उप्र में मोदी की ट्रिपल सेंचुरी ! कई दलों को आत्ममंथन मिला

संपादकीय
11 मार्च 2017


पांच राज्यों के चुनावी नतीजे अकेले उत्तरप्रदेश से लदे हुए दिख रहे हैं, क्योंकि देश का यह सबसे बड़ा राज्य मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अधिक सांसद भेजने वाला भी था, और इस राज्य में प्रदेश के किसी भाजपा नेता की साख दांव पर नहीं लगी थी, अकेले नरेन्द्र मोदी के सिर पर ठीकरा रखा हुआ था। लेकिन जो नतीजे आए हैं, वे शायद लोकसभा के चुनावी नतीजों की तरह भाजपा की भी उम्मीद से भी बेहतर हैं, और अभी तक के आंकड़े बता रहे हैं कि उत्तरप्रदेश की 403 सीटों में से भाजपा, अपने दो छोटे सहयोगी दलों के साथ गठबंधन से 300 से अधिक पर जीत की ओर है। देश के एक भी एक्जिट पोल सर्वे ने इस तरह की अटकल नहीं बताई थी, और यह जीत अकेले नरेन्द्र मोदी की जीत कही जाएगी, क्योंकि हार होने पर उन्हीं पर ठीकरा फोड़ा जाता।
लेकिन एक पल के लिए इन पांच राज्यों पर एक नजर डालना ठीक होगा क्योंकि राज्य छोटे हों, या बड़े हों, भारत के संघीय ढांचे में यह तो गिनाता ही है कि कितने राज्यों में किस पार्टी या गठबंधन की सरकारें हैं। इस हिसाब से अगर देखें, तो कांग्रेस पार्टी का हाल बहुत बुरा नहीं दिख रहा है, क्योंकि उसने दस बरस बाद न सिर्फ अकाली दल-भाजपा गठबंधन से राज्य की सत्ता से छीन ली है, बल्कि उसने आम आदमी पार्टी के सरकार बनाने के दावे को भी खारिज करवा दिया है। गोवा और मणिपुर में इस पल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों की खींचतान चल रही है, और कुछ समय बाद तस्वीर साफ होगी। लगे हाथों पांचवें राज्य उत्तराखंड की चर्चा जरूरी है जहां पर कांग्रेस की बुरी शिकस्त हो रही है, और भाजपा की सरकार बन रही है।
अब पूरा खाताबही एक साथ देखें तो लगता है कि भाजपा गोवा में राज्य खोए या न खोए, वोट तो खो ही रही है, पंजाब में अपने बड़े भागीदार अकाली दल के साथ सत्ता से बाहर हो रही है, लेकिन वह उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, और मणिपुर भी हासिल कर सकती है। लेकिन इन पांचों राज्यों को मिला लें, तो अकेले उत्तरप्रदेश की 403 सीटें, बाकी चार राज्यों की कुल मिलाकर 287 सीटों के मुकाबले न सिर्फ गिनती में बहुत अधिक हैं, बल्कि वोटरों की गिनती के हिसाब से भी उत्तरप्रदेश के वोटर बाकी चारों राज्यों के वोटरों से बहुत अधिक है। इसलिए नरेन्द्र मोदी की इज्जत दांव पर देखने वाले उत्तरप्रदेश की यह जीत आकार में बहुत ही विशाल है, और जिस तरह की कमजोर और बुरी हार समाजवादी पार्टी, बसपा, और कांग्रेस की हुई है, वह हार इन पार्टियों के तात्कालिक भविष्य के लिए बहुत विकराल भी है। ऐसी ही बुरी हार पंजाब में अकाली बाप-बेटे को नसीब हुई है जो कि दस बरस से सत्ता को डेयरी की मशीन बनकर इतना दुह रहे थे कि राज्य के थनों से खून भी निकल आ रहा था। और अगर यहां पर आम आदमी पार्टी की चर्चा शुरू करके खत्म कर ली जाए, तो वह यह है कि इस पल के आंकड़े उसे पंजाब में अकाली-भाजपा से बड़ा विपक्षी दल बनते दिखा रहे हैं, और यह आप की सरकार बनने के अलावा दूसरी सबसे अच्छी नौबत दिख रही है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के पांव इस चुनाव में बड़ी अच्छी तरह जमते दिख रहे हैं, और दिल्ली प्रदेश के बाद यह पार्टी पंजाब में एक तीसरी ताकत बनती दिख रही है।
उत्तरप्रदेश के चुनाव विश्लेषणों में बहुत सी बातें कही जा रही हैं। इनमें एक बात तो यह कि  समाजवादी पार्टी में बाप-बेटे का झगड़ा उसे भारी पड़ा। मुलायम सिंह प्रचार को नहीं निकले, और इस वजह से सपा की यह दुर्गत हुई। लेकिन दूसरी तरफ कल तक के विश्लेषण यह भी कहते थे कि मुलायम सिंह ने खुद होकर हाशिए पर जाकर बेटे के लिए खुला मैदान छोड़ा, और इससे एक नौजवान खून को खुलकर काम करने का मौका भी मिलेगा। सपा की राजनीति के भीतर-बाहर के लोग यह भी कहते थे कि बेटे की छवि निखारने के लिए बाप ने यह नौटंकी की थी, और इस बहाने उसने पार्टी के भीतर के सारे अखिलेश-विरोधियों की शिनाख्त करवाकर उन्हें बाहर भी करवा दिया था। तीसरी बात यह कही जा रही थी कि अखिलेश और राहुल गांधी मिलकर एक नौजवान चेहरा, साफ-सुथरा चेहरा पेश कर रहे हैं, और इससे इनको फायदा होगा। खुद अखिलेश कांग्रेस से गठबंधन के पहले से यह कहते आए थे कि कांग्रेस के साथ मिलकर लडऩे पर 300 से अधिक सीटें मिलेंगी। आज हालत यह है कि यह गठबंधन पौन सौ सीटें भी नहीं पा रहा। इसलिए उत्तरप्रदेश में भाजपा की, या बेहतर होगा कहना कि, मोदी की इस ऐतिहासिक जीत को न तो सत्ता के खिलाफ जनता की नाराजगी कहा जा सकता, न ही मीडिया को खरीदकर चुनाव जीतना कहा जा सकता, न ही मुस्लिम आतंकियों की खबरों से यह चुनाव जीता गया, न ही यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से हासिल जीत है, और न ही मायावती की मदद से भाजपा को 300 से अधिक सीटें मिलीं। भाजपा की उत्तरप्रदेश की जीत एक बिल्कुल खालिस और विर्विवाद जीत है, जिसे कि ऊपर की तमाम तरकीबों से भी नहीं पाया जा सकता था। बनारस में मोदी के तीन-चार दिन लगातार काम प्रचार करने को लेकर बहुत से कार्टून बने, लेकिन आलोचना में इस बात को अनदेखा कर दिया गया कि मोदी उसी सीट से लोकसभा में चुने गए हैं, और अपनी संसदीय सीट पर चुनाव प्रचार किसी भी सांसद की जिम्मेदारी रहती है, फिर चाहे वह सांसद प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। इस जीत के मायने भाजपा के भीतर लोग निकालें या न निकालें, इस शिकस्त के मायने हारने वाली तीनों पार्टियों की जरूर निकालने चाहिए, जो कि हर मौका रहते हुए भी इस कदर हारी हैं कि मानो मोदी ही मुख्यमंत्री बनने जा रहे। मजे की बात यह है कि भाजपा ने तो उत्तरप्रदेश के लिए अपने मुख्यमंत्री का एक चेहरा तक सामने नहीं रखा था। 1991 की राम लहर में भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिली थीं जितनी कि अभी मोदी लहर में मिली हैं।
पंजाब में दस बरस की सत्ता के बाद बादल बाप-बेटे जैसी दुर्गति के साथ खारिज किए गए हैं, उससे भाजपा के लिए भी अगले लोकसभा चुनाव को लेकर एक खतरा खड़ा होता है। अकालियों से भाजपा की पुरानी भागीदारी है, और अकाली सरकार इन बरसों में भ्रष्टाचार, कुनबापरस्ती, नशे के धंधे के आरोपों से इस कदर लदी हुई थी, कि वह भाजपा के लिए एक बोझ बनी हुई दिख भी रही थी। पंजाब की इस भागीदारी को महाराष्ट्र की शिवसेना के साथ भाजपा की भागीदारी के संदर्भ में देखें, तो भाजपा के लिए ये दो बड़े गठबंधन राज्य अगले लोकसभा चुनाव में एक नई चुनौती पेश करेंगे। फिलहाल उत्तरप्रदेश से उड़ी गुलाल से पूरे देश के भाजपाई खुश हैं, और खुशी का उनका हक बनता भी है। लेकिन मोदी को लेकर एक यह बात गौर करने लायक है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी से परे भाजपा और संघ परिवार के पास क्या कोई विकल्प मौजूद है? या भाजपा मोदी के करिश्मे पर उसी तरह चल रही है जिस तरह व्यक्तिवादी कांग्रेस पार्टी इंदिरा के कंधों पर सवार होकर चलती थी। यह एक और बात है कि मोदी की निजी पसंद, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तरप्रदेश के चुनावी मोर्चे को मौके पर जाकर सम्हाला था, और वहां पार्टी का नफा-नुकसान जो भी होता, उसे शाह के नाम पर भी जड़ा जाता, इसलिए वे भी जीत की वाहवाही हकदार भी हैं।
मोदी ने अपने सारे आलोचकों के एक और हमले को कम से कम चुनावी मोर्चे पर गलत साबित कर दिया है। कुछ महीने पहले की नोटबंदी से ऐसा माना जा रहा था कि गरीबों की जिंदगी और कमाई तबाह हो गई है, और भाजपा को चुनाव में इसका भुगतान करना पड़ेगा। नोटबंदी के बाद ओडिशा के पंचायत चुनाव में सबसे गरीब तबका वोटर था, फिर महाराष्ट्र के म्युनिसिपल चुनावों में गरीबों से लेकर फिल्मी सितारों तक सब लोग वोटर थे, इन दोनों में भाजपा की तगड़ी जीत के बाद अब उत्तरप्रदेश की यह ऐतिहासिक जीत साबित कर रही है कि नोटबंदी की वजह से मोदी की वोटबंदी नहीं हुई।

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