दाखिले और नौकरी की ऐसी बिक्री से भी नक्सल सोच पनपती है...

संपादकीय
26 फरवरी 2017


एक तरफ बिहार में लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष, आईएएस अफसर गिरफ्तार हैं कि वहां नौकरियों के लिए इम्तिहान में घोटाला हुआ है, मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाला बरसों से चले आ रहा है, दर्जनों लोग जेल में हैं, दर्जनों गवाह-आरोपी या जांच अफसर रहस्यमय तरीके से मारे गए हैं, छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के चयन के घोटाले पर हाईकोर्ट का हुक्म आ चुका है, और सारा चयन खारिज करने कह दिया गया है, और आज की ताजा खबर यह है कि महाराष्ट्र में आज होने जा रही सेना की भर्ती परीक्षा का पेपर लीक हो गया, परीक्षा रद्द हो गई, 18 लोग गिरफ्तार कर लिए गए। ऐसा पता लगा है कि सेना की इस परीक्षा के पर्चे को लीक करने के लिए करोड़ों की कमाई की गई थी। इस मामले में अब तक तीन सौ छात्र भी हिरासत में हैं।
हिन्दुस्तान में एक तो सरकारी नौकरियों का वैसे भी टोटा है, और करोड़ों बेरोजगार नौजवान सड़कों पर भटक रहे हैं। कॉलेजों की पढ़ाई ऐसी है कि वहां से बेरोजगार पैदा होते हैं, कामगार पैदा नहीं होते। अब ऐसे देश में जब गिनी-चुनी नौकरियों के लिए सरकारों के जो संवैधानिक संस्थान काम कर रहे हैं, वे भी अगर भर्ती घोटाले के कारखाने बन जाएंगे, तो इससे होनहार बेरोजगारों के साथ ज्यादती भर नहीं होगी, उनके मन में लोकतंत्र के खिलाफ जो हिकारत और नफरत पैदा होगी, वह सड़कों पर और बाकी जगहों पर तरह-तरह की हिंसा की शक्ल में दिखाई पड़ेगी। हमारा ख्याल है कि जो लोग संगठित रूप से होनहार लोगों के हक की नौकरियों को, या कॉलेज की सीटों को बेचते हैं, ऐसे लोगों को उनकी ताकत और उनके ओहदों के मुताबिक खासी कड़ी सजा होनी चाहिए, और ऐसा करते हुए उनकी जो काली कमाई होती है, उसकी जब्ती के लिए भी कानून बनना चाहिए। ऐसा करना एक आम भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिकों के बुनियादी हक के खिलाफ एक हिंसक भ्रष्टाचार है जिसमें सरकार के हाथ दूसरे दर्जे के कर्मचारी लगते हैं, जो कि नौकरी में आने के पहले ही भ्रष्ट हो चुके रहते हैं, और जाहिर है कि नौकरी करते हुए उनका पहला मकसद इस पूंजीनिवेश को वापिस हासिल करना रहता होगा। दूसरी बात यह कि सरकार को अपने कामकाज के लिए जो सबसे होशियार लोग मिल सकते थे, उनकी जगह औसत और सतही दर्जे के भ्रष्ट लोग मिलते हैं, और इससे भी सरकार का कामकाज, उसकी उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित होती है।
इस देश में कहीं नक्सल हिंसा, तो कहीं कोई दूसरे किस्म की आतंकी हिंसा फैलने के पीछे इसी तरह के सामाजिक अन्याय का हाथ रहता है, और जब सबसे कमजोर लोगों को यह लगता है कि उन्हें न तो उनके हक मिलने वाले हैं, न ही उन्हें बराबरी के मौके मिलने वाले हैं, तो फिर उनको लगता है कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर तबकों के खिलाफ हिंसा के बिना भारतीय लोकतंत्र में कमजोर को इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है। नक्सलियों से परे भी बहुत से अहिंसक लोगों का भी यह मानना है कि यह लोकतंत्र अब ऐसा हिंसक-तंत्र बन चुका है कि इसमेें सबसे कमजोर की नियति कमजोर ही बने रहना बनी रहेगी। यह सिलसिला थमना चाहिए, और सरकारी नौकरियों में, दाखिलों में, संगठित अपराध करने वाले लोगों के लिए उम्रकैद जैसी कड़ी सजा का इंतजाम करना चाहिए, इसके बिना लोगों का गरीबों का हक बेचना बंद नहीं होने जा रहा।

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