यौहारों पर अंधेरा रखा था, और मुस्लिम त्यौहारों को रौशन किया था, तो हमको तो पिछले दस बरसों में भाजपा की उठाई हुई ऐसी कोई बात याद नहीं पड़ती है। भाजपा उत्तरप्रदेश में बड़ी मजबूत है, और भाजपा के वहां पर भगवा नेता इतनी हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात हैं कि बार-बार उनके खिलाफ कभी चुनाव आयोग को चेतावनी देनी पड़ती है, तो कभी पार्टी को सफाई देनी पड़ती है। रात-दिन खबरों के बीच बैठे हुए भी हमें ऐसी कोई खबर याद नहीं पड़ रही है कि भाजपा के किसी भी नेता ने उत्तरप्रदेश में ऐसा कोई बयान दिया हो। और यह बात साफ है कि अगर साम्प्रदायिकता के आधार पर, धर्म के आधार पर उत्तरप्रदेश में ऐसा हुआ रहता तो अब तक संसद में भी यह बात गूंज जानी चाहिए थी। फिर आज तो प्रधानमंत्री खुद उत्तरप्रदेश के सबसे धार्मिक शहर के सांसद हैं, और पार्टी की उत्तरप्रदेश इकाई की पहुंच भी उन तक अच्छी खासी होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में धर्म के इस्तेमाल को लेकर जो फैसला दिया है, प्रधानमंत्री का बयान उस फैसले के दायरे में तो आता है और वह फैसले की भावना के खिलाफ भी दिखता है, लेकिन यह एक अलग बात है कि तकनीकी आधार पर मोदी का बयान सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बच सकता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि अदालत के किसी फैसले या उसकी भावना से परे भी प्रधानमंत्री को एक बड़प्पन के साथ भाषण देना चाहिए, और चुनाव के मौके पर भी प्रधानमंत्री पार्टी के नेता भर नहीं रहते, वे प्रधानमंत्री भी रहते हैं, इस नाते उन्हें सुरक्षा और सहूलियत भी मिलती है, और लोकतंत्र का तकाजा यह है कि प्रधानमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुकूल बड़प्पन की बात करनी चाहिए, और ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जिसे उकसावा और भड़कावा करार दिया जा सके। हमारी तो देश के किसी भी प्रधानमंत्री से यही उम्मीद रहेगी कि वे वोटों के लालच में भी अपने पद की जिम्मेदारी को न भूलें।

शौच के तरीके के साथ-साथ सोच के तरीके को भी बदलें

संपादकीय
19 फरवरी 2017


आज पूरे देश में खुले में शौच खत्म करवाने के लिए करोड़ों शौचालय बनवाए जा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि जैसा कि किसी भी सरकारी योजना में होता है, भारत में भी अलग-अलग राज्यों में जिला स्तर से राज्य सरकारों के पास फर्जी आंकड़े पहुंच रहे हैं, और हकीकत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी कि बताई जा रही है। लेकिन यह बात सिर्फ शौचालय के मामलों में हो, ऐसा भी नहीं है, सरकार की तो हर योजना में फर्जी आंकड़े सामने आते ही हैं, और बाद में जब कोई जांच होती है, तो पता लगता है कि जनता का पैसा बर्बाद होते रहता है, और नेता-अफसर झूठ पेश करके वाहवाही पाते रहते हैं।
ऐसे में इस मामले से जुड़ी हुई एक दूसरी खबर है जो कि आंकड़ों के झूठ से परे एक अच्छी तस्वीर भी पेश करती है। केन्द्र सररकार के स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर अभी तेलंगाना पहुंचे, और वहां एक गांव जाकर दूसरे बहुत से बड़े आईएएस अफसरों के साथ मिलकर अलग-अलग शौचालयों के गड्ढों में उतरे, और वहां भरा हुआ पखाना जो कि खाद में तब्दील हो गया था, उसे अपने हाथों साफ करके निकाला, और गांव के लोगों के सामने यह हकीकत रखी कि शौचालयों के गड्ढे भरने के बाद कुछ महीनों में ही उनमें मलमूत्र सूखकर सूखा पावडर सरीखा खाद बन जाता है, और उसे बाहर निकालने में कोई दिक्कत नहीं होती। देश के इन कुछ सबसे बड़े अफसरों ने ऐसा करके लोगों की वह हिचक खत्म करने की कोशिश की कि शौचालयों के टैंक जब भर जाएंगे, तब उन्हें साफ कौन करेगा? क्योंकि आज देश में यह कानून लागू है कि किसी भी सफाई कर्मचारी से दूसरों का पखाना नहीं उठवाया जाएगा, और वह जुर्म होगा। ऐसे में बहुत से लोगों के बीच यह सवाल है कि खुले में शौच बंद करवाकर आज हर कहीं पखाने तो बन जा रहे हैं, लेकिन उनके टैंक भर जाने के बाद उनकी सफाई कौन करेगा? इन अफसरों ने बताया कि दो-दो टैंक इसीलिए हर शौचालय के साथ बनते हैं कि जब एक भर जाए, तो उसे बंद करके सूखने दिया जाए, और फिर लोग खुद कुछ महीनों में उसे खाली करके खाद का इस्तेमाल कर लें।
यह बात कहने में जितनी आसान लगती है, हकीकत में इस पर अमल उतनी आसान नहीं रहेगी, मलमूत्र की सफाई आज भी भारत में छुआछूत की एक वजह है, और लोग अपने घर के पखाने की सफाई भी खुद नहीं करते। ऐसे में शौचालयों के भरे हुए और सूखी खाद से भरे हुए टैंक की सफाई के लिए लोग उसके भीतर उतरेंगे, और उसे निकालकर खेतों में इस्तेमाल करेंगे, इस राह में सामाजिक सोच एक बड़ा अड़ंगा साबित होगी। इसलिए यह भी जरूरी है कि जिस बड़े पैमाने पर शौचालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी बड़े पैमाने पर सफाई की जिम्मेदारी की सामाजिक-नसीहत भी लोगों को दी जाए। शौचालय को ईंट-गारे से बनाना तो आसान है, लेकिन लोगों की हिचक को खत्म करना इसके मुकाबले बहुत मुश्किल है। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार के इतने बड़े अफसरों ने दूसरों के शौचालयों के टैंक साफ करके लोगों के सामने एक मिसाल रखी है, और दूसरे प्रदेशों में भी लोगों को आज से ही ऐसी सामाजिक जागरूकता फैलाना शुरू करना चाहिए, वरना टैंकों के भरने के बाद रातों-रात लोगों की सोच नहीं बदली जा सकेगी। शौच के तरीके के साथ सोच के तरीके को भी साथ-साथ ही बदला जाए।

ताकतवरों की कैद और सुनवाई दूसरे राज्यों में होना जरूरी हो...

संपादकीय
18 फरवरी 2017


बिहार के बाहुबली कहे जाने वाले, और अनगिनत जुर्म के मामलों से घिरे हुए एक नेता शहाबुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बिहार की जेल से दिल्ली के तिहाड़ जेल लाया जा रहा है क्योंकि बिहार में जेल के भीतर भी इस आदमी का राज चलता है, और उसके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाह और सुबूत दोनों ही खत्म होते चलते हैं। ऐसे में उसकी करवाई बताई जाती एक हत्या के मुकदमे में वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से यह अपील की थी कि इसे बिहार से बाहर की जेल में रखा जाए।
देश में ऐसे बहुत से ताकतवर लोग हैं जो जेल के भीतर भी राज करने जितना दमखम रखते हैं, या उतना खर्च कर सकते हैं। कुछ दूसरे तरह की ताकत आसाराम जैसे लोग रखते हैं जिनके बलात्कार के मामले के बावजूद लोग उनके भक्त बने हुए हैं, और जेल से लेकर अदालत तक हर बार सड़कों पर भीड़ लगाकर हंगामा भी करते हैं। ऐसे सारे लोगों को उनके राज्य के बाहर की जेलों में रखना चाहिए, और साथ ही इनके मामले तुरंत ही इनके प्रभामंडल के इलाकों से बाहर की अदालतों में, दूसरे प्रदेशों की अदालतों में भेज देने चाहिए, तभी जाकर किसी तरह की सही सुनवाई हो सकती है। न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में जेलों के भीतर मुजरिमों का ही राज चलता है, और जब ऐसे मुजरिम सत्ता या पैसों की ताकत से लैस होते हैं, तो वे वहां से फोन पर बाहर की दुनिया में अपना कामकाज भी चलाते रहते हैं, और गवाहों और सुबूतों को खत्म भी करते रहते हैं। इसी शहाबुद्दीन का हाल यह है कि जब अभी जेल से वह पैरोल पर बाहर निकला था, तो उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री-विधायक पहुंचे थे। अब आज अगर शशिकला को कर्नाटक के बजाय तमिलनाडू की जेल में रखा गया होता, तो उनके चरण धोने के लिए रोज पहुंचने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री को देखते हुए जेल के कर्मचारी उन पर कौन से नियम लागू कर सकते थे?
भारत की न्याय व्यवस्था में मामले की शुरुआत पुलिस या इस तरह की दूसरी जांच एजेंसी से शुरू होती है, और उसके बाद गवाह और सुबूत जुटने पर मामले अदालत में पहुंचते हैं, इसके बाद जांच रिपोर्ट, गवाह, सुबूत, अदालती कर्मचारी, सरकारी वकील, और जज, इनमें से जो-जो बिकाऊ हों, उन सबको खरीदने का सिलसिला शुरू होता है। इस खरीदी के बाद अगर मामले में कोई दम बचता है, तो ही वह आगे घिसटता है, और मुजरिमों की ताकत मामले के पैरों में बेडिय़ां बांध देती है ताकि वह पैदल चाल से भी न चल सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक ऐसा नियम बनाना चाहिए कि मंत्री, सांसद, विधायक, और बड़े अफसर, एक सीमा से अधिक संपन्नता वाले लोग, ऐसे तमाम लोगों को प्रदेश के बाहर की जेल में ही रखा जाए, और गवाह या सुबूत खत्म होने की शिकायत आने पर उनके मुकदमे ही दूसरे प्रदेश में भेज दिए जाएं। गुजरात में मुठभेड़-हत्याओं के मामलों में दिग्गज आईपीएस अफसर बंजारा का ऐसा ही किया गया था।
लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि मध्यप्रदेश के जिस व्यापम घोटाले की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने अभी पिछले कुछ दिनों में ही सैकड़ों मेडिकल छात्रों का दाखिला खारिज किया है, उस मामले में किस तरह इसी भाजपा सरकार के मंत्री से लेकर अफसर तक, और कई ताकतवर नेता तक शामिल थे, और जेल में बंद रहने के बाद जब ऐसे मंत्री बाहर निकले तो उनकी भव्य शोभायात्रा निकाली गई थी, बड़ा स्वागत किया गया था। और इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान इससे जुड़े हुए गवाह, छोटे-मोटे अभियुक्त, और जांच अफसर मिलाकर शायद चार दर्जन के करीब लोग रहस्यमय तरीके से मारे गए। यह ऐसा ही एक मामला था जिसमें सत्ता की सीधी भागीदारी एक बड़े जुर्म में साबित हो रही थी, फिर भी उसे मध्यप्रदेश में ही चलाया गया, मध्यप्रदेश में ही उसकी जांच की गई, और लोगों को अपनी ही सरकार की जेल में रखा गया।
हमने ऐसे ही खतरों के बारे में एक बार पहले यह भी लिखा था कि जब किसी राज्य में सत्ता पर बैठे लोगों पर ही किसी जुर्म में शामिल होने के आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच अपने आप केन्द्र सरकार की किसी जांच एजेंसी को देने की एक व्यवस्था करनी चाहिए। आज केन्द्र की जांच एजेंसी सीबीआई तभी तस्वीर में आती है जब राज्य सरकार ऐसी जांच की सिफारिश करती है, और राज्य सरकारें आमतौर पर यह चाहती हैं कि जांच उनके कब्जे की पुलिस से परे न जाए। भारत में न्याय की किसी भी संभावना के खत्म होने की यह एक बड़ी वजह रहती है, और इसके खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट को कोई आदेश देना चाहिए।

राज्य सरकार के भ्रष्टाचार पर निगरानी की खुफिया एजेंसी हो

संपादकीय
17 फरवरी 2017


छत्तीसगढ़ में कल फिर एंटी करप्शन ब्यूरो ने पौन दर्जन अफसरों पर छापे मारे, और उनसे एक अरब से अधिक की जमीन-जायदाद, गहनों और रूपयों की बरामदगी बताई है। हर कुछ महीनों में ब्यूरो की ऐसी कार्रवाई होती है, और फिर महीनों तक उससे जुड़ी खबरें आती हैं, और फिर लोगों को यह भी पता नहीं लगता कि ये मामले अदालत तक पहुंचे या नहीं, या वहां से क्या फैसला हुआ। प्रदेश में एसीबी की आज तक की सबसे बड़ी कार्रवाई, नागरिक आपूर्ति निगम से सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार का दावा किया गया था, लेकिन उससे जुड़े हुए दो सबसे बड़े आईएएस अफसर अब तक किसी भी कार्रवाई से परे आजाद हैं, सरकार विधानसभा में बार-बार कह चुकी है कि कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है।
प्रदेश की जनता ऐसे रहस्य सुलझा नहीं पाती है कि भ्रष्टाचार का घड़ा भरते हुए जब हर किसी को दिखता है, तो भी खुद सरकार को क्यों नहीं दिखता है, और फिर जब भ्रष्टाचार पकड़ में आ भी जाता है, तो भी दस-बीस बरस तक भ्रष्ट लोग कुर्सियों पर जमे रहते हैं, और आगे भ्रष्टाचार जारी रखने के अधिकारों से लैस भी रहते हैं। शायद ही किसी भ्रष्ट को यह खतरा दिखता हो कि उस पर कोई कार्रवाई होगी, और ऐसी कार्रवाई होगी कि उसकी नौकरी जाएगी, और वे खुद जेल जाएंगे। ऐसे खतरे के बिना लोग बेफिक्र होकर कमाते हैं, और कभी उन पर कार्रवाई होती भी है, तो उनकी कमाई का एक बड़ा ही छोटा हिस्सा छापे में पकड़ाता है, और इस हिस्से को भी वे अपनी जायज कमाई साबित करने में अदालत तक पहुंचते हुए कामयाब हो जाते हैं। भारत में न्यायपालिका में मुजरिमों को संदेह के आधार पर रियायत देने की जो सोच है,  उसके चलते सौ गुनहगारों में से दो-चार ही सजा पाते होंगे।
हम बार-बार छत्तीसगढ़ के सिलसिले में यह लिखते आए हैं कि सरकार को भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी से परे एक ऐसी खुफिया एजेंसी भी विकसित करनी चाहिए जो कि भ्रष्टाचार शुरू होते ही उस पर जल्द ही नजर रख सके, और इसकी जानकारी समय रहते भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी को दे सके। जिस तरह केन्द्र सरकार से लेकर राज्यों तक दूसरे कई मामलों के लिए खुफिया विभाग रहते हैं जो कि खुद कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, लेकिन नजर रखकर जानकारी जुटाते हैं, और उनकी जानकारी के आधार पर कहीं आतंकी हमले थमते हैं, तो कहीं किसी और तरह के जुर्म। ऐसी ही एजेंसी राज्य सरकार को अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए बनानी चाहिए, और जब एसीबी जैसी एजेंसी कोई कार्रवाई करती है, तो पकड़ाए हुए अफसरों के खिलाफ मुकदमे की इजाजत का लंबा और थका देने वाला सिलसिला खत्म करना चाहिए। इसके साथ-साथ राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि भ्रष्टाचार या अनुपातहीन सम्पत्ति के मामलों में पकड़ाए गए अधिकारी-कर्मचारी किसी भी काम में न लगाए जाएं, और उन्हें निलंबन के दौर में आधी तनख्वाह देना या बिना काम बिठाए रखना राज्य के अधिक हित में होगा।
आज देश और प्रदेश में अदालतें भ्रष्टाचार पर सरकार के ढीले-ढाले रवैये के खिलाफ तरह-तरह की दखल दे रही हैं। खुद छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने सरकार से उसकी ढिलाई पर बहुत तरह के जवाब-तलब किए हैं। ऐसे में सरकार को भ्रष्ट लोगों को बचाना छोड़कर इस प्रदेश को बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसे लुटेरों के पकड़ाने के बाद भी उन्हें आगे लूटने के लिए कुर्सियों पर बनाए रखना खुद सरकार की साख को चौपट करता है।

इसरो की कामयाबी तो ठीक है, पर बाकी देश क्या उससे कुछ सीखने की जहमत भी उठाएगा?

संपादकीय
16 फरवरी 2017


भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो की एक और कामयाबी ने कल सुबह-सुबह देश का सिर ऊंचा किया। यह चारों तरफ की नकारात्मक खबरों के बीच एक सकारात्मक खबर थी कि दुनिया के कई विकसित देशों के 104 उपग्रह लेकर भारतीय रॉकेट किस तरह अंतरिक्ष गया। अलग-अलग देशों और कंपनियों के सौ से अधिक उपग्रह एक साथ भेजने का यह विश्व रिकॉर्ड बना है। इस बड़े ही तकनीकी मामले पर वैसे तो हमको किसी विचार के लिखने की जरूरत नहीं होनी थी, लेकिन फिर भी एक सरकारी संस्थान इस देश की आम सरकारी संस्कृति के बीच भी किस बखूबी काम कर सकता है, यह देखने की जरूरत है। बुरी बातों पर लिखने का मौका तो दिन में चार बार मिलता है, लेकिन सरकार में किसी अच्छी बात पर लिखने के मुद्दों का अकाल बने रहता है।
यह इसरो केन्द्र सरकार के पैसों पर चलने वाला संस्थान ही है, और इसमें वे हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक और तकनीशियन काम करते हैं, जिनकी राष्ट्रीयता के बारे में बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तानी बुनियादी रूप से भ्रष्ट हैं, वे काम नहीं करते हैं, सरकार के हर काम में बड़ा भ्रष्टाचार रहता है, वगैरह-वगैरह। दूसरी दिलचस्प बात यह कि पिछली बार जब मंगल ग्रह के लिए भारत का यान रवाना हुआ, तो पहली बार यह बात सामने आई कि इसरो के उस अभियान से कितनी बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हुई थीं। आमतौर पर महिलाओं का मखौल बनाने के लिए यह कहा जाता है कि वे एक कार भी ठीक से पार्क नहीं कर सकतीं, और वे ही महिलाएं इसरो में काम करते हुए मंगलयान को भी मंगल पर ठीक से पार्क कर चुकी हैं। यह इसरो सरकारी खरीदी पर ही काम करता है, इसके वैज्ञानिक वे ही लोग हैं जिन्हें कि दुनिया के दूसरे देशों में इससे दस-बीस गुना बड़ी तनख्वाह मिल सकती है, और इस पर सरकार की वैसी ही राजनीति चल सकती है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी संस्थान पर चलती है या चल सकती है। लेकिन ऐसी ही तमाम सीमाओं के बीच इतनी बड़ी महिला-भागीदारी के साथ इसरो ने जो कामयाबी पाई है, उसे देखकर इस देश को यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी हर कोने पर थूकने या मूतने से बेहतर भी बहुत से काम कर सकते हैं, और करते हैं।
किसी देश के लिए राष्ट्रीय गौरव बहुत जरूरी होता है। इसरो हर बरस एक से अधिक बार देश को ऐसा मौका देता है। ऐसा ही एक दूसरा संस्थान अमूल है जो कि सहकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें डेयरी चलाने के साथ-साथ आइसक्रीम से लेकर चॉकलेट तक, और दूध से लेकर मक्खन तक बनाकर अपने ब्रांड से बेचने में अमूल ने भारत में काम कर रही सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पछाड़ दिया है। और इस अमूल की एक खूबी यह भी है कि दशकों से इसके ऐसे कॉर्टूननुमा पोस्टर हर चर्चित घटना पर आते हैं, और सरकारी क्षेत्र की सहकारी संस्था होने के बाद भी ये पोस्टर सरकार का मजाक उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहते। गौरव का एक और संस्थान दिल्ली का मेट्रो था जिसे कि एक इंजीनियर-अफसर श्रीधरन ने बेमिसाल कामयाबी से बनाया था, और सरकार के भीतर रहते हुए शानदार काम करके दिखाया था। देश में ऐसी मिसालें कई जगह सामने आती हैं, और जनता से लेकर सरकार तक सभी को यह सोचना भी चाहिए कि कामयाबी की ऐसी मिसालें और कहां-कहां बढ़ाई जा सकती हैं। आज अगर कोई यह सोचे कि इसरो के रॉकेट में, या उसके उपग्रह में घटिया सामान सरकारी सप्लाई से खरीदकर लगाया गया होता, तो क्या आज इसरो मंगल पर पहुंचा होता? क्या वह दुनियाभर के देशों के लिए काम करता होता?
अंतरिक्ष में भारत की सफलता पूरी तरह से घरेलू तकनीक पर गढ़ी हुई है, और भारत को अपने बाकी सरकारी क्षेत्रों के बारे में यह सोचना चाहिए कि वहां ऐसी कामयाबी पाने के लिए क्या किया जा सकता है। कामयाबी के ये एक-दो टापू भारत में भ्रष्टाचार और राजनीति की गंदगी के समंदर के बीच भी पनपे हैं, और इनसे बाकी देश को भी सीखना चाहिए।

निजी-पारिवारिक हिंसा रोकने परामर्शदाता तैयार किए जाएं

संपादकीय
15 फरवरी 2017


अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक आदमी ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसे और दो बेटियों को मार डाला, और दो बच्चे बाहर रहने की वजह से बच गए। कुछ दिन पहले प्रदेश के एक दूसरे हिस्से में इसी तरह की हिंसा हुई, और आज दिल्ली की खबर है कि वहां अपने छोटे बच्चों के सामने ही एक आदमी ने पत्नी की डंडे से पीट-पीटकर हत्या की, और उसकी लाश के साथ सोते रहा। हर कुछ दिनों में ऐसी पारिवारिक हिंसा सामने आती है, और वह महज एक पुलिस का आंकड़ा बनकर अदालत तक पहुंचती है, खबर बनती है, फैसले के बाद कैद होती है, और परिवार इस दौर में तबाह हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि निजी जिंदगी की ऐसी हिंसा को दुनिया की कोई भी पुलिस जाकर वक्त रहते नहीं रोक सकती, क्योंकि किसी के दिल में परिवार के लोगों के खिलाफ ही अगर कोई हिंसक भावना है, तो उसकी शिनाख्त का तो कोई जरिया हो भी नहीं सकता। अब ऐसे में ऐसी हिंसा से बचाव कैसे किया जाए? और ऐसी पारिवारिक हिंसा न महज परिवार पर भारी पड़ती है, बल्कि पूरे समाज पर भारी पड़ती है, और जांच से लेकर अदालत और जेल तक, सरकार की जेब पर भी बोझ बनती है। इसलिए समाज को ऐसी हिंसा से बचाव के रास्ते देखने चाहिए, कोशिशें करने पर ऐसी हिंसा चाहे पूरी तरह बंद न हो, कम जरूर हो सकती है, और उसी के लिए कोशिश करनी चाहिए।
परिवार के भीतर की ऐसी अधिकतर हिंसा एक तनाव के बढ़ते चले जाने और उसके हद से गुजर जाने के बाद होती है। इसके पहले परिवार के लोगों के बीच टकराव को रोकने के लिए, तनाव को रोकने के लिए, परिवार के दूसरे लोग भी मददगार हो सकते हैं, रिश्तेदार और पड़ोसी भी काम आ सकते हैं, दोस्त और सहकर्मी भी इस्तेमाल के हो सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि किसी भी निजी हिंसा के पीछे आसपास के करीबी लोगों में से कम से कम कुछ लोगों की अनदेखी और लापरवाही भी जिम्मेदार रहती है, जो कि समय पर दखल देने से बचने वाले लोगों की रहती हैं। लेकिन यहां तक तो बात समाज की है, सरकार की भी एक जिम्मेदारी बनती है जिस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।
आज देश-प्रदेश में लोगों के भीतर बढ़ते हुए तनाव को लेकर, उनकी कुंठाओं और उनकी हताशा को लेकर, नाकामयाबी से उपजे उनके मानसिक अवसाद को लेकर समाज के एक बड़े हिस्से को परामर्श की जरूरत है। और यह बात हम आज पहली बार नहीं लिख रहे हैं, पहले भी बहुत बार लिख चुके हैं कि कभी इम्तिहान देते बच्चे तनाव में आत्महत्या कर लेते हैं, तो कभी मनपसंद मोबाइल फोन न मिलने पर किसी गरीब घर की लड़की टंग जाती है। ऐसे सारे मामलों में स्कूल-कॉलेज, और पड़ोस के किसी संगठन से समय रहते अगर सलाह मिल जाए, तो आत्महिंसा या हिंसा की ऐसी नौबत टल सकती है। यह काम सररकार को ही शुरू करना होगा। अभी जैसे स्कूली इम्तिहान शुरू होने के ठीक पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पत्नी के साथ एक सरकारी स्कूल गए, और बच्चियों का हौसला बढ़ाकर आए। यह तो एक स्कूल की बात हुई, लेकिन प्रदेश भर में ऐसे हजारों परामर्शदाताओं की जरूरत है जो कि बारी-बारी से अलग-अलग स्कूल-कॉलेज में जाकर, अलग-अलग बस्तियों और मुहल्लों में जाकर लोगों के बीच सकारात्मक भावनाओं को बढ़ा सकें।
इसके लिए सररकार को प्रदेश के विश्वविद्यालयों में सामाजिक-मानसिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे जो कि मनोविज्ञान की पढ़ाई के बाद के होंगे। ऐसे लोग सीधे-सीधे सरकारी नौकरी चाहे न पा सकें, लेकिन इन्हें भत्ता देकर भी काम में लगाया जा सकता है, जिस तरह कि आज शिक्षाकर्मी काम करते हैं, मितानिनें काम करती हैं। समाज के भीतर टीवी और अखबार मिलकर इतनी हिंसा बढ़ा रहे हैं, और लोगों की जिंदगी के तनाव इतने अधिक हो चुके हैं, कि उन्हें घटाने के लिए ऐसी मेहनत जरूरी है। पूरे देश में ही कॉलेज की पढ़ाई के बाद शायद दो-चार फीसदी लोगों को ही उनकी पढ़ाई की वजह से रोजगार या कारोबार मिल पाता है। अगर ऐसी पढ़ाई के बाद परामर्शदाता निकलेंगे, तो हो सकता है कि समाज का एक हिस्सा उन्हें कुछ फीस देकर भी अपने बच्चों की या अपने मन की उलझनों को सुलझाने की कोशिश करे। लेकिन जब तक ऐसे परामर्श की सुविधा हासिल नहीं होगी, लोग खुद होकर अपने तनाव पूरी तरह से नहीं घटा सकते, और ऐसी सुविधा के लिए सरकार को ही विश्वविद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करवाने की पहल करनी होगी। जिस तरह स्कूलों में खेल शिक्षक होते हैं, उसी तरह कम से कम हर शहर या कस्बे में एक-एक स्कूली-परामर्शदाता भी होने चाहिए, और ऐसा होने पर बच्चों का देह शोषण रोकने में भी मदद मिल सकती है। 

मुजरिम नेताओं को फास्ट फूड डिलीवरी जैसा तेज इंसाफ मिले

संपादकीय
14 फरवरी 2017


तमिलनाडू में गुजर चुकीं मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में निचली अदालत की सुनाई हुई सजा को आज सुप्रीम कोर्ट ने सही करार दी, और चूंकि जयललिता को तो अब पेश होने का आदेश दिया नहीं जा सकता था, इसलिए शशिकला को ही तुरंत समर्पण करने को कहा गया है। आज इस वक्त तक वहां के अन्नाद्रमुक पार्टी के तकरीबन सारे विधायकों को अपने साथ लेकर बैठीं शशिकला के लिए तो यह एक सदमा है ही कि चार बरस की कैद से बचने का अभी तुरंत कोई जरिया नहीं है, लेकिन चेन्नई से आ रहीं ताजा खबरें बता रही हैं कि शशिकला के मुकाबले रीढ़ की हड्डी लेकर खड़े हुए मौजूदा मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम को शशिकला ने पार्टी से निकलवा दिया है, और अपनी जगह एक दूसरे विधायक को अगला मुख्यमंत्री निर्वाचित करवा दिया है। ऐसा लगता है कि विधायक दल अभी उनके ही कब्जे में है, या उनके साथ है, और तमिलनाडू की सरकार अभी एक अस्थिरता में फंसी है, और आने वाले घंटों या दिनों में मामला साफ होगा। लेकिन हम अभी इस मामले पर न लिखकर, इससे जुड़े हुए उस बुनियादी मुद्दे पर लिखना चाहते हैं जिसकी वजह से आज शशिकला को चार बरस की कैद हुई है, और दस करोड़ रूपए जुर्माना पटाने को कहा गया है।
अब यह याद रखने की जरूरत है कि आज तमिल राजनीति में इतनी ऊंचाई और इतनी ताकत की जगह पर पहुंची हुई शशिकला मुख्यमंत्री जयललिता की एक घरेलू सहयोगी रहीं, और वह जयललिता की सबसे करीबी, सबसे विश्वस्त, और सबसे ताकतवर भी रहीं। ऐसे में भ्रष्टाचार की काली कमाई का अथाह खजाना इकट्ठा करके जया और शशिकला दोनों ही अदालत के कटघरे में पहुंचे, जेल पहुंचे, और अब कैद जारी रहने वाली है। भारत की राजनीति में भ्रष्ट नेताओं को सजा मिलते हुए कितना वक्त लगता है, यह इस खबर से पता लगता है जिसमें अठारह बरस से यह मुकदमा चल रहा था, और देश के एक तीखे तेवर वाले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बिना थके हुए देश की छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, और आज वह आखिरी मुकाम तक पहुंची है। अब इसके साथ ही यह खबर भी आई है कि बिहार के चारा घोटाले के चलते गिरफ्तार, सजायाफ्ता, और अभी ऊंची अदालत में अपील के चलते जमानत पर छूटे हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले की वजह से परेशान हैं। अब सवाल यह उठता है कि लालू यादव भ्रष्टाचार के इस मामले के बाद अपनी गृहिणी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर एक किस्म से बिहार को हांकते रहे। तब से लेकर अब तक उनकी बेटी सांसद बन गई, दो बेटे बिहार में मंत्री हैं, और वे खुद बेताज बादशाह हैं, और यह सब देखकर बिहार की वे गाय-भैंस सदमे में मर चुकी हैं जिनके चारे के घोटाले में लालू को सजा हुई थी।
भारत की राजनीति यह साबित करती है कि भ्रष्टाचार हो, या कि किसी और किस्म का जुर्म हो, लोग अगर सत्ता या विपक्ष की राजनीति में ताकतवर हैं, तो दशकों तक वे अपने जुर्म की सजा से बचे रह सकते हैं। यही वजह है कि हिन्दी में ऐसी बहुत सी फिल्में सामने आई हैं जिनमें कोई ईमानदार पुलिस अफसर भ्रष्ट मंत्री-मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से पीट-पीटकर जेल में डालता है, कानून अपने हाथ में लेता है, हिंसा करता है, और लोग ऐसे नजारे देखकर ताली बजाते हैं क्योंकि हिन्दुस्तान में ऐसे ताकतवर नेताओं को महज ऐसे फिल्मी किरदार ही सजा दे पाते हैं। भारत में लोकतंत्र राजनीति के मुजरिमों को सजा देने के मामले में एकदम ही खोखला और बेअसर साबित हुआ है। कभी-कभार दस-बीस बरस की मुकदमेबाजी के बाद हजारों में से कोई एक नेता सजा पाते हैं, और आमतौर पर वे सजा के पहले जयललिता जैसे अंत को पहले पा लेते हैं, राजकीय सम्मान के साथ ऊपर रवाना होते हैं, और इसके साथ ही उनकी सजा की आशंका खत्म भी हो जाती है।
हम पहले भी बार-बार यह लिखते रहे हैं कि सत्ता की अलग-अलग दर्जे की ताकत पाए हुए लोगों के लिए अलग से अदालत होनी चाहिए, और उनके जुर्म के लिए उनके ऊंचे दर्जे के अनुपात में ही अधिक कड़क सजा का भी इंतजाम होना चाहिए। जब तक हिन्दुस्तानी नेताओं के जुर्म पर फास्ट फूड डिलीवरी जैसी तेज रफ्तार से इंसाफ की डिलीवरी नहीं होगी, और वाघ-बकरी ब्रांड की चाय की तरह कड़क सजा नहीं होगी, तब तक भारतीय राजनीतिक सत्ता भ्रष्ट लोगों से दबी रहेगी, और भ्रष्ट बनी रहेगी।

न ज्ञान, न समझ, बच्चे महज इम्तिहानों की अंधी दौड़ में..

संपादकीय
13 फरवरी 2017


राजस्थान की एक खबर है कि वहां सरकारी स्कूल में बोर्ड परीक्षा में सौ फीसदी नतीजे लाने के लिए, और मेरिट में जगह पाने के लिए बच्चों को रात-दिन पढ़ाया जा रहा है, और उनके लिए स्कूल में ही रजाई-बिस्तर का इंतजाम कर दिया गया है। शिक्षक भी रात भर उनको पढ़ाने के लिए स्कूल में ही रूक रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले एक दूसरी खबर आई थी कि कहीं और एक स्कूल में रिकॉर्ड बनाने के लिए सुबह 4 बजे से शिक्षक निकलते हैं, और बच्चों को जगाकर लेकर आते हैं। इस स्कूल में साल के हर दिन क्लास लगने की भी बात उस खबर में थी।
पढ़ाई के लिए हिन्दुस्तान में बावलापन मोटे तौर पर इम्तिहान में बेहतर नतीजे पाने के लिए बावलेपन में बदल गया है। मां-बाप से लेकर स्कूल तक बच्चों को मानो कोल्हू में बैल की तरह जोत देते हैं कि उनका कितना अधिक तेल निकाला जा सकता है। और यह हाल तो तब है जब राजस्थान के कोटा जैसे प्रवेश-परीक्षा तैयारी के कारखाने की बात नहीं की जा रही है। कोटा में तो आईआईटी जैसी परीक्षाओं में कामयाब करने के लिए स्कूल के आखिरी कई बरस बच्चे झोंक दिए जाते हैं, और हर बरस इनमें से कई बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं।
स्कूल की पढ़ाई को हिन्दुस्तान में सब कुछ मान लिया जाता है। और यह पढ़ाई भी ज्ञान और समझ पाने के लिए नहीं होती, यह इम्तिहान में पास होने और अधिक नंबर पाने के लिए ही रहती है, और नतीजा यह होता है कि अंकसूची को ज्ञान मान लिया जाता है। बच्चों की जिंदगी के स्कूली बरस सबसे अधिक असर डालने वाले होते हैं, और इन बरसों में उन पर मां-बाप की उम्मीदों से लेकर स्कूल के दबाव तक का हाल ऐसा रहता है कि हर बरस उन्हें गिनाया जाता है कि जिंदगी में इस बरस के इम्तिहान में नंबर पाना ही सब कुछ है, और उसके अलावा जिंदगी में कुछ भी नहीं है। जबकि दुनिया का इतिहास बताता है कि जो सबसे कामयाब महान लोग हुए हैं, वे स्कूलों में पढ़ाई में बहुत मामूली रहे हैं, और बहुत से तो मुश्किल से पास हुए। अभी-अभी दुनिया की एक सबसे कामयाब चीनी कम्पनी अली बाबा के संस्थापक जैक मा ने किसी भाषण या इंटरव्यू में कहा है कि वे अपने बच्चों को बहुत अधिक नंबर पाने के किसी दबाव में नहीं रखते, उनका मानना है कि ठीक-ठाक नंबर मिल जाएं वही बहुत है। वे खुद एक बहुत गरीब स्कूल में पढ़े और यहां तक पहुंचे।
हिन्दुस्तानी मां-बाप और स्कूलों को यह समझना चाहिए कि बच्चों की जिंदगी के ये बरस दुबारा नहीं आने वाले रहते। और इन बरसों में न सिर्फ किताबी पढ़ाई जरूरी है, बल्कि खेलकूद भी जरूरी है, जैसा कि जापानी स्कूलों में होता है, बच्चों का अपने आसपास की सफाई का काम करना भी जरूरी है, उनमें रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, और लीडरशिप की संभावनाओं को देखना भी जरूरी है। और इन सबके लिए इन बच्चों के दिल-दिमाग से पढ़ाई के बोझ को घटाना भी जरूरी है। हर दिन बच्चों के पास कुछ घंटे उनकी हॉबी के लिए, सामान्य ज्ञान के लिए, उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए, उन्हें सामाजिक सरोकार सिखाने के लिए, और उन्हें किताबों से परे की समझ देने के लिए भी लगाने चाहिए। भारत में इम्तिहानों में एक-एक नंबर को लेकर, और क्लास में या स्कूल में अव्वल आने को लेकर जिस तरह का दबाव बच्चों पर डाला जाता है वह उनके शारीरिक-मानसिक विकास, और उनके व्यक्तित्व-विकास सभी को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में स्कूली इम्तिहान में नंबरों के बजाय ग्रेड देने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि बच्चे एक-एक नंबर के मुकाबले में न लगे रहें, और बचपन से किशोरावस्था तक की उम्र में वे दुनिया की दूसरी बहुत सी अच्छी बातों को समझ और सीख भी सकें। भारत पहले पढ़ाई के इम्तिहान में उलझा रहता है, और उसके तुरंत बाद किसी जगह दाखिले के मुकाबले के इम्तिहान में। यह देश अपने बच्चों को न तो ज्ञान दे पा रहा है, न समझ दे पा रहा है, इन्हें महज एक मुकाबले में लगातार जोतकर रख रहा है, यह नौबत किसी का भला नहीं करती।

सब कुछ काबू में रखने की हसरत ने इस तरह मौत दिलाई मां-बाप को

आजकल
13 फरवरी 2017  
पिछले कुछ दिनों से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, और बंगाल की पुलिस एक नौजवान से जूझ रही हैं जिसने पहले तो भोपाल में अपनी पत्नी का कत्ल करके एक बुरी शोहरत हासिल की, और फिर पूछताछ में जिसने कहा कि वह तो रायपुर में अपने मां-बाप को भी मारकर दफनाकर आया है। पहले तो उसकी बातें सिरफिरों सी लगी, लेकिन जब पुलिस ने आकर उसके बेचे हुए मकान के आंगन में उसकी बताई जगह पर खुदाई की, तो दो लोगों के कंकाल मिले, जिनमें एक महिला की चूडिय़ां और बाकी गहने भी थे, और अब यह बात संदेह से परे सही लगती है कि उसने जो कहा वह सचमुच किया था।
 दुनिया ऐसी औलाद को जितना कोस सकती है, उतना कोस रही है, लेकिन उससे परे कि एक बात यह दिखती है कि ऐसे जुर्म में पडऩे के पहले इस नौजवान की जिंदगी में कुछ ऐसा वक्त आया जिसने उसे ऐसे जुर्म की तरफ धकेल भी दिया। हम यह तो नहीं कहते कि ऐसे वक्त और लोगों की जिंदगी में नहीं आते, और वे सारे के सारे ऐसे ही जुर्म करने लगते हैं, लेकिन इस नौजवान की बताई बातों से जो सामने आता है, उस पर तमाम लोगों को कुछ सोचने की जरूरत भी है।
इसने बताया कि यह गणित पढऩा नहीं चाहता था, यह इंजीनियरिंग में जाना नहीं चाहता था, लेकिन मां-बाप ने दबाव डालकर उसे इंजीनियरिंग के कोर्स में डाला, और नतीजा यह हुआ कि वह फेल होते चले गया। परिवार का दबाव कि वह पास होकर इंजीनियरिंग के काम में लगे, और उसने मजबूरी में घर पर झूठ कहा कि वह पास हो गया। मां-बाप ने जब दबाव डाला कि वह डिग्री लेकर आए ताकि उसकी कहीं नौकरी लगवाई जाए, तो उसने मां-बाप को मार डालना तय किया ताकि चैन से रह सके।
इस नौजवान के दिल-दिमाग में गणित की दहशत, और पढ़ाई नापसंद होने की नफरत तो रही होगी, और हो सकता है कि उसके साथ-साथ कुछ हिंसा भी उसके भीतर रही हो। लेकिन आज हर किसी को यह सोचना चाहिए कि बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ धकेलने का क्या-क्या नतीजा हो सकता है। हो सकता है कि ऐसे तमाम बच्चे हिंसक न हों, लेकिन उन पर नकारात्मक असर तो पड़ता ही है। ऐसे असर से हिंसा से परे भी लोग अपनी जिंदगी में कुंठा और तनाव से लद जाते हैं, और कभी भी अपनी स्वाभाविक मंजिल तक नहीं पहुंच पाते, सारी संभावनाओं को नहीं छू पाते।
आज जब 12 फरवरी को मैं यह बात लिख रहा हूं, तब बाजार वेलेंटाइन डे की सजावट में दिख रहा है। प्रेमी-प्रेमिका और दोस्त एक-दूसरे के लिए तोहफे लेने की तैयारी में हैं, और 14 फरवरी को बहुत से लोग अपनी चाहत से मिलेंगे। लेकिन हर दिन ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि मां-बाप कहां-कहां पर प्रेमी-प्रेमिका को मार डाल रहे हैं, शादी हो जाने के बाद भी मार डाल रहे हैं, और कितनी जगहों पर प्रेमी जोड़े आत्महत्या कर रहे हैं, क्योंकि जालिम जमाना, और उससे भी जालिम मां-बाप उन्हें साथ रहने ही नहीं देंगे। अलग-अलग जीने से बेहतर लोग मर जाना समझ रहे हैं।
हिन्दुस्तानी लोग आसपास के तमाम दायरे पर काबू बनाए रखने के बावलेपन के शिकार रहते हैं। बहुत से परिवारों में कॉलेज पहुंच चुके बच्चों के कपड़े भी मां-बाप तय करते हैं, स्कूल की उनकी पढ़ाई के विषय तो तय किए ही रहते हैं, कॉलेज का दाखिला भी वे तय करते हैं, और बाद में किससे शादी करनी है यह तो तकरीबन सारे ही हिन्दुस्तानी मां-बाप अपना विशेषाधिकार समझते हैं। नतीजा यह होता है कि इस देश में प्रेम एक गंदा शब्द करार दिया जा चुका है, और यह हिन्दुस्तान प्रेम और श्रृंगार रस से भरे हुए अपने उस इतिहास को भी अनदेखा कर देना चाहता है जिस दौर में प्रेम सिर चढ़कर बोलता था, और कृष्ण की प्रेमकथाएं करोड़ों तस्वीरों में खुलासे से दर्ज हैं, इंसानों के बीच प्रेम खुलासे से मंदिरों की दीवारों पर तराशा गया है, और इस देश में भगवानों से लेकर इंसानों तक का प्रेम पौराणिक कथाओं से लेकर ताजा इतिहास तक खूब दर्ज है।
लेकिन आज अपनी अगली पीढ़ी पर काबू करने की दीवानगी वाली पुरानी पीढ़ी मजदूर की पीठ पर लदे बोरे की तरह सवार है, और बच्चों की हसरत को पूरा करने की कोई नीयत मां-बाप की नहीं रहती। अब ऐसे में अगर गणित से डरे हुए, और इंजीनियरिंग से नफरत करने वाले एक नौजवान की दहशत इतनी बढ़ती चली गई कि उसने मां-बाप को ठिकाने ही लगा दिया, कि न रहें मां-बाप, और न रहे गणित, तो ऐसे में क्या यह वारदात बाकी लोगों के लिए एक सबक नहीं रहना चाहिए?
हफ्ते भर से मैं इस मुद्दे पर लिखने की फिराक में था, कि आज सुबह एक दूसरी रिपोर्ट सामने आई।
अमेरिका की पिट्सबर्ग यूनिवर्सटी के शोधकर्ताओं मुताबिक- 'स्कूल में बच्चों के अच्छे या खराब प्रदर्शन के जिम्मेदार महज बच्चे ही नहीं बल्कि उनके मां-बाप भी हैं। इसलिए अगर आपका बच्चा स्कूल में अच्छा परफॉर्म नहीं कर रहा तो उसे डांटने के बजाय बतौर मां-बाप आपको सोचना होगा कि आप कहीं गलत ढंग से पेश तो नहीं आ रहे हैं। मां-बाप द्वारा बच्चों को शारीरिक दंड देना या उनके साथ डांट-डपट करना भी इनके खराब प्रदर्शन का कारण हो सकता है।  जिन बच्चों को मां-बाप की लताड़ और सख्ती का सामना करना पड़ता है वे पढ़ाई की जगह सेक्स और अपराध में लिप्त हो जाते हैं। यह देखा गया कि सख्त माहौल में पले-बढ़े 7वीं कक्षा में पढऩे वाले बच्चे दो साल बाद मां-बाप के नियम कायदों के सामने अपने साथियों और दोस्तों को अधिक अहमियत देने लगते हैं। ग्यारहवीं कक्षा तक आते-आते ये बच्चे जोखिम मोल लेने लगते हैं। लड़कियों का झुकाव जहां सेक्स की ओर नजर आने लगता है तो लड़कों की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती है।'
हिन्दुस्तान में मां-बाप खासकर इस बारे में अधिक सोचने की जरूरत है क्योंकि मां-बाप की मर्जी से बच्चे पढ़ लें, शादी कर लें, तो भी उसके बाद मां-बाप इस बात पर भी काबू रखना चाहते हैं कि औलाद कब अपनी खुद की औलाद पैदा करे, और कितनी पैदा करे, उसमें लड़के कितने हों, और लड़कियां कितनी हों। सब कुछ काबू में रखने की हिन्दुस्तानी मां-बाप की हसरत इस देश की नई पीढ़ी को अपनी स्वाभाविक संभावनाओं को छूने भी नहीं देती है।

मातृ-पितृ दिवस मनाने का यह ताजा पाखंड खत्म किया जाए

संपादकीय
12 फरवरी 2017


दो दिन बाद प्रेम का त्यौहार वेलेंटाइन डे आ रहा है, और इसके लिए प्रेमी दिलों ने फूलों और तोहफों की तैयारी कर रखे हैं, दूसरी तरफ प्रेम से नफरत करने वालों ने प्रेमियों को मारने के लिए लाठियों को तेल पिला रखा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में प्रशासन और पुलिस गुंडों को रोकने और जेल भेजने के बजाय बाग-बगीचों से लड़के-लड़कियों को, दोस्तों और प्रेमी जोड़ों को बाहर रखने के लिए हथियार लेकर जवान तैनात कर रखेंगे। नतीजा यह है कि गुंडागर्दी रोकने के बजाय, नफरत और हिंसा रोकने के बजाय, सरकार की पूरी ताकत प्रेम को रोकने में झोंक दी जाएगी।
इस राज्य में कुछ बरस पहले, उस वक्त बापू कहलाने वाले, और अब आसाराम रह गए एक आदमी ने सरकार को सलाह दी थी कि वेलेंटाइन डे को मनाना बंद करके 14 फरवरी के इस अंग्रेजी तारीख वाले त्यौहार के दिन मातृ-पितृ दिवस मनाया जाए। चूंकि उस वक्त आसाराम, बापू भी कहलाता था इसलिए सरकार ने उसके पांव छूते हुए वह राय मान ली थी, और सरकारी स्तर पर, सरकारी खर्च पर, स्कूलों में यह नए मुखौटे वाला त्यौहार शुरू हो गया था। यह फेरबदल करते हुए सरकार ने किसी भी समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक से यह सलाह नहीं ली थी कि नौजवान पीढ़ी को, लड़के-लड़कियों को अगर स्वाभाविक प्रेम से रोका जाएगा, तो उनके मानसिक विकास पर क्या फर्क पड़ेगा। यह देश इसी तरह के धर्मान्ध पाखंडियों की राय पर अपनी रीति-नीति बदलते रहता है, और यही वजह है कि नौजवान पीढ़ी से लेकर बच्चों तक को अंतहीन बलात्कारों का शिकार होना पड़ता है, कुंठाओं में जीना पड़ता है, और अपनी स्वाभाविक संभावनाओं से कोसों पीछे रहकर मन मारकर दूसरे सभ्य देशों को हसरत से देखना पड़ता है।
इस देश के इतिहास में इस किस्म की इतनी बड़ी मूर्खता कभी नहीं हुई थी कि नौजवान लड़के-लड़कियों को प्रेम से रोका जाए। सैकड़ों बरस पहले का संस्कृत साहित्य प्रेम की कहानियों से, प्रेम की बातों से ऐसा लबालब है कि उसमें से मादक रस टपकते ही रहता है। एक तरफ तो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति, और अपनी संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति के ठेकेदार लाठियां लेकर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, और दूसरी तरफ अपने ही देश के सांस्कृतिक इतिहास में प्रेम की जो लंबी परंपरा रही है, कृष्ण के गोपियों के साथ रास की जो कविताएं, जो तस्वीरें सैकड़ों बरस से चली आ रही हैं, उन सबको अनदेखा करके प्रेम को कुचलना भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म साबित किया जा रहा है।
नौजवान दिलों की भावनाओं को कुचलकर उससे उनके मां-बाप के लिए सम्मान का प्रतीक चिन्ह नहीं गढ़ा जा सकता। इंसान की जिंदगी में मां-बाप की जरूरत भी होती है, बच्चों की जरूरत भी होती है, और प्रेम या/ और सेक्स की जरूरत भी होती है। इनमें से कोई भी जरूरत एक-दूसरे का विकल्प नहीं होती, जिस तरह जिंदगी मौत का विकल्प नहीं होती, मौत जिंदगी का विकल्प नहीं होती, भजन भोजन का विकल्प नहीं होता, और भोजन भजन का विकल्प नहीं होता। जिंदगी में हर बात की अलग-अलग जगह और जरूरत होती हैं। इनको एक-दूसरे से गड्डमड्ड करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जिस आसाराम ने वेलेंटाइन डे के खिलाफ, नौजवानों के प्रेम के खिलाफ बकवास की थी, वही आसाराम मन में कैसी हिंसक भावनाएं रखता था, यह उसके बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्ची के बयान में खुलकर सामने आया है। छत्तीसगढ़ सरकार को बिना देर किए हुए भारतीय संस्कृति को कुचलने वाले ऐसे मातृ-पितृ दिवस की इस ताजा-ताजा परंपरा को तुरंत खत्म करना चाहिए। और इसके साथ ही प्रेम के ऐसे दिनों पर होने वाली गुंडागर्दी को भी खत्म करना चाहिए जो कि हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व, और भारतीय संस्कृति, इन सबको बदनाम करती है। नौजवान अगर प्रेम नहीं कर पाएंगे, तो कुंठा और भड़ास में वे हिंसा की तरफ बढ़ेंगे। सरकार को अपने ऐसे अवैज्ञानिक फैसले को बिना अधिक देर किए हुए वापिस लेना चाहिए। मां-बाप की इज्जत करने के लिए प्रेमी दिलों की इज्जत का कत्ल जरूरी नहीं है। और जहां तक एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी की बात है, तो किसी भी दिन बाग-बगीचे में, तालाब के किनारे जाकर बैठने वाले प्रेमियों को रोकने के बजाय सरकार को अपनी बंदूकें उन गुंडे-मवालियों पर ताननी चाहिए जो कि धर्म और सांस्कृतिक इतिहास का नाम लेकर अपनी दुकानदारी चलाते हैं, और हिंसा करते हैं। सरकार को तो यह खुली मुनादी करनी चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर शिष्टता की सीमा में मिलने वाले सारे लोगों को सुरक्षा दी जाएगी।

छत्तीसगढ़ में बैंक खाते से हुई साइबर ठगी, प्रशिक्षण जरूरी

संपादकीय
11 फरवरी 2017


छत्तीसगढ़ में एक किसान को जमीन का मुआवजा मिला और उसने बैंक से मोबाइल फोन के मार्फत काम करने का एप्लीकेशन भी किसी के कहे डाउनलोड कर लिया। नतीजा यह हुआ कि किसी और ने उसके फोन से साढ़े 13 लाख रूपए निकाल लिए, और यह दिव्यांग बुजुर्ग अब लुटा हुआ बैठा है। आज जिस रफ्तार से देश के लोगों को डिजिटल भुगतान की तरफ, कैशलेस भुगतान की तरफ ले जाया जा रहा है, और नगदी को कम करने की कोशिश चल रही है, उसमें केन्द्र और राज्य सरकारें बड़ी रफ्तार से लोगों को मोबाइल फोन और इंटरनेट से बैंकिंग के फायदे सिखा रही हैं। लेकिन न सिर्फ कम पढ़े-लिखे लोग, न सिर्फ बुजुर्ग लोग, बल्कि देश की तमाम पीढिय़ों में अधिकतर ऐसे लोग हैं जो कि साइबर-सुरक्षा की जरूरतों से वाकिफ नहीं हैं। बहुत से लोग तो फोन की स्क्रीन तक लॉक करना नहीं जानते, और बहुत से लोग किसी आम कम्प्यूटर पर भी अपने ईमेल या दूसरे अकाउंट खुले छोड़कर चले जाते हैं।
दरअसल कोई भी तकनीक लोगों के हुनर के एक स्तर के साथ ही कारगर रहती है। आज लोग जिस बात के लिए तैयार नहीं हैं, उसे केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें नोटबंदी के एक तार्किक विस्तार की तरह बढ़ा रहे हैं, और नोटबंदी को कामयाब साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं हो सकता। लोग रात-दिन ठगी के शिकार भी हो रहे हैं, और उनकी जिंदगी भर की कमाई मिनटों में साफ हुई जा रही है। हमने कुछ समय पहले भी इसी मुद्दे को लेकर लिखा था कि भारत सरकार जिस आक्रामक अंदाज में देश को डिजिटल बनाना चाहती है, और लोगों को बिना नगदी के काम करने की तरफ धकेल रही है, उसे चाहिए कि हर किस्म की साइबर ठगी के खिलाफ लोगों का बीमा करवाए। आज लोग मजबूरी में तरह-तरह के मोबाइल एप इस्तेमाल कर रहे हैं, भुगतान के तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं, और उनको न तो इनकी विश्वसनीयता मालूम है, न ही वे अपने खुद के पासवर्ड हिफाजत से रख सकते। हर दिन देश में कहीं न कहीं एटीएम पर दूसरों की मदद से नगदी निकालने वाले लोग ठगी के शिकार होते हैं, और वे अपना एटीएम कार्ड तक ठीक से इस्तेमाल नहीं कर सकते, ऐसे में रातों-रात लोग डिजिटल-शिक्षित नहीं हो सकते।
राज्य सरकारों को भी यह चाहिए कि अपनी आबादी को भी वे साइबर-सावधानी सिखाएं, और इसके लिए बड़े पैमाने पर बैंकों के बाहर, एटीएम पर, और सार्वजनिक जगहों पर प्रशिक्षण देना होगा, वरना लोगों का भरोसा इस नई तकनीक से तेजी से उठने भी लगेगा। छत्तीसगढ़ में एक किसान जिस तरह से ठगी का शिकार हुआ है, वैसे अनगिनत मामले सामने आ सकते हैं, और हो सकता है कि ऐसे जुर्म हो भी रहे हों, और लोगों को आज पता न चल रहा हो।

उमा भारती का यह बयान उन्हें कटघरे तक ले जाने को काफी

संपादकीय
10 फरवरी 2017


मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं, और फिर साम्प्रदायिक दंगे के एक अदालती मुकदमे की वजह से इस्तीफा देने पर मजबूर हुईं उमा भारती ने अपने कार्यकाल को लेकर उत्तरप्रदेश की एक चुनावी सभा में एक मंच से कहा कि जब वे मुख्यमंत्री थीं तो बलात्कारियों को पीडि़ता के सामने तब तक टॉर्चर किया जाता था जब तक वे रहम के मामले में भीख न मांगने लगें। उन्होंने बताया कि जब एक पुलिस अफसर ने उनके ऐसा करवाने पर आपत्ति की थी तो उन्होंने उस अफसर से कहा था कि ऐसे दानवों का कोई मानवाधिकार नहीं होता, और रावण की तरह उनके भी सिर काट दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि बलात्कारियों को उल्टा लटकाकर तब तक पीटना चाहिए जब तक कि उनकी चमड़ी न उतर जाए, और उसके बाद उनके घावों पर नमक-मिर्च छिड़कना चाहिए। उमा भारती आज केन्द्रीय मंत्री हैं, जिन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा से काम करने की शपथ के साथ पद सम्हाला है। वे उत्तरप्रदेश में बलात्कार की घटनाओं पर वहां की सपा सरकार को काम करने का तरीका समझा रही थीं।
उमा भारती शुरू से एक साध्वी के रूप में जानी जाती हैं। वे हिन्दू धर्म से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने का आव्हान करने वाले भाजपा के बड़े नेताओं में वे भी शामिल थीं, और जब मस्जिद गिराई जा रही थी, तब मंच और माईक पर उमा भारती भी थीं, और 1992 से चल रहे इस अदालती केस में उमा भारती भी एक आरोपी हैं, और मस्जिद के गिरते वक्त उनके खुशी से उछलते-कूदते और मुरली मनोहर जोशी के कंधे पर लटकते वक्त की तस्वीरें इंटरनेट की मशहूर तस्वीरों में से एक हैं। उमा भारती जब मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, तब भी वे संविधान की शपथ लेने के बाद काम कर रही थीं, हालांकि यह एक अलग बात है कि उस वक्त उन्होंने मुख्यमंत्री की टेबिल को एक मंदिर बनाकर रख छोड़ा था।
अब सवाल यह उठता है कि बलात्कार के आरोप में पकड़े गए किसी व्यक्ति को अगर उमा भारती ऐसी सजा दिलवाती थीं, तो उनके मध्यप्रदेश में किसी अदालत की जरूरत ही क्या थी? जब किसी को आरोप लगते ही इस तरह से हिंसक सजा सड़क पर ही देनी है, तो फिर मुख्यमंत्री ही प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश भी हो सकते हैं। उमा भारती का यह कहना उनके खिलाफ एक बड़े सुबूत की तरह इस्तेमाल करके उन्हें कटघरे में खड़ा करने के काम में लाया जा सकता है। अब इंसाफ के इसी पैमाने को अगर देखें, तो बाबरी मस्जिद गिराने के जुर्म में आज तक उमा भारती पर जो मुकदमा चल रहा है, क्या 6 दिसंबर 1992 के उस दिन जो लोग जाहिर तौर पर उस जुर्म में शामिल थे, उन पर किसी मुकदमे की जरूरत नहीं है, और उन तमाम नेताओं को क्या उमा भारती की सोच के मुताबिक सड़कों पर ही तुरंत सजा नहीं दे दी जानी चाहिए थी?
लोकतंत्र में एक दिक्कत यह है कि धर्म से जुड़े हुए ऐसे लोग जब सत्ता पर काबिज होते हैं जो कि संविधान से ऊपर अपने धर्म को मानते हैं, तो उनकी यह अलोकतांत्रिक सोच उनके बाकी बर्ताव को भी तय करने लगती है। उमा भारती के तौर-तरीके कभी भी लोकतांत्रिक नहीं रहे, कभी भी वे इंसानियत से भरे हुए भी नहीं रहे, कभी वे किसी पुलिस अफसर को थप्पड़ मारती हैं, तो कभी किसी और को धमकाती हैं। साम्प्रदायिक बातें तो वो करती ही हैं, और संविधान की शपथ पर उनकी कोई आस्था कभी दिखती नहीं है। लोकतंत्र में धर्मान्धता, धार्मिक कट्टरता, और साम्प्रदायिकता से भरे हुए लोग ऐसा ही अलोकतांत्रिक बर्ताव करते हैं, और देश में आज ऐसे लोगों को खारिज करने की जरूरत है। दिक्कत यह है कि ऐसे लोग उस बहुमत के सहारे जीतकर सत्ता में आते हैं, जिन्हें लोकतंत्र की समझ नहीं है, और जिन्हें कट्टरता के झांसे में आसानी से लाया जा सकता है। ये सारे लोग लोकतंत्र के सारे फायदे उठाते हुए उसे खत्म करने में लगे रहते हैं, और देश में आज नेहरू की तरह के हौसलामंद नेता भी नहीं है, जो कि ऐसे धर्मान्ध लोगों को उजागर कर सकें।

राजनीति में कटुता के चलते कहावत-मुहावरे भी मुश्किल

संपादकीय
9 फरवरी 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में कल पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर एक हमला करते हुए कहा कि वे चालीस बरस तक देश के आर्थिक नीति निर्धारण के केन्द्र में रहे, और इतने बड़े-बड़े घोटाले होते गए। उन्होंने मनमोहन सिंह के बारे में कहा कि वे बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाना अच्छी तरह जानते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने कल संसद छोड़ दी, और आज वह इसे लेकर राज्यसभा में नारेबाजी कर रही है। कांग्रेस इसे लेकर प्रधानमंत्री से मांग कर रही है कि वे अपने शब्द वापिस लें, और माफी मांगें।
आज देश की राजनीतिक हवा में जहर देश की असल हवा से कहीं अधिक घुला हुआ है। दिल्ली या प्रदूषण के शिकार इलाहाबाद जैसे दूसरे शहरों की हवा कितनी भी जहरीली हो, संसद और विधानसभाओं में एयरकंडीशनिंग के बावजूद, राजनीतिक दलों के भाषणों और पत्रवार्ताओं में जहर कारखानों के जहर से अधिक घुला हुआ है। नतीजा यह है कि किसी का मुंह खुलता नहीं है कि उसका राजनीतिक जवाब सोचना और देना शुरू हो जाता है। तमाम राजनीतिक दल इसी काम में लगे हैं और मुद्दे की बात धरी रह जाती है। कल प्रधानमंत्री ने जो कहा वह बात एक कहावत या मुहावरे जैसी अधिक थी, और एक हकीकत भी थी। मनमोहन सिंह दस बरस प्रधानमंत्री रहे, और अपने कम से कम दूसरे कार्यकाल में तो वे लगातार भ्रष्टाचार के मूक गवाह बने रहे, और उन्होंने देश को डूब जाने दिया। किसी मंत्रिमंडल का मुखिया मीडिया में अपनी सरकार के भ्रष्टाचार की अंतहीन खबरों को देखते हुए भी अनजान और निर्लिप्त नहीं बने रह सकता। कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूते रहने का हक कमल को तो मिल सकता है, किसी प्रधानमंत्री को नहीं। इसलिए मोदी की इस बात में सच्चाई तो थी कि मनमोहन सिंह अपनी इस लंबी आर्थिक भूमिका के दौरान होते भ्रष्टाचार से अनजान बने रहे। प्रधानमंत्री बनने के पहले वे वित्तमंत्री रहे, सरकार में सचिव रहे, आरबीआई के गवर्नर रहे, और अनगिनत आर्थिक नीतियों के पीछे उनका हाथ रहा। ऐसे में वे अपने दशकों के कार्यकाल के भ्रष्टाचार से अनजान बने रहने का दावा तो बिल्कुल ही नहीं कर सकते। हमने यूपीए के कार्यकाल के दौरान यह बार-बार लिखा था कि मनमोहन सिंह की जगह अदालती कटघरे से होते हुए जेल की दिखती है, यह अलग बात है कि अब तक उसकी नौबत नहीं आई है। जब कोई इंसान देश और सरकार की सेवा करने की संवैधानिक शपथ लेते हैं, तब उनकी निजी ईमानदार बने रहना कोई मायने नहीं रखता, अगर उनके मातहत एक गिरोह की तरह काम करते हैं।
देश की राजनीति में गंदी, ओछी, और भड़काऊ बातें बहुत सी हो रही हैं, कम से कम संसद की यह एक बात सदन छोडऩे जैसी नहीं थी, और कांग्रेस ने मानो एक बहाना ढूंढकर सदन छोड़ दिया। नरेन्द्र मोदी इससे बुरी बहुत सी और बातें कहते आए हैं, उन्होंने शशि थरूर के मामले में सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात भी कही थी, और कई दूसरे लोगों पर ओछे हमले किए थे, लेकिन वैसी बातों का वैसा ही जवाब दूसरे लोगों ने भी उनको दे दिया था। हम ऐसी किसी भी बात को सही नहीं मानते, लेकिन मनमोहन सिंह चूंकि निजी जीवन में ईमानदार माने जाते हैं, इसलिए उनके कार्यकाल के, उनके मातहत, उनके काबू के कामकाज में हुए घोटालों को लेकर भी उनके बारे में कुछ न कहा जाए, यह फिजूल की बात है। इतिहास भी मनमोहन सिंह से हमेशा इस बात का जवाब मांगता रहेगा, भले मनमोहन सिंह अपने खुद के बारे में, अपने को रियायत देते हुए यह कहते रहें कि इतिहास उनके प्रति अधिक नर्मी बरतेगा। इस देश का कोई प्रधानमंत्री, कोई मंत्री या मुख्यमंत्री अपने मातहत होते भ्रष्टाचार का मुखिया बने रहकर किसी नर्मी की उम्मीद न करे, और जेल जाने को तैयार रहे।
आज राजनीति में कटुता इतनी बढ़ गई है कि मुद्दे की बात धरी रह जाती है, और कुछ शब्दों को लेकर लाठियां चलने लगती हैं। हमारा यह मानना है कि बात ठोस बात पर होना चाहिए, संसद का पिछला सत्र इस मुद्दे पर खत्म हो गया कि प्रधानमंत्री उसमें आ नहीं रहे हैं, आ रहे हैं तो बोल नहीं रहे हैं, और अब बोल रहे हैं तो बोलते हैं कि बोलता है।

कोल्ड स्टोरेज के बजाय गांवों में फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगें...

संपादकीय
8 फरवरी 2017


राज्य सरकार खेतों में छोटे-छोटे फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की नीति बना रही है ताकि खेतों की उपज सड़कों पर न फेंकना पड़े। छत्तीसगढ़ पिछले कई बरसों से टमाटर की ऐसी बर्बाद होती हुई फसल देख रहा है, और अब इस बरस तो कई तरह की दूसरी सब्जियां भी सड़कों पर फेंकी गई हैं। पिछले दिनों राज्य शासन ने ऐसा इरादा जाहिर किया था कि फसलों को बचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएंगे, और तब हमने यह सलाह दी थी कि महंगी बिजली पर चलने वाले कोल्ड स्टोरेज सस्ती सब्जी को रखने में बड़े महंगे पड़ेंगे, और उसके बजाय सरकार को फूड प्रोसेसिंग इकाईयां लगानी चाहिए।
उस समय हमने यह लिखा था- एक ऐसा मोड़ है कि सरकार को बाजार के साथ मिलकर यह भी सोचना चाहिए कि इसे खर्चीले कोल्ड स्टोरेज बनाने हैं, या कि फल-सब्जियों और वनोपज की प्रोसेसिंग करने वाले छोटे-बड़े कारखाने? कोल्ड स्टोरेज में किसी सामान को रखना दो हिसाब से खर्चीला होता है, एक तो किसान को तुरंत दाम नहीं मिल पाते और उसके बैंक-कर्ज का ब्याज बढ़ते रहता है, और दूसरी बात यह कि उसे कोल्ड स्टोरेज में उपज रखने का भाड़ा देते रहना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि एक वक्त के बाद इस भाड़े को मिलाकर लागत इतनी बढ़ जाती है कि किसान कहीं के नहीं रहते। अभी पिछले हफ्ते ही उत्तरप्रदेश में कुछ जगहों से खबरें आई हैं कि किराए से थके हुए किसानों या व्यापारियों ने कोल्ड स्टोरेज से आलू निकालकर सड़कों पर फेंक दिए और उनके सडऩे से भयानक बदबू फैली और बीमारी फैलने का खतरा खड़ा हो गया है। छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है कि सब्जी का यही हाल होने लगे, और किसान आज तो सड़कों पर सब्जी फेंक रहे हैं, या कि मुफ्त में बांट रहे हैं, कल वे कोल्ड स्टोरेज के भी कर्जदार हो जाएंगे।
हमारी सीमित समझ यह कहती है कि दूध, फल-सब्जी, या वनोपज सरीखे सामानों की प्रोसेसिंग के छोटे-बड़े कारखाने अगर राज्य में लगाए जाते हैं, तो उससे स्थानीय रोजगार तुरंत खड़े होंगे, और उपज में इतना वेल्यूएडिशन हो जाएगा कि उससे किसान को दाम ठीक मिलेंगे, और कुछ कारोबारी भी उससे कमा सकेंगे। ऐसी औद्योगिक इकाईयों में लागत भी कम आएगी, और उससे आसपास के इलाकों में फल-सब्जी उगाने का काम एक कमाऊ कारोबार भी हो सकेगा। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि ऐसी प्रोसेसिंग इकाईयों का मतलब यह नहीं होता है कि राज्य के भीतर बड़े ब्रांड विकसित हों, और उसके बिना ये इकाईयां किसी काम की न हों। होता यह है कि ऐसी इकाईयां एक कच्चा माल तैयार करती हैं, और इसे बाहर की बड़ी कंपनियां ले जाकर ग्राहक के लायक प्रोडक्ट बनाकर बेचती हैं।
राज्य के भीतर से कोयला निकालकर अगर दूसरे राज्य में ले जाकर बिजली बनाई जाती, तो छत्तीसगढ़ को अधिक कमाई नहीं होती। इस राज्य से लौह अयस्क बाहर ले जाकर बेचा जाता है, तो उससे राज्य को बहुत कम पैसा मिलता है। लेकिन जब कारखाने यहां लग जाते हैं, तो ऐसे वेल्यूएडिशन से कमाई एकदम से बढ़ जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि राज्य के भीतर अलग-अलग इलाकों की पहचान करके ऐसे केन्द्र तैयार करें जहां पर आसानी से फल-सब्जी पहुंचाए जा सकें, और वहां से कच्चा माल भी आसानी से बाहर निकल सके। हमारा ख्याल है कि ऐसी योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार का भी भरपूर अनुदान है, और इसे बिना देर किए करना जरूरी है ताकि प्रदेश के फल-सब्जी किसान इस काम को बंद करने की न सोचने लगें। कोल्ड स्टोरेज की सोच उन उपजों के लिए ठीक हो सकती है जिनका बाजार भाव इतना अधिक रहता है कि उन्हें किराया देकर भी रखना फायदे का साबित हो। हमको यह नहीं लगता कि टमाटर-गोभी जैसी सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखना मुनासिब होगा, यह किसान को एक और कर्ज में धकेलने का काम हो सकता है, इसके बजाय सरकार को कारखाने लगाना चाहिए।
अब यह एक अच्छी बात है कि सरकार सब्जियों के लिए, या दूसरे किस्म की उपज के लिए फूड प्रोसेसिंग प्लांट को बढ़ावा देने की नीति बना रही है। छत्तीसगढ़ में वनोपज से लेकर औषधीय और सुगंध के पौधों और जड़ी-बूटियों की भरमार है, और इन सबमें वेल्यूएडिशन की संभावनाओं को तलाशकर राज्य के लोगों को बहुत आगे ले जाया जा सकता है।

भारतीय फौज भ्रष्टाचार से परे नहीं, जवाबदेह तो रहे

संपादकीय
7 फरवरी 2017


सीबीआई ने एक जांच शुरू की है कि भारतीय फौज पाकिस्तान की सरहद पर जिन जमीनों का किराया दे रही है, उनमें से कई जमीनें तो पाक अधिकृत कश्मीर की हैं। अब ऐसे में उन जमीनों का किराया देने के नाम पर पहली नजर में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उसकी जांच से फौज की साख पर एक आंच तो आती ही है। दूसरी तरफ, अभी दो दिन पहले एक खबर आई कि भारतीय सेना के एक ट्रिब्यूनल ने 26 बरस पुराने एक मामले में फैसला दिया, और उस वक्त के एक नौजवान अफसर को दी गई सजा को खारिज किया। उस अफसर का कहना है कि सरहद पर फौज ने बड़ी तादाद में सोना जब्त किया था, जिसे अफसरों ने दबा दिया था, और इस अफसर ने जब दबाने का विरोध किया तो इसके खिलाफ कार्रवाई की गई। अब इतने दशक बाद जाकर मिलिट्री ट्रिब्यूनल ने उस वक्त की कोर्ट मार्शल की कार्रवाई को गलत ठहराया है, और इस अफसर को राहत दी है।
जब कभी फौज की बात आती है, तो लोग यह मान लेते हैं कि उसकी किसी भी तरह की आलोचना देशद्रोह है। फौज को लोग जांच से परे रखना चाहते हैं, आलोचना से परे रखना चाहते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन-जिन चीजों को जवाबदेही से परे रखा जाता है, उन सबमें खामियां पैदा होने लगती हैं। जहां रौशनी नहीं पड़ती, जहां चीजों को रहस्यमय या गोपनीय रखा जाता है, वहां गलत काम करने वालों का हौसला बढ़ता है। भारत की फौज हो या कि यहां कि पैरामिलिट्री, या किसी राज्य की पुलिस हो, वह लोकतंत्र से ऊपर नहीं हो सकती, और किसी तरह की गोपनीयता की छूट उसे रणनीति के तहत तो मिलनी चाहिए, लेकिन बाकी रोज के कामकाज में किसी ईमानदार को गोपनीयता की क्या जरूरत पड़ सकती है? फौज की खरीदी भ्रष्टाचार से भरी हुई रहती है, दूसरी तरफ फौज के भीतर से ही ऐसी शिकायतें आती हैं कि बड़े फौजी अफसरों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मातहत अफसरों की पत्नियों के शोषण में लग जाते हैं। फौज के रियायती सामान बेचने में भी बड़ा भ्रष्टाचार होता है, फौज से गोलियां चोरी होकर नक्सलियों और दूसरे आतंकियों तक पहुंचती हैं, और फौज की अपनी अंतरराष्ट्रीय खरीदी कैसे भयानक भ्रष्टाचार से भरी रहती है, यह बोफोर्स से लेकर हाल के हेलिकॉप्टर खरीदी तक सामने आया ही है।
फौज के प्रति एक सम्मान एक अलग बात है, लेकिन जिसका सम्मान हो, उससे कोई जवाब न लिया जाए यह तो जरूरी नहीं है। जब गांधी की बात होती है, तो गांधी को राष्ट्रपिता मानकर देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया है। लेकिन गांधी के अपने जीवन की खामियों या कमजोरियों को लेकर कौन-कौन से सवाल नहीं उठते? इतिहास में उनकी हर गलती या गलत काम को खुलासे से दर्ज किया जाता है। किसी महानता के लिए किसी गोपनीयता की जरूरत नहीं होती है। फौज में उसकी कार्रवाई की गोपनीयता तो जरूरी है, लेकिन उसकी बाकी बातों को महानता की आड़ में अनदेखा करना गलत है। कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक कितनी ही जगहों पर भारतीय सेना पर बलात्कार और बेकसूर की हत्या जैसी तोहमत लगती हैं, और कहीं-कहीं पर साबित भी होती हैं। फौज को ऐसी शिकायतों और उन पर मुकदमों से बचाने के लिए ऐसे इलाकों में एक अलग कानून बनाया गया है जिसे हटाने के लिए बरसों से आंदोलन चल रहा है। फौज को किसी पवित्र चीज की तरह अलग रखना ठीक नहीं है, और लोकतंत्र में हर किसी को जवाबदेह तो रहना ही चाहिए।