भारतीय फौज भ्रष्टाचार से परे नहीं, जवाबदेह तो रहे

संपादकीय
7 फरवरी 2017


सीबीआई ने एक जांच शुरू की है कि भारतीय फौज पाकिस्तान की सरहद पर जिन जमीनों का किराया दे रही है, उनमें से कई जमीनें तो पाक अधिकृत कश्मीर की हैं। अब ऐसे में उन जमीनों का किराया देने के नाम पर पहली नजर में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उसकी जांच से फौज की साख पर एक आंच तो आती ही है। दूसरी तरफ, अभी दो दिन पहले एक खबर आई कि भारतीय सेना के एक ट्रिब्यूनल ने 26 बरस पुराने एक मामले में फैसला दिया, और उस वक्त के एक नौजवान अफसर को दी गई सजा को खारिज किया। उस अफसर का कहना है कि सरहद पर फौज ने बड़ी तादाद में सोना जब्त किया था, जिसे अफसरों ने दबा दिया था, और इस अफसर ने जब दबाने का विरोध किया तो इसके खिलाफ कार्रवाई की गई। अब इतने दशक बाद जाकर मिलिट्री ट्रिब्यूनल ने उस वक्त की कोर्ट मार्शल की कार्रवाई को गलत ठहराया है, और इस अफसर को राहत दी है।
जब कभी फौज की बात आती है, तो लोग यह मान लेते हैं कि उसकी किसी भी तरह की आलोचना देशद्रोह है। फौज को लोग जांच से परे रखना चाहते हैं, आलोचना से परे रखना चाहते हैं। लेकिन दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन-जिन चीजों को जवाबदेही से परे रखा जाता है, उन सबमें खामियां पैदा होने लगती हैं। जहां रौशनी नहीं पड़ती, जहां चीजों को रहस्यमय या गोपनीय रखा जाता है, वहां गलत काम करने वालों का हौसला बढ़ता है। भारत की फौज हो या कि यहां कि पैरामिलिट्री, या किसी राज्य की पुलिस हो, वह लोकतंत्र से ऊपर नहीं हो सकती, और किसी तरह की गोपनीयता की छूट उसे रणनीति के तहत तो मिलनी चाहिए, लेकिन बाकी रोज के कामकाज में किसी ईमानदार को गोपनीयता की क्या जरूरत पड़ सकती है? फौज की खरीदी भ्रष्टाचार से भरी हुई रहती है, दूसरी तरफ फौज के भीतर से ही ऐसी शिकायतें आती हैं कि बड़े फौजी अफसरों में से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मातहत अफसरों की पत्नियों के शोषण में लग जाते हैं। फौज के रियायती सामान बेचने में भी बड़ा भ्रष्टाचार होता है, फौज से गोलियां चोरी होकर नक्सलियों और दूसरे आतंकियों तक पहुंचती हैं, और फौज की अपनी अंतरराष्ट्रीय खरीदी कैसे भयानक भ्रष्टाचार से भरी रहती है, यह बोफोर्स से लेकर हाल के हेलिकॉप्टर खरीदी तक सामने आया ही है।
फौज के प्रति एक सम्मान एक अलग बात है, लेकिन जिसका सम्मान हो, उससे कोई जवाब न लिया जाए यह तो जरूरी नहीं है। जब गांधी की बात होती है, तो गांधी को राष्ट्रपिता मानकर देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया है। लेकिन गांधी के अपने जीवन की खामियों या कमजोरियों को लेकर कौन-कौन से सवाल नहीं उठते? इतिहास में उनकी हर गलती या गलत काम को खुलासे से दर्ज किया जाता है। किसी महानता के लिए किसी गोपनीयता की जरूरत नहीं होती है। फौज में उसकी कार्रवाई की गोपनीयता तो जरूरी है, लेकिन उसकी बाकी बातों को महानता की आड़ में अनदेखा करना गलत है। कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक कितनी ही जगहों पर भारतीय सेना पर बलात्कार और बेकसूर की हत्या जैसी तोहमत लगती हैं, और कहीं-कहीं पर साबित भी होती हैं। फौज को ऐसी शिकायतों और उन पर मुकदमों से बचाने के लिए ऐसे इलाकों में एक अलग कानून बनाया गया है जिसे हटाने के लिए बरसों से आंदोलन चल रहा है। फौज को किसी पवित्र चीज की तरह अलग रखना ठीक नहीं है, और लोकतंत्र में हर किसी को जवाबदेह तो रहना ही चाहिए।

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