मुजरिम नेताओं को फास्ट फूड डिलीवरी जैसा तेज इंसाफ मिले

संपादकीय
14 फरवरी 2017


तमिलनाडू में गुजर चुकीं मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में निचली अदालत की सुनाई हुई सजा को आज सुप्रीम कोर्ट ने सही करार दी, और चूंकि जयललिता को तो अब पेश होने का आदेश दिया नहीं जा सकता था, इसलिए शशिकला को ही तुरंत समर्पण करने को कहा गया है। आज इस वक्त तक वहां के अन्नाद्रमुक पार्टी के तकरीबन सारे विधायकों को अपने साथ लेकर बैठीं शशिकला के लिए तो यह एक सदमा है ही कि चार बरस की कैद से बचने का अभी तुरंत कोई जरिया नहीं है, लेकिन चेन्नई से आ रहीं ताजा खबरें बता रही हैं कि शशिकला के मुकाबले रीढ़ की हड्डी लेकर खड़े हुए मौजूदा मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम को शशिकला ने पार्टी से निकलवा दिया है, और अपनी जगह एक दूसरे विधायक को अगला मुख्यमंत्री निर्वाचित करवा दिया है। ऐसा लगता है कि विधायक दल अभी उनके ही कब्जे में है, या उनके साथ है, और तमिलनाडू की सरकार अभी एक अस्थिरता में फंसी है, और आने वाले घंटों या दिनों में मामला साफ होगा। लेकिन हम अभी इस मामले पर न लिखकर, इससे जुड़े हुए उस बुनियादी मुद्दे पर लिखना चाहते हैं जिसकी वजह से आज शशिकला को चार बरस की कैद हुई है, और दस करोड़ रूपए जुर्माना पटाने को कहा गया है।
अब यह याद रखने की जरूरत है कि आज तमिल राजनीति में इतनी ऊंचाई और इतनी ताकत की जगह पर पहुंची हुई शशिकला मुख्यमंत्री जयललिता की एक घरेलू सहयोगी रहीं, और वह जयललिता की सबसे करीबी, सबसे विश्वस्त, और सबसे ताकतवर भी रहीं। ऐसे में भ्रष्टाचार की काली कमाई का अथाह खजाना इकट्ठा करके जया और शशिकला दोनों ही अदालत के कटघरे में पहुंचे, जेल पहुंचे, और अब कैद जारी रहने वाली है। भारत की राजनीति में भ्रष्ट नेताओं को सजा मिलते हुए कितना वक्त लगता है, यह इस खबर से पता लगता है जिसमें अठारह बरस से यह मुकदमा चल रहा था, और देश के एक तीखे तेवर वाले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बिना थके हुए देश की छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, और आज वह आखिरी मुकाम तक पहुंची है। अब इसके साथ ही यह खबर भी आई है कि बिहार के चारा घोटाले के चलते गिरफ्तार, सजायाफ्ता, और अभी ऊंची अदालत में अपील के चलते जमानत पर छूटे हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले की वजह से परेशान हैं। अब सवाल यह उठता है कि लालू यादव भ्रष्टाचार के इस मामले के बाद अपनी गृहिणी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर एक किस्म से बिहार को हांकते रहे। तब से लेकर अब तक उनकी बेटी सांसद बन गई, दो बेटे बिहार में मंत्री हैं, और वे खुद बेताज बादशाह हैं, और यह सब देखकर बिहार की वे गाय-भैंस सदमे में मर चुकी हैं जिनके चारे के घोटाले में लालू को सजा हुई थी।
भारत की राजनीति यह साबित करती है कि भ्रष्टाचार हो, या कि किसी और किस्म का जुर्म हो, लोग अगर सत्ता या विपक्ष की राजनीति में ताकतवर हैं, तो दशकों तक वे अपने जुर्म की सजा से बचे रह सकते हैं। यही वजह है कि हिन्दी में ऐसी बहुत सी फिल्में सामने आई हैं जिनमें कोई ईमानदार पुलिस अफसर भ्रष्ट मंत्री-मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से पीट-पीटकर जेल में डालता है, कानून अपने हाथ में लेता है, हिंसा करता है, और लोग ऐसे नजारे देखकर ताली बजाते हैं क्योंकि हिन्दुस्तान में ऐसे ताकतवर नेताओं को महज ऐसे फिल्मी किरदार ही सजा दे पाते हैं। भारत में लोकतंत्र राजनीति के मुजरिमों को सजा देने के मामले में एकदम ही खोखला और बेअसर साबित हुआ है। कभी-कभार दस-बीस बरस की मुकदमेबाजी के बाद हजारों में से कोई एक नेता सजा पाते हैं, और आमतौर पर वे सजा के पहले जयललिता जैसे अंत को पहले पा लेते हैं, राजकीय सम्मान के साथ ऊपर रवाना होते हैं, और इसके साथ ही उनकी सजा की आशंका खत्म भी हो जाती है।
हम पहले भी बार-बार यह लिखते रहे हैं कि सत्ता की अलग-अलग दर्जे की ताकत पाए हुए लोगों के लिए अलग से अदालत होनी चाहिए, और उनके जुर्म के लिए उनके ऊंचे दर्जे के अनुपात में ही अधिक कड़क सजा का भी इंतजाम होना चाहिए। जब तक हिन्दुस्तानी नेताओं के जुर्म पर फास्ट फूड डिलीवरी जैसी तेज रफ्तार से इंसाफ की डिलीवरी नहीं होगी, और वाघ-बकरी ब्रांड की चाय की तरह कड़क सजा नहीं होगी, तब तक भारतीय राजनीतिक सत्ता भ्रष्ट लोगों से दबी रहेगी, और भ्रष्ट बनी रहेगी।

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