सब कुछ काबू में रखने की हसरत ने इस तरह मौत दिलाई मां-बाप को

आजकल
13 फरवरी 2017  
पिछले कुछ दिनों से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, और बंगाल की पुलिस एक नौजवान से जूझ रही हैं जिसने पहले तो भोपाल में अपनी पत्नी का कत्ल करके एक बुरी शोहरत हासिल की, और फिर पूछताछ में जिसने कहा कि वह तो रायपुर में अपने मां-बाप को भी मारकर दफनाकर आया है। पहले तो उसकी बातें सिरफिरों सी लगी, लेकिन जब पुलिस ने आकर उसके बेचे हुए मकान के आंगन में उसकी बताई जगह पर खुदाई की, तो दो लोगों के कंकाल मिले, जिनमें एक महिला की चूडिय़ां और बाकी गहने भी थे, और अब यह बात संदेह से परे सही लगती है कि उसने जो कहा वह सचमुच किया था।
 दुनिया ऐसी औलाद को जितना कोस सकती है, उतना कोस रही है, लेकिन उससे परे कि एक बात यह दिखती है कि ऐसे जुर्म में पडऩे के पहले इस नौजवान की जिंदगी में कुछ ऐसा वक्त आया जिसने उसे ऐसे जुर्म की तरफ धकेल भी दिया। हम यह तो नहीं कहते कि ऐसे वक्त और लोगों की जिंदगी में नहीं आते, और वे सारे के सारे ऐसे ही जुर्म करने लगते हैं, लेकिन इस नौजवान की बताई बातों से जो सामने आता है, उस पर तमाम लोगों को कुछ सोचने की जरूरत भी है।
इसने बताया कि यह गणित पढऩा नहीं चाहता था, यह इंजीनियरिंग में जाना नहीं चाहता था, लेकिन मां-बाप ने दबाव डालकर उसे इंजीनियरिंग के कोर्स में डाला, और नतीजा यह हुआ कि वह फेल होते चले गया। परिवार का दबाव कि वह पास होकर इंजीनियरिंग के काम में लगे, और उसने मजबूरी में घर पर झूठ कहा कि वह पास हो गया। मां-बाप ने जब दबाव डाला कि वह डिग्री लेकर आए ताकि उसकी कहीं नौकरी लगवाई जाए, तो उसने मां-बाप को मार डालना तय किया ताकि चैन से रह सके।
इस नौजवान के दिल-दिमाग में गणित की दहशत, और पढ़ाई नापसंद होने की नफरत तो रही होगी, और हो सकता है कि उसके साथ-साथ कुछ हिंसा भी उसके भीतर रही हो। लेकिन आज हर किसी को यह सोचना चाहिए कि बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ धकेलने का क्या-क्या नतीजा हो सकता है। हो सकता है कि ऐसे तमाम बच्चे हिंसक न हों, लेकिन उन पर नकारात्मक असर तो पड़ता ही है। ऐसे असर से हिंसा से परे भी लोग अपनी जिंदगी में कुंठा और तनाव से लद जाते हैं, और कभी भी अपनी स्वाभाविक मंजिल तक नहीं पहुंच पाते, सारी संभावनाओं को नहीं छू पाते।
आज जब 12 फरवरी को मैं यह बात लिख रहा हूं, तब बाजार वेलेंटाइन डे की सजावट में दिख रहा है। प्रेमी-प्रेमिका और दोस्त एक-दूसरे के लिए तोहफे लेने की तैयारी में हैं, और 14 फरवरी को बहुत से लोग अपनी चाहत से मिलेंगे। लेकिन हर दिन ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि मां-बाप कहां-कहां पर प्रेमी-प्रेमिका को मार डाल रहे हैं, शादी हो जाने के बाद भी मार डाल रहे हैं, और कितनी जगहों पर प्रेमी जोड़े आत्महत्या कर रहे हैं, क्योंकि जालिम जमाना, और उससे भी जालिम मां-बाप उन्हें साथ रहने ही नहीं देंगे। अलग-अलग जीने से बेहतर लोग मर जाना समझ रहे हैं।
हिन्दुस्तानी लोग आसपास के तमाम दायरे पर काबू बनाए रखने के बावलेपन के शिकार रहते हैं। बहुत से परिवारों में कॉलेज पहुंच चुके बच्चों के कपड़े भी मां-बाप तय करते हैं, स्कूल की उनकी पढ़ाई के विषय तो तय किए ही रहते हैं, कॉलेज का दाखिला भी वे तय करते हैं, और बाद में किससे शादी करनी है यह तो तकरीबन सारे ही हिन्दुस्तानी मां-बाप अपना विशेषाधिकार समझते हैं। नतीजा यह होता है कि इस देश में प्रेम एक गंदा शब्द करार दिया जा चुका है, और यह हिन्दुस्तान प्रेम और श्रृंगार रस से भरे हुए अपने उस इतिहास को भी अनदेखा कर देना चाहता है जिस दौर में प्रेम सिर चढ़कर बोलता था, और कृष्ण की प्रेमकथाएं करोड़ों तस्वीरों में खुलासे से दर्ज हैं, इंसानों के बीच प्रेम खुलासे से मंदिरों की दीवारों पर तराशा गया है, और इस देश में भगवानों से लेकर इंसानों तक का प्रेम पौराणिक कथाओं से लेकर ताजा इतिहास तक खूब दर्ज है।
लेकिन आज अपनी अगली पीढ़ी पर काबू करने की दीवानगी वाली पुरानी पीढ़ी मजदूर की पीठ पर लदे बोरे की तरह सवार है, और बच्चों की हसरत को पूरा करने की कोई नीयत मां-बाप की नहीं रहती। अब ऐसे में अगर गणित से डरे हुए, और इंजीनियरिंग से नफरत करने वाले एक नौजवान की दहशत इतनी बढ़ती चली गई कि उसने मां-बाप को ठिकाने ही लगा दिया, कि न रहें मां-बाप, और न रहे गणित, तो ऐसे में क्या यह वारदात बाकी लोगों के लिए एक सबक नहीं रहना चाहिए?
हफ्ते भर से मैं इस मुद्दे पर लिखने की फिराक में था, कि आज सुबह एक दूसरी रिपोर्ट सामने आई।
अमेरिका की पिट्सबर्ग यूनिवर्सटी के शोधकर्ताओं मुताबिक- 'स्कूल में बच्चों के अच्छे या खराब प्रदर्शन के जिम्मेदार महज बच्चे ही नहीं बल्कि उनके मां-बाप भी हैं। इसलिए अगर आपका बच्चा स्कूल में अच्छा परफॉर्म नहीं कर रहा तो उसे डांटने के बजाय बतौर मां-बाप आपको सोचना होगा कि आप कहीं गलत ढंग से पेश तो नहीं आ रहे हैं। मां-बाप द्वारा बच्चों को शारीरिक दंड देना या उनके साथ डांट-डपट करना भी इनके खराब प्रदर्शन का कारण हो सकता है।  जिन बच्चों को मां-बाप की लताड़ और सख्ती का सामना करना पड़ता है वे पढ़ाई की जगह सेक्स और अपराध में लिप्त हो जाते हैं। यह देखा गया कि सख्त माहौल में पले-बढ़े 7वीं कक्षा में पढऩे वाले बच्चे दो साल बाद मां-बाप के नियम कायदों के सामने अपने साथियों और दोस्तों को अधिक अहमियत देने लगते हैं। ग्यारहवीं कक्षा तक आते-आते ये बच्चे जोखिम मोल लेने लगते हैं। लड़कियों का झुकाव जहां सेक्स की ओर नजर आने लगता है तो लड़कों की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती है।'
हिन्दुस्तान में मां-बाप खासकर इस बारे में अधिक सोचने की जरूरत है क्योंकि मां-बाप की मर्जी से बच्चे पढ़ लें, शादी कर लें, तो भी उसके बाद मां-बाप इस बात पर भी काबू रखना चाहते हैं कि औलाद कब अपनी खुद की औलाद पैदा करे, और कितनी पैदा करे, उसमें लड़के कितने हों, और लड़कियां कितनी हों। सब कुछ काबू में रखने की हिन्दुस्तानी मां-बाप की हसरत इस देश की नई पीढ़ी को अपनी स्वाभाविक संभावनाओं को छूने भी नहीं देती है।

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