धर्म की हिंसा के खिलाफ इंसाफपसंद धर्मालुओं को आगे आने की जरूरत

संपादकीय
28 फरवरी 2017


केरल के एक पादरी का बयान आया है कि जींस और टी शर्ट में चर्च पहुंचने वाली लड़कियों की वजह से लोगों का ध्यान उपासना से हटता है, और ऐसा करने वाली लड़कियों को समंदर में डूबा देना चाहिए। इस पादरी का यह भी कहना है कि इस तरह की लड़कियां केवल आकर्षण का केंद्र बनने के लिए ऐसा करती हैं।
केरल देश का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा राज्य है, और यहां पर महिलाओं की स्थिति बाकी देश के मुकाबले बेहतर है और यह शायद देश का अकेला राज्य है जहां पर लड़कों के मुकाबले लड़कियों की जन्म संख्या अधिक है। ऐसे राज्य में जब ऐसी दकियानूसी बात सामने आती है, तो यह धर्म के मुंह से ही निकलकर आ सकती है। भारत में हम लगातार इस बात को देखते हैं कि हिंदू, मुस्लिम, या ईसाइ धर्मगुरू लगातार महिलाओं के खिलाफ अन्याय की, गैरबराबरी की, और हिंसा की बातें करते हैं। उत्तर भारत में जगह-जगह जाति और धर्म से परे शादी करने वाले लड़के-लड़कियों को उनके मां-बाप ही मरवा डालते हैं, और ऐसी हत्याएं धर्म और जाति से उपजी हुई कटरता की वजह से होती हैं। धर्म ने न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में लाखों हत्याओं को जारी रखा है, और धर्म का नाम लेकर अनगिनत मुस्लिम देशों में लगातार सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, और महिलाओं और लड़कियों को खरीदा-बेचा जा रहा है, इसके लिए धर्म का तर्क भी दिया जा रहा है कि धर्म में यह किस तरह जायज है।
धर्म पूरी दुनिया में खूनखराबे और अन्याय के लिए जिम्मेदार अकेला सबसे बड़ा कारण है, और दुनिया के नक्शे से धार्मिक-कत्ल हटा दिए जाएं, तो शायद 90 फीसदी कत्ल थम जाएंगे। ऐसा कातिल धर्म पढ़े-लिखे लोगों के दिल दिमाग पर भी राज करता है, और विज्ञान को पैर जमाने ही नहीं देता। इसके सबसे बड़े शिकार सारे कमजोर तबके होते हैं, गरीब, दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे और परंपरागत रूप से नीची समझी जाने वाली जातियों के लोग होते हैं। ऐसे में आस्थावान लोगों में, धर्मालु लोगों में जो लोग न्यायसंगत हैं, उन्हीं को पहल करनी होगी और धर्म को सार्वजनिक जगह से हटाकर घर के भीतर ले जाना होगा। जब धर्म निजी जिंदगी के बाहर आता है और एक संगठित ताकत की तरह होता है, तो वह किसी भी मुजरिम-बाहुबली की तरह का हो जाता है। नतीजा यह है कि हिंदुस्तान में आज इस बाहुबली की ताकत का इस्तेमाल चुनाव में करते हैं, किसी जमीन को खाली करवाने में करते हैं, बलात्कार और तस्करी में करते हैं।
भारत के सभी प्रमुख धर्मों के भीतर से जिस तरह की हिंसक बातें निकलती हैं, उनका विरोध करना अकेले नास्तिकों के बस का नहीं है। धर्म को मानने वाले लोगों के बीच से सुधार की आवाज उठनी चाहिए, और लोगों को याद होगा कि हर धर्म से कुछ लोग ऐसे पाखंड और ऐसी हिंसा के खिलाफ समय-समय पर खड़े हुए भी हैं। भारत में तो सती प्रथा और बाल विवाह को खत्म करवाने का काम धर्म से जुड़े हुए आस्थावान लोगों ने ही किया था, मुस्लिमों के बीच से असगर अली इंजीनियर जैसे सुधारवादी खड़े हुए थे, और ईसाईयों के बीच भी उदारवादी आंदोलनकारी हैं। इन सबके साथ समाज के उस मौन बहुमत को आगे आने की जरूरत है जो कि इंसाफपसंद तो है, लेकिन चुप है।

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