लोकतंत्र के भीतर गुंजाइश है लोकतंत्र पर हमले की...

संपादकीय
16 मार्च 2017


अभी योरप के हॉलैंड में चुनाव हो रहे हैं, तो वहां पर एक घोर दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री-प्रत्याशी ने मुस्लिमों के खिलाफ कुछ उसी तरह का हमलावर अभियान छेड़ा है जैसा कि ट्रंप ने अपने चुनाव में अमरीका में छेड़ा था। अब यह चल ही रहा था कि वहां पहुंचे हुए तुर्की के शरणार्थियों के बीच प्रचार करने के लिए तुर्की के एक मंत्री पहुंच गए जिन्हें देश में दाखिला नहीं मिला, और विमानतल से ही बाहर रवाना कर दिया गया। ऐसा ही अभी जर्मनी में वहां जगह पाए हुए लाखों तुर्क शरणार्थियों के लिए हो रहा है जहां कि तुर्की के एक मंत्री पहुंचकर प्रचार कर रहे हैं। ऐसी कुछ अलग-अलग मिसालें योरप के अलग-अलग देशों में सामने आ रही हैं जहां पर कहीं मुस्लिम धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों पर रोक लगाई जा रही है, तो कहीं शरणार्थियों को जगह देने या न देने के मुद्दे पर देश यूरोपीय यूनियन छोड़ रहे हैं या छोडऩे की घोषणा कर रहे हैं। इन तमाम बातों पर खुलासे से यहां चर्चा मुमकिन नहीं है, लेकिन इन सबसे लोकतंत्र की एक बुनियादी सोच को लेकर कुछ बुनियादी सवाल खड़े हो रहे हैं।
दुनिया में इंसान लाखों-बरसों से हैं, धर्म कुछ हजार बरसों से हैं, और लोकतंत्र कुछ सौ बरसों से है। यह लोकतंत्र भी दुनिया के अलग-अलग देशों में धीरे-धीरे लोकतांत्रिक हो पाया है, और इसके साथ-साथ लोगों की धार्मिक आजादी, लोगों की सामाजिक आजादी, और दुनिया के देशों के एक-दूसरे के प्रति सामाजिक सरोकार धीरे-धीरे विकसित हुए। आज योरप में जिस तरह शरणार्थियों को लेकर कई देश तनाव से गुजर रहे हैं, उनके सामने भारत की एक मिसाल रखने की जरूरत है कि इस देश ने किस तरह तिब्बत के लोगों को शरण दी, बांग्लादेश के लोगों को शरण दी, और अब म्यांमार के लोगों को शरण दे रहा है। ऐसा नहीं कि भारत में संस्कृतियों के टकराव की नौबत नहीं आ सकती थी, लेकिन भारत के इतिहास के कुछ महान नेता जनता पर इतना प्रभाव रखते थे कि उनके शरण के फैसले को भी लोगों ने अपनी तकलीफ के बावजूद देश और दुनिया के हित का माना था। जब बांग्लादेश के शरणार्थियों को भारत में जगह दी गई, तो उस खर्च को उठाने के लिए सिनेमा टिकटों पर शरणार्थी-टैक्स लगाया गया था, और छत्तीसगढ़ ऐसे टैक्स का भी गवाह रहा, और यहां बसाए गए दसियों हजार शरणार्थियों को छत्तीसगढ़ी मान लेने की दरियादिली इस प्रदेश ने दिखाई थी। छत्तीसगढ़ के मैनपाट में तिब्बती शरणार्थी भी बसे हुए हैं, और उनको लेकर भी कोई तनाव नहीं हुआ।
लेकिन आज योरप में जिस तरह से बड़ी संख्या में सीरिया और दूसरे मुस्लिम देशों से मुस्लिम शरणार्थी पहुंचे हैं, उन्हें लेकर योरप के देश एक सांस्कृतिक तनाव से भी गुजर रहे हैं, और वहां की जनता भी इतने शरणार्थियों को वहां देखकर अपनी हिफाजत के लिए फिक्रमंद हो गई है। ऐसे में जगह-जगह नस्लवादी, धार्मिक भेदभाव करने वाली, और शरणार्थियों के साथ उदारता का विरोध करने वाली पार्टियों को सिर बिठाने का मौका मिल रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अमरीकी मतदाताओं के एक तबके के बीच ट्रंप को इन्हीं मुद्दों से समर्थन मिला था। अब यहां गौर करने की बात यह है कि लोकतंत्र के भीतर अलोकतांत्रिक सोच को भी जगह पाने और पनपने की गुंजाइश मिलती है। लोकतंत्र इतनी लचीली व्यवस्था है कि यह अपने पर हमला करने वाले लोगों को भी बहुत दूर तक और बहुत देर तक बर्दाश्त करता है। भारत में ही हम देखते हैं कि किस तरह जो नक्सली लगातार लोकतंत्र को खत्म करने का बीड़ा उठाए हिंसा कर रहे हैं, उन्हें भी लोकतंत्र बर्दाश्त करता है, और एकमुश्त नहीं कुचलता है।
दुनिया में कई वजहों से लोकतंत्र अलग-अलग जगहों पर तनाव से गुजर रहा है। कई लोगों को यह लग रहा है कि लोकतंत्र एक अच्छी व्यवस्था नहीं है, और इसके तहत मिलने वाली रियायतों को खत्म किया जाना चाहिए, या कि कम किया जाना चाहिए। यह पूरा दौर लोकतंत्र की उदारता के करवट बदलने का चल रहा है, और भारत भी इस दौर से अनछुआ नहीं है। भारत में भी धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता को हथियार बनाकर चलने वाले लोग अब किसी शर्मिंदगी के शिकार नहीं दिखते। आने वाला दौर पूरी दुनिया में एक दिलचस्प, और खतरनाक इतिहास दर्ज करते दिख रहा है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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