शौच के तरीके के साथ-साथ सोच के तरीके को भी बदलें

संपादकीय
19 फरवरी 2017


आज पूरे देश में खुले में शौच खत्म करवाने के लिए करोड़ों शौचालय बनवाए जा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि जैसा कि किसी भी सरकारी योजना में होता है, भारत में भी अलग-अलग राज्यों में जिला स्तर से राज्य सरकारों के पास फर्जी आंकड़े पहुंच रहे हैं, और हकीकत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी कि बताई जा रही है। लेकिन यह बात सिर्फ शौचालय के मामलों में हो, ऐसा भी नहीं है, सरकार की तो हर योजना में फर्जी आंकड़े सामने आते ही हैं, और बाद में जब कोई जांच होती है, तो पता लगता है कि जनता का पैसा बर्बाद होते रहता है, और नेता-अफसर झूठ पेश करके वाहवाही पाते रहते हैं।
ऐसे में इस मामले से जुड़ी हुई एक दूसरी खबर है जो कि आंकड़ों के झूठ से परे एक अच्छी तस्वीर भी पेश करती है। केन्द्र सररकार के स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर अभी तेलंगाना पहुंचे, और वहां एक गांव जाकर दूसरे बहुत से बड़े आईएएस अफसरों के साथ मिलकर अलग-अलग शौचालयों के गड्ढों में उतरे, और वहां भरा हुआ पखाना जो कि खाद में तब्दील हो गया था, उसे अपने हाथों साफ करके निकाला, और गांव के लोगों के सामने यह हकीकत रखी कि शौचालयों के गड्ढे भरने के बाद कुछ महीनों में ही उनमें मलमूत्र सूखकर सूखा पावडर सरीखा खाद बन जाता है, और उसे बाहर निकालने में कोई दिक्कत नहीं होती। देश के इन कुछ सबसे बड़े अफसरों ने ऐसा करके लोगों की वह हिचक खत्म करने की कोशिश की कि शौचालयों के टैंक जब भर जाएंगे, तब उन्हें साफ कौन करेगा? क्योंकि आज देश में यह कानून लागू है कि किसी भी सफाई कर्मचारी से दूसरों का पखाना नहीं उठवाया जाएगा, और वह जुर्म होगा। ऐसे में बहुत से लोगों के बीच यह सवाल है कि खुले में शौच बंद करवाकर आज हर कहीं पखाने तो बन जा रहे हैं, लेकिन उनके टैंक भर जाने के बाद उनकी सफाई कौन करेगा? इन अफसरों ने बताया कि दो-दो टैंक इसीलिए हर शौचालय के साथ बनते हैं कि जब एक भर जाए, तो उसे बंद करके सूखने दिया जाए, और फिर लोग खुद कुछ महीनों में उसे खाली करके खाद का इस्तेमाल कर लें।
यह बात कहने में जितनी आसान लगती है, हकीकत में इस पर अमल उतनी आसान नहीं रहेगी, मलमूत्र की सफाई आज भी भारत में छुआछूत की एक वजह है, और लोग अपने घर के पखाने की सफाई भी खुद नहीं करते। ऐसे में शौचालयों के भरे हुए और सूखी खाद से भरे हुए टैंक की सफाई के लिए लोग उसके भीतर उतरेंगे, और उसे निकालकर खेतों में इस्तेमाल करेंगे, इस राह में सामाजिक सोच एक बड़ा अड़ंगा साबित होगी। इसलिए यह भी जरूरी है कि जिस बड़े पैमाने पर शौचालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी बड़े पैमाने पर सफाई की जिम्मेदारी की सामाजिक-नसीहत भी लोगों को दी जाए। शौचालय को ईंट-गारे से बनाना तो आसान है, लेकिन लोगों की हिचक को खत्म करना इसके मुकाबले बहुत मुश्किल है। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार के इतने बड़े अफसरों ने दूसरों के शौचालयों के टैंक साफ करके लोगों के सामने एक मिसाल रखी है, और दूसरे प्रदेशों में भी लोगों को आज से ही ऐसी सामाजिक जागरूकता फैलाना शुरू करना चाहिए, वरना टैंकों के भरने के बाद रातों-रात लोगों की सोच नहीं बदली जा सकेगी। शौच के तरीके के साथ सोच के तरीके को भी साथ-साथ ही बदला जाए।

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