भारत की डिजिटल-हड़बड़ी और सौ कदम आगे साइबर-मुजरिम..

संपादकीय
5 फरवरी 2017


देश में एक बार फिर बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई है, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर आज सुबह की चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखे कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।
भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।
लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इकट्ठा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी।

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