शराबबंदी के वायदों और बातों को करते-करते राज्य सरकार बन गई शराब-कारोबारी!

संपादकीय
1 मार्च 2017


छत्तीसगढ़ मेेंं दारू सिर चढ़कर बोल रही है। आमतौर पर तो पीने वाले लोगों पर ही ऐसा असर होता है, लेकिन अभी इस धंधे के सरकारीकरण की वजह से बहस छिड़ गई है कि सरकार को दारू का कारोबार करना चाहिए, या नहीं? खुद भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में शराबबंदी का वायदा था, और हर बरस शराब की खपत या उससे कमाई बढ़ती ही जा रही है। अब सरकार ने खुद बिक्री करना तय किया है, और भाजपा, संघ परिवार के बाकी संगठन, और जनता के बहुत से लोग इस फैसले से हक्का-बक्का हैं कि शराबबंदी करने चली सरकार यह क्या कर रही है? भाजपा के बहुत से लोगों को यह आशंका है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी के खिलाफ यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहेगा, और हो सकता है कि सबसे बड़ा मुद्दा यही रहेगा। दूसरी तरफ आरएसएस के छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख नेता ने खुलकर इसका विरोध किया है, और भाजपा के सांसद-विधायक भी इस फैसले से परेशान हैं, इसलिए भी कि बदनामी से कैसे निपटेंगे, और इसलिए भी कि अगले चुनाव में बांटने के लिए दारू कौन देगा?
भाजपा के देश के सबसे बड़े नेता, और गुजरात में लगातार मुख्यमंत्री रह चुके, लगातार राज्य को जीतने वाले नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, और हाल ही में उन्होंने अपनी आमसभाओं में बिहार में अपने धुर-विरोधी नीतीश कुमार की लगाई हुई शराबबंदी की तारीफ भी की है। ऐसे में भाजपा के बाकी राज्यों से यह उम्मीद की जाती थी कि वे दारूबंदी के बारे में सोचेंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार खुद ठेकेदार बन गई है, और लोगों का अंदाज है कि इससे पार्टी फंड में अगले दो बरस में हजार-दो हजार करोड़ रूपए तो जुट जाएंगे, लेकिन इज्जत चली जाएगी। आज प्रदेश में आबकारी मंत्री सहित सत्ता के कुछ लोगों ने यह रूख बना लिया है कि सरकार के इस फैसले का जो लोग विरोध कर रहे हैं, वे सारे के सारे अब बेरोजगार हो रहे शराब कारोबारियों के दलाल हैं, या उनके भोंपू की तरह काम कर रहे हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में सत्ता पर बैठे लोग चारों तरफ से दारू-कारोबारियों से घिरे हुए हैं, और रमन सरकार के शायद शुरू से ही अमर अग्रवाल लगभग लगातार आबकारी मंत्री भी बने हुए हैं।
हम इस बहस में पडऩा नहीं चाहते कि दारू कौन बेचे, ठेकेदार बेचे, या सरकार बेचे। इससे फर्क महज इतना पड़ेगा कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार की जेब में जाएगा, या कि सत्ता में बैठे हुए नेता-अफसर की जेब में जाएगा। सरकार की जायज और घोषित कमाई तो तकरीबन वैसी ही बनी रहेगी। इस मौके पर हमको इस बात को लेकर हैरानी होती है कि अगले विधानसभा चुनाव के दो बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार कारोबार का यह नया प्रयोग करने जा रही है, और उस वक्त कर रही है जब उससे शराबबंदी की उम्मीद की जाती थी। बिहार के मुख्यमंत्री ने यह बार-बार कहा है कि शराब से होने वाली कमाई से सरकार की जेब जितनी भरती है, उससे अधिक खाली हो जाती है, जब उसे शराब से लोगों पर पडऩे वाले बुरे असर से निपटना पड़ता है। लोगों की सेहत खराब होती है, और घरेलू अर्थव्यवस्था चौपट होती है। पता नहीं क्यों छत्तीसगढ़ सरकार यह हिम्मत नहीं जुटा पाई कि अगर दारू ठेकेदारों की मनमानी को खत्म करना है, तो वह शराबबंदी का फैसला लेती, मनमानी करने वाले ठेकेदार एक बार में बेरोजगार भी हो जाते, और जनता भी इससे आजाद होती, और गरीबों के घर बर्बाद होने से बचते।
आज छत्तीसगढ़ में कोई हफ्ता ऐसा नहीं गुजरता जब दारू पीने वाले लोग परिवार के भीतर बलात्कार या हत्या न करते हों। और यह पारिवारिक हिंसा तो बड़ी वारदात होने के बाद ही खबरों में आती है, लोग जानते हैं कि शराब परिवार को किस तरह बर्बाद करती है। आज ही रायपुर के एक प्रमुख अखबार में बस्तर की एक तस्वीर छपी है जिसमें तीन बहुत ही छोटे बच्चे अपनी झोपड़ी में कुछ पका रहे हैं, क्योंकि मां मर चुकी है, और बाप दारू पीकर कहीं पड़े रहता है। ऐसे में ये बच्चे गांव के लोगों से मांगकर कुछ लाते हैं, और पका लेते हैं। इस अकेली तस्वीर को देखें तो समझ आता है कि शराबबंदी क्यों होनी चाहिए। लेकिन शराबबंदी करने के बजाय सरकार जिस तरह युद्धस्तर पर शराब कारोबारी बन रही है, वह प्रचलित भारतीय संस्कृति के हिसाब से अनैतिक काम भी लगता है, और सरकार का एक कमजोर फैसला भी लगता है कि अगर गांव-गांव में बिकने वाली अवैध शराब की वजह से होती बर्बादी को सरकार रोकना चाहती थी, तो उसे इस धंधे को ही बंद करना था, बजाय इस धंधे में उतरने के। शराबबंदी के सिवाय इस सरकार के पास अगले विधानसभा चुनाव तक और कोई रास्ता भी नहीं बचेगा, लेकिन विपक्ष की इस मांग को मानने में सरकार अगर समय बर्बाद करती रहेगी, तो शराबबंदी के फैसले का अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा तो नहीं होगा, बल्कि इस कारोबार के शर्तिया और अनिवार्य भ्रष्टाचार की कालिख जरूर इस सरकार पर लग जाएगी। हमको नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ की सत्तारूढ़ पार्टी को अगला चुनाव लडऩे के लिए दारू की अवैध कमाई की जरूरत पडऩे वाली थी, ऐसे में शराबबंदी के बजाय शराब के धंधे का फैसला इस सरकार के लिए नुकसानदेह है, और जनता के लिए तो जितना नुकसानदेह था, उतना ही नुकसानदेह बने रहेगा। छत्तीसगढ़ सरकार इस मोर्चे पर अपनी जनकल्याणकारी जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पाई है, और यह निराश करने वाली बात है।

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