आल-औलाद श्रवण कुमार बनी रहें इसका इंतजाम करना मां-बाप का जिम्मा

संपादकीय
4 फरवरी 2017


जो घटनाएं जारी हैं, उन पर लिखना समझदारी का काम नहीं होता क्योंकि कई बार सतह पर तैरता हुआ सच गलत निकलते दिखता है, और ऐसे में उस पर लिखा हुआ भी गलत लगने लगता है। लेकिन भोपाल से अभी जो खबर आ रही है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के रायपुर में रह चुके एक नौजवान ने भोपाल में अपनी पत्नी का कत्ल किया, और पकड़ाने पर पुलिस पूछताछ में अभी यह भी कहा है कि उसने रायपुर में अपने मां-बाप का भी कत्ल करके उन्हें दफना दिया था, और मां के नाम की जायदाद बेचकर उससे अब तक मौज की जिंदगी गुजार रहा था। हो सकता है कि यह बात सच न भी हो, लेकिन दुनिया में रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जब आल-औलाद मां-बाप को बुरे हाल में रखते दिखती है, और बहुत से मामलों में उनकी जायदाद पर कब्जा करने की नीयत रहती है। दुनिया के इस हाल पर ही आज सोचने की जरूरत है।
आमतौर पर मां-बाप अपने बच्चों के लिए ही दौलत इकट्ठी करके छोड़ जाते हैं। कुछ लोग ऐसे रहते हैं जो अपनी कमाई का छोटा या बड़ा हिस्सा समाज के भले के लिए भी छोड़ जाते हैं, जैसा कि बिल गेट्स से लेकर वारेन बफे तक अमरीका में कर रहे हैं, फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग बहुत कम उम्र में ही ऐसा करना शुरू कर चुके हैं, और भारत में भी टाटा या गोदरेज जैसे उद्योगों की कमाई का एक हिस्सा समाज सेवा में जाता है। लेकिन अधिक परंपरागत सोच अपनी पाई-पाई को बच्चों के लिए छोड़ देने की है। दूसरी तरफ ऐसे मामले भी बढ़ते चल रहे हैं जिनमें बूढ़े मां-बाप बच्चों का तिरस्कार झेलते हुए अपने आखिरी बरस बड़ी तकलीफ में गुजारते हैं, और कुछ बरस पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में मां-बाप को सम्हालने की जिम्मेदारी बच्चों पर डालने का एक फैसला भी दिया था।
आज अपने बच्चों के लिए सब कुछ छोड़कर जाने की चाह और नीयत को भी काबू में करने की जरूरत इसलिए है कि एक बार सब कुछ बच्चों के हाथ आ जाए तो फिर उसके बाद वे बूढ़े मां-बाप से कैसा सुलूक करें, यह उनकी मर्जी पर रहता है। दुनिया के तमाम रिश्ते किसी न किसी स्वार्थ से जुड़े रहते हैं। मां-बाप बच्चों को जितना ख्याल रखते हैं, तो उनके अचेतन मन में यह उम्मीद तो रहती ही है कि उनके आखिरी बरसों में बच्चे भी उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन ऐसी उम्मीद पूरी हो, इसकी जिम्मेदारी भी कुछ हद तक मां-बाप पर रहती है जिन्हें अपनी विरासत को अपनी आखिरी सांस तक अपनी जरूरत के लायक को बचाकर रखना ही चाहिए। कभी भी वसीयत ऐसी ही बनानी चाहिए कि जायदाद का आखिरी हिस्सा बच्चों को मां-बाप के गुजर जाने के बाद ही मिले, और उनकी अपनी जिंदगी में वे बच्चों के मोहताज होकर न रह जाएं। बहुत से बच्चे ऐसे रहते हैं जो कि जायदाद अपने नाम आने तक तो मां-बाप से अच्छा बर्ताव करते हैं, लेकिन उसके बाद उनका रूख बदल जाता है। ऐसी नौबत न आ पाए, आल-औलाद जिम्मेदार बनी रहे, इसकी सावधानी मां-बाप को ही बरतनी चाहिए।
और इस बात में भी कोई बुराई नहीं है कि जो लोग कमाकर इकट्ठा कर चुके हैं, उन्हें अपने बुढ़ापे के जीने और इलाज जैसे खर्चों का इंतजाम करके किसी अच्छे वृद्धाश्रम का विकल्प भी खुला रखना चाहिए, और उनके बच्चे वहां मिलने आते रहें, इसके लिए अपनी वसीयत भी उसी हिसाब से बाकी रखनी चाहिए। अपनी जिंदगी के बाद तो वे चाहें तो बच्चों को सब दे जाएं, चाहें तो उनकी सेवा करने वाले लोगों को दे जाएं, और चाहें तो समाज के लिए बिना किसी स्वार्थ छोड़ जाएं। लेकिन अगर उनकी बचत है, तो अपने बाकी जीवन तक गुजारे के लिए उसे अपने ही पास रखें, पूरा का पूरा किसी को न दें। इसके लिए बैंक भी कई तरह के रिवर्स-लोन देते हैं जिनमें लोग अपनी संपत्ति गिरवी रखकर हर महीने कुछ रकम पा सकते हैं, और उनके मरने के बाद बैंक उसे बेचकर अपना कर्ज वसूलकर बाकी रकम उनके वारिसों को दे सकती है। बुढ़ापे के लिए ऐसी सारी सावधानी और ऐसे सारे विकल्प लोगों को सोचने चाहिए। फिलहाल एक बेटे के मां-बाप को कत्ल करने के दावे से बाकी मां-बाप को दहशत में आने की जरूरत नहीं है, लेकिन आल-औलाद श्रवण कुमार की कहानी की तरह सेवा करती रहे, ऐसी वसीयत बनाने की जरूरत जरूर है।

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