मोहब्बत से कई गुना रफ्तार से दुनिया में बढ़ रही है नफरत...

आजकल
20 फरवरी 2017  
इन दिनों सोशल मीडिया पर समाज के हालात को आंकने का एक पैमाना मान लिया जाता है क्योंकि जो बिल्कुल ही अनपढ़ हैं, या कि इंटरनेट और कम्प्यूटर से दूर हैं, उनके अलावा बाकी लोग सोशल मीडिया से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर भारतीय प्रधानमंत्री तक, और आईएस जैसे आतंकियों से लेकर दूसरे किस्म के धर्मान्ध लोगों तक, किसी का भी काम सोशल मीडिया के बिना चलता नहीं है। दो दिन पहले ही फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने यह लिखा है कि फेसबुक के इस्तेमाल से किस तरह चुनाव जीता जा सकता है, उन्होंने सोशल मीडिया को लेकर और भी बहुत सी बातें लिखी हैं।
ट्विटर पर लोग छोटे-छोटे एक-दो वाक्य में ही अपनी बात कह लेते हैं, और साथ में अपनी पसंद की कोई तस्वीर भी पोस्ट कर लेते हैं। अभी इस बहुत ही लोकप्रिय सोशल मीडिया को लेकर एक अध्ययन का यह नतीजा है कि 2012 से लेकर अब तक ट्विटर पर श्वेत नस्लवादी-राष्ट्रवादी लोग आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन के मुकाबले भी अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, और इन चार बरसों में वे छह गुना हो चुके हैं। यह बात जानने के लिए हिन्दुस्तान के लोगों को अमरीका के इस अध्ययन को जानने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हिन्दुस्तान के भीतर भी सोशल मीडिया पर गांधी के हिमायती जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उससे कई गुना रफ्तार से नफरतजीवी, गोडसेवादी बढ़ते जा रहे हैं। साम्प्रदायिक नफरत को बढ़ाने और फैलाने में हिन्दुस्तान के कई संगठन उसी अंदाज में जुटे हैं।
अब पश्चिमी देशों को अगर देखें, तो वहां पर हिटलर के समर्थक और नस्लवादी लोग, कट्टरतावादी और युद्धोन्मादी लोग लगातार अधिक मुखर और हमलावर होते चल रहे हैं, और वे सोशल मीडिया पर अपनी नफरत फैलाने में खासा वक्त भी लगाते हैं, और अपनी नस्ल के दूसरे नफरतजीवियों को साथ में जोड़ते भी चलते हैं। देखकर यही लगता है कि दुनिया में मोहब्बत जितने लोगों को जोड़ सकती है, उससे कई गुना अधिक जोडऩे का काम नफरत कर सकती है, जो कि नफरतजीवियों को आसपास ले आती है।
लोगों को याद होगा कि अभी एक-दो हफ्ते पहले ही ऐसी खबर आई है कि एक नई डेटिंग वेबसाईट ऐसी बनी है जो कि लोगों को नापसंद के आधार पर, नफरत के आधार पर एक-दूसरे से जोड़ती है। हेटर्स नाम की यह वेबसाईट उस पर आने वाले लोगों से हर छोटी-बड़ी चीज के लिए उनकी नापसंद पूछती है, और ऐसे करीब तीन हजार पैमाने और सवाल इसकी वेबसाईट पर रहते हैं, और लोग जितने चाहें उतने सवालों के जवाब देकर अपने व्यक्तित्व की बारीकियों को, अपनी सोच को वहां दर्ज करवा लेते हैं। इसके बाद वेबसाईट का कम्प्यूटर नापसंद और नफरत के आधार पर लोगों को जोड़ीदार सुझाता है, और एक सी नफरत रखने वाले लोग आसानी से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
जिस तरह सच और अफवाह के बीच एक बड़ा फासला रहता है कि सच जब तक अपने जूतों के तस्में बांधते रहता है, तब तक अफवाह शहर का फेरा लगाकर लौट आती है, ठीक उसी तरह का हाल मोहब्बत और नफरत का रहता है। खादी को पसंद करने वाले चार लोग एक-दूसरे से जब तक मिलने की सोचें, तब तक गोडसे  के हिमायती गांधी की गढ़ी हुई फर्जी तस्वीरों से उनको बदचलन साबित करते हुए सोशल मीडिया पर बमबारी कर चुके रहते हैं। नेहरू की वल्दियत को लेकर, राजीव गांधी और संजय गांधी की वल्दियत को लेकर इंटरनेट सोचे-समझे और गढ़े हुए झूठों से पटा हुआ है, और नफरतजीवी लोग अपने असली सोशल मीडिया अकाऊंट से भी ऐसी बातों को फैलाने में जरा भी नहीं झिझकते।
जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में यह कहा जाता है कि बुरे लोग चुनावों में इसलिए जीतकर आ जाते हैं क्योंकि अच्छे मतदाता वोट डालने नहीं जाते, और घर बैठे रह जाते हैं। ठीक वैसा ही हाल सोशल मीडिया पर भी है, भारत में इंसानियत और लोकतंत्र का भला चाहने वाले लोग भले वोटरों की तरह घर बैठे रहते हैं, और नफरत फैलाकर जंग का रास्ता साफ करने में लगे हुए लोग सोशल मीडिया पर समर्पित भाव से ओवरटाईम करते रहते हैं।
खुद फेसबुक इस बात को लेकर परेशान है कि उस पर पोस्ट होने वाली झूठी खबरों पर वह किस तरह काबू करे। वह इसके तकनीकी रास्ते भी ढूंढ रहा है, और उसके कर्मचारी भी इसमें लगे हैं कि फेक-न्यूज कही जाने वाली खबरें जब फेसबुक पर आएं, तो उनकी किस तरह शिनाख्त हो, और उन्हें किस तरह हटाया जाए। आज दिक्कत यह भी है कि परंपरागत मीडिया के अखबार भी अपने को चटपटा बनाने के लिए सोशल मीडिया पर तैरती हुई फर्जी और फरेबी खबरों और तस्वीरों के शिकार हो जा रहे हैं, और बड़े-बड़े अखबारों में भी इंटरनेट का झूठ बड़ी इज्जत की जगह पा लेता है।
आज यह वक्त अमरीका में लोगों की जागरूकता को देखकर उससे कुछ सीखने का है। वहां सत्ता पर आ गए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नफरतभरी बातों के खिलाफ, फैसलों के खिलाफ आम अमरीकी जनता जिस बड़े पैमाने पर चारों तरफ यह आंदोलन कर रही है कि यह राष्ट्रपति उनका नहीं है, वह देखने लायक है। लोकतंत्र में वोटरों का बहुमत किसी को सत्ता पर तो ला सकता है, लेकिन आबादी के कम या अधिक लोगों के पास यह हक फिर भी कायम रहता है कि वे सत्ता के फैसलों का खुलकर विरोध कर सकें। आज अमरीका में जनता और मीडिया इन दोनों ने मिलकर न सिर्फ वहां की सरकार के गलत फैसलों का जबर्दस्त विरोध किया है, बल्कि समाज के भीतर भी जो लोग नफरत बढ़ाने का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ अमन-पसंद लोग एक होकर लाखों की संख्या में सड़कों पर आ रहे हैं, जिससे कि समाज में बेहतरी की संभावनाएं जिंदा रह सकें।
आज दुनिया में हर समझदार और जिम्मेदार की यह जिम्मेदारी है कि इंटरनेट या किसी और जगह पर अगर जहर घोला जा रहा है, तो उसके खिलाफ वे सच की मदद से हवा साफ करने की कोशिश करें। अगर लोग आज जहर का विरोध नहीं करेंगे, तो वे आने वाले पीढ़ी को पिछली सदी का जर्मनी बनाकर जाएंगे, जब हिटलर ने नस्ल के आधार पर लाखों लोगों का कत्ल किया था। नफरत का जहर हवा में इतना घना छाता चला जाएगा, तो वह अगली कई पीढिय़ों को अपना शिकार बनाएगा। इसलिए आज जो लोग अपनी अगली पीढ़ी के लिए मकान-दुकान छोड़कर जाना काफी समझते हैं, उनको यह भी समझना चाहिए कि इसके साथ-साथ, और बल्कि इससे अधिक जरूरी यह है कि अपने बच्चों के लिए नफरत के जहर वाली हवा छोड़कर न जाएं, बल्कि अपनी पूरी कोशिश इस जहर को साफ करने और खत्म करने में लगाएं। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भवानी प्रसाद मिश्र और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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