शशिकला का आना एक बुरी मिसाल

संपादकीय
6 फरवरी 2017


तमिलनाडू की राजनीति जिस अंदाज में करवट बदल रही है, और गुजर चुकीं भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के मंत्रिमंडल में लंबे समय तक काम कर चुके और बाद में उन्हीं के होशोहवास में मुख्यमंत्री बनाए गए पनीरसेल्वम को जिस तरह इस्तीफा देना पड़ा, और भ्रष्टाचार के भयानक आरोपों से अदालती कटघरे में पड़ी हुई शशिकला को अगला मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी त्रासदी है। और ऐसा भी नहीं कि ऐसा लोकतंत्र देश में पहली बार तमिलनाडू में ही देखने मिल रहा है, अलग-अलग कई किस्म की कुनबापरस्ती, कई किस्म के भ्रष्टाचार, और कई किस्म की बेशर्मी के साथ लोग न सिर्फ मुख्यमंत्री बनते रहे हैं, बल्कि केन्द्रीय मंत्री, और पार्टियों के पदाधिकारी भी ऐसी नौबत में बनते रहे हैं, जो कि लोकतंत्र के नाम पर एक धब्बे से कम और कुछ नहीं है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी गिनाया है कि जिस वक्त लालू यादव को भ्रष्टाचार के आरोपोंं में जेल जाना पड़ा, या हटना पड़ा, उन्होंने किस तरह अपनी एक घरेलू-महिला पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया था।
लोकतंत्र जब तक मजबूत और गौरवशाली संसदीय परंपराओं का सम्मान करते हुए न चले, उसका बेजा इस्तेमाल होने का खतरा अपार है। कदम-कदम पर इस बात का नाजायज फायदा उठाया जा सकता है कि कानून में किस-किस बात पर रोक नहीं है। जिस ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को देखकर भारत की संसदीय प्रणाली बनाई गई, वह देश तो बिना लिखित संविधान वाला, और मोटेतौर पर परंपराओं का सम्मान करते हुए चलने वाला देश है। वहां पर लोगों के इस्तीफे जरा-जरा सी बात पर हो जाते हैं। और हिन्दुस्तान में जिन लोगों के एक पैर जेल में है, वे भी प्रदेश और देश का भविष्य तय करने पर आमादा रहते हैं कि कोई कानून उन्हें नहीं रोकता है। भारत का यह हाल देखते हुए पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का यह रूख भी याद पड़ता है जब लोगों ने उनसे उनकी कंपनियों का हिसाब सार्वजनिक करने को कहा, और याद दिलाया कि किस तरह वे आधा दर्जन बार दीवालिया घोषित करके अपनी कंपनियों को टैक्स देने से बचाते आए हैं, तो उन्होंने कहा कि वे एक चतुर कारोबारी हैं, और उन्होंने कानून में मिली छूट का इस्तेमाल करके ही अपना टैक्स बचाया।
लोकतंत्र और बेशर्मी इन दो का मेल बड़ा ही घातक होता है। भारत में जगह-जगह लोकतंत्र का जैसा मखौल उड़ाया जा रहा है, उससे कहीं पर लोगों का भरोसा नक्सलियों पर बढ़ रहा है, तो कहीं पर दूसरे किस्म के अपराधियों पर जो कि हाथों-हाथ फैसला सुना सकते हैं, सजा दे सकते हैं। किसी के कुनबे में रहने वाली एक महिला जिस तरह रातों-रात आज तमिलनाडू की मुख्यमंत्री बनाई जा रही है, और उसके अरबों के भ्रष्टाचार के मामलों का कोई मतलब ही नहीं रह गया दिखता है, वह लोकतंत्र के लिए एक शर्म की बात है। लेकिन ऐसी ही शर्म की बात कई किस्म की हैं, और भारतीय लोकतंत्र ऐसे तमाम बेजा इस्तेमाल से एक बुरी तरह से खोखला हो चुका तंत्र है, जिसे चुनाव-मतदान में मिली हुई कामयाबी से अपनी इज्जत ढांकने का मौका मिलता है। चुनाव में मतदान बिना जाहिर जुर्म के हो जाए, वही लोकतंत्र नहीं होता। ऐसे जाहिर जुर्म से परे एक-एक वोट खरीदा या साम्प्रदायिकता और जाति के आधार पर डलवाया जाता है, और वह लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। ऐसे में शशिकला ने एक और बुरी नौबत खड़ी की है, और आने वाले दिन देश में इस मिसाल का और बुरा इस्तेमाल करते दिखेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें