वोटों के लिए भी प्रधानमंत्री को बड़प्पन नहीं खोना चाहिए...

संपादकीय
20 फरवरी 2017


उत्तरप्रदेश की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब यह कहा कि राज्य सरकार जहां कब्रिस्तान बनाती है, वहां श्मशान भी बनाना चाहिए, और अगर ईद पर बिजली रहती है, तो दीवाली पर भी रहना चाहिए। उनके शब्द कुछ आगे-पीछे हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनका निशाना मुस्लिम और हिन्दू समाज के बीच का फर्क था, और वे यह साबित कर रहे थे कि राज्य सरकार चला रही समाजवादी पार्टी हिन्दू और मुस्लिम में फर्क कर रही है। उनकी इस बात को देश में बहुत से तबके एक साम्प्रदायिक भड़कावा मान रहे हैं, और यह भी मान रहे हैं कि अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में यह हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश।
प्रधानमंत्री की यह बात गलत और अटपटी दोनों लग रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनकी पार्टी भाजपा उत्तरप्रदेश में या तो सत्ता में रही है, या फिर विपक्ष में। ऐसे में अगर समाजवादी पार्टी ने सचमुच ही कब्रिस्तान और श्मशान के बीच ऐसा कोई फर्क किया था, और हिन्दू त्यौहारों पर अंधेरा रखा था, और मुस्लिम त्यौहारों को रौशन किया था, तो हमको तो पिछले दस बरसों में भाजपा की उठाई हुई ऐसी कोई बात याद नहीं पड़ती है। भाजपा उत्तरप्रदेश में बड़ी मजबूत है, और भाजपा के वहां पर भगवा नेता इतनी हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात हैं कि बार-बार उनके खिलाफ कभी चुनाव आयोग को चेतावनी देनी पड़ती है, तो कभी पार्टी को सफाई देनी पड़ती है। रात-दिन खबरों के बीच बैठे हुए भी हमें ऐसी कोई खबर याद नहीं पड़ रही है कि भाजपा के किसी भी नेता ने उत्तरप्रदेश में ऐसा कोई बयान दिया हो। और यह बात साफ है कि अगर साम्प्रदायिकता के आधार पर, धर्म के आधार पर उत्तरप्रदेश में ऐसा हुआ रहता तो अब तक संसद में भी यह बात गूंज जानी चाहिए थी। फिर आज तो प्रधानमंत्री खुद उत्तरप्रदेश के सबसे धार्मिक शहर के सांसद हैं, और पार्टी की उत्तरप्रदेश इकाई की पहुंच भी उन तक अच्छी खासी होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में धर्म के इस्तेमाल को लेकर जो फैसला दिया है, प्रधानमंत्री का बयान उस फैसले के दायरे में तो आता है और वह फैसले की भावना के खिलाफ भी दिखता है, लेकिन यह एक अलग बात है कि तकनीकी आधार पर मोदी का बयान सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बच सकता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि अदालत के किसी फैसले या उसकी भावना से परे भी प्रधानमंत्री को एक बड़प्पन के साथ भाषण देना चाहिए, और चुनाव के मौके पर भी प्रधानमंत्री पार्टी के नेता भर नहीं रहते, वे प्रधानमंत्री भी रहते हैं, इस नाते उन्हें सुरक्षा और सहूलियत भी मिलती है, और लोकतंत्र का तकाजा यह है कि प्रधानमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुकूल बड़प्पन की बात करनी चाहिए, और ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जिसे उकसावा और भड़कावा करार दिया जा सके। हमारी तो देश के किसी भी प्रधानमंत्री से यही उम्मीद रहेगी कि वे वोटों के लालच में भी अपने पद की जिम्मेदारी को न भूलें।

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