जनता के पैसों पर सत्ता की शान-शौकत नाजायज

संपादकीय
31 मार्च 2017


पंजाब में काम सम्हालते ही कांग्रेस के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा कि मंत्री गाडिय़ों पर लालबत्ती नहीं लगाएंगे। इसके अलावा उन्होंने उद्घाटन, शिलान्यास, और भूमिपूजन के पत्थरों पर मंत्री-मुख्यमंत्री के नाम लिखवाने को भी बंद किया कि जनता का पैसा जनता को समर्पित। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी के तौर-तरीके भी ऐसे ही किफायत के रहते हैं, लेकिन बंगाल की परंपरा ही वामपंथियों के वक्त से सादगी और किफायत की रहते आई है, और त्रिपुरा में तो एक वामपंथी मुख्यमंत्री ऐसे भी थे जो कि अपने कपड़े खुद धो लेते थे, और उन्हीं के बंगले में राज्य के मुख्य सचिव भी रहते थे, और दोनों एक साथ मंत्रालय जाते-आते थे। त्रिपुरा में एक माक्र्सवादी मुख्यमंत्री की पत्नी ऑटो रिक्शा पर सरकारी नौकरी करने आती-जाती थी। अभी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों से कहा है कि वे बंगलों की साज-सज्जा पर खर्च न करें और सादगी से रहें।
इन पांच राज्यों के चुनावों में जो नतीजे सामने आए उनमें अलग-अलग राज्य में अलग-अलग बातें तो दिखीं, लेकिन जो एक बात सिर चढ़कर दिखी, वह थी कि जनता ने पांचों जगहों पर सत्तारूढ़ पार्टी को हरा दिया, और दो राज्य तो ऐसे थे जहां मुख्यमंत्रियों को ही हरा दिया। इससे अगर देश के बाकी राज्य कोई सबक ले सकते हैं, तो उन्हें लेना चाहिए, क्योंकि चुनाव में जीत-हार तो चलती रहती है, जब सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के मुखिया, मुख्यमंत्री-मंत्री, या उनके मातहत काम करने वाले अफसर राजसी और सामंती अंदाज में शान-शौकत पर जनता का पैसा खर्च करने लगते हैं, तो जनता के मन में उसे लेकर नफरत खड़ी होने लगती है। और भारतीय लोकतंत्र में चुनाव में अब जनता अपने परंपरागत रूख और पसंद से हटकर कई नई किस्म की सोच के आधार पर भी वोट देने लगी है। दिल्ली में जिस तरह सादगी के मुद्दे पर चुनाव लड़कर आम आदमी पार्टी ने उस राज्य में चल रहे दो पार्टियों के परंपरागत मुकाबले को ही खारिज कर दिया, और कल के लड़कों की पार्टी, आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। अभी के पंजाब के नतीजों में भी अकाली-भाजपा गठबंधन तीसरे नंबर पर रहा, और केजरीवाल की किफायत वाली पार्टी वहां मुख्य विपक्षी दल बन गई है।
हमारा मानना है कि अब जनता अपने अधिकारों को लेकर अधिक आक्रामक हो चली है, और कोई भी पार्टी, कोई भी सत्ता, अब जनता को बेवकूफ मानकर नहीं चल सकतीं। जनता के मन में गाडिय़ों के काफिले, बड़े-बड़े बंगले, और फिजूलखर्ची के खिलाफ बड़ी हिकारत सुनाई पड़ती है। यह बात ठीक है कि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं होता, और बहुत से मुद्दों की एक जटिल पसंद-नापसंद जनता के फैसले तय करती है, लेकिन जो नेता या पार्टी इसे लेकर सावधान न रहें, उनका बाकी का अच्छा किया कराया भी पानी में मिल सकता है। हमारा ख्याल है कि गांधी के इस देश में, और आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रहते हुए, सत्ता पर आए लोगों को अधिक से अधिक किफायत बरतनी चाहिए, इसके बिना न तो देश का भला है, और न ही लोगों का खुद का भला हो सकता है। लालबत्तियों के सायरन-चीखते काफिले लोगों के मन में नफरत पैदा करते हैं, और चूंकि इसके बावजूद कुछ लोग चुनाव जीत जाते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि जनता इसे बर्दाश्त कर लेती है। कल के दिन ऐसे ही मुद्दों पर बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव हार भी सकते हैं। बेहतर यही है कि जनता का पैसा बर्बाद न किया जाए, सादगी बरती जाए, और लोकतंत्र का सम्मान किया जाए।

आधार कार्ड की जानकारी बुलबुले जितनी ही सुरक्षित

संपादकीय
30 मार्च 2017


क्रिकेट सितारे महेन्द्र सिंह धोनी के घर जाकर आधार कार्ड के लिए अंगूठा निशान लेने वाली एजेंसी ने कर्मचारी की तस्वीर तो ट्वीट की ही, धोनी के परिवार की जानकारी वाला गोपनीय फॉर्म भी ट्वीट कर दिया। जब इसे लेकर तस्वीर का प्रचार कर रहे केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से धोनी की पत्नी, साक्षी धोनी, ने आपत्ति दर्ज कराई, तो वे शुरू में आपत्ति की वजह समझ भी नहीं पाए। बाद में वह फॉर्म ट्विटर से हटाया गया। अब हर दिन केन्द्र सरकार किसी न किसी काम के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल अनिवार्य करते जा रही है, और कुछ दिन बाद मोबाइल फोन के सिम कार्ड के लिए भी आधार अनिवार्य रहेगा। आधार कार्ड से लोगों के बैंक खाते जोड़ दिए गए हैं, उनके क्रेडिट कार्ड जोड़ दिए गए हैं, राशन कार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक जुड़ गए हैं, ट्रेन या प्लेन की टिकटों के लिए कहीं-कहीं आधार जरूरी किया जा रहा है, और ऐसी नौबत दिख रही है कि जिसके पास आधार कार्ड न हो, उनका हिन्दुस्तान में रहना मुश्किल हो जाए।
पिछली मनमोहन सिंह सरकार की इस योजना का आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित उनके बहुत से मंत्रियों ने जमकर विरोध किया था, और इसे गोपनीयता के खिलाफ बताया था, और लोगों की निजी जिंदगी के अधिकार का उल्लंघन कहा था। लेकिन सरकार में आने के बाद अच्छी बात यह रही कि मोदी ने इसके पायदे महसूस किए, और इसे न सिर्फ जारी रखा, बल्कि इसके लिए लंबा-चौड़ा बजट भी दिया, और इसके इस्तेमाल को अधिक से अधिक जगहों पर अनिवार्य बनाना जारी रखा। नतीजा यह है कि अब केन्द्र सरकार की योजनाओं में रियायत पाने के अलावा बाकी तमाम बातों के लिए आधार की अनिवार्यता को सुप्रीम कोर्ट ने भी मंजूरी दे दी है। केवल जनकल्याण की अनुदान योजनाओं को अभी आधार से बाहर इसलिए रखा है कि इस कार्ड के न बन पाने पर कोई जरूरतमंद वंचित न रह जाए।
लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जिस तरह धोनी के परिवार का फॉर्म पोस्ट कर दिया गया, उसी तरह देश में आज दसियों लाख गैरसरकारी लोग आधार कार्ड बनाने से जुड़े हुए हैं। ये लोग अपने कम्प्यूटरों पर हर किसी की तमाम जानकारियों को लेकर बैठे रहते हैं, और आज इसी देश में अगर देखें कि कई कारोबारी जिस तरह मोबाइल नंबरों पर संदेश भेजने के धंधे के लिए करोड़ों लोगों के नाम-पते और जात सहित उनके नंबर की जानकारी चुराकर रखते हैं, उस तरह से आधार की जानकारी तक पहुंचना भी मुश्किल नहीं है। आज दुनिया में सबसे विकसित कंपनियों के ई-मेल खातों में घुसपैठिये ऐसे घुस जाते हैं कि वे एक साथ दस-दस, बीस-बीस लाख लोगों के पासवर्ड चुरा लेते हैं, तो ऐसे में भारत सरकार की गली-गली फैली हुई आधार-जानकारी की भला क्या सुरक्षा हो सकती है। आज तो नए मोबाइल सिम बेचते हुए लोग फुटपाथ पर फिंगर प्रिंट स्केनर लेकर खड़े रहते हैं, और लोगों से अंगूठा लगवाकर पल भर में आधार-डाटाबेस से उसकी शिनाख्त करवा लेते हैं, और सिम कार्ड शुरू हो जाता है। जिस आधार-डाटाबेस तक पहुंचना इतना आसान हो गया है, उसमें घुसपैठ भला क्या मुश्किल होगी?
और आधार कार्ड बनवाने के लिए लोगों को अपने अंगूठे और उंगलियों के निशान देने पड़ते हैं। आज दुनिया में कहीं न कहीं ऐसी टेक्नालॉजी बन गई होगी जिससे लोगों के ऐसे डिजिटल निशानों को किसी जगह पर उतारा जा सके। अब अगर किसी हथियार पर, या किसी जुर्म की जगह पर लोगों के फिंगर प्रिंट लगाने की तकनीक किसी के हाथ आ गई, तो आज तो अदालतें ऐसे सुबूत को मानकर किसी को सजा दे ही देंगी। हमारा ख्याल है कि आधार कार्ड से होने वाली सहूलियतों को लेकर उसके सुरक्षा-खतरों को अनदेखा किया जा रहा है, और जिस दिन ऐसे खतरे सामने आएंगे, उस दिन तक तो साइबर-मुजरिमों के पास हिन्दुस्तान की पूरी आबादी की जानकारी, और उनके निशान होंगे। मुजरिमों और कारोबारियों से, खुफिया एजेंसियों और बदला लेने के लिए बदनाम नेताओं से जनता की निजी और गोपनीय जानकारी कब तक बचाई जा सकेगी, यह अंदाज नहीं लगाया जा सकता। आधार कार्ड के मार्फत सरकार पूरी आबादी की रोज की जिंदगी पर ऐसी निगरानी रख सकती है कि जिसे कोई अपराधकथा लेखक की बता सकते हैं। यह एक खतरनाक बुलबुला है, और किसी भी दिन इसके फूटने से हिन्दुस्तान की पूरी आबादी एक अकल्पनीय खतरे में घिरी हुई दिखेगी।

योगी के आने से बढ़े हौसले से घिरे हरियाणा और राजस्थान भी

संपादकीय
29 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में योगी सरकार आने के बाद अवैध बूचडख़ाने को रातों-रात बंद करवाने की सरकार की कार्रवाई से अब उन लोगों का हौसला बढ़ते चल रहा है जो लोग खानपान के अपने तरीकों, और अपनी धार्मिक मान्यताओं को बाकी तमाम लोगों पर हमलावर तरीके से थोपना चाहते हैं। आज दिल्ली के राजधानी क्षेत्र के एक हिस्से, और हरियाणा में आने वाले गुडग़ांव में शिवसैनिकों ने नवरात्रि की वजह से मांस की तीन सौ दुकानें बंद करवा दीं। इस हरियाणा में भी भाजपा की सरकार है, और भाजपा के समर्थक-साथी दल-संगठन बड़े उत्साह में हैं। उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने प्रेमी-प्रेमिका या दोस्त लड़के-लड़कियों का साथ तोडऩे के लिए जो रोमियो दस्ते बनाए हैं, वे भाई-बहन को भी पकड़कर मार रहे हैं, और वहां की पुलिस के एक अफसर ने मीडिया को यह बात बड़े फख्र के साथ बताई है कि अब जवान लड़की को लाने या छोडऩे घरवाले उसके भाई को साथ नहीं भेजते, घर के किसी बुजुर्ग को जाना पड़ता है। मानो इसी से उत्साह पाकर राजस्थान में बीती रात पुलिस ने फिल्म देखकर घर लौटते पति-पत्नी को पकड़ा, और उनसे शादीशुदा होने का सर्टिफिकेट पेश करने को कहा, महिला के बाल पकड़कर उसे घसीटा जो कि पास के किसी सीसी टीवी कैमरे में कैद भी हुआ है।
यह पूरा सिलसिला देश को कुछ सदियों पहले ले जाने का है जब न आजादी थी, न संविधान था, न लोगों के मौलिक अधिकार थे, और जो राज करते थे, उनकी सोच को मार-मारकर लागू करवा दिया जाता था। हमने पिछले दिनों ही इसी जगह नई-नई बनी योगी सरकार के रोमियो दस्ते के बारे में लिखा भी था कि यह रोमियो नाम को बदनाम करने का एक नाजायज काम है, और इक्कीसवीं सदी में ऐसी बंदिशें थोपना सरकार के संवैधानिक अधिकारों से परे की बात है, और संवैधानिक जिम्मेदारी के खिलाफ भी है। लेकिन जहां कहीं लोकतंत्र के ऊपर धार्मिक सोच लादी जाती है, वहां पर इस तरह के गैरकानूनी काम सरकारी फैसलों के तहत ही होने लगते हैं। जिस नवरात्रि का नाम लेकर गुडग़ांव में मांस की दुकानों को गुंडागर्दी से बंद करवाया गया है, वहां ऐसी गुंडागर्दी करने वाले लोगों के हिन्दू धर्म के लोग ही देश में कई प्रदेशों और कई जगहों पर देवी पूजा करते हुए जानवरों की बलि देते हैं। हिन्दू धर्म के भीतर भी बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी हैं, और कुछ जगहों पर देवी के प्रसाद के रूप में मांस दिया और खाया भी जाता है।
संस्कृति और धर्म के नाम पर आज चारों तरफ जिस तरह की दहशत फैलाई जा रही है, वह देश में अलग-अलग तबकों को एक-दूसरे से दूर धकेलने का काम कर रही है। भारत की जिस मिलीजुली संस्कृति, और उसकी वजह से भारत की जिस ताकत का जिक्र अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो दिन पहले ही किया है, और जो इतिहास में अकबर के वक्त से लेकर अभी तक लगातार दर्ज हुआ है, उसे सत्ता में आते ही कुछ हफ्तों के भीतर खत्म कर देने की यह हड़बड़ी इस देश में कभी न सुधरने वाला नुकसान कर रही है। एक धर्म, एक रंग, एक किस्म का खानपान, एक किस्म का रहन-सहन, एक किस्म की पोशाक, एक आकार का परिवार, इस तरह की अनगिनत बातों को चुनावी-बहुमत की ताकत से जब लोकतंत्र के ऊपर हावी किया जा रहा है, तो उससे होने वाले नुकसान की भरपाई पांच बरस बाद भी, नई और किसी दूसरी सरकार के आ जाने के बाद भी नहीं हो पाएगी। और हमारा ख्याल है कि दुनिया में जहां कहीं से भी भारत पूंजीनिवेश की उम्मीद करता है, वहां से भी भारत को अपने ऐसे घरेलू हमलों के चलते निराशा मिल सकती है। इसके साथ-साथ घरेलू मोर्चे पर जब इतनी ज्यादा बेचैनी रहेगी, इतनी ज्यादा नफरत रहेगी, तो देश की भीतरी अर्थव्यवस्था भी खराब होगी। आज तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता मिलने से देश का घरेलू आर्थिक मोर्चा ठीक दिख रहा है, लेकिन धीरे-धीरे करके पर्यटकों को बेचैन करना, लोगों के पेशेवर कामकाज को तबाह करना, और रोजगार को नुकसान करना, इन सबका कुल मिलाकर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। मोदी को अपने साथियों पर काबू करना होगा, वरना चुनावी जीत से बढ़े हुए उनके कद को नुकसान उनके घर के भीतर से ही हो रहा है।

नवरात्रि का धार्मिक जमावड़ा जागरूकता फैलाने का मौका

संपादकीय
28 मार्च 2017


भारत के बहुत बड़े हिस्से में आज से 9 दिनों तक देवी की पूजा होगी, और समारोह चलते रहेंगे। करोड़ों लोग उपवास भी करेंगे, और देवी दर्शन के लिए जगह-जगह मंदिरों में भी जाएंगे। यह मौका धार्मिक भावनाओं से भरा होता है, और समाज के साथ-साथ सरकार को भी इसका इस्तेमाल करना चाहिए। एक तो भारत में महिलाओं की जो बुरी स्थिति है, उसे देखते हुए लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि इस देश की संस्कृति में महिलाओं के लिए कितना सम्मान रहते आया है, और आज जब समाज का एक बड़ा तबका अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कायम रखने पर आमादा है,तब यह भी समझने की जरूरत है कि आज समाज में लड़कियों और महिलाओं के साथ जुल्म करते हुए, या जुल्म देखते हुए ऐसी किसी संस्कृति का कोई महत्व नहीं रह जाता। यह मौका देवियों की प्रतिमाओं की पूजा करने के साथ-साथ जीवित देवियों का सम्मान सिखाने का भी होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे हर धार्मिक या सामाजिक मौके पर कई और तरह की जागरूकता भी फैलाई जा सकती है। देवी-मंदिरों में पॉली बैग पर रोक लगाकर लोगों को ऐसे प्रदूषण के खिलाफ जागरूक किया जा सकता है। इस मौके पर लोगों को यह भी सिखाया जा सकता है कि किस तरह पूजा-पाठ के बाद का धार्मिक-कचरा सड़कों के किनारे न फेंका जाए, नदियों और तालाबों में ना डाला जाए। मंदिरों के बाहर लोगों में जागरूकता के पर्चे भी बांटे जा सकते हैं, और धर्मगुरूओं से भी अपील की जा सकती है कि वे जागरूकता के मुद्दों पर अपनी आवाज में रिकार्डिंग करवाएं, जिन्हें कि जगह-जगह सुनाया जा सके। जहां कहीं बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं, उनके बीच जनजागरण के लिए सरकार को भी पहले से तैयारी करके रखनी चाहिए, और छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार जिस तरह प्रचार-वैन का इस्तेमाल कर रही है, उन्हें भी ऐसे मंदिरों के आस-पास लगाकर उनकी स्क्रीन पर जागरूकता के मुद्दों को दिखाया जा सकता है। आमतौर पर समाज या सरकार किसी नसीहत या सलाह को देने के लिए बड़ा खर्च करके ही लोगों तक पहुंच सकते हैं, लेकिन जब खुद होकर ऐसी भीड़ जुटती है, तो उसका मुफ्त इस्तेमाल समझदारी की बात होगी।
पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर ऐसे मौकों पर वन विभाग पौधे बांटने का काम करता है ताकि लोग लौटकर जाकर अपने घरों के आसपास पेड़ लगाएं। ऐसे मौकों पर स्वास्थ्य विभाग, म्युनिसिपल-विभाग भी साफ-सफाई के लिए पर्चे बांट सकते हैं। सरकार के हर विभाग के पास लोगों को समझाने के लिए, बताने के लिए कई बातें रहती हैं, और किसी भी धर्म या समाज के ऐसे आयोजनों के पहले विभागों को अपनी योजना बना लेनी चाहिए।

योगी के दो फैसलों के बाद स्वामी अग्निवेश का साथ

आजकल
27 मार्च 2017 
भारत में आर्य समाज से जुड़े रहे और बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के काम में लगे स्वामी अग्निवेश ने बीती रात फेसबुक पर यह लिखा है कि उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अवैध बूचडख़ानों को जो बंद करने का अभियान चलाया है उससे हो सकता है कि कुछ लोगों को दिक्कत हो, लेकिन उसमें एक वरदान छिपा हो सकता है। उन्होंने लिखा कि इससे मांसाहार घटेगा, और शाकाहार को बढ़ावा मिलेगा। पशु-पक्षियों की जान बचेगी, और लोगों की सेहत अच्छी होगी। उन्होंने मोटेतौर पर प्राणियों को बचाने में इस फैसले से मिलने वाली एक परोक्ष मदद की बात लिखी है।
योगी आदित्यनाथ के फैसले को लेकर दो राय नहीं हो सकती कि जो भी अवैध बूचडख़ाने हैं, उनको तो बंद किया ही जाना चाहिए था, और इनके अलावा भी जो भी अवैध कारोबार कहीं भी चलते हों, उन्हें बंद करवाना राज्य सरकार, या कि उसके मातहत स्थानीय प्रशासन का जिम्मा रहना चाहिए। इस हिसाब से यह फैसला अपने आपमें, और पहली नजर में सही लगता है, लेकिन जिस तरह लोकतंत्र में, या कि इंसानी जिंदगी और समाज में कोई भी फैसले टापू की तरह अलग-थलग नहीं होते, और उनसे कई दूसरे मुद्दे भी जुड़े रहते हैं, इसलिए बूचडख़ाने बंद करने के इस फैसले को बहुत सी दूसरी बातों के साथ जोड़कर ही समझा जा सकता है।
उत्तरप्रदेश से दूर बैठे हुए अभी हमको यह जानकारी नहीं है कि ये बूचडख़ाने महज मुस्लिमों के थे, या कि इन्हें चलाने वालों में कुछ हिन्दू भी थे। दूसरी बात यह कि यहां का मांस खाने वाले महज मुस्लिम थे, या कि उनमें हिन्दू भी थे। तीसरी बात यह कि मांस के कारोबार के साथ जुड़ी हुई दूसरी कई किस्म की मजदूरियां भी रहती हैं, और दूसरे कई रोजगार भी साथ-साथ चलते हैं। बूचडख़ानों से जुड़े हुए चमड़े के कारोबार में मुस्लिमों के अलावा बड़ी संख्या में दलित भी काम करते हैं, और उत्तरप्रदेश में चमड़ा उद्योग अनपढ़, गरीब जातियों के रोजगार का एक बड़ा साधन भी है। ऐसे में एक झटके में हुए ऐसे फैसले से रोज कमाने-खाने वाले लोगों की अगले दिन की कमाई कहां से आएगी, इस फिक्र की कोई जगह सीएम योगी के फैसले में नहीं दिखती है। दूसरी बात यह भी नहीं दिखती है कि मांसाहार करने वाले लोग इन बूचडख़ानों के बंद होने के बाद कहां से मांस पाएंगे, इस फैसले के पहले इस पर भी नहीं सोचा गया है।
लोकतंत्र में किसी शाकाहारी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को भी खान-पान की अपनी पसंद को दूसरों पर लादने की छूट नहीं मिलती। सीएम योगी का यह फैसला उनकी निजी मान्यताओं से निकला दिखता है, और योगी सहित उनके साथियों का जो रूख मुस्लिमों के लिए बरसों से रहा है, उसे देखते हुए ऐसा न मानने के कोई कारण नहीं दिखते कि यह फैसला मुस्लिमों पर हमला करने के लिए भी लिया गया है। कुछ महीने पहले यह वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आई थी जिसमें योगी आदित्यनाथ के संगठन के उनके एक साथी मंच और माईक पर से यह आव्हान कर रहे थे कि दफन की गई मुस्लिम महिलाओं को कब्र से निकालकर उनके साथ बलात्कार करना चाहिए। इस बात पर योगी का कोई विरोध या उनकी कोई असहमति सामने नहीं आई थी, इसलिए यह मानने की पर्याप्त वजह है कि वे इसे सहमत भी थे। अब खुद योगी के दिए हुए सैकड़ों भड़काऊ बयानों को साथ जोड़कर देखें तो मुस्लिमों के चलाए जा रहे अवैध बूचडख़ानों को पल भर में बंद करवाने के उनके फैसले के पीछे की नीयत भी साफ होती है।
लेकिन योगी की नीयत तो पहले से साफ है, आज जब उनके इस फैसले के बचाव में स्वामी अग्निवेश एक बयान देते हैं, तो वह बयान अपने शब्दों से परे जाकर, उनसे आगे जाकर, एक मासूमियत के मुखौटे के पीछे से योगी की साम्प्रदायिकता का बचाव भी करते दिखता है, और ऐसा करते हुए स्वामी अग्निवेश अपनी उस साख को खोते हैं जो कि हिन्दू समाज के भगवा चोले में रहते हुए भी पाखंड के खिलाफ आर्यसमाजी तेवरों से एक लड़ाई के लिए उन्होंने एक वक्त पाई थी। एक घोर साम्प्रदायिक नेता के बचाव के लिए स्वामी अग्निवेश आज अगर शाकाहार और उसके फायदों को तरह-तरह से गिना रहे हैं, तो यह किसी कातिल के कत्ल की चर्चा होने पर उस कातिल के एक अच्छा पेंटर होने, या अच्छा चित्रकार होने की चर्चा छेडऩे की तरह की बात है।
जब बहस का मुद्दा एक बुनियादी मुद्दा हो, तो उसके केन्द्र को छोड़कर उसके दूर के किनारे के आसपास के इन्द्रधनुष की चर्चा करना न तो मासूमियत की बात होती, और न ही इंसाफ की बात होती। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनगिनत बड़े हत्यारे हुए हैं जिनमें कला या साहित्य की कोई खूबी भी थी, लेकिन जब उनके लहू सने हाथों पर चर्चा होती हो, तब उनकी लाल रंग की किसी पेंटिंग की चर्चा छेड़ देना एक साजिश भरी नीयत साबित करती है।
भारत में लोगों को खान-पान की आजादी है। अलग-अलग राज्यों में गाय या गोवंश को कटने से बचाने के लिए कई तरह के कानून बनाए हैं। उत्तरप्रदेश में भी गाय काटने पर पहले से रोक लगी हुई है। लेकिन वहां के बूचडख़ाने ऐसे जानवरों को भी काटते थे जो कि कानून के दायरे में काटे जा सकते हैं, और उनका कुसूर यह जरूर था कि वे बिना लाइसेंस के चल रहे बूचडख़ाने थे, और उनको शर्तें पूरी करके लाइसेंस के तहत यह काम करना था। लेकिन उत्तरप्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के राज वाले गोवा में भाजपा के ही मुख्यमंत्री साफ-साफ यह घोषणा करते आए हैं कि उनके राज्य में गोहत्या या गोमांस पर कोई रोक नहीं लगेगी।
बूचडख़ानों के अलावा जो दूसरा फैसला सीएम योगी का आया, वह पूरे प्रदेश में पुलिस के रोमियो-दस्ते बनाने का है जिन्होंने अपना काम शुरू भी कर दिया है, और बाग-बगीचों में, सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लड़के-लड़कियों को पकड़कर भगाना, धमकाना, सजा देना शुरू कर दिया है। इसे लेकर पूरे देश में अलग-अलग जागरूक तबकों ने योगी के खिलाफ जमकर लिखा, और चूंकि पुलिस की कार्रवाई गैरकानूनी भी चल रही थी, इसलिए भी योगी को दो दिन के बाद यह घोषणा करनी पड़ी कि जो जोड़े सहमति से बैठे हैं, उन्हें पुलिस परेशान न करे। यह फैसला किसी को छेडख़ानी से बचाने वाला नहीं है, यह फैसला योगी की पहले की दर्जनों बार की ऐसी सार्वजनिक घोषणाओं के सिलसिले की एक कड़ी है जिसमें वे यह कहते आए हैं कि मुस्लिम नौजवान हिन्दू लड़कियों को बरगला ले जाते हैं, और शादी करके मुस्लिम बना लेते हैं। उन्होंने अपने भाषणों में पहले यह कहा है कि ऐसी एक भी हिन्दू लड़की के मुस्लिम बनाए जाने पर उसके खिलाफ सौ-सौ मुस्लिम लड़कियों को हिन्दू बनाया जाएगा। अब मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके लिए हुए फैसले को उनके ही ऐसे बयानों की रौशनी में देखना ठीक रहेगा, और हमारा ख्याल यह था कि रोमियो-दस्तों की ऐसी कार्रवाई के खिलाफ अदालत खुद होकर दखल दे सकती है, लेकिन इसके पहले ही मुख्यमंत्री ने अपने फैसले को सुधारा।
सीएम योगी से लोगों को किसी हृदय परिवर्तन की उम्मीद नहीं है, लेकिन लोकतंत्र के भीतर इतनी उम्मीद तो हर किसी से रखनी ही चाहिए कि या तो वे देश के संविधान का सम्मान करें, या फिर देश की अदालतें संविधान को बचाने के लिए ऐसे लोगों के फैसलों में दखल दें। उत्तरप्रदेश की शक्ल में आज देश में एक ऐसा राज्य सामने आया है जो कि संविधान की शपथ लेकर काम करने वाले घोर साम्प्रदायिक नेता के काम को दर्ज करने जा रहा है। कल तक तो देश का संविधान अपने लचीलेपन के साथ योगी को साम्प्रदायिक-भड़काऊ बातें कहने देता था, और यह संविधान देश की अदालतों को ऐसे जुर्म को अनदेखा करने की छूट भी देते रहता था। लेकिन आज जब योगी के फैसले महज बयान नहीं रहेंगे, और उनकी बहुत सी बातें सरकारी कार्रवाई की शक्ल में भी सामने आएंगी, तो उत्तरप्रदेश की न्यायपालिका, और उसके बाद देश की सबसे बड़ी अदालत, इन दोनों का एक बहुत बड़ा जिम्मा यह रहेगा कि जहां कहीं मुख्यमंत्री संविधान के खिलाफ जाएं, वहां अदालतें दखल दें। किसी पार्टी को चुनाव में बहुमत मिल जाने, और उस पार्टी की पसंद के मुख्यमंत्री बन जाने का यह मतलब नहीं रहता कि वहां पर संविधान पांच बरस निलंबित रहेगा। एक बहुमत की सरकार भी संविधान पर चलने के लिए बाध्य रहती है, और अदालतों के लिए जवाबदेह भी रहती है। योगी का अब तक का रूख देखते हुए उत्तरप्रदेश में जितना जिम्मा सरकार का है, उतने का उतना जिम्मा अदालत का भी है, और उसे बारीकी से ऐसी सरकार की निगरानी करते चलना चाहिए। हमें ऐसा दिन ज्यादा दूर नहीं दिखता है जब अदालत को दखल देनी पड़े।
आखिर में हम फिर स्वामी अग्निवेश पर लौटते हैं। और हम यह मानते हैं कि अग्निवेश बूचडख़ानों पर रोक के अलावा रोमियो-दस्तों की खबर को भी पढ़ चुके होंगे। इस देश में आर्य समाज ने हिन्दू धर्म के प्रेमी जोड़ों को मर्जी से शादी करने के लिए सबसे बड़ी सहूलियत दशकों से उपलब्ध कराई हैं। ऐसे प्रेम-विवाहों की वजह से ही देश में जाति व्यवस्था की कट्टरता कमजोर पड़ रही है। और नौजवान लड़के-लड़कियों के मिलने-जुलने पर भी पुलिसिया जुल्म लादने वाले योगी आदित्यनाथ का एक दूसरे मामले में बचाव करने के पहले स्वामी अग्निवेश को आर्य समाज में होने वाले प्रेम-विवाहों के सामाजिक योगदान के बारे में भी याद रखना चाहिए था।

म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग में छत्तीसगढ़ का नाम भी नहीं

संपादकीय
27 मार्च 2017


केन्द्र सरकार ने देश के शहरों की म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग जारी की है जिनके मुताबिक ये शहर अपने आपको स्मार्ट बनाने के लिए बाजार से कर्ज उठाने के लिए बॉंड जारी कर सकते हैं। अभी देश में जिन पांच सौ शहरों को स्मार्ट सिटी मिशन, और ऐसी ही एक दूसरी अमृत योजना के लिए छांटा गया है, उनमें से ऊपर के 94 पाए गए शहरों की क्रेडिट रेटिंग जारी हुई है। देश के 55 शहर ऐसे पाए गए हैं जिन्हें पूंजीनिवेश के लायक दर्जा मिला है और इसके नीचे के शहरों को यह नसीहत दी गई है कि वे अगले एक बरस में अपनी हालत को सुधारें ताकि वे क्रेडिट रेटिंग पैमानों पर बेहतर साबित हो सकें। छत्तीसगढ़ का इस लिस्ट में हाल यह है कि जिन 14 राज्यों के 94 शहर इस लिस्ट में हैं, उनमें से छत्तीसगढ़ का कोई नहीं है, और प्रदेश का नामोनिशान नहीं है। दूसरी तरफ नया राज्य तेलंगाना, सबसे गरीब समझा जाना वाला राज्य पश्चिम बंगाल, छोटा राज्य गोवा, मिजोरम, झारखंड, ओडिशा, ऐसे कई राज्यों के शहर इस लिस्ट में हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर राज्य बनने के बाद के इस डेढ़ दशक में हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। रायपुर के अलावा बिलासपुर ऐसा शहर है जहां लंबे समय से नगरीय प्रशासन मंत्री चले आ रहे अमर अग्रवाल विधायक हैं और वहीं बसे हैं, और वहां पर शहर की योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च भी हुआ है। यही हाल दुर्ग-भिलाई का है, जहां खर्च खूब हुआ है, ताकतवर मंत्री इन तीनों शहरों में बसते हैं, लेकिन नगर निगम की अपनी हालत खस्ता बनी हुई है। क्रेडिट रेटिंग के पैमानों पर शहरों की म्युनिसिपलों को इसलिए आंका जाता है कि अपने विकास के लिए कौन-कौन से शहर कर्ज पाने की क्षमता रखते हैं, इसे देखा जाए, और इस आधार पर शहरों को बॉंड लाने की इजाजत दी जाए। अभी की लिस्ट में हालत यह है कि बॉंड के लिए अपात्र माने गए करीब 45 शहरों के नीचे भी छत्तीसगढ़ का नाम नहीं है।
छत्तीसगढ़ में म्युनिसिपलों के साथ दिक्कत यह है कि राज्य सरकार उन पर अपना काबू कम करना ही नहीं चाहती। जब किसी स्थानीय प्रशासन को अपने पैरों पर खड़ा होना है, तो उसे कई तरह की स्वायत्तता भी मिलनी चाहिए। उसे अपने खर्च करने, अपनी कमाई के साधन जुटाने, और अपनी पसंद के टैक्स लगाने की छूट मिलनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के म्युुनिसिपल सरकार द्वारा मिलने वाली मदद के इंतजार में बरस-दर-बरस गुजार देते हैं, और राज्य शासन के रहमोकरम के मोहताज बने रहते हैं। दूसरी तरफ यहां की कई म्युनिसिपलों में ऐसी पार्टी के महापौर चुनकर आए जो कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के विपक्षी रहे, और नतीजा यह हुआ कि उनके साथ सरकार द्वारा तैनात कमिश्नरों का टकराव ही चलते रहा, या फिर म्युनिसिपल के भीतर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे से निपटने में लगे रहे, शहर की दिक्कतों से निपटने के बजाय। सरकार की सोच में भी स्थानीय निकायों को आजादी देना नहीं है, और कई बार तो राज्य शासन के स्तर पर बड़ी महंगी-महंगी मशीनें खरीदकर म्युनिसिपलों पर थोप दी जाती हैं, जो कि कबाड़ का बोझ बने हुए अखबारों में खबरें बनती रहती हैं।
दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्र में स्थानीय निकायों को इतना महत्व मिलता है कि कई जगहों पर पुलिस विभाग भी उनके मातहत काम करता है। वे स्थानीय स्तर पर सरकार का दर्जा रखते हैं, और वहां से निकला हुआ नेतृत्व आगे चलकर प्रदेश और देश के भी काम आता है। इसके अलावा स्थानीय जरूरतों को समझते हुए जब म्युनिसिपल अपने स्तर पर फैसले लेने और काम चलाने की आजादी रखते हैं, तब फिर वे निर्वाचत करने वाली जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भी पूरी कर सकते हैं। आज स्थानीय निकायों को छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में केवल राज्य शासन के अनुदान, या अलग-अलग मद में उनसे दूसरे किस्म की मंजूरी पर जिंदा रहने की मजबूरी है। इसके चलते हुए म्युनिसिपलों का अपना खुद का ढांचा लापरवाह और जर्जर हो गया है। जब हर काम के लिए राज्य के मंत्रालय जाकर खड़ा रहना है, तो निर्वाचित नेता भी अपनी जिम्मेदारी से कतराने लगते हैं। यह सिलसिला किसी शहर की म्युनिसिपल के दफ्तर में सुधरने का नहीं है, इसके लिए राज्य शासन के स्तर पर इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि स्थानीय नेतृत्व पनपने दिया जाए, न कि उससे डरा जाए, उसे दबाया जाए, और उसे काबू पाने के लिए अफसर तैनात किए जाएं। अभी केन्द्र सरकार की क्रेडिट रेटिंग की लिस्ट छत्तीसगढ़ सरकार को हकीकत समझाने के लिए काफी है। ऐसा न होने पर स्थानीय निकाय कमजोर बने रहेंगे, और स्थानीय निकायों की नाकामयाबी की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य सरकार की होगी, जैसी कि आज है।

एक दिन पेट्रोल-डीजल बिना रहने के लिए जरूरी है...

संपादकीय
26 मार्च 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज अपने मन की बात में लोगों से हफ्ते में एक दिन डीजल-पेट्रोल इस्तेमाल न करने की अपील की है। यह वैसे तो एक अच्छी सलाह है जिससे देश की विदेशी मुद्रा बचेगी, सड़कों पर भीड़ बचेगी, प्रदूषण घटेगा, और पैदल या पैडल की वजह से लोगों की सेहत भी बेहतर होगी। जो लोग सार्वजनिक साधनों पर चलेंगे, उनकी बचत भी होगी। लेकिन भारत के संदर्भ में इस सलाह में दो बड़ी बातें आड़े आती हैं, और ये दोनों ही बातें सरकारों से जुड़ी हुई हैं, जिनके सुलझाए बिना इस सलाह पर अमल करना अधिक मुमकिन नहीं है।
लोगों को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होता है, और अगर मेट्रो या बस जैसी सहूलियत न हो, तो लोगों को अपने ही दुपहिए या चौपहिए पर जाना पड़ता है। ब्रिटेन जैसे विकसित और संपन्न देश में करोड़पति भी अपनी मर्जी से साइकिलों पर निकल पड़ते हैं, और ऐसा हाल योरप के बाकी देशों में भी है, और अमरीका में भी है। इन देशों में ट्रेन से लेकर ट्राम और बसों तक साइकिलों को लेकर जाने की सुविधा रहती है, और लोग एक देश से दूसरे देश साइकिल ले जाते हैं, और वहां उतरकर सीधे रवाना हो जाते हैं। हिन्दुस्तान तो ऐसा गरीब देश है जहां पर आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजबूरी में साइकिल चलाता है, और उसे तो ऐसी नसीहत की जरूरत भी नहीं है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित सड़कों की जरूरत जरूर है जो कि हिन्दुस्तान में बिल्कुल भी नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि देश की एक सबसे प्रमुख पर्यावरण विशेषज्ञ सुनीता नारायण कुछ बरस पहले दिल्ली में साइकिल से अपनी दफ्तर जा रही थीं, और एक कार उन्हें मारकर भाग निकली थी। बुरी तरह जख्मी हालत में वे अस्पताल में रहीं। जब सड़कों पर बड़ी गाडिय़ों की रफ्तार पर काबू नहीं होगा, तब तक साइकिल चलाने वाले लोग कुचले जाते रहेंगे, और ऐसे खतरे लोगों को साइकिल के इस्तेमाल से रोकते हैं।
दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में यह देखा है कि मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर दिल्ली की मेट्रो और कोलकाता की मेट्रो तक, जहां-जहां सार्वजनिक परिवहन लोगों को मिलता है, लोग उसका खूब इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जब शहरीकरण के ढांचे में बसों या मेट्रो का इंतजाम नहीं होता है, तो लोगों की आदत अपनी गाडिय़ों पर निर्भर रहने की होने लगती है, और उसके बाद उनसे बसों पर चलने की उम्मीद बेकार रहती है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को एक मिसाल की तरह देखते हैं, और पिछले सोलह बरसों के राज्य के अस्तित्व में इस शहर पर हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। लेकिन सार्वजनिक परिवहन के लिए बसों की सुविधा आज भी बहुत सीमित है, और शहर के कई हिस्सों में बसों के भरोसे नहीं जाया जा सकता। ऐसे में लोग निजी गाडिय़ों पर मजबूर होते हैं। दूसरी तरफ रायपुर शहर प्रदूषण में देश और दुनिया में सबसे ऊपर के शहरों में आता है, और प्रदूषण में एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर गाडिय़ों से निकलने वाला धुआं भी है। इसलिए हिन्दुस्तानी शहरों को एक बड़ी प्राथमिकता के आधार पर सार्वजनिक परिवहन को बड़े घाटे के साथ भी बढ़ावा देना होगा, और जैसे-जैसे लोगों को इस ढांचे पर भरोसा होते जाएगा, वैसे-वैसे घाटा दूर भी होता जाएगा। दूसरी तरफ दुनिया में कहीं भी शहरों के सार्वजनिक परिवहन को नफे-नुकसान से जोड़कर नहीं देखा जाता है, क्योंकि इससे लोगों की सेहत, पर्यावरण, लोगों का वक्त, और देश की उत्पादकता इन सभी का बड़ा फर्क पड़ता है।
मोदी ने चूंकि यह बात छेड़ी है इसलिए उनकी सरकार को यह पहल करनी चाहिए, और हर राज्य के बड़े शहरों को यह बढ़ावा देना चाहिए कि राज्य सरकारें बसों का जाल बिछाएं। आज भी केन्द्र सरकार की ऐसी योजना है और छत्तीसगढ़ की कुछ शहरों में ऐसी बसें चल भी रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में ही ऐसे शहर हैं जहां केन्द्रीय पैसों से आई हुई बसें महीनों से खड़ी हुई हैं, और सरकार उसे चलाने का इंतजाम नहीं कर पा रही है। ऐसी सारी दिक्कतों को दूर करके तेजी से बसों को बढ़ाना पड़ेगा, तभी लोगों का पेट्रोल-डीजल का निजी गाडिय़ों का खर्च थमेगा। और फिर साइकिलों को बढ़ावा अगर देना है, तो सड़कों को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। हिन्दुस्तानी सड़कों पर दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें दुनिया में सबसे अधिक हैं, और ऐसे में कोई साइकिल चलाने की हिम्मत नहीं कर सकते, जब तक कि साइकिल चलाना उनकी मजबूरी न हो।

जिंदा कौमों वाला लोहिया का बयान चुनाव व्यवस्था में महज कागजी

संपादकीय
25 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तान के बहुत से लोग उबले पड़े हैं कि ऐसी साम्प्रदायिक सोच रखने वाले को मुख्यमंत्री बनाया गया है। इसे लेकर हिटलर की मिसाल भी दी जा रही है, और कुछ ऐसे कार्टून-पोस्टर बनाए गए जिन्हें फेसबुक ने भी हिटलर के चेहरे की वजह से हटा दिया। कुछ ऐसा ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जीतकर आने के बाद हुआ कि अमरीका के दर्जनों शहरों में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए और लोग इन नारों की तख्तियां लिए हुए थे- ये मेरा राष्ट्रपति नहीं है।
लोकतंत्र में हर बात की एक सीमा होती है। उत्तरप्रदेश सहित बाकी राज्यों के चुनाव के पहले हर राजनीतिक दल और हर विचारधारा के सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के पास अपने-अपने प्रचार का पूरा मौका था। और ऐसे ही मौके के चलते उत्तरप्रदेश में एक सुनामी की तरह भाजपा आई, लेकिन पास के पंजाब में वही भाजपा अपने बड़े भागीदार अकाली दल के साथ मानो सुनामी में बह गई, और विपक्ष में भी दूसरे नंबर पर पहुंची। ऐसे में लोकतंत्र में सिवाय इसके और कोई विकल्प नहीं है कि निर्वाचित व्यक्ति को, या कि निर्वाचित लोगों के बहुमत के छांटे हुए किसी व्यक्ति को सरकार पर काम करने का मौका दिया जाए। वह व्यक्ति खराब हो सकता है, बहुत खराब हो सकता है, लेकिन उसकी खराबी भी अगर उसे चुनाव लडऩे के लिए अपात्र नहीं ठहराती, तो फिर जीतकर आने के बाद उसे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, या मंत्री बनने के लिए भला कैसे अपात्र ठहराया जा सकता है? लोगों को यह लग सकता है कि यह देश की साम्प्रदायिक-सद्भावना के खिलाफ है, देश के लिए खतरा है, देश का लोकतंत्र इससे खत्म हो सकता है, लेकिन ये तमाम बातें मतदाता के फैसले के पहले तक की हैं। एक बार मतदाता ने जब चुन लिया, तो लोगों को अपनी हसरतों को विचार के रूप में ही सामने रखने की संभावना मिलती है, और भारत में वह चल भी रहा है।
अमरीका सहित पश्चिम के बहुत से अखबारों ने योगी को मुख्यमंत्री बनाने को बहुत बड़ा खतरा बताते हुए इसे मोदी से निराशा बताई है, लेकिन देश के भीतर के ही अखबारों के विचार क्या मायने रखते हैं? और फिर यह देखें कि चुनाव में अखबार क्या मायने रखते हैं, मीडिया क्या मायने रखता है, तो इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो अमरीका में ट्रंप का जीतकर आना है क्योंकि ट्रंप तो वहां हिलेरी क्लिंटन और मीडिया दोनों से ही एक साथ लड़ रहे थे, और इस बात को बार-बार बोल भी रहे थे। हम अमरीकी मीडिया के रूख के खिलाफ नहीं हैं, उसने दबे-छुपे कुछ नहीं किया, उसने खुलकर ट्रंप का विरोध किया, और उस विरोध के बावजूद अमरीकी जनता ने एक ऐसे ट्रंप को राष्ट्रपति बना दिया जिसे लेकर उसे वोट देने वाले मतदाता भी अगले ही दिन हक्का-बक्का रह गए। हो सकता है आने वाले दिनों या हफ्तों में योगी के ऐसे फैसले रहें जिन्हें लेकर उत्तरप्रदेश की जनता को अफसोस हो कि यह उसने किसे चुन लिया था, किस पार्टी को चुन लिया था, लेकिन लोकतंत्र में जनता के पास विकल्प सीमित हैं। वह मतदान के दिन घर बैठकर बाद में पांच बरस झींक सकती है, वह गलत पार्टी या नेता को चुनकर पांच बरस तक मलाल कर सकती है, लेकिन वह एक बार चुन लेने के बाद किसी को वापिस नहीं बुला सकती, हटा नहीं सकती। इसलिए लोहिया की कही हुई यह बात भारतीय संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में महज एक भावना है कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। यह बात चुनावी व्यवस्था के ढांचे में किसी काम की नहीं है, और उत्तरप्रदेश के आने वाले बरस ही वहां के मतदाताओं को खुशी या गम दे सकते हैं कि उन्होंने किसे मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता बनाया। फिलहाल तो लोगों को चुपचाप इंतजार करना है अगले चुनाव का, और तब तक वे चाहें तो अपने विचारों को लोहिया के कहे मुताबिक चारों तरफ उठा सकते हैं, ताकि जनजागरूकता कम से कम पांच बरस बाद तैयार रहे।

बिना समझ ज्ञान बेकार

संपादकीय
24 मार्च 2017


भारत में इम्तिहान शुरू होने और नतीजे निकलने शुरू होते ही जगह-जगह से बच्चों की आत्महत्या की खबरें आने लगती हैं। देश में सबसे अधिक कड़े मुकाबले वाली जगहों में से एक आईआईटी में पढ़ाई और मुकाबले के दबाव के चलते हर बरस कुछ छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर लेते हैं और छोटी-छोटी स्कूलों में जहां पर बिना अधिक दबाव वाली साधारण पढ़ाई होती है वहां से भी दिल दहलाने वाली ऐसी खबरें आती हैं। इस देश में मनोचिकित्सक और मनोपरामर्शदाताओं का अकाल है और आज इस विशेषज्ञता के लिए चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान की जो पढ़ाई जरूरी है, वहां पर सीटों का ही अकाल है, इसलिए आने वाले दशकों तक यह कमी खत्म नहीं होने वाली है। ऐसे में देश के बच्चों और नौजवान पीढ़ी के सामने मौजूदा शिक्षानीति और मां-बाप की उम्मीदों नाम के दो पाटों के बीच पिसना ही नियति है। इसके अलावा जरा-जरा सी बात पर मां-बाप से नाराज होकर कुछ बच्चे आत्महत्याएं कर रहे हैं जिनमें मोबाईल फोन न मिलने, या फोन पर अधिक बातचीत से रोके जाने पर बच्चे ऐसे फैसले ले रहे हैं।
ऐसी खबरें जब आती हैं तो हमें यह लगता है कि इन खबरों को कितना छापें, कितना न छापें? क्या ऐसी खबरों से और बच्चों को ऐसा आत्मघाती फैसला लेने की राह दिखने लगेगी या फिर उनके मां-बाप और उनके शिक्षक ऐसी खबरों से चौकन्ने होकर अपना व्यवहार सुधारेंगे और अपने बच्चों की बेहतर देखभाल करेंगे? यह फैसला मुश्किल होता है और हम ऐसे खतरों के कम होने के आसार देख भी नहीं रहे। एक तरफ स्कूल और कॉलेज, तकरीबन हर जगह पढ़ाई का मतलब परीक्षा हो गया है और परीक्षा का मतलब अगली पढ़ाई के लिए दाखिला-परीक्षा हो गया है। पढ़ाई से किसी का ज्ञान बढऩा अब जरूरी नहीं रह गया, अब अगर बच्चे बड़ी-बड़ी, ऊंची और महंगी पढ़ाई तक पहुंचने का रास्ता बनाते चलते हैं तो मां-बाप भी उनसे खुश रहते हैं और स्कूलों में शिक्षकों के बीच भी बच्चों की साख ठीक बनी रहती है। कुछ मां-बाप जो इससे भी अधिक महत्वाकांक्षी हैं और जिंदगी में बहुत बुरे-बुरे समझौते करके, गलत काम करके अपने बच्चों को 'आगे बढ़ाने' में लगे रहते हैं, अभी कुछ बरस पहले  छत्तीसगढ़ में ही चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में जालसाजी करते कुछ बच्चे पकड़े गए। लाखों रूपये खर्च करके जब कुछ मां-बाप अपने बच्चों के लिए पर्चे खरीदने का इंतजाम कर लेते हैं, नंबर बढ़वाने का इंतजाम कर लेते हैं, तो उनसे काबिल जिन हजारों बच्चों का हक छिनता है, वे भी हताशा और निराशा में आत्महत्या की कगार पर पहुंच सकते हैं।
यह एक बहुत भयानक नौबत है जहां पर दुनिया की भौतिक सुविधाओं को, इम्तिहानों में कामयाबी को ही सब कुछ मान लिया गया है और शायद ही कुछ फीसदी मां-बाप अपने बच्चों को एक बेहतर इंसान बनाने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं। जिंदगी और दुनिया में जिन दूसरी बातों का अधिक महत्व होना चाहिए वे तमाम हाशिए पर हो गई हैं।
कुछ बरस पहले ऐसे एक छात्र ने  अपने दो मोबाईल फोन के बाद एक तीसरे मोबाईल की फरमाईश पूरी न होने पर आत्महत्या कर ली और अपने पिता के लिए एक चि_ी छोड़ गया  कि वे बाजार से दूसरा बेटा खरीद लें। ऐसी खबरों के बाद  मां-बाप अपने बच्चों पर कितना काबू करने का हौसला कर पाएंगे? इसलिए जरूरी यह है कि पढ़ाई और मुकाबले से परे हर मां-बाप अपने बच्चों को उनकी जिंदगी की शुरूआत से ही सही और गलत, जरूरी और गैरजरूरी, नैतिक और अनैतिक की नसीहत देते चलें, और ऐसा करते हुए उन्हें अपनी खुद की जिंदगी को एक मिसाल के तौर पर बच्चों के सामने रखना होगा। इतनी सावधानी रखते हुए मां-बाप अपनी खुद की जिंदगी को भी बेहतर बना पाएंगे क्योंकि वे अगर बच्चों को गुड़ खाने से रोकना चाहेंगे तो उन्हें खुद भी गुलगुलों से परहेज करना होगा। यह करना इसलिए जरूरी है कि आत्महत्या से कम भी, जब बच्चे खबरें नहीं बनते हैं और तनाव या कुंठा में जीते हैं, हीन भावना के शिकार हो जाते हैं तो उनकी अपनी जिंदगी आगे जाकर बहुत तकलीफदेह रहती है। इसलिए बच्चों का सिर्फ आत्महत्या न करना, और जिंदा रहना काफी नहीं है। जरूरी तो यह है कि बच्चे जिंदगी और दुनिया के लिए अच्छे मूल्यों वाला नजरिया अपने भीतर विकसित कर पाएं, और कामयाबी के भी पहले वे बेहतर इंसान बनने को अधिक जरूरी समझें। मां-बाप को और स्कूल-कॉलेज को यह समझना जरूरी है कि दुनिया के बहुत से महान लोग किताबों के मामले में बहुत असफल रहे, परीक्षाओं में फेल हुए, लेकिन उन पर दुनिया में हजारों किताबें लिखी गईं। किताबों और उम्मीदों, नासमझी और लापरवाही तले अपने बच्चों को दम न तोडऩे दें और पहली कोशिश उन्हें समझदार और बेहतर इंसान बनाने में लगाएं। यह समझना चाहिए कि ज्ञानी और समझदार में से समझदार बेहतर होता है। बिना समझ ज्ञान किसी काम का नहीं होता।

मोहब्बत से नफरत का एजेंडा, पराजित होता भारतीय लोकतंत्र

संपादकीय
23 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में नई योगी सरकार ने अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र और आमसभाओं में किए गए वायदे के मुताबिक पुलिस के रोमियो दस्ते बनाए हैं जो कि लड़कियों को छेडख़ानी और प्रताडऩा से बचाने का काम करेंगे। इस कार्रवाई में दो दिक्कतें हैं। पहली बात तो यह कि रोमियो के नाम को इस तरह की बातों से जोडऩा प्रेम के महत्व को खत्म करना है, और प्रेम को अपमानित करना भी है। शेक्सपियर की कहानी में रोमियो और जूलियट के बीच शुद्ध प्रेम रहता है, किसी तरह की छेडख़ानी या ज्यादती, या जुल्म या बलात्कार जैसी कोई बात नहीं रहती है। लेकिन जिस देश की संस्कृति मूर्खों जैसा बर्ताव करने पर आमादा हो, उन्हें रोमियो-जूलियट की कहानी पढ़ाने से भी उनकी समझ में कुछ नहीं आएगा। जिस तरह प्रेम के प्रतीक वेलेंटाइन डे का विरोध भारत का एक धर्मान्ध तबका इसलिए करता है कि वह एक पश्चिमी परंपरा है, ईसाई परंपरा है, और उसे खत्म करना चाहिए। वेलेंटाइन डे को खत्म करते-करते उसके विरोधी यह भी भूल जाते हैं कि कृष्ण की कहानियों से लेकर कालीदास के साहित्य तक प्रेम और श्रृंगार रस की चाशनी बिखरी हुई है, और उसे धर्मान्ध लोग सारी मेहनत करके भी धो नहीं पाएंगे। इस देश में ऐसा बर्ताव करना कि लड़के-लड़की के बीच प्रेम अनैतिक है, अपराध है, यह एक ऐसा दकियानूसी पाखंड है जो न अपने बीते कल को मानने को तैयार है, न ही आने वाले कल पर इस जिद के बुरे असर को मानने को तैयार है, और वह आज हिंसा पर आमादा महज इसलिए है कि उसके इलाके की सत्ता से उसे ऐसी हिंसा की रियायत मिली हुई है।
हिन्दुस्तान को एक पढ़े-लिखे, जानकार, और सभ्य देश की तरह बर्ताव करना चाहिए, और सरकारों को कहीं रोमियो के नाम पर, तो कहीं मजनूं के नाम पर ऐसे दस्ते बनाने की परले दर्जे की बेवकूफी छोडऩी चाहिए जो कि इतिहास की कहानियों में प्रेम जैसी पवित्र भावना का अपमान भी है, और देश में प्रेम के खिलाफ नफरत पैदा करने का एक जुर्म भी है। एक दूसरी दिक्कत उत्तरप्रदेश में यह हो रही है कि ऐसे रोमियो दस्ते बाग-बगीचे में बैठे लड़के-लड़कियों को पकड़-पकड़कर सड़कों पर उनसे उठक-बैठक करवा रहे हैं, धमका रहे हैं, और उनको बेइज्जत कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि नौजवान पीढ़ी की भावनात्मक जरूरतों के भी खिलाफ है। यह अजीब पत्थरयुग का वक्त आ गया है जब नफरत को तो वाहवाही मिलती है, लेकिन प्रेम को पीछा करके, घेरकर मारा जाता है। हमारे हिसाब से यह मामला तुरंत ही अदालत की दखल का बनता है, और चाहे उत्तरप्रदेश हो, चाहे कोई और राज्य, ऐसी सरकारी हिंसा और अराजकता के खिलाफ अदालत को खुद मामला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की नैतिक-चौकीदारी के लिए पुलिस ने ऑपरेशन मजनूं चलाया है, जिनमें पुलिसकर्मी जाकर लड़के-लड़कियों को पकड़कर सजा देने का काम करते हैं। इसमें पुलिस को लड़के-लड़कियों को पीटते हुए भी कैमरे में कैद किया जा चुका है।
यह असभ्य देश अपनी नौजवान पीढ़ी को कुंठा में डालकर उसकी सभी तरह की संभावनाओं को खत्म कर रहा है। आज जब दुनिया के विकसित देश अपने लोगों के बुनियादी अधिकारों का सम्मान करते हुए अधिक से अधिक उदारता की तरफ बढ़ रहे हैं, तब कृष्ण प्रेमकथाओं के इतिहास से संपन्न यह देश यह साबित करने में जुट गया है कि इसके इतिहास में प्रेम कभी रहा ही नहीं। यह शुद्धतावादी, कट्टरतावादी, पवित्रतावादी सोच इतनी हिंसक हो चल रही है कि इसके झांसे में आकर बहुत से मां-बाप अपनी ही आल-औलाद को मारकर फेंक रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी से प्रेम हो गया। मोहब्बत के खिलाफ नफरत इस पूरे देश को ऐसा नुकसान पहुंचा रही है जो कि पीढिय़ों तक दूर नहीं हो सकेगा। उत्तरप्रदेश में इस नफरत के पीछे यह सोच भी है कि कोई मुस्लिम लड़का किसी हिन्दू लड़की को मोहब्बत के जाल में फंसाकर मुस्लिम आबादी में इजाफा न कर ले, लेकिन छांट-छांटकर ऐसी निगरानी हो नहीं सकती, और इसके चक्कर में पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी एक ऐसे अंत की तरफ धकेली जा रही है जिसमें वह इस देश-प्रदेश से नफरत करने लगे, और दुनिया के किसी सभ्य देश में जाकर बसने की सोचने लगे। भारत का लोकतंत्र विकसित होने के बजाय पराजित होते चल रहा है।

गंगा-यमुना बचाने आया फैसला एक आदिवासी सोच से उपजा हुआ

संपादकीय
22 मार्च 2017


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अभी एक फैसले में देश की दो प्रमुख नदियों, गंगा और यमुना को इंसानों जैसे अधिकार देते हुए यह कहा कि इनको प्रदूषित करना उसी तरह अपराध माना जाए जिस तरह किसी इंसान या जानवर के साथ जुल्म करना अपराध होता है। हाईकोर्ट ने कहा कि अब गंगा-यमुना को वही अधिकार हैं जो देश का कानून और संविधान किसी भी नागरिक को देता है। अदालत ने इस संबंध में न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी का भी उदाहरण दिया जिसे इस तरह का दर्जा दिया गया है। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक संघर्ष करता रहा। माओरी समुदाय वांगानुई नदी को अपना पूर्वज मानता है। इस नदी पर उसकी आस्था अगाध है।
यह फैसला आज के हिन्दुस्तान में एकदम अनोखा है क्योंकि अब भारत की सरकार और अधिकतर राज्यों की सरकारें लगातार कुदरत पर मार करते चलने में भरोसा रख रही हैं। कारखानों के लिए जमीन और खनिज, खदानों के लिए जंगल, और कारखानों से लेकर शहरों तक के लिए पानी, इन तमाम मुद्दों पर सरकार और कारखानेदार का मिलाजुला रूख कमाई के आंकड़ों का रहता है, और धरती के साथ इस रफ्तार से, इस परले दर्जे की ज्यादती हो रही है, कि उसे धरती माता कहना भी अब ठीक नहीं लगता। कोई बहुत बुरी औलाद ही मां के साथ इतने जुल्म कर सकती है जितने कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लोग, और खासकर यहां की सरकारें, कुदरत के साथ कर रही हैं। पांच बरस के कार्यकाल को पूरा करने के पहले ही अगले चुनाव को जीतने की तैयारी में सरकारें और राजनीतिक दल, इन दोनों का रूख कमाई के आंकड़े पेश करने में रहता है, और धरती का अगले हजारों बरस का जो नुकसान हो रहा है, वह किसी की फिक्र का सामान नहीं बनता। नतीजा यह है कि जिन नदियों के किनारे दुनिया भर में बसाहट हुई और संस्कृतियां विकसित हुईं, उन तमाम नदियों का हाल आज यह है कि उनमें डुबकी लगाना भी खतरनाक हो गया है। जिन नदियों को मां कहा जाता है, जिस गंगा के पानी को मरते इंसान के मुंह में टपकाकर हिन्दू यह मानते हैं कि मरते-मरते गंगाजल सीधे स्वर्ग ले जाएगा, उसी गंगा में उसी हिन्दू धर्म के लोग न सिर्फ पूजा-पाठ का भयानक प्रदूषण छोड़ते हैं, बल्कि उसके किनारे लाशों को जलाते हुए अधजली लाशें भी बहा देते हैं। नदियों के किनारे के शहर अपनी गंदगी को बिना साफ किए हुए सारा पानी और पखाना सीधे इन्हीं गंगा-यमुना में छोड़ देते हैं, और इनमें शहरी आबादी में हिन्दुओं का जितना हिस्सा होता है, कम से कम गंदगी में भी उतना हिस्सा तो उनका होता ही है। दूसरी तरफ कारखानों की गंदगी नदियों में इस रफ्तार से मिल रही है कि मरते के लिए गंगाजल लाने को शायद सीधे गंगा के उद्गम गोमुख पर जाना होगा।
इसलिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले को हम एक कानूनी अमल की संभावना से परे भी एक सोच की तरह देखते हैं कि लोगों को यह याद पड़े कि भयानक भ्रष्टाचार के लिए दसियों हजार करोड़ खर्च करके गंगा को साफ करने का एक धार्मिक-भावनात्मक अभियान तब तक किसी काम का नहीं है, जब तक उसमें गंदगी को रोजाना जोडऩा न घटे। जब तक सरकार और समाज इन दोनों की नजरों में गंगा पूजा से परे, जिंदा रहने देने लायक इंसान न मान ली जाए, तब तक गंगा का कुछ भला नहीं होना है, और नदियों के किनारे बसे इस देश का भी कोई भला नहीं होना है। जब तक गंगा को एक धार्मिक प्रतीक मानकर उसे एक धार्मिक नारे की तरह बचाया जाएगा, तबतक उसका बचना वैसे ही होगा जैसे कि किसी देवी की प्रतिमा को नौ दिनों तक बचाना होता है, और दूसरी तरफ उसी समाज में जिंदा देवियों के साथ बलात्कार होता है, और उनकी ऑनरकिलिंग होती है। किसी का सम्मान करने के लिए उसके साथ किसी पौराणिक कहानी को जोडऩे की जरूरत नहीं होनी चाहिए, महज एक इंसान को इंसानियत से देखने की सोच काफी हो सकती है, जैसी कि पूरी दुनिया में आदिवासियों की होती है। कुदरत के तमाम हिस्से, जंगल, पेड़, नदी, पहाड़, जमीन, और पशु-पक्षी, इन सबके लिए आदिवासियों का नजरिया पूरी दुनिया में सबसे अधिक लोकतांत्रिक होता है, इंसाफपसंद होता है, और पर्यावरणप्रेमी होता है। इन्हीं आदिवासियों की जमीनों पर आज सरकार से लेकर कारखानेदार तक टूट पड़े हैं, और उनको उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, उनके पेड़ काटे जा रहे हैं, और पेड़ कटने से मिट्टी बनकर नदियों तक पहुंचकर उनमें गाद भर रही है, और पूरी धरती चौपट हो रही है। शहरों से निकली, शहरों में बसी, शहरी सोच में ढली, और शहरियों के लिए फिक्रमंद सरकारें पर्यावरण को बचाने का नारा तो जानती हैं, लेकिन आदिवासी और प्रकृति के बीच के सबसे मजबूत और अनंतकालीन रिश्ते को वे नहीं समझ पातीं। इसलिए उत्तराखंड ने जब न्यूजीलैंड के आदिवासियों की सोच का बखान करते हुए यह फैसला दिया है, तो इसे देखते हुए नदियों को धर्म से परे देखने की जरूरत है, उन्हें इंसानों की तरह देखने की जरूरत है, और संविधान में इंसानों को दिए गए अधिकार इन नदियों को भी देने की जरूरत है। और यह देना कोई देना भी नहीं है, यह तो नदियों और इस कुदरत से अपनी आने वाली हजारों पीढिय़ों के लिए एक बेहतर कल लेना है, और इस लेने की गारंटी के लिए धर्म के अवैज्ञानिक पाखंड से परे एक लोकतांत्रिक-वैज्ञानिक सोच की जरूरत है, और हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ही उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस एक दार्शनिक फैसले को काट नहीं सकेगी।

अयोध्या पर वार्ता संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट फैसले से न बचे

संपादकीय
21 मार्च 2017


कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह लिखा था कि बड़े-बड़े मामलों में भारत की अदालतें झिझक जाती हैं। कुछ ऐसा ही आज सुप्रीम कोर्ट ने किया जब उसने अयोध्या के बाबरी मुद्दे को अदालत के बाहर निपटाने की सलाह दी, और कहा कि दोनों पक्ष अगर मानें तो सुप्रीम कोर्ट अपने किसी जज को मध्यस्थता के लिए भी बिठा सकता है, और उच्च न्यायाधीश ने कहा कि जरूरत रहे तो वे खुद भी मध्यस्थ बनने को तैयार हैं। यह मामला आधी सदी से उत्तरप्रदेश के अयोध्या में चल रहा है कि जहां बाबरी मस्जिद थी, वहां पर क्या राम का जन्म हुआ था, और क्या बाबर ने उसी मंदिर की जगह पर मस्जिद बनाई थी? अदालत में इस मामले के चलते हुए भी 1992 में उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार ने मस्जिद को गिर जाने दिया था, और अदालत से किए गए अपने वायदे को नहीं निभाया था। इसके बाद की घटनाएं सब लोगों को याद हैं कि किस तरह देश भर में दंगे हुए, मुंबई बम धमाके हुए, गोधरा हुआ, और गुजरात दंगे हुए।
यह मामला निचली अदालत से लेकर उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट तक चलने में ही कई दशक लग गए। और हाईकोर्ट के फैसले के बाद उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील को भी कई बरस हो गए, लेकिन अदालत इस पर फैसले से एक किस्म से कतराती हुई दिखती है। यह बात किसी धर्म के मानने वाले तो कर सकते हैं कि आस्था किसी भी अदालत से ऊपर है, लेकिन अदालत का अपनी जिम्मेदारी से कतराना ठीक नहीं है। ऐसा भी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी नहीं है कि इसके पहले भी मध्यस्थता की बहुत कोशिश हो चुकी है, और बात किसी किनारे नहीं पहुंची है। इस बीच बाबरी मस्जिद को गिराने का मामला अदालत में चल ही रहा है, और चौथाई सदी बाद भी सबसे छोटी अदालत से भी किसी को सजा नहीं हुई है।
एक बात बड़ी साफ है कि बाबर ने अपने वक्त में जो किया होगा, उस वक्त तो इस देश में लोकतंत्र नहीं था, किसी संविधान का राज नहीं था, और सभी धर्मों के लिए बराबरी का दर्जा भी उन दिनों में नहीं था। इसलिए बीसवीं सदी में आकर, आजाद भारत की आधी सदी पूरी हो जाने के वक्त अगर बाबरी मस्जिद को सार्वजनिक उकसावे और भड़कावे से गिराया गया था, और जिसके नतीजे के रूप में हजारों जानें गई थीं, तो उस जुर्म का निपटारा तो जमीन के विवाद और मंदिर-मस्जिद के निपटारे से परे भी होना चाहिए था जो कि दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। ऐसा भी नहीं कि देश की सर्वोच्च अदालत को अलग-अलग मामलों में अलग-अलग महत्व समझ न आता हो, सुप्रीम कोर्ट संजय दत्त से लेकर सुब्रत राय सहारा तक के मामले अंधाधुंध रफ्तार से सुनने के लिए बैठ जाता है, और कई मामलों के लिए विशेष अदालत बना देता है, विशेष जांच दल बना देता है, अपनी निगरानी में जांच करवाता है, लेकिन ऐसी कोई भी प्राथमिकता बाबरी मस्जिद गिराने के मामले को देना सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी नहीं समझा, और इसके आरोपियों को केंद्रीय मंत्री बन जाने दिया, राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल बन जाने दिया, और अदालत को ऐसी कोई जल्दी नहीं दिखती है कि आजाद भारत के इस एक सबसे बड़े जुर्म पर इंसाफ हो जाए। ऐसा सुप्रीम कोर्ट आज हाईकोर्ट के सुनाए गए फैसले पर फैसला लेना से कतरा रहा है, और फिर एक ऐसी मध्यस्थता की बात कर रहा है कि जिसके चलते फिर कई दशक लग सकते हैं, और मस्जिद गिराने वाले जिंदगी पूरी जीकर चैन से आजाद चल बस सकते हैं। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और अदालत को अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए। अभी पहली प्रतिक्रिया यह आई है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है, और सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह फैसला सुनाए। इसके बाद अदालत के पास और कोई रास्ता नहीं बचता है, बजाय इसे निपटाने के। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट की सारी बातें केवल जमीन के हक के मुकदमे की रहीं, और उससे परे एक दूसरा मुकदमा मस्जिद गिराने का भी है, वह तो एक आपराधिक मामला है, और उसमें किसी मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है, इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत को इंसाफ की अपनी नीयत साबित करनी चाहिए। बहुत से फैसले कड़वे होते हैं, और कड़े मन से करने पड़ते हैं, लेकिन जो भी ताकत और फैसला की कुर्सी पर बैठते हैं, उन्हें कई बार अप्रिय काम भी करना पड़ता है, और सुप्रीम कोर्ट को इससे कतराने की अब कोई इजाजत नहीं मिल सकती क्योंकि एक पक्ष ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है।

सार्वजनिक पदों के लोग आस्था घर पर रखें

संपादकीय
20 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर एक बार फिर सरकारी पद पर किसी धर्म से जुड़े ऐसे व्यक्ति के बैठने का मुद्दा उठ रहा है जिसकी राजनीति धर्म के आधार पर चल रही हो। लेकिन यह ऐसा पहला मौका नहीं है। ठीक उन्हीं की तरह की भगवाधारी उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और लोगों को याद है कि किस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री-दफ्तर के अपने टेबिल पर ही मूर्तियों और मालाओं से मंदिर सा बना लिया था। दूसरी तरफ उत्तर-पूर्व में मिजोरम जैसे राज्य में लगभग सौ फीसदी ईसाई आबादी के चलते हुए सरकार पर चर्च का बेहद दबदबा हमेशा से दर्ज रहा है। पंजाब में अकाली दल सिख पंथ से जुड़ा हुआ है, और धार्मिक मामले वहां सरकारी कामकाज पर हमेशा से हावी रहे हैं। कुछ और संन्यासी या साध्वियां केंद्र और राज्यों में मंत्री रहते आए हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ में संत-कवि पवन दीवान भी शामिल थे।
भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोगों को सैद्धांतिक रूप से ऐसा होना चाहिए कि सभी धर्मों के लोगों की, और आस्तिकों को भी, ऐसे मंत्री-मुख्यमंत्री, ऐसे जज-अफसर पर भरोसा होना चाहिए। यह काम थोड़ा सा मुश्किल इसलिए है कि लोगों को किसी ओहदे पर रहते हुए भी अपनी धार्मिक या आध्यात्मिक आस्था को मानना जारी रखने की पूरी आजादी है, और इसके अलावा लोग जातियों के संगठन में भी सक्रिय रह लेते हैं। सरकारी दफ्तरों में लोग धर्म-आध्यात्म से जुड़ी हुई तस्वीरों को दीवारों पर और मेज के कांच के नीचे सजाकर रख लेते हैं, और अपनी गाडिय़ों में भी ऐसी तस्वीरें लगा लेते हैं। ऐसे बहुत से काम सरकारी खर्च पर भी होते हैं, और मध्यप्रदेश तो याद है कि उमा भारती ने मुख्यमंत्री निवास के अहाते में एक मंदिर भी बनवा लिया था।
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन में जनता के पैसों पर चलने वाले ऐसे ओहदों पर बैठे लोगों को अपनी आस्था घर पर रखनी चाहिए, और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र लचीला जरूर है, वह लोगों को कई तरह की छूट भी देता है, लेकिन नियमों से परे वह जिम्मेदारियों के कई तरह के तकाजे भी करता है, जिनके बिना लोकतंत्र, लोकतंत्र नहीं रह जाएगा। लोग महज अपने लिखित अधिकार का दावा करते रहें, और अपनी अलिखित जिम्मेदारी को मानने से इंकार करते रहें, या कतराते रहें, तो यह जनता के बीच अविश्वास पैदा करता है। अब हम नेहरू के जाने के आधी सदी बाद इस देश में नेहरू जैसे निरपेक्ष नेता की तो उम्मीद नहीं करते, क्योंकि ऐसे नेता तो खुद उनकी कांग्रेस पार्टी में भी नहीं रह गए हैं, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए। चारों तरफ अगर धर्मांधता का अंधेरा छा गया हो, तो भी लोकतंत्र की रौशनी की कोशिश खत्म नहीं करनी चाहिए। देश में यह चर्चा जरूर होनी चाहिए कि जनता की तनख्वाह पर बैठे लोग अपनी आस्था अपने घर पर रखें, और जनता के बीच एक भरोसा कायम रखें।

नफरतजीवी मुख्यमंत्री लोकतंत्र हक्का-बक्का

संपादकीय
19 मार्च 2017


देश के सबसे बड़े राज्य और देश में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश में कल भाजपा ने योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री के लिए तय करके देश की जनता के बीच एक बड़ा असमंजस खड़ा कर दिया है। ऐसा भी नहीं कि यह नाम कहीं से आयातित है, और इस पर कोई चर्चा ही नहीं थी, लेकिन किसी ने यह गंभीरता से सोचा नहीं था कि योगी मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं। लेकिन अब यह हकीकत सामने आई है, तो जनता को यह हैरानी है कि मोदी का विकास का नारा क्या हुआ?
सबका साथ और सबका विकास, यह नारा भाजपा चुनाव के पहले से लगाते आ रही है, लेकिन उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के प्रति उसका रूख पहले से ही साफ था जब 403 सीटों में से किसी एक सीट पर भी उसने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। और अब ऐसा लगता है कि यह चुनाव जीतने के लिए बिल्कुल सोची-समझी एक योजना थी जिसमें धर्म और जाति के समीकरणों के आधार पर मायावती की बसपा ने अनुपातहीन तरीके से अधिक से अधिक मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए, और समाजवादी पार्टी की बुनियाद खिसका दी। इसके बाद भाजपा का काम आसान था, और मोदी की लोकप्रियता जैसी बातें तो थीं ही। नतीजा यह है कि उत्तरप्रदेश में आबादी के 20 फीसदी से अधिक की मुस्लिम आबादी की भाजपा को कोई जरूरत नहीं रह गई है, और शायद यह भी एक वजह है कि आज खुलकर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया है जो कि मुस्लिमों से नफरत की बात करने की राजनीति ही करते आया है, और जिसकी साख गांव-गांव की मामूली बातों को लेकर साम्प्रदायिक दंगा खड़ा करने की है। उत्तरप्रदेश के अपने प्रभावक्षेत्र में आदित्यनाथ ने हिन्दू धर्म के नाम पर एक ऐसा आक्रामक संगठन खड़ा करके रखा है जो कि रात-दिन मुस्लिमों को मटियामेट करने का मुद्दा लेकर चलता है। ऐसी साख वाले आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना, ढाई बरस बाद के आम चुनाव में एक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका बताता है।
लोकतंत्र की सारी सोच, और भारतीय संविधान की शपथ आदित्यनाथ के नाम के आगे दम तोड़ देती हैं। उनके तौर-तरीकों और उनकी हिंसा के साथ किसी लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती, और यह देश के सबसे बड़े राज्य में एक सबसे बड़ा साम्प्रदायिक प्रयोग भी होते दिख रहा है। वे किस तरह सरकार चलाएंगे, यह अटकल लगाना अभी मुमकिन नहीं है लेकिन देश के अमन-पसंद लोग आज आशंकाओं से भरे हुए निराश बैठे हैं, और भाजपा ने बिना किसी मजबूरी के जब योगी को उस ओहदे के लिए चुना है, तो आने वाले कुछ बरस तक मोदी सरकार और उनकी भाजपा की सोच और रणनीति इससे साफ भी होती है। भाजपा में अब हिन्दू-साम्प्रदायिकता की साख वाले लोगों को कोई खतरा नहीं है, उनकी संभावनाएं हैं, और यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक फिक्र की बात है। उत्तरप्रदेश में भाजपा के सामने आदित्यनाथ से बेहतर नाम मौजूद थे, लेकिन इस नफरतजीवी नेता को ऐसा नाजुक राज्य दे देना लोकतंत्र को हक्का-बक्का करता है। 

चेन्नई में सड़क पर मौत से सबक लेना जरूरी

संपादकीय
18 मार्च 2017


तमिलनाडू के चेन्नई से एक ऐसी खबर आई है जो तकलीफ देने वाली तो है ही लेकिन उससे कुछ सबक लेने की भी जरूरत है। एक पेशेवर कार रेस चालक अश्विन सुंदर अपनी पत्नी के साथ कार से जा रहे थे, और पेड़ से टकराकर कार जलकर राख हो गई, और दोनों की मौत हो गई। यह वैसे तो महज एक दुर्घटना है, लेकिन इससे यह समझ पड़ता है कि ऐसे माहिर कार चालक से भी एक्सीडेंट हो सकता है, और इतना बुरा हो सकता है।
हिन्दुस्तान दुनिया में सबसे अधिक सड़क हादसों वाला देश है, और यहां पर कई वजहों से इस नौबत को सुधारने की जरूरत है। इस देश में हर जगह कुछ हिस्सों में सड़कें 21वीं सदी की बन गई हैं, और उन्हीं के आसपास की दूसरी सड़कें पिछली सदी में चल रही हैं। बहुत सी गाडिय़ां, बैलगाडिय़ां, खच्चर गाडिय़ां, हाथधक्के के ठेले, ये सब सौ बरस से भी पहले से चल रहे हैं, और इन्हीं के बीच दूसरे देशों में बनकर जहाज पर लदकर आने वाली बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं जो कि सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हैं। पच्चीस-पचास लाख दाम की मोटरसाइकिलें हैं जो कि पलक झपकते आंखों से ओझिल हो सकती हैं, और दूसरी तरफ सड़क के ट्रैफिक नियमों के लिए हिन्दुस्तानियों के मन में एक आम हिकारत है। ऐसे में सड़कें तो गोली की रफ्तार से भागती गाडिय़ां देखती हैं, लेकिन उन पर पैदल और साइकिल पर चलने वाले ऐसे लोग भी हैं जो कि उस रफ्तार के बीच सड़क पार भी नहीं कर पाते।
एक युग से दूसरे युग में ट्रैफिक को ले जाने का यह दौर अगले कुछ दशकों तक इसी तरह मिलाजुला चलते रहेगा, और इस बीच सड़कों पर जिंदगियों को बचाना एक बड़ी चुनौती है। सड़क हादसे बहुत से तो ऐसे रहते हैं जो कि टाले जा सकते हैं, और इसी बात पर मेहनत करने की जरूरत है। लोग दुपहिया चलाते हुए हेलमेट लगाने को तैयार नहीं होते, जबकि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में हर दिन एक से अधिक लोग दुपहिया-सड़क हादसे के शिकार होकर जान खो बैठते हैं। शराब पीकर गाडिय़ां चलाते हुए लोग खुद भी मरते हैं, और दूसरों को भी मारते हैं। सीट बेल्ट की लागत गाडिय़ों के दाम में जुड़कर आती है, लेकिन लोग इस सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते, और दुर्घटना में बचने की संभावना पहले ही खो बैठते हैं।
भारत सरकार देश में सड़क हादसों की नौबत से परेशान भी है, और अभी एक ऐसे बीमे का इंतजाम किया जा रहा है जिसमें सड़क पर दुर्घटना-मौत होने पर दस लाख रूपए का मुआवजा मिल सके। लेकिन रूपयों से जिंदगी नहीं लौटती, और सरकार के साथ-साथ समाज और परिवार को भी यह जिम्मा उठाना चाहिए कि अपने लोगों पर हेलमेट और सीट बेल्ट के लिए जोर डालें, रफ्तार काबू में रखने कहें, और नशे में गाड़ी न चलाने दें। इतनी ही बातों पर जोर डाल दिया जाएगा, तो शायद तीन चौथाई दुर्घटना-मौतें टल जाएंगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि सड़कों पर लापरवाह लोग न केवल अपनी जिंदगी खोते हैं, बल्कि उन बेकसूर लोगों की जिंदगी भी ले लेते हैं जो कि नियमों का पालन करके चलते हैं।
ट्रैफिक पर काबू रखना राज्य सरकारों का जिम्मा है, और हम देखते हैं कि छत्तीसगढ़ में भी कभी-कभी हवा के झोंके की तरह सरकार को ट्रैफिक  नियम लागू करने की सूझती है, और फिर बात आई-गई हो जाती है। जो बच्चे अपने मां-बाप को लापरवाह ड्राइविंग करते देखते हैं, वे वैसा ही सीखते भी हैं। इसलिए सरकार को तेजी से ट्रैफिक सुधारना चाहिए, और उसका असर आने वाली पीढ़ी पर तुरंत होने भी लगेगा। 

फ्रांस में एक अतिदक्षिणपंथी नेता के बेटे ने की बड़ी हिंसा

संपादकीय
17 मार्च 2017


फ्रांस के एक स्कूल में आज 16 बरस के एक लड़के ने बंदूक-पिस्तौल और हथगोले से लैस होकर प्रिंसिपल और दूसरे बच्चों पर गोलीबारी की, जिसमें कई लोग घायल हो गए, और यह लड़का भी गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके फेसबुक पेज पर हिंसा और नफरत से भरी हुई तस्वीरें भरी पड़ी थीं, और उसे हथियारों से खास लगाव था। स्कूल में वह दूसरे बच्चों से अलग-थलग रहता था, और सबसे बड़ी बात यह है कि उसका पिता फ्रांस का एक अतिदक्षिणपंथी राजनेता है। योरप में ऐसे अतिदक्षिणपंथी लोग नस्लवादी हिंसा को बढ़ावा देने वाले माने जाते हैं, और आमतौर पर शरणार्थी, अप्रवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों के खिलाफ मुद्दे उठाकर राजनीति करते हैं।
किसी एक मामले को लेकर बहुत लंबा-चौड़ा निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होता, लेकिन हम इसे न सिर्फ हिन्दुस्तान से, बल्कि दुनिया की बाकी जगहों से भी जोड़कर एक मोटी बात करना चाहते हैं। जो लोग नफरत और हिंसा की बात करते हैं, चाहे वे अमरीका में हों, फ्रांस या जर्मनी में हों, हॉलैंड या हिन्दुस्तान में हों, ऐसे लोग न सिर्फ मौजूदा हवा को खराब करते हैं, बल्कि वे विरासत में नफरत की ऐसी फसल छोड़कर जाते हैं जो कि आने वाली कई पीढिय़ों को अपने जहर से तबाह करती है। ये बातें परिवार के भीतर हिंसक बातों से लेकर, समाज और देश में सार्वजनिक रूप से हिंसा या नफरत की बातों तक फैली रहती हैं, और इनका खतरा तुरंत तो नहीं दिखता है, लेकिन बचपन से ही लोगों पर इसका असर पडऩे लगता है। जिन परिवारों में मां-बाप सिगरेट-तम्बाखू, या शराब-जुएं की लत रखते हैं, उन परिवारों में बच्चों का भी इस खतरे में पडऩा अधिक होता है। जहां पर मां-बाप जाति या धर्म के आधार पर, विचारधारा या रंग के आधार पर नफरत की बातें करते हैं, वहां पर बच्चे तुरंत ही नफरत को अपना लेते हैं, और उसे आगे भी बढ़ाते चलते हैं।
यह सिलसिला आने वाली दुनिया को अपने ही बच्चों के लिए एक अधिक खतरनाक जगह बनाकर छोड़कर जाने का रहता है, और इससे तमाम लोगों को बचना चाहिए। जिस तरह से कई बच्चे परिवार के पेशे को अपना लेते हैं, और अपने मां-बाप की तरह उन्हीं के काम को करने लगते हैं, उसी तरह हिंसा का सिलसिला भी अगली पीढ़ी तक आगे बढ़ता है, और हो सकता है कि वह अधिक खतरनाक दर्जे की हिंसा बनकर और आगे की पीढिय़ों तक जाने लगे। इसलिए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि विरासत में महज जमीन-जायदाद, या दौलत छोड़कर जाना काफी नहीं है, बल्कि अच्छी मिसालों और अच्छी सोच को छोड़कर जाना भी जरूरी है। दुनिया में नस्ल के आधार पर या रक्त के आधार पर कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह पारिवारिक माहौल के आधार पर होता है, सामाजिक-पर्यावरण के आधार पर होता है, और चारों तरफ देखे-सुने के असर से होता है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी में नफरत और हिंसा की बातें करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने बच्चों को एक बड़े खतरे में भी डाल रहे हैं, जिससे कि किसी दिन या तो वे हिंसा में मारे जा सकते हैं, या हिंसा करके दूसरों को मार सकते हैं। 

लोकतंत्र के भीतर गुंजाइश है लोकतंत्र पर हमले की...

संपादकीय
16 मार्च 2017


अभी योरप के हॉलैंड में चुनाव हो रहे हैं, तो वहां पर एक घोर दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री-प्रत्याशी ने मुस्लिमों के खिलाफ कुछ उसी तरह का हमलावर अभियान छेड़ा है जैसा कि ट्रंप ने अपने चुनाव में अमरीका में छेड़ा था। अब यह चल ही रहा था कि वहां पहुंचे हुए तुर्की के शरणार्थियों के बीच प्रचार करने के लिए तुर्की के एक मंत्री पहुंच गए जिन्हें देश में दाखिला नहीं मिला, और विमानतल से ही बाहर रवाना कर दिया गया। ऐसा ही अभी जर्मनी में वहां जगह पाए हुए लाखों तुर्क शरणार्थियों के लिए हो रहा है जहां कि तुर्की के एक मंत्री पहुंचकर प्रचार कर रहे हैं। ऐसी कुछ अलग-अलग मिसालें योरप के अलग-अलग देशों में सामने आ रही हैं जहां पर कहीं मुस्लिम धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों पर रोक लगाई जा रही है, तो कहीं शरणार्थियों को जगह देने या न देने के मुद्दे पर देश यूरोपीय यूनियन छोड़ रहे हैं या छोडऩे की घोषणा कर रहे हैं। इन तमाम बातों पर खुलासे से यहां चर्चा मुमकिन नहीं है, लेकिन इन सबसे लोकतंत्र की एक बुनियादी सोच को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं।
दुनिया में इंसान लाखों-बरसों से हैं, धर्म कुछ हजार बरसों से हैं, और लोकतंत्र कुछ सौ बरसों से है। यह लोकतंत्र भी दुनिया के अलग-अलग देशों में धीरे-धीरे लोकतांत्रिक हो पाया है, और इसके साथ-साथ लोगों की धार्मिक आजादी, लोगों की सामाजिक आजादी, और दुनिया के देशों के एक-दूसरे के प्रति सामाजिक सरोकार धीरे-धीरे विकसित हुए। आज योरप में जिस तरह शरणार्थियों को लेकर कई देश तनाव से गुजर रहे हैं, उनके सामने भारत की एक मिसाल रखने की जरूरत है कि इस देश ने किस तरह तिब्बत के लोगों को शरण दी, बांग्लादेश के लोगों को शरण दी, और अब म्यांमार के लोगों को शरण दे रहा है। ऐसा नहीं कि भारत में संस्कृतियों के टकराव की नौबत नहीं आ सकती थी, लेकिन भारत के इतिहास के कुछ महान नेता जनता पर इतना प्रभाव रखते थे कि उनके शरण के फैसले को भी लोगों ने अपनी तकलीफ के बावजूद देश और दुनिया के हित का माना था। जब बांग्लादेश के शरणार्थियों को भारत में जगह दी गई, तो उस खर्च को उठाने के लिए सिनेमा टिकटों पर शरणार्थी-टैक्स लगाया गया था, और छत्तीसगढ़ ऐसे टैक्स का भी गवाह रहा, और यहां बसाए गए दसियों हजार शरणार्थियों को छत्तीसगढ़ी मान लेने की दरियादिली इस प्रदेश ने दिखाई थी। छत्तीसगढ़ के मैनपाट में तिब्बती शरणार्थी भी बसे हुए हैं, और उनको लेकर भी कोई तनाव नहीं हुआ।
लेकिन आज योरप में जिस तरह से बड़ी संख्या में सीरिया और दूसरे मुस्लिम देशों से मुस्लिम शरणार्थी पहुंचे हैं, उन्हें लेकर योरप के देश एक सांस्कृतिक तनाव से भी गुजर रहे हैं, और वहां की जनता भी इतने शरणार्थियों को वहां देखकर अपनी हिफाजत के लिए फिक्रमंद हो गई है। ऐसे में जगह-जगह नस्लवादी, धार्मिक भेदभाव करने वाली, और शरणार्थियों के साथ उदारता का विरोध करने वाली पार्टियों को सिर बिठाने का मौका मिल रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अमरीकी मतदाताओं के एक तबके के बीच ट्रंप को इन्हीं मुद्दों से समर्थन मिला था। अब यहां गौर करने की बात यह है कि लोकतंत्र के भीतर अलोकतांत्रिक सोच को भी जगह पाने और पनपने की गुंजाइश मिलती है। लोकतंत्र इतनी लचीली व्यवस्था है कि यह अपने पर हमला करने वाले लोगों को भी बहुत दूर तक और बहुत देर तक बर्दाश्त करता है। भारत में ही हम देखते हैं कि किस तरह जो नक्सली लगातार लोकतंत्र को खत्म करने का बीड़ा उठाए हिंसा कर रहे हैं, उन्हें भी लोकतंत्र बर्दाश्त करता है, और एकमुश्त नहीं कुचलता है।
दुनिया में कई वजहों से लोकतंत्र अलग-अलग जगहों पर तनाव से गुजर रहा है। कई लोगों को यह लग रहा है कि लोकतंत्र एक अच्छी व्यवस्था नहीं है, और इसके तहत मिलने वाली रियायतों को खत्म किया जाना चाहिए, या कि कम किया जाना चाहिए। यह पूरा दौर लोकतंत्र की उदारता के करवट बदलने का चल रहा है, और भारत भी इस दौर से अनछुआ नहीं है। भारत में भी धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता को हथियार बनाकर चलने वाले लोग अब किसी शर्मिंदगी के शिकार नहीं दिखते। आने वाला दौर पूरी दुनिया में एक दिलचस्प, और खतरनाक इतिहास दर्ज करते दिख रहा है।

राजनीतिक कीर्तन या निंदा से परे आत्ममंथन की जरूरत

संपादकीय
15 मार्च 2017


भारत में राजनीति और बाकी तमाम किस्म के सार्वजनिक मुद्दों पर अब गंभीर लिखे हुए की जरूरत, और उसका वजन, दोनों ही घट गए हैं। अब सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोग चटपटे, पैने, तेजाबी, और झूठे पोस्ट करके अपनी पढऩे और लिखने की जरूरत को पूरा कर लेते हैं। ऐसे में किसी मुद्दे पर गंभीर विश्लेषण धरे रह जाता है, और लोग जिस तरह पहले टीवी चैनलों में समाचारों की सुर्खियों से प्रभावित होते थे, उसी तरह आज वॉट्सऐप या ट्विटर-फेसबुक की पोस्ट से प्रभावित हो जाते हैं, और मुद्दे की बात धरी रह जाती है। अभी पांच राज्यों के चुनावी नतीजों को देखते हुए कुछ ऐसा ही चल रहा है कि ऐसे नतीजों के पीछे जो वजहें हैं, उन पर बात होने के बजाय मोदी-भक्तों और मोदी-विरोधियों के बीच अपनी भावनाओं की बहस चल रही है, और दिमाग को मोटे तौर पर अलग रख दिया गया है।
चार बिल्कुल अलग-अलग किस्म के पांच राज्यों के चुनावी नतीजों को देखते हुए आज अगर मोदी का मूल्यांकन हो, या राहुल को आंका जाए, या माया-अखिलेश का भविष्य सोचा जाए, तो यह सब बहुत जटिल है। लेकिन जब 140 अक्षरों के ट्वीट पर विश्लेषण कर दिया जाता है, तो लोग अतिसरलीकरण के शिकार हो जाते हैं। और आज यही हो भी रहा है। मोदी की उत्तरप्रदेश में इस ऐतिहासिक जीत को जो लोग वोटिंग मशीन का घपला मानकर चल रहे हैं, वे लोग अपने आपको धोखा दे रहे हैं। अगर मोदी या किसी के भी हाथ में मशीनों से छेड़छाड़ की ताकत होती, तो पंजाब में अकाली-भाजपा आज फुटपाथ पर क्यों बैठे होते? और गोवा या मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा क्यों खो चुके होते? पांचों राज्यों में एक ही तरह की ईवीएम मशीनें इस्तेमाल हुई हैं, और अगर कोई जालसाजी मुमकिन थी, तो भाजपा पंजाब को क्यों खोती? लेकिन राजनीति में अपने ही पहले के किए हुए का भुगतान आगे चलकर अक्सर करना पड़ता है, और भाजपा के भीतर सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर नरसिम्हा राव तक कई लोग लगातार ईवीएम के खतरे गिनाते आए थे, और चुनाव विश्लेषक से भाजपाई नेता बने नरसिम्हा राव ने तो इस पर एक किताब भी लिखी थी, इसलिए जो सत्ता में रहेगी, उस पार्टी को ऐसी तोहमत तो झेलनी पड़ेगी।
लेकिन आज कांग्रेस, सपा, बसपा, और आम आदमी पार्टी के खुद के हित में यह है कि वे बैठकर अपने घर को सम्हालने के लिए आत्मचिंतन करें, आत्ममंथन करें, और अपनी कमियों से उबरने की कोशिश करें। हमारा यह मानना है कि इन पांचों राज्यों में, हारने वालों के साथ-साथ, सरकार बनाने वाली बीजेपी के लिए भी समझने और सीखने का बहुत कुछ है, और चुनाव के बाद जीत-हार से परे पार्टियों को अनिवार्य रूप से यह काम करना चाहिए, अगर उन्हें चुनावी राजनीति से बाहर नहीं होना है तो। हम सपा, कांग्रेस, बसपा, या केजरीवाल की संभावनाओं को खारिज नहीं करते। इस देश में पिछली चौथाई सदी में ही भाजपा लोकसभा की अपनी दो सीटों से बढ़ते हुए आज ऐतिहासिक बहुमत तक पहुंची है, और अब हाल यह है कि उसके विरोधी भी कई बरस बाद के लोकसभा चुनाव में मोदी को विजेता मान रहे हैं। ऐसी स्थिति मोदी और भाजपा के लिए एक अलग तरह की चुनौती हो सकती है, लेकिन हारी पार्टियों को न सिर्फ अपनी खामियों को समझना है, बल्कि उनसे उबरना भी है, वरना वे जो शून्य छोड़ेंगे, उसे भरने के लिए मोदी और उनके साथी तैयार खड़े हैं। यही हाल 2014 के आम चुनावों में हुआ था जब यूपीए के दलों ने मतदाताओं के सामने एक बड़ा शून्य छोड़ा था, और मोदी एक अंधड़ की रफ्तार से उस शून्य को भरने के लिए पहुंच गए थे। आज भी भाजपा और खासकर नरेन्द्र मोदी ऐसी क्षमता साबित कर चुके हैं कि देश की चुनावी राजनीति में जहां भी जो पार्टी शून्य छोड़ेगी, उसे भरने की ताकत कमल छाप में है। भाजपा का देश के नक्शे पर ऐसा विस्तार अभूतपूर्व है, और भाजपा के समर्थक बहुत गलत नहीं है, जब वे कई सौ बरस पहले के एक मराठा शासनकाल के भगवा रंग के नक्शे को आज के नक्शे में भाजपा राज्यों के साथ रखकर देख रहे हैं। मोदी बाकी तमाम पार्टियों के लिए, खुद अपने गठबंधन के साथियों के लिए भी, एक अभूतपूर्व किस्म की अनोखी राजनीतिक चुनौती हैं, और मोदी की खूबियों का अध्ययन किए बिना, उसकी काट निकाले बिना, उनको परास्त करना आज मुमकिन नहीं है, 2019 के लोकसभा चुनाव में भी शायद नहीं रहेगा।

कांग्रेस का राहुलमुक्त होना आज उसके जिंदा बचने की पहली शर्त

संपादकीय
12 मार्च 2017


कल आए विधानसभा चुनाव नतीजों को लेकर मोदी की सुनामी जैसी बातें लगातार कही और लिखी जा रही हैं। लेकिन तारीफ की इस सुनामी में राहुल गांधी के हिस्से अभी महज लतीफे आ रहे हैं। इस हफ्ते इन पांचों राज्यों में नई सरकारें बन जाएंगी, और उसके बाद दिल्ली में हर कोई थकान को कुछ हद तक दूर करने के हकदार हो जाएंगे, लेकिन इस वक्त देश में सबसे अधिक आत्ममंथन की जरूरत अगर किसी को है, तो वह कांग्रेस पार्टी को है। कांग्रेस के साथ-साथ इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के मौजूदा ताजा और नौजवान मुखिया अखिलेश यादव भी फिलहाल डूबकर राज्य की राजनीति की तलहटी में पहुंच गए हैं, लेकिन उनके पास 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले साबित करने को कुछ नहीं है, उत्तरप्रदेश के बाहर उनकी साख कहीं और दांव पर नहीं लगी है। मायावती भी मोटेतौर पर उत्तरप्रदेश में हाशिए पर किनारे हो चुकी हैं, और बाकी कहीं उनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसा नहीं है। पूरे देश में बिखरी हुई यह पार्टी आज भी भाजपा के सामने सबसे विस्तृत अस्तित्व वाली पार्टी है, और इसे अपने भविष्य के बारे में सबसे अधिक सोचने की जरूरत है। राजनीति में राख के ढेर से निकलकर बहुत से नेता और बहुत सी पार्टियां इतिहास बनाते आए हैं, इसलिए कांग्रेस को आज हाथ डालकर बैठ जाने की जरूरत नहीं है, अपनी खामियों और खूबियों के बारे में सोचकर आगे काम करने की जरूरत है, और जैसा कि कल जम्मू-कश्मीर के उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि लोगों को 2019 के आम चुनाव में मोदी को शिकस्त देने की नहीं सोचनी चाहिए, 2024 के चुनाव के हिसाब से तैयारी करनी चाहिए। लोगों को यह भी याद होगा कि समय-समय पर भारत की क्रिकेट टीम को भी कुछ बरसों के लिए सन्यास ले लेने की सलाह दी जाती थी, और अभी एक या दो ओलंपिक पहले तक भारत को ओलंपिक से कुछ वक्त के लिए सन्यास लेने की सलाह दी गई थी, और उस नौबत से उबरकर भारत के खिलाडिय़ों ने आसमान पर पहुंचकर दिखा भी दिया है।
अब कांग्रेस की अगर बात करें, तो उसके मर्ज की शिनाख्त अधिक मुश्किल भी नहीं है। जिस राहुल गांधी को कांग्रेस अपना वर्तमान और अपना भविष्य बनाकर चल रही है, वे आज कांग्रेस के लिए रेस का घोड़ा न होकर बाधा दौड़ का बैरियर हो गए हैं। साफ-साफ कहें तो भाजपा इस देश को कांग्रेसमुक्त करने के अपने नारे को तकरीबन कामयाब करते दिख रही है, और अगर कांग्रेस पार्टी ने अपने आपको राहुलमुक्त नहीं किया, तो देश कांग्रेसमुक्त हो जाना तय दिख रहा है। एक आध्यात्मिक संगठन अपने किसी मनचाहे गुरू के मातहत पूरी जिंदगी चला सकता है, कोई धर्म अपने ईश्वर या अपने गुरू के तहत अनंतकाल तक चल सकता है। लेकिन जब बात मुकाबले की होती है, जब दूसरी पार्टियों के मुकाबले चुनाव लड़ा जाता है, नेताओं के मुकाबले दूसरे नेताओं की तस्वीरें टीवी के पर्दों पर दिखती हैं, अखबारों में छपती हैं, तो फिर ऐसी तुलना में अपने कुलदेवी या कुलदेवता के प्रति आस्था जनता के गले नहीं उतारी जा सकती। इसलिए कांग्रेस के नेता अपने घर के भीतर चाहे जिसकी पूजा करें, अगर उन्हें असल राजनीति में किसी लीडर के पीछे चलकर सत्ता तक पहुंचना है, तो उन्हें अपना लीडर ऐसा छांटना होगा जो आज की चुनावी राजनीति में विरोधियों या प्रतिद्वंदियों के मुकाबले कहीं टिक सके।
कांग्रेस की आज दिक्कत यह है कि मोदी हो या कोई और, कांग्रेस के पास दिखाने को महज राहुल गांधी का चेहरा है, और यह चेहरा जनधारणा के मुताबिक बहुत ही मामूली समझ वाला चेहरा है। लोग राहुल गांधी को इतने बरसों की कांग्रेसी-मेहनत के बावजूद गंभीरता से नहीं ले पाए हैं, क्योंकि राहुल में लीडरशिप की खूबियां सिरे से ही नहीं उपज पाई हैं, नहीं पनप पाई हैं। राहुल गांधी की अगुवाई में 2019 या 2024 में भी कांग्रेस पार्टी कभी सत्ता तक पहुंच पाएगी, ऐसा कोई संकेत आज नहीं मिलता। कांग्रेस के इतिहास में इतनी कमजोर लीडरशिप कभी याद नहीं पड़ती, और जब देश की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी थी, तो उसके प्रधानमंत्री अघोषित रूप से पार्टी के मुखिया भी रहते थे, और वैसे में कुछ अरसे के लिए सीताराम केसरी जैसे बेअसर नेता भी खप गए थे। लेकिन अब वक्त अलग है, और आज की चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी जैसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कामयाब नेता के मुकाबले राहुल गांधी तब तक महज एक लतीफा बने रहेंगे, जब तक कोई तिलस्मी ताबीज या तो उन्हें लीडर न बना दे, या फिर कोई भयानक भूल मोदी को नायक से खलनायक न बना दे। इन दो में से कोई एक बात जब तक न हो जाए, तब तक मोदी के मुकाबले राहुल का कोई भविष्य नहीं है, और अपने आपमें भी कांग्रेस पार्टी का राहुल के मातहत कोई भविष्य बचा है।
जिंदगी में ऐसे बहुत से मौके आते हैं जब लोगों को अपना निजी त्याग करके अपने संगठन को, अपने कारोबार को, अपने परिवार को, अपने समाज को बचाने का काम करना पड़ता है। क्रिकेट जैसे खेल में कई बार खिलाड़ी खुद होकर सन्यास ले लेते हैं, क्योंकि उनके कमजोर खेल से उनकी टीम का रिकॉर्ड बर्बाद होने लगता है। आज जाहिर है कि राहुल गांधी के पास मशविरा देने के लिए कोई हौसलेमंद सलाहकार बचे नहीं हैं, वरना उन्हें यह सुझाया गया होता कि अब उन्हें अपने पुरखों की इस पार्टी को जिंदा रखने के लिए इसकी लीडरशिप छोड़ देनी चाहिए, और पार्टी का एक कार्यकर्ता बनकर काम करना चाहिए, और यह घोषणा करनी चाहिए कि वे अपनी पार्टी, या पार्टी की सरकार में कोई भी ओहदा नहीं लेंगे। हम यह नहीं मानते कि सौ से अधिक बरस पुरानी इस विशाल पार्टी में अपने किसी नेता में संभावनाएं तलाशने की ताकत नहीं है। लेकिन जब तक नेहरू-गांधी कुनबे का यह बोझ इस पार्टी पर लदा रहेगा, तब तक यह अपनी संभावनाओं से कोसों दूर रहेगी। भारतीय जनता पार्टी के आगे बढऩे की सबसे बड़ी वजह यही रही कि वह कुनबापरस्ती से आजाद रही, और इसकी लीडरशिप कभी किसी कुनबे के कब्जे में नहीं रही। नया खून आते रहा, लोगों को पार्टी के भीतर अपनी संभावनाएं दिखती रहीं, और इसलिए लोग काम करते रहे। किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन में इस तरह का काम नहीं होता, वहां पर कीर्तन में एक सुरताल में सिर हिलाना जरूर होता है, लेकिन ऐसी नौबत में राजनीतिक पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। एक कुनबे या एक व्यक्ति के कब्जे की पार्टियों का हाल अखिलेश, माया, और बादल बाप-बेटे की शक्ल में इस बार भी सामने आया है। दूसरी तरफ कुनबे से परे के मोदी की एक बड़ी ताकत यह भी है कि वे कुनबे के बोझ से आजाद हैं।
देश का कांग्रेसमुक्त होना लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात नहीं होगी, क्योंकि इस पार्टी की सोच में आज भी राष्ट्रीय स्तर की, राष्ट्र के हित की, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की कुछ-कुछ बातें बाकी हैं, कायम हैं, लेकिन कांग्रेस का राहुलमुक्त होना आज उसके जिंदा बचने की पहली शर्त दिख रही है।

उप्र में मोदी की ट्रिपल सेंचुरी ! कई दलों को आत्ममंथन मिला

संपादकीय
11 मार्च 2017


पांच राज्यों के चुनावी नतीजे अकेले उत्तरप्रदेश से लदे हुए दिख रहे हैं, क्योंकि देश का यह सबसे बड़ा राज्य मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अधिक सांसद भेजने वाला भी था, और इस राज्य में प्रदेश के किसी भाजपा नेता की साख दांव पर नहीं लगी थी, अकेले नरेन्द्र मोदी के सिर पर ठीकरा रखा हुआ था। लेकिन जो नतीजे आए हैं, वे शायद लोकसभा के चुनावी नतीजों की तरह भाजपा की भी उम्मीद से भी बेहतर हैं, और अभी तक के आंकड़े बता रहे हैं कि उत्तरप्रदेश की 403 सीटों में से भाजपा, अपने दो छोटे सहयोगी दलों के साथ गठबंधन से 300 से अधिक पर जीत की ओर है। देश के एक भी एक्जिट पोल सर्वे ने इस तरह की अटकल नहीं बताई थी, और यह जीत अकेले नरेन्द्र मोदी की जीत कही जाएगी, क्योंकि हार होने पर उन्हीं पर ठीकरा फोड़ा जाता।
लेकिन एक पल के लिए इन पांच राज्यों पर एक नजर डालना ठीक होगा क्योंकि राज्य छोटे हों, या बड़े हों, भारत के संघीय ढांचे में यह तो गिनाता ही है कि कितने राज्यों में किस पार्टी या गठबंधन की सरकारें हैं। इस हिसाब से अगर देखें, तो कांग्रेस पार्टी का हाल बहुत बुरा नहीं दिख रहा है, क्योंकि उसने दस बरस बाद न सिर्फ अकाली दल-भाजपा गठबंधन से राज्य की सत्ता से छीन ली है, बल्कि उसने आम आदमी पार्टी के सरकार बनाने के दावे को भी खारिज करवा दिया है। गोवा और मणिपुर में इस पल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों की खींचतान चल रही है, और कुछ समय बाद तस्वीर साफ होगी। लगे हाथों पांचवें राज्य उत्तराखंड की चर्चा जरूरी है जहां पर कांग्रेस की बुरी शिकस्त हो रही है, और भाजपा की सरकार बन रही है।
अब पूरा खाताबही एक साथ देखें तो लगता है कि भाजपा गोवा में राज्य खोए या न खोए, वोट तो खो ही रही है, पंजाब में अपने बड़े भागीदार अकाली दल के साथ सत्ता से बाहर हो रही है, लेकिन वह उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, और मणिपुर भी हासिल कर सकती है। लेकिन इन पांचों राज्यों को मिला लें, तो अकेले उत्तरप्रदेश की 403 सीटें, बाकी चार राज्यों की कुल मिलाकर 287 सीटों के मुकाबले न सिर्फ गिनती में बहुत अधिक हैं, बल्कि वोटरों की गिनती के हिसाब से भी उत्तरप्रदेश के वोटर बाकी चारों राज्यों के वोटरों से बहुत अधिक है। इसलिए नरेन्द्र मोदी की इज्जत दांव पर देखने वाले उत्तरप्रदेश की यह जीत आकार में बहुत ही विशाल है, और जिस तरह की कमजोर और बुरी हार समाजवादी पार्टी, बसपा, और कांग्रेस की हुई है, वह हार इन पार्टियों के तात्कालिक भविष्य के लिए बहुत विकराल भी है। ऐसी ही बुरी हार पंजाब में अकाली बाप-बेटे को नसीब हुई है जो कि दस बरस से सत्ता को डेयरी की मशीन बनकर इतना दुह रहे थे कि राज्य के थनों से खून भी निकल आ रहा था। और अगर यहां पर आम आदमी पार्टी की चर्चा शुरू करके खत्म कर ली जाए, तो वह यह है कि इस पल के आंकड़े उसे पंजाब में अकाली-भाजपा से बड़ा विपक्षी दल बनते दिखा रहे हैं, और यह आप की सरकार बनने के अलावा दूसरी सबसे अच्छी नौबत दिख रही है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के पांव इस चुनाव में बड़ी अच्छी तरह जमते दिख रहे हैं, और दिल्ली प्रदेश के बाद यह पार्टी पंजाब में एक तीसरी ताकत बनती दिख रही है।
उत्तरप्रदेश के चुनाव विश्लेषणों में बहुत सी बातें कही जा रही हैं। इनमें एक बात तो यह कि  समाजवादी पार्टी में बाप-बेटे का झगड़ा उसे भारी पड़ा। मुलायम सिंह प्रचार को नहीं निकले, और इस वजह से सपा की यह दुर्गत हुई। लेकिन दूसरी तरफ कल तक के विश्लेषण यह भी कहते थे कि मुलायम सिंह ने खुद होकर हाशिए पर जाकर बेटे के लिए खुला मैदान छोड़ा, और इससे एक नौजवान खून को खुलकर काम करने का मौका भी मिलेगा। सपा की राजनीति के भीतर-बाहर के लोग यह भी कहते थे कि बेटे की छवि निखारने के लिए बाप ने यह नौटंकी की थी, और इस बहाने उसने पार्टी के भीतर के सारे अखिलेश-विरोधियों की शिनाख्त करवाकर उन्हें बाहर भी करवा दिया था। तीसरी बात यह कही जा रही थी कि अखिलेश और राहुल गांधी मिलकर एक नौजवान चेहरा, साफ-सुथरा चेहरा पेश कर रहे हैं, और इससे इनको फायदा होगा। खुद अखिलेश कांग्रेस से गठबंधन के पहले से यह कहते आए थे कि कांग्रेस के साथ मिलकर लडऩे पर 300 से अधिक सीटें मिलेंगी। आज हालत यह है कि यह गठबंधन पौन सौ सीटें भी नहीं पा रहा। इसलिए उत्तरप्रदेश में भाजपा की, या बेहतर होगा कहना कि, मोदी की इस ऐतिहासिक जीत को न तो सत्ता के खिलाफ जनता की नाराजगी कहा जा सकता, न ही मीडिया को खरीदकर चुनाव जीतना कहा जा सकता, न ही मुस्लिम आतंकियों की खबरों से यह चुनाव जीता गया, न ही यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से हासिल जीत है, और न ही मायावती की मदद से भाजपा को 300 से अधिक सीटें मिलीं। भाजपा की उत्तरप्रदेश की जीत एक बिल्कुल खालिस और विर्विवाद जीत है, जिसे कि ऊपर की तमाम तरकीबों से भी नहीं पाया जा सकता था। बनारस में मोदी के तीन-चार दिन लगातार काम प्रचार करने को लेकर बहुत से कार्टून बने, लेकिन आलोचना में इस बात को अनदेखा कर दिया गया कि मोदी उसी सीट से लोकसभा में चुने गए हैं, और अपनी संसदीय सीट पर चुनाव प्रचार किसी भी सांसद की जिम्मेदारी रहती है, फिर चाहे वह सांसद प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। इस जीत के मायने भाजपा के भीतर लोग निकालें या न निकालें, इस शिकस्त के मायने हारने वाली तीनों पार्टियों की जरूर निकालने चाहिए, जो कि हर मौका रहते हुए भी इस कदर हारी हैं कि मानो मोदी ही मुख्यमंत्री बनने जा रहे। मजे की बात यह है कि भाजपा ने तो उत्तरप्रदेश के लिए अपने मुख्यमंत्री का एक चेहरा तक सामने नहीं रखा था। 1991 की राम लहर में भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिली थीं जितनी कि अभी मोदी लहर में मिली हैं।
पंजाब में दस बरस की सत्ता के बाद बादल बाप-बेटे जैसी दुर्गति के साथ खारिज किए गए हैं, उससे भाजपा के लिए भी अगले लोकसभा चुनाव को लेकर एक खतरा खड़ा होता है। अकालियों से भाजपा की पुरानी भागीदारी है, और अकाली सरकार इन बरसों में भ्रष्टाचार, कुनबापरस्ती, नशे के धंधे के आरोपों से इस कदर लदी हुई थी, कि वह भाजपा के लिए एक बोझ बनी हुई दिख भी रही थी। पंजाब की इस भागीदारी को महाराष्ट्र की शिवसेना के साथ भाजपा की भागीदारी के संदर्भ में देखें, तो भाजपा के लिए ये दो बड़े गठबंधन राज्य अगले लोकसभा चुनाव में एक नई चुनौती पेश करेंगे। फिलहाल उत्तरप्रदेश से उड़ी गुलाल से पूरे देश के भाजपाई खुश हैं, और खुशी का उनका हक बनता भी है। लेकिन मोदी को लेकर एक यह बात गौर करने लायक है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी से परे भाजपा और संघ परिवार के पास क्या कोई विकल्प मौजूद है? या भाजपा मोदी के करिश्मे पर उसी तरह चल रही है जिस तरह व्यक्तिवादी कांग्रेस पार्टी इंदिरा के कंधों पर सवार होकर चलती थी। यह एक और बात है कि मोदी की निजी पसंद, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तरप्रदेश के चुनावी मोर्चे को मौके पर जाकर सम्हाला था, और वहां पार्टी का नफा-नुकसान जो भी होता, उसे शाह के नाम पर भी जड़ा जाता, इसलिए वे भी जीत की वाहवाही हकदार भी हैं।
मोदी ने अपने सारे आलोचकों के एक और हमले को कम से कम चुनावी मोर्चे पर गलत साबित कर दिया है। कुछ महीने पहले की नोटबंदी से ऐसा माना जा रहा था कि गरीबों की जिंदगी और कमाई तबाह हो गई है, और भाजपा को चुनाव में इसका भुगतान करना पड़ेगा। नोटबंदी के बाद ओडिशा के पंचायत चुनाव में सबसे गरीब तबका वोटर था, फिर महाराष्ट्र के म्युनिसिपल चुनावों में गरीबों से लेकर फिल्मी सितारों तक सब लोग वोटर थे, इन दोनों में भाजपा की तगड़ी जीत के बाद अब उत्तरप्रदेश की यह ऐतिहासिक जीत साबित कर रही है कि नोटबंदी की वजह से मोदी की वोटबंदी नहीं हुई।

राजनीति, चुनावी सर्वे, और मीडिया की भागीदारी

संपादकीय
10 मार्च 2017


पांच राज्यों में हुए चुनावों पर करीब आधा दर्जन एक्जिट पोल हुए, और उनके आंकड़े कल शाम से हवा में तैर रहे हैं। इनमें से अधिकतर का रूख अधिकतर राज्यों में एक सरीखा दिख रहा है, और गिनती जरूर कम-ज्यादा हो सकती है, लेकिन सारे के सारे एक्जिट पोल एक साथ मैनेज करके आज कोई क्या हासिल कर सकते हैं? इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि मतदान के पहले आयोजित और प्रायोजित सर्वे की तरह एक्जिट पोल बिके हुए और बेईमान शायद न हों, यह एक अलग बात है कि वे गलत हो सकते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार और मतदान खत्म होने के बाद मतदाताओं को टटोलकर निकाली गईं इन अटकलों से कल और आज मीडिया का काम और चल निकला। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यह बेबसी रहती है कि गलाकाट मुकाबले के बीच उसे आधे-एक घंटे के लंबे-लंबे बुलेटिन भरने रहते हैं, और ऐसे में इस तरह का कोई मुद्दा टीवी समाचार चैनलों के हाथ लग जाए, तो एक पुरानी कहावत याद आने लगती है कि गिलहरी के हाथ नीम लगा, तो हकीम बन बैठी।
देश के बहुत से लोगों के बीच अभी ऐसी सोच सामने आती है कि मीडिया थोक में बिका हुआ है। फिर काफी लोगों में ऐसी चर्चा दिखती है कि मीडिया डरा हुआ है। हमें जो दिखता है वह यह है कि आपस के मुकाबले में दहशत से भरा हुआ मीडिया कहीं जिंदा रहने के लिए अपनी तथाकथित आत्मा को बेचने की कोशिश करता है, और चुनाव-मतदान के पहले मतदाताओं को धोखा देने के काम में लग भी जाता है। लेकिन अब जब मतदान हो चुके हैं, तो मीडिया के ग्राहक भी कोई राजनीतिक दल शायद ही हों, हालांकि असल राजनीति को जानने वाले लोगों का यह भी मानना है कि नतीजे आने के पहले संभावित खरीद-बिक्री, और संभावित जोड़तोड़ को ध्यान में रखते हुए खरीदे हुए मीडिया का इस्तेमाल जारी भी हो सकता है। जैसे उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती के बीच एक-दूसरे से परहेज न होने के जो आसार सामने आए, तो उसे देखते हुए मीडिया के एक तबके ने स्वघोषित राष्ट्रीय दलाल अमर सिंह को तेजी से पेश करना शुरू कर दिया कि मायावती तो मुलायम को जेल भेजने के लिए सुप्रीम कोर्ट गई हुई हैं, और मायावती के साथ अखिलेश के लोगों ने कैसी फूहड़ बदतमीजी की हुई है। और अगर मीडिया का बिका हुआ हिस्सा ऐसी राजनीतिक साजिशों में मतदान के बाद भी अभी जुटा हुआ होगा, तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।
राजनीति और मीडिया को लेकर जब लोगों को एक साथ सामूहिक निराशा होती है, तो उसका एक ही मतलब होता है कि इन दोनों से लोगों को किसी आदर्श की उम्मीद होगी। दरअसल ये दोनों ही खुले कारोबार हैं, और इन्हें बाजार के किसी भी दूसरे प्रोडक्ट की तरह ही देखना चाहिए, न उससे अधिक इज्जत देनी चाहिए, न उससे अधिक उम्मीद रखनी चाहिए, और ऐसा करने पर निराशा भी नहीं होगी। हमने राडिया टेप के समय से यह सुना हुआ है कि किस तरह करोड़ों रूपए साल का मेहनताना पाने वाले पांच सितारा मीडियाकर्मी खुली दलाली में लगे रहते हैं, और उनमें से किसी का भी अधिक कुछ नहीं बिगड़ा, उस पूरी साजिश का भांडाफोड़ हो जाने के बाद भी। इसलिए राजनीति और मीडिया को एक ही गिरोह के दो बंदूकबाज मानकर चलना ठीक है, और चुनावों के नतीजे इस नजरिए से ही देखने चाहिए कि इस गिरोह का कैसा असर जनता पर हो पाया है।

एक-एक कर लोकतांत्रिक संस्थाओं में गिरावट के खतरे

संपादकीय
9 मार्च 2017


साल 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में अभी सुप्रीम कोर्ट का ताजा रूख यह है कि लालकृष्ण अडवानी, उमा भारती, कल्याण सिंह जैसे बड़े नेताओं पर मुकदमा आगे चले। अभी यह मामला उत्तरप्रदेश की जिला अदालत से लेकर, लखनऊ हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट के बीच फुटबॉल की तरह लात मार-मारकर इधर से उधर फेंका जा रहा है। और इसके जिम्मेदार लोगों में से एक ने भी एक दिन की भी सजा नहीं भुगती है। आजाद भारत के इस सबसे बड़े जुर्म में से एक, जिसकी वजह से बाद में हजारों मौतों की वजह भी बनी, उसकी सुनवाई आगे कैसे बढ़े यही तय नहीं हो पा रहा है, तो इससे भारत की न्याय व्यवस्था का एक अंदाज लगता है कि ताकतवर लोगों के खिलाफ, भावनात्मक मुद्दों पर, सत्ता से जुड़े हुए मामलों पर अदालतें किस तरह अपनी कलम बचाते हुए बैठ जाती हैं। एक तरफ तो अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद तय करने में किसी भी अदालत की दिलचस्पी नहीं दिखती, दूसरी तरफ उस वक्त की राज्य की कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद गिराने की साजिश में जैसी सक्रिय हिस्सेदारी निभाई थी, उसके बावजूद अब तक कोई भी नेता सजा के कई बरस दूर भी नहीं दिख रहे। इसके बाद तो उमा भारती मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री बनती रहीं, कल्याण सिंह मंत्री और राज्यपाल बनते रहे, लालकृष्ण अडवानी देश के दो नंबर के सबसे बड़े मंत्री रहे, और बाकी भी कई लोग सत्ता का सुख भोगते रहे। इसके बाद अब जाकर कोई सजा होगी भी तो उसका क्या मतलब निकलेगा।
भारत की अदालतें बड़े मामलों में बड़ा छोटा हौसला दिखाती हैं, या कि बड़े वकीलों के सामने जजों में झिझक पैदा हो जाती है। नए मुख्य न्यायाधीश ने अभी दो -चार दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वाले वकीलों को कहा कि बड़े-बड़े वकील भी कतार में ही आएं, और अपने पैसे वाले मुवक्किलों के लिए बारी से पहले सुनवाई न मांगें। जाहिर है कि अब तक यह सिलसिला चल रहा है कि अदालतें बहुत बड़े वकीलों की बातों को सुनने के लिए आनन-फानन तैयार हो जाती हैं, और जब सुनवाई होती है, तो ऐसे वकीलों को अधिक वक्त भी मिल जाता है। नतीजा यह होता है कि जिन ताकतवर लोगों को अदालत का ध्यान खींचना होता है, वे लोग बड़े से बड़ा वकील करते हैं, और उसका असर वकीलों के कद जितना ही पड़ता है। इसकी एक ताजा मिसाल सुब्रत राय सहारा का मामला है जिनसे सुप्रीम कोर्ट हजारों करोड़ रूपए जमा करवाना चाह रहा है, और सहारा की जमानत आगे बढ़वाने के लिए देश के बड़े-बड़े वकील खड़े होकर अदालत का इतना वक्त खर्च करवाते हैं जितना कि किसी फांसी के फैसले पर भी न लगता हो। सहारा की जमानत एक दिन आगे बढ़ाने के लिए, अदालत के कई मिनट खर्च करवा दिए जाते हैं।
यही वजह है कि भारत की न्याय व्यवस्था पर बहुत से लोगों का भरोसा नहीं रहता है, और लोग अदालत के बाहर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, या बाहुबल की अनौपचारिक अदालतों पर भरोसा करने लगते हैं, जमीन या मकान को खाली करवाने के लिए सुपारी देने लगते हैं। देश के लोगों का पुलिस पर से, सरकार और अदालतों पर से भरोसा खत्म होना फिक्र की बात है। नेताओं पर से भरोसा बहुत हद तक पहले ही खत्म हो चुका है, और बाकी लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख में बड़ी गिरावट आई है, जिसमें मीडिया भी शामिल है। और इसमें छुपा हुआ एक बड़ा खतरा यह है कि जब लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा हटता है, तो लोकतंत्र के नाम पर, लोकतंत्र की निरंतरता के लिए होने वाले चुनाव में वोट डालते हुए भी लोग जिम्मेदारी से काम नहीं लेते। प्रचलित भाषा में लोगों को लगता है कि जब नागनाथ या सांपनाथ में से किसी एक को चुनना है, तो फिर वोट क्यों डाला जाए, या फिर किसी को भी क्यों न डाल दिया जाए। एक-एक करके सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख में गिरावट एक बड़ा नुकसान है जो कि जलती हुई आग की तरह सामने दिख तो नहीं रहा है, लेकिन गलत लोगों की चुनावी जीत उसका एक सुबूत है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आरक्षण पर कुछ चर्चा हो जाए

संपादकीय
8 मार्च 2017


आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दुनिया भर में महिलाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जा रही हैं, और भारत भी इसमें पीछे नहीं है। ट्विटर पर माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लिखा है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए। इस बात से याद पड़ता है कि इस देश में महिला आरक्षण की चर्चा भी अब साल में एक दिन भी यह अकेली पार्टी कर रही है, और खुद महिलाएं इस मुद्दे को भूल सी गई हैं, या कि समाज ने उन्हें भूलने को मजबूर कर दिया है। जो भी हो हम इस मुद्दे को इसलिए बार-बार उठाते हैं कि यह हमें देश में लैंगिक समानता का एक पैमाना दिखता है कि यह समाज महिलाओं को उनका हक देना चाहता है या नहीं।
मजे की बात यह है कि पूरे देश में पंचायतों और म्युनिसिपलों में वार्ड और पंच-सरपंच से लेकर महापौर तक के लिए महिला आरक्षण लागू है, और इनमें से हर जगह जाति के आधार पर आरक्षित तबकों में भी महिलाएं मिल जाती हैं, जीतकर आती हैं, और धीरे-धीरे स्थानीय शासन का काम सीख और सम्हाल रही हैं। जब एक विधानसभा सीट के भीतर ऐसी सैकड़ों महिलाएं छोटे-छोटे वार्ड में भी मिल जाती हैं, तो फिर पूरे विधानसभा सीट में एक महिला क्यों नहीं मिलेगी जो कि विधायक बनने के लायक हो? इसी तरह एक लोकसभा सीट में औसतन सात-आठ विधायक होते हैं, और इनके बीच से सांसद बनने लायक एक महिला नहीं मिल पाएगी, यह सोचना एक बहुत ही पुरूषवादी हिंसक सोच का नतीजा है।
आज दिक्कत यह है कि भारत की राजनीति में जिन पार्टियों की मुखिया महिलाएं हैं, उनके भीतर भी महिला आरक्षण को लेकर कोई हसरत नहीं दिखती। सोनिया गांधी से लेकर मायावती, ममता बैनर्जी, और अब शशिकला तक कई महिलाएं बड़ी-बड़ी पार्टियों की मुखिया हैं, लेकिन संसद के भीतर महिला आरक्षण का नाम भी कोई नहीं लेतीं। जब तक यह तस्वीर नहीं बदलेगी, भारतीय राजनीति से बेइंसाफी खत्म नहीं होगी। इसी किस्म की एक दूसरी बेइंसाफी एक दूसरे आरक्षण से जुड़ी हुई है, और इसे लेकर भी हम बार-बार लिखते हैं। जातिगत आरक्षण के कोटे के भीतर के मलाईदार तबके को जब तक आरक्षण की पात्रता से हटाया नहीं जाएगा, तब तक उन तबकों के गरीब और कमजोर, आरक्षण के सचमुच के हकदार लोगों को मौका नहीं मिल पाएगा। जब दलित या आदिवासी, या ओबीसी के छात्र-छात्रा या बेरोजगार नौजवान किसी कुर्सी को पाने की कोशिश करते हैं, तो उनका मुकाबला अपने ही तबके के उन लोगों से होता है जिनके मां-बाप बड़े-बड़े सरकारी या राजनीतिक ओहदों पर रहते आए हैं, और वे आर्थिक और सामाजिक ताकत से इतने मजबूत हैं कि किसी मुकाबले की उनकी तैयारी के सामने गरीब दलित-आदिवासी के ठहरने की संभावना खत्म सी हो जाती है। लेकिन क्रीमीलेयर को हटाने के इस मुद्दे को सत्ता पर काबिज तबकों ने इसलिए बड़ी सहूलियत से भुला दिया है क्योंकि अगर इनको आरक्षण के फायदों से हटाया जाएगा, तो सारे सांसद-विधायक, अफसर-जज, संपन्न लोग अपने बच्चों के लिए आरक्षण का फायदा खो बैठेंगे। इसलिए जिन सांसदों-विधायकों और अफसरों को क्रीमीलेयर हटाने के न्यायसंगत कारण बताने हैं, वे सारे के सारे अपने निजी हित में इसके खिलाफ हैं। यह सैद्धांतिक रूप से एक बहुत बड़ा हितों का टकराव है, और पता नहीं सुप्रीम कोर्ट में कोई जाकर इसे साबित क्यों नहीं कर पा रहे।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय महिला आरक्षण दिवस पर सूझे इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए, और इन दोनों किस्म के आरक्षण पर अलग-अलग मंचों पर लोगों को खुद ही बात करके ऐसा जनमत बनाना चाहिए कि महिला आरक्षण भी लागू हो, और क्रीमीलेयर के लोग आरक्षण के फायदों से बाहर भी हों। हमको सीपीएम के 33 फीसदी के सुझाव पर हैरानी होती है कि कम से कम वामपंथियों को तो महिलाओं को आधा हक दिलाने की वकालत करनी चाहिए थी।

छत्तीसगढ़ में स्मार्टफोन के ऐसे विस्तार के साथ आने वाली चुनौतियां

संपादकीय
7 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ सरकार के कल के बजट में सबसे आसानी से समझ और नजर आने वाली बात पैंतालीस लाख लोगों को स्मार्टफोन और इंटरनेट तक पहुंच देने की है। पैंतालीस लाख इस छोटे राज्य के लिए एक बड़ी गिनती है, और सवा दो करोड़ की आबादी में गरीबी की रेखा के नीचे के हर परिवार को फोन और नेट मिल जाएगा। सरकार का यह कहना है कि उसकी बहुत सारी योजनाएं, और बहुत सी सहूलियतें इंटरनेट के रास्ते आसानी से पहुंची जा सकती हैं।
आज हालांकि फोन और इंटरनेट बहुत बड़ी बात नहीं हैं, लेकिन फिर भी इस देश में एक डिजिटल-डिवाइड चले आ रहा है जिसे पाटने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के इस एक काम से हो सकता है कि गरीबों की पहुंच एक स्मार्टफोन और उससे जुड़ी हुई सुविधाओं तक हो जाए, और उसका काम आसान हो। साथ ही हम कम्प्यूटर या इंटरनेट को कोई तिलस्मी ताबीज मानने से इंकार करते हैं कि यह औजार अपने आपमें कोई करिश्मा कर सकता है। आज जब सरकार के लिए सबसे अधिक कमाई करने वाले रजिस्ट्री ऑफिस और आरटीओ ऑफिस में टैक्स जमा करने का काम भी कम्प्यूटर और सर्वर की खामी से कई-कई दिन ठप्प रहता है, तो सरकारी रियायत देने के काम में इनके ठीक रहने की क्या गारंटी हो सकती है? और फिर सरकार इस बात पर आत्मसंतुष्ट हो सकती है कि उसने अधिक से अधिक सुविधाओं को ऑनलाईन कर दिया है, और हकीकत में ये काम न करें।
लेकिन हम छत्तीसगढ़ सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की संभावनाओं को नहीं नकारते हुए इससे जुड़ी तीन बातों को याद दिलाना चाहते हैं। पहली बात यह कि डिजिटल ट्रेनिंग के बिना ऐसे औजार लोगों के काम के नहीं रहेंगे। दूसरी बात यह कि डिजिटल या साइबर निगरानी के बिना साइबर-जुर्म बढ़ते चले जाएंगे, लोग लुटते चले जाएंगे, और लुटेरे भाग जाने के बाद सरकार देखती रह जाएगी। तीसरी बात यह कि डिजिटल-जुर्म सामने आने पर भी क्या यह छत्तीसगढ़ सरकार किसी साइबर-जांच की क्षमता रखती है? आज की हकीकत तो यह है कि पिछले कई बरसों में प्रदेश का पहला साइबर-थाना ही सरकार नहीं खोल पाई है, और उसकी आज की जांच की ताकत दस-बीस बरस पुराने मोबाइल फोन तक सीमित है। किसी नई टेक्नॉलॉजी के साथ यह सरकार नहीं चल पा रही, और पुलिस मुख्यालय और मंत्रालय के बीच साइबर-मंजूरी की फाईलें मानो घोंघे की पीठ पर बंधी हुई चल रही हैं।
अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ में एक ऐसी ठगी हुई है जिसमें किसी ने फोन करके आधार कार्ड नंबर पूछा, और उससे खाते से 63 हजार रुपये निकाल लिए। केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक आधार कार्ड को अनिवार्य करने के लिए दीवानगी की रफ्तार से जुटी हुई हैं। लेकिन आधार कार्ड से जुड़ी हुई अनगिनत जानकारियों की हिफाजत कैसे होगी, यह आज केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं समझा पा रही है। दूसरी तरफ पूरे देश में लगातार लोगों के बैंक खातों से ठगी चल रही है, और ऐसे जुर्म के खिलाफ आम तो आम, खासे पढ़े-लिखे लोगों में भी कोई चौकन्नापन नहीं है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ के हर साक्षर-अनपढ़ हाथ में एक मोबाइल फोन होगा, और उससे उसके हक की बहुत सी सहूलियतें, और रियायतें जुड़ी रहेंगी, उसकी मजदूरी या उसका बैंक खाता उससे जुड़ा रहेगा, उसे मोबाइल बैंकिंग की तरफ धकेला जाएगा, तो फिर उसके सामने खड़े खतरों से बचाव का जिम्मा भी छत्तीसगढ़ सरकार का ही होगा।
इसलिए लोगों को डिजिटल कामकाज में सावधानी सिखाने की पहली जरूरत है, और दूसरी जरूरत सरकार के अपने एक ऐसे खुफिया ढांचे की है जो कि फोन, नेट, और कम्प्यूटर से होने वाले जुर्म पर नजर रख सके। तीसरी, लेकिन शायद आखिरी नहीं, जरूरत यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार फोन या नेट से होने वाले अपराध की तुरंत जांच करने की अपनी क्षमता विकसित करे। हमारा मानना है कि आज सरकार ने पैंतालीस लाख स्मार्टफोन-इंटरनेट कनेक्शन के लिए जो बजट रखा है, उसका ही एक हिस्सा इन तीन क्षमताओं को विकसित करने के लिए रखना चाहिए, क्योंकि प्रदेश के पुलिस विभाग और राज्य शासन के बीच कई बरसों में मिलकर भी एक साइबर-थाना खड़ा करने की सहमति नहीं जुट पाई है। सरकार को किसी भी बड़ी योजना के साथ-साथ ऐसी सावधानी के पहलुओं को अनिवार्य रूप से जोड़ लेना चाहिए क्योंकि प्रदेश में सिर्फ पैंतालीस लाख औजार नहीं बढऩे वाले हैं, ठगों और जालसाजों के लिए पैंतालीस लाख संभावनाएं भी बढऩे वाली हैं।