चेन्नई में सड़क पर मौत से सबक लेना जरूरी

संपादकीय
18 मार्च 2017


तमिलनाडू के चेन्नई से एक ऐसी खबर आई है जो तकलीफ देने वाली तो है ही लेकिन उससे कुछ सबक लेने की भी जरूरत है। एक पेशेवर कार रेस चालक अश्विन सुंदर अपनी पत्नी के साथ कार से जा रहे थे, और पेड़ से टकराकर कार जलकर राख हो गई, और दोनों की मौत हो गई। यह वैसे तो महज एक दुर्घटना है, लेकिन इससे यह समझ पड़ता है कि ऐसे माहिर कार चालक से भी एक्सीडेंट हो सकता है, और इतना बुरा हो सकता है।
हिन्दुस्तान दुनिया में सबसे अधिक सड़क हादसों वाला देश है, और यहां पर कई वजहों से इस नौबत को सुधारने की जरूरत है। इस देश में हर जगह कुछ हिस्सों में सड़कें 21वीं सदी की बन गई हैं, और उन्हीं के आसपास की दूसरी सड़कें पिछली सदी में चल रही हैं। बहुत सी गाडिय़ां, बैलगाडिय़ां, खच्चर गाडिय़ां, हाथधक्के के ठेले, ये सब सौ बरस से भी पहले से चल रहे हैं, और इन्हीं के बीच दूसरे देशों में बनकर जहाज पर लदकर आने वाली बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं जो कि सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हैं। पच्चीस-पचास लाख दाम की मोटरसाइकिलें हैं जो कि पलक झपकते आंखों से ओझिल हो सकती हैं, और दूसरी तरफ सड़क के ट्रैफिक नियमों के लिए हिन्दुस्तानियों के मन में एक आम हिकारत है। ऐसे में सड़कें तो गोली की रफ्तार से भागती गाडिय़ां देखती हैं, लेकिन उन पर पैदल और साइकिल पर चलने वाले ऐसे लोग भी हैं जो कि उस रफ्तार के बीच सड़क पार भी नहीं कर पाते।
एक युग से दूसरे युग में ट्रैफिक को ले जाने का यह दौर अगले कुछ दशकों तक इसी तरह मिलाजुला चलते रहेगा, और इस बीच सड़कों पर जिंदगियों को बचाना एक बड़ी चुनौती है। सड़क हादसे बहुत से तो ऐसे रहते हैं जो कि टाले जा सकते हैं, और इसी बात पर मेहनत करने की जरूरत है। लोग दुपहिया चलाते हुए हेलमेट लगाने को तैयार नहीं होते, जबकि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में हर दिन एक से अधिक लोग दुपहिया-सड़क हादसे के शिकार होकर जान खो बैठते हैं। शराब पीकर गाडिय़ां चलाते हुए लोग खुद भी मरते हैं, और दूसरों को भी मारते हैं। सीट बेल्ट की लागत गाडिय़ों के दाम में जुड़कर आती है, लेकिन लोग इस सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते, और दुर्घटना में बचने की संभावना पहले ही खो बैठते हैं।
भारत सरकार देश में सड़क हादसों की नौबत से परेशान भी है, और अभी एक ऐसे बीमे का इंतजाम किया जा रहा है जिसमें सड़क पर दुर्घटना-मौत होने पर दस लाख रूपए का मुआवजा मिल सके। लेकिन रूपयों से जिंदगी नहीं लौटती, और सरकार के साथ-साथ समाज और परिवार को भी यह जिम्मा उठाना चाहिए कि अपने लोगों पर हेलमेट और सीट बेल्ट के लिए जोर डालें, रफ्तार काबू में रखने कहें, और नशे में गाड़ी न चलाने दें। इतनी ही बातों पर जोर डाल दिया जाएगा, तो शायद तीन चौथाई दुर्घटना-मौतें टल जाएंगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि सड़कों पर लापरवाह लोग न केवल अपनी जिंदगी खोते हैं, बल्कि उन बेकसूर लोगों की जिंदगी भी ले लेते हैं जो कि नियमों का पालन करके चलते हैं।
ट्रैफिक पर काबू रखना राज्य सरकारों का जिम्मा है, और हम देखते हैं कि छत्तीसगढ़ में भी कभी-कभी हवा के झोंके की तरह सरकार को ट्रैफिक  नियम लागू करने की सूझती है, और फिर बात आई-गई हो जाती है। जो बच्चे अपने मां-बाप को लापरवाह ड्राइविंग करते देखते हैं, वे वैसा ही सीखते भी हैं। इसलिए सरकार को तेजी से ट्रैफिक सुधारना चाहिए, और उसका असर आने वाली पीढ़ी पर तुरंत होने भी लगेगा। 

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