ट्रंप के फैसले, और उनके खिलाफ खड़ी वहां की कौम

संपादकीय
2 फरवरी 2017


अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के काम सम्हालने के बाद उनकी घोर नस्लवादी, साम्प्रदायिक, आप्रवासी और गरीब विरोधी नीतियों के चलते उनका देश भर में जबर्दस्त विरोध हो रहा है। वहां के संघीय ढांचे में राज्यों और शहरों को कई किस्म के अधिकार मिले हुए हैं, और कुछ राज्यों और शहरों ने ट्रंप के शरणार्थी-विरोधी फैसलों को मानने से इंकार कर दिया है। उनके फैसलों को अदालतों में चुनौती भी दी जा रही है, और अमरीकी सरकार की वकील ने जब अदालत में उनके फैसलों की वकालत करने से मना कर दिया, तो जाहिर तौर पर उसे इस ओहदे से हटा दिया गया। ट्रंप सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को यह भी कहा है कि अगर वे ट्रंप की नीतियों से सहमत नहीं हैं, तो वे नौकरी छोड़कर जा सकते हैं। अमरीका में एक अभूतपूर्व जागरूकता का सैलाब दिख रहा है कि मुस्लिमों पर ट्रंप के हमले का विरोध करने के लिए सभी धर्मों के लोग, सभी नस्लों के लोग खुलकर साथ आए हैं, सड़कों पर हैं, और ट्रंप को अमरीकी उदारता भी याद दिला रहे हैं, और संविधान के प्रावधान भी।
अमरीका में जागरूकता का यह दौर, और लोगों का अपने निजी हितों से परे भी सार्वजनिक जीवन मूल्यों के लिए इस तरह लडऩा एक देखने लायक बात है। हिन्दुस्तान में जहां सरकार से असहमति होने पर लोग अपने-अपने तबके के लिए लड़ते दिखते हैं, और धर्म या जाति ही उन्हें जोड़कर एक करती है, वहां अमरीका में इतने बड़े पैमाने पर लोगों का दूसरों के लिए लडऩा इंसानियत के लिए बड़ी उम्मीद बंधाता है। अमरीका की एक दूसरी बात जो देखने लायक है, वह है ट्रंप की नीतियों से असहमत वहां की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखियाओं का खुलकर विरोध में सामने आना। भारत में न तो केन्द्र सरकार, और न ही किसी राज्य सरकार के खिलाफ बोलने का हौसला किसी उद्योगपति या कारोबारी में हो सकता है, या होता है। ऐसे में अमरीका में यह हौसला दिखना यह भी साबित करता है कि वहां कारोबार किस तरह भारत के मुकाबले बहुत अधिक हद तक सरकारी काबू से परे रहते हैं। तीसरी बात जो सोचने की है, वह है अमरीकी मीडिया के तकरीबन तमाम लोगों का ट्रंप के लिए बड़ा ही आलोचक होना। ट्रंप ने मीडिया के साथ एकदम से सींग भिड़ाए हैं, और मीडिया के साथ बदसलूकी के नए रिकॉर्ड कायम किए हैं। ऐसे में वहां का मीडिया ट्रंप के खिलाफ जितना खुलकर लिख रहा है और बोल रहा है, वह भी अमरीका में मीडिया की आजादी का एक अलग सुबूत दिखता है।
ट्रंप अमरीकी राष्ट्रपति भवन में कुछ उसी किस्म के दिख और लग रहे हैं जिस तरह की कांच और चीनी मिट्टी के सामानों की किसी दुकान में फंस गया बिफरा हुआ सांड दिख सकता है। ट्रंप उसी अंदाज में चारों तरफ तबाही कर रहे हैं, दूसरी देशों को कोस रहे हैं, खुद अमरीका के भीतर मनमाने फैसले ले रहे हैं, अपनी सरकार के भीतर भी मानो उनका कोई सलाहकार न हो, और वे अकेले ही ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनका अमरीका को नुकसान उनका कार्यकाल खत्म होने के बरसों बाद तक जारी रहेगा। ऐसा लगता है कि ट्रंप न सिर्फ बददिमागी और घमंड से भरे हुए हैं, बल्कि वे बेवकूफी से भी भरे हुए हैं, और अमरीका की तमाम अच्छी परंपराओं को कुचलने की हड़बड़ी में भी हैं। किसी बुरे नेता के लिए ऐसा होना दुनिया के लिए एक बेहतर बात होती है कि उसका घड़ा तेजी से भरना शुरू हो गया है। लेकिन दुनिया में दूसरी जगहों पर जहां पर बुरे नेता इतने बददिमाग, और इतने बेवकूफ नहीं हैं, वे अपने-अपने देश के लिए धीमी रफ्तार से बुरे फैसले लेते हुए देर तक कुर्सी पर काबिज भी रह सकते हैं। फिलहाल डोनल्ड ट्रंप अमरीका को दुनिया का सबसे बड़ा निशाना बनाने का काम भी कर रहे हैं, और अपने देश का इतना बड़ा नुकसान भी कर रहे हैं जो कि आने वाले कई राष्ट्रपति भी सुधार नहीं पाएंगे।
भारत के समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। भारत में तो कौमें पांच बरस के कई कार्यकाल इंतजार कर लेती हैं, लेकिन अमरीकी कौम देखने लायक है जो कि देश को तोड़ रहे निर्वाचित मुखिया के खिलाफ इस तरह मजबूती के साथ सड़कों पर है, और एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर खड़ी है।

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