राजनीति, चुनावी सर्वे, और मीडिया की भागीदारी

संपादकीय
10 मार्च 2017


पांच राज्यों में हुए चुनावों पर करीब आधा दर्जन एक्जिट पोल हुए, और उनके आंकड़े कल शाम से हवा में तैर रहे हैं। इनमें से अधिकतर का रूख अधिकतर राज्यों में एक सरीखा दिख रहा है, और गिनती जरूर कम-ज्यादा हो सकती है, लेकिन सारे के सारे एक्जिट पोल एक साथ मैनेज करके आज कोई क्या हासिल कर सकते हैं? इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि मतदान के पहले आयोजित और प्रायोजित सर्वे की तरह एक्जिट पोल बिके हुए और बेईमान शायद न हों, यह एक अलग बात है कि वे गलत हो सकते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार और मतदान खत्म होने के बाद मतदाताओं को टटोलकर निकाली गईं इन अटकलों से कल और आज मीडिया का काम और चल निकला। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यह बेबसी रहती है कि गलाकाट मुकाबले के बीच उसे आधे-एक घंटे के लंबे-लंबे बुलेटिन भरने रहते हैं, और ऐसे में इस तरह का कोई मुद्दा टीवी समाचार चैनलों के हाथ लग जाए, तो एक पुरानी कहावत याद आने लगती है कि गिलहरी के हाथ नीम लगा, तो हकीम बन बैठी।
देश के बहुत से लोगों के बीच अभी ऐसी सोच सामने आती है कि मीडिया थोक में बिका हुआ है। फिर काफी लोगों में ऐसी चर्चा दिखती है कि मीडिया डरा हुआ है। हमें जो दिखता है वह यह है कि आपस के मुकाबले में दहशत से भरा हुआ मीडिया कहीं जिंदा रहने के लिए अपनी तथाकथित आत्मा को बेचने की कोशिश करता है, और चुनाव-मतदान के पहले मतदाताओं को धोखा देने के काम में लग भी जाता है। लेकिन अब जब मतदान हो चुके हैं, तो मीडिया के ग्राहक भी कोई राजनीतिक दल शायद ही हों, हालांकि असल राजनीति को जानने वाले लोगों का यह भी मानना है कि नतीजे आने के पहले संभावित खरीद-बिक्री, और संभावित जोड़तोड़ को ध्यान में रखते हुए खरीदे हुए मीडिया का इस्तेमाल जारी भी हो सकता है। जैसे उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती के बीच एक-दूसरे से परहेज न होने के जो आसार सामने आए, तो उसे देखते हुए मीडिया के एक तबके ने स्वघोषित राष्ट्रीय दलाल अमर सिंह को तेजी से पेश करना शुरू कर दिया कि मायावती तो मुलायम को जेल भेजने के लिए सुप्रीम कोर्ट गई हुई हैं, और मायावती के साथ अखिलेश के लोगों ने कैसी फूहड़ बदतमीजी की हुई है। और अगर मीडिया का बिका हुआ हिस्सा ऐसी राजनीतिक साजिशों में मतदान के बाद भी अभी जुटा हुआ होगा, तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।
राजनीति और मीडिया को लेकर जब लोगों को एक साथ सामूहिक निराशा होती है, तो उसका एक ही मतलब होता है कि इन दोनों से लोगों को किसी आदर्श की उम्मीद होगी। दरअसल ये दोनों ही खुले कारोबार हैं, और इन्हें बाजार के किसी भी दूसरे प्रोडक्ट की तरह ही देखना चाहिए, न उससे अधिक इज्जत देनी चाहिए, न उससे अधिक उम्मीद रखनी चाहिए, और ऐसा करने पर निराशा भी नहीं होगी। हमने राडिया टेप के समय से यह सुना हुआ है कि किस तरह करोड़ों रूपए साल का मेहनताना पाने वाले पांच सितारा मीडियाकर्मी खुली दलाली में लगे रहते हैं, और उनमें से किसी का भी अधिक कुछ नहीं बिगड़ा, उस पूरी साजिश का भांडाफोड़ हो जाने के बाद भी। इसलिए राजनीति और मीडिया को एक ही गिरोह के दो बंदूकबाज मानकर चलना ठीक है, और चुनावों के नतीजे इस नजरिए से ही देखने चाहिए कि इस गिरोह का कैसा असर जनता पर हो पाया है।

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