राजनीतिक कीर्तन या निंदा से परे आत्ममंथन की जरूरत

संपादकीय
15 मार्च 2017


भारत में राजनीति और बाकी तमाम किस्म के सार्वजनिक मुद्दों पर अब गंभीर लिखे हुए की जरूरत, और उसका वजन, दोनों ही घट गए हैं। अब सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोग चटपटे, पैने, तेजाबी, और झूठे पोस्ट करके अपनी पढऩे और लिखने की जरूरत को पूरा कर लेते हैं। ऐसे में किसी मुद्दे पर गंभीर विश्लेषण धरे रह जाता है, और लोग जिस तरह पहले टीवी चैनलों में समाचारों की सुर्खियों से प्रभावित होते थे, उसी तरह आज वॉट्सऐप या ट्विटर-फेसबुक की पोस्ट से प्रभावित हो जाते हैं, और मुद्दे की बात धरी रह जाती है। अभी पांच राज्यों के चुनावी नतीजों को देखते हुए कुछ ऐसा ही चल रहा है कि ऐसे नतीजों के पीछे जो वजहें हैं, उन पर बात होने के बजाय मोदी-भक्तों और मोदी-विरोधियों के बीच अपनी भावनाओं की बहस चल रही है, और दिमाग को मोटे तौर पर अलग रख दिया गया है।
चार बिल्कुल अलग-अलग किस्म के पांच राज्यों के चुनावी नतीजों को देखते हुए आज अगर मोदी का मूल्यांकन हो, या राहुल को आंका जाए, या माया-अखिलेश का भविष्य सोचा जाए, तो यह सब बहुत जटिल है। लेकिन जब 140 अक्षरों के ट्वीट पर विश्लेषण कर दिया जाता है, तो लोग अतिसरलीकरण के शिकार हो जाते हैं। और आज यही हो भी रहा है। मोदी की उत्तरप्रदेश में इस ऐतिहासिक जीत को जो लोग वोटिंग मशीन का घपला मानकर चल रहे हैं, वे लोग अपने आपको धोखा दे रहे हैं। अगर मोदी या किसी के भी हाथ में मशीनों से छेड़छाड़ की ताकत होती, तो पंजाब में अकाली-भाजपा आज फुटपाथ पर क्यों बैठे होते? और गोवा या मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा क्यों खो चुके होते? पांचों राज्यों में एक ही तरह की ईवीएम मशीनें इस्तेमाल हुई हैं, और अगर कोई जालसाजी मुमकिन थी, तो भाजपा पंजाब को क्यों खोती? लेकिन राजनीति में अपने ही पहले के किए हुए का भुगतान आगे चलकर अक्सर करना पड़ता है, और भाजपा के भीतर सुब्रमण्यम स्वामी से लेकर नरसिम्हा राव तक कई लोग लगातार ईवीएम के खतरे गिनाते आए थे, और चुनाव विश्लेषक से भाजपाई नेता बने नरसिम्हा राव ने तो इस पर एक किताब भी लिखी थी, इसलिए जो सत्ता में रहेगी, उस पार्टी को ऐसी तोहमत तो झेलनी पड़ेगी।
लेकिन आज कांग्रेस, सपा, बसपा, और आम आदमी पार्टी के खुद के हित में यह है कि वे बैठकर अपने घर को सम्हालने के लिए आत्मचिंतन करें, आत्ममंथन करें, और अपनी कमियों से उबरने की कोशिश करें। हमारा यह मानना है कि इन पांचों राज्यों में, हारने वालों के साथ-साथ, सरकार बनाने वाली बीजेपी के लिए भी समझने और सीखने का बहुत कुछ है, और चुनाव के बाद जीत-हार से परे पार्टियों को अनिवार्य रूप से यह काम करना चाहिए, अगर उन्हें चुनावी राजनीति से बाहर नहीं होना है तो। हम सपा, कांग्रेस, बसपा, या केजरीवाल की संभावनाओं को खारिज नहीं करते। इस देश में पिछली चौथाई सदी में ही भाजपा लोकसभा की अपनी दो सीटों से बढ़ते हुए आज ऐतिहासिक बहुमत तक पहुंची है, और अब हाल यह है कि उसके विरोधी भी कई बरस बाद के लोकसभा चुनाव में मोदी को विजेता मान रहे हैं। ऐसी स्थिति मोदी और भाजपा के लिए एक अलग तरह की चुनौती हो सकती है, लेकिन हारी पार्टियों को न सिर्फ अपनी खामियों को समझना है, बल्कि उनसे उबरना भी है, वरना वे जो शून्य छोड़ेंगे, उसे भरने के लिए मोदी और उनके साथी तैयार खड़े हैं। यही हाल 2014 के आम चुनावों में हुआ था जब यूपीए के दलों ने मतदाताओं के सामने एक बड़ा शून्य छोड़ा था, और मोदी एक अंधड़ की रफ्तार से उस शून्य को भरने के लिए पहुंच गए थे। आज भी भाजपा और खासकर नरेन्द्र मोदी ऐसी क्षमता साबित कर चुके हैं कि देश की चुनावी राजनीति में जहां भी जो पार्टी शून्य छोड़ेगी, उसे भरने की ताकत कमल छाप में है। भाजपा का देश के नक्शे पर ऐसा विस्तार अभूतपूर्व है, और भाजपा के समर्थक बहुत गलत नहीं है, जब वे कई सौ बरस पहले के एक मराठा शासनकाल के भगवा रंग के नक्शे को आज के नक्शे में भाजपा राज्यों के साथ रखकर देख रहे हैं। मोदी बाकी तमाम पार्टियों के लिए, खुद अपने गठबंधन के साथियों के लिए भी, एक अभूतपूर्व किस्म की अनोखी राजनीतिक चुनौती हैं, और मोदी की खूबियों का अध्ययन किए बिना, उसकी काट निकाले बिना, उनको परास्त करना आज मुमकिन नहीं है, 2019 के लोकसभा चुनाव में भी शायद नहीं रहेगा।

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