कांग्रेस का राहुलमुक्त होना आज उसके जिंदा बचने की पहली शर्त

संपादकीय
12 मार्च 2017


कल आए विधानसभा चुनाव नतीजों को लेकर मोदी की सुनामी जैसी बातें लगातार कही और लिखी जा रही हैं। लेकिन तारीफ की इस सुनामी में राहुल गांधी के हिस्से अभी महज लतीफे आ रहे हैं। इस हफ्ते इन पांचों राज्यों में नई सरकारें बन जाएंगी, और उसके बाद दिल्ली में हर कोई थकान को कुछ हद तक दूर करने के हकदार हो जाएंगे, लेकिन इस वक्त देश में सबसे अधिक आत्ममंथन की जरूरत अगर किसी को है, तो वह कांग्रेस पार्टी को है। कांग्रेस के साथ-साथ इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के मौजूदा ताजा और नौजवान मुखिया अखिलेश यादव भी फिलहाल डूबकर राज्य की राजनीति की तलहटी में पहुंच गए हैं, लेकिन उनके पास 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले साबित करने को कुछ नहीं है, उत्तरप्रदेश के बाहर उनकी साख कहीं और दांव पर नहीं लगी है। मायावती भी मोटेतौर पर उत्तरप्रदेश में हाशिए पर किनारे हो चुकी हैं, और बाकी कहीं उनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसा नहीं है। पूरे देश में बिखरी हुई यह पार्टी आज भी भाजपा के सामने सबसे विस्तृत अस्तित्व वाली पार्टी है, और इसे अपने भविष्य के बारे में सबसे अधिक सोचने की जरूरत है। राजनीति में राख के ढेर से निकलकर बहुत से नेता और बहुत सी पार्टियां इतिहास बनाते आए हैं, इसलिए कांग्रेस को आज हाथ डालकर बैठ जाने की जरूरत नहीं है, अपनी खामियों और खूबियों के बारे में सोचकर आगे काम करने की जरूरत है, और जैसा कि कल जम्मू-कश्मीर के उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि लोगों को 2019 के आम चुनाव में मोदी को शिकस्त देने की नहीं सोचनी चाहिए, 2024 के चुनाव के हिसाब से तैयारी करनी चाहिए। लोगों को यह भी याद होगा कि समय-समय पर भारत की क्रिकेट टीम को भी कुछ बरसों के लिए सन्यास ले लेने की सलाह दी जाती थी, और अभी एक या दो ओलंपिक पहले तक भारत को ओलंपिक से कुछ वक्त के लिए सन्यास लेने की सलाह दी गई थी, और उस नौबत से उबरकर भारत के खिलाडिय़ों ने आसमान पर पहुंचकर दिखा भी दिया है।
अब कांग्रेस की अगर बात करें, तो उसके मर्ज की शिनाख्त अधिक मुश्किल भी नहीं है। जिस राहुल गांधी को कांग्रेस अपना वर्तमान और अपना भविष्य बनाकर चल रही है, वे आज कांग्रेस के लिए रेस का घोड़ा न होकर बाधा दौड़ का बैरियर हो गए हैं। साफ-साफ कहें तो भाजपा इस देश को कांग्रेसमुक्त करने के अपने नारे को तकरीबन कामयाब करते दिख रही है, और अगर कांग्रेस पार्टी ने अपने आपको राहुलमुक्त नहीं किया, तो देश कांग्रेसमुक्त हो जाना तय दिख रहा है। एक आध्यात्मिक संगठन अपने किसी मनचाहे गुरू के मातहत पूरी जिंदगी चला सकता है, कोई धर्म अपने ईश्वर या अपने गुरू के तहत अनंतकाल तक चल सकता है। लेकिन जब बात मुकाबले की होती है, जब दूसरी पार्टियों के मुकाबले चुनाव लड़ा जाता है, नेताओं के मुकाबले दूसरे नेताओं की तस्वीरें टीवी के पर्दों पर दिखती हैं, अखबारों में छपती हैं, तो फिर ऐसी तुलना में अपने कुलदेवी या कुलदेवता के प्रति आस्था जनता के गले नहीं उतारी जा सकती। इसलिए कांग्रेस के नेता अपने घर के भीतर चाहे जिसकी पूजा करें, अगर उन्हें असल राजनीति में किसी लीडर के पीछे चलकर सत्ता तक पहुंचना है, तो उन्हें अपना लीडर ऐसा छांटना होगा जो आज की चुनावी राजनीति में विरोधियों या प्रतिद्वंदियों के मुकाबले कहीं टिक सके।
कांग्रेस की आज दिक्कत यह है कि मोदी हो या कोई और, कांग्रेस के पास दिखाने को महज राहुल गांधी का चेहरा है, और यह चेहरा जनधारणा के मुताबिक बहुत ही मामूली समझ वाला चेहरा है। लोग राहुल गांधी को इतने बरसों की कांग्रेसी-मेहनत के बावजूद गंभीरता से नहीं ले पाए हैं, क्योंकि राहुल में लीडरशिप की खूबियां सिरे से ही नहीं उपज पाई हैं, नहीं पनप पाई हैं। राहुल गांधी की अगुवाई में 2019 या 2024 में भी कांग्रेस पार्टी कभी सत्ता तक पहुंच पाएगी, ऐसा कोई संकेत आज नहीं मिलता। कांग्रेस के इतिहास में इतनी कमजोर लीडरशिप कभी याद नहीं पड़ती, और जब देश की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी थी, तो उसके प्रधानमंत्री अघोषित रूप से पार्टी के मुखिया भी रहते थे, और वैसे में कुछ अरसे के लिए सीताराम केसरी जैसे बेअसर नेता भी खप गए थे। लेकिन अब वक्त अलग है, और आज की चुनावी राजनीति में नरेन्द्र मोदी जैसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कामयाब नेता के मुकाबले राहुल गांधी तब तक महज एक लतीफा बने रहेंगे, जब तक कोई तिलस्मी ताबीज या तो उन्हें लीडर न बना दे, या फिर कोई भयानक भूल मोदी को नायक से खलनायक न बना दे। इन दो में से कोई एक बात जब तक न हो जाए, तब तक मोदी के मुकाबले राहुल का कोई भविष्य नहीं है, और अपने आपमें भी कांग्रेस पार्टी का राहुल के मातहत कोई भविष्य बचा है।
जिंदगी में ऐसे बहुत से मौके आते हैं जब लोगों को अपना निजी त्याग करके अपने संगठन को, अपने कारोबार को, अपने परिवार को, अपने समाज को बचाने का काम करना पड़ता है। क्रिकेट जैसे खेल में कई बार खिलाड़ी खुद होकर सन्यास ले लेते हैं, क्योंकि उनके कमजोर खेल से उनकी टीम का रिकॉर्ड बर्बाद होने लगता है। आज जाहिर है कि राहुल गांधी के पास मशविरा देने के लिए कोई हौसलेमंद सलाहकार बचे नहीं हैं, वरना उन्हें यह सुझाया गया होता कि अब उन्हें अपने पुरखों की इस पार्टी को जिंदा रखने के लिए इसकी लीडरशिप छोड़ देनी चाहिए, और पार्टी का एक कार्यकर्ता बनकर काम करना चाहिए, और यह घोषणा करनी चाहिए कि वे अपनी पार्टी, या पार्टी की सरकार में कोई भी ओहदा नहीं लेंगे। हम यह नहीं मानते कि सौ से अधिक बरस पुरानी इस विशाल पार्टी में अपने किसी नेता में संभावनाएं तलाशने की ताकत नहीं है। लेकिन जब तक नेहरू-गांधी कुनबे का यह बोझ इस पार्टी पर लदा रहेगा, तब तक यह अपनी संभावनाओं से कोसों दूर रहेगी। भारतीय जनता पार्टी के आगे बढऩे की सबसे बड़ी वजह यही रही कि वह कुनबापरस्ती से आजाद रही, और इसकी लीडरशिप कभी किसी कुनबे के कब्जे में नहीं रही। नया खून आते रहा, लोगों को पार्टी के भीतर अपनी संभावनाएं दिखती रहीं, और इसलिए लोग काम करते रहे। किसी धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन में इस तरह का काम नहीं होता, वहां पर कीर्तन में एक सुरताल में सिर हिलाना जरूर होता है, लेकिन ऐसी नौबत में राजनीतिक पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती। एक कुनबे या एक व्यक्ति के कब्जे की पार्टियों का हाल अखिलेश, माया, और बादल बाप-बेटे की शक्ल में इस बार भी सामने आया है। दूसरी तरफ कुनबे से परे के मोदी की एक बड़ी ताकत यह भी है कि वे कुनबे के बोझ से आजाद हैं।
देश का कांग्रेसमुक्त होना लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात नहीं होगी, क्योंकि इस पार्टी की सोच में आज भी राष्ट्रीय स्तर की, राष्ट्र के हित की, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की कुछ-कुछ बातें बाकी हैं, कायम हैं, लेकिन कांग्रेस का राहुलमुक्त होना आज उसके जिंदा बचने की पहली शर्त दिख रही है।

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