नफरतजीवी मुख्यमंत्री लोकतंत्र हक्का-बक्का

संपादकीय
19 मार्च 2017


देश के सबसे बड़े राज्य और देश में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश में कल भाजपा ने योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री के लिए तय करके देश की जनता के बीच एक बड़ा असमंजस खड़ा कर दिया है। ऐसा भी नहीं कि यह नाम कहीं से आयातित है, और इस पर कोई चर्चा ही नहीं थी, लेकिन किसी ने यह गंभीरता से सोचा नहीं था कि योगी मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं। लेकिन अब यह हकीकत सामने आई है, तो जनता को यह हैरानी है कि मोदी का विकास का नारा क्या हुआ?
सबका साथ और सबका विकास, यह नारा भाजपा चुनाव के पहले से लगाते आ रही है, लेकिन उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के प्रति उसका रूख पहले से ही साफ था जब 403 सीटों में से किसी एक सीट पर भी उसने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। और अब ऐसा लगता है कि यह चुनाव जीतने के लिए बिल्कुल सोची-समझी एक योजना थी जिसमें धर्म और जाति के समीकरणों के आधार पर मायावती की बसपा ने अनुपातहीन तरीके से अधिक से अधिक मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए, और समाजवादी पार्टी की बुनियाद खिसका दी। इसके बाद भाजपा का काम आसान था, और मोदी की लोकप्रियता जैसी बातें तो थीं ही। नतीजा यह है कि उत्तरप्रदेश में आबादी के 20 फीसदी से अधिक की मुस्लिम आबादी की भाजपा को कोई जरूरत नहीं रह गई है, और शायद यह भी एक वजह है कि आज खुलकर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया है जो कि मुस्लिमों से नफरत की बात करने की राजनीति ही करते आया है, और जिसकी साख गांव-गांव की मामूली बातों को लेकर साम्प्रदायिक दंगा खड़ा करने की है। उत्तरप्रदेश के अपने प्रभावक्षेत्र में आदित्यनाथ ने हिन्दू धर्म के नाम पर एक ऐसा आक्रामक संगठन खड़ा करके रखा है जो कि रात-दिन मुस्लिमों को मटियामेट करने का मुद्दा लेकर चलता है। ऐसी साख वाले आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना, ढाई बरस बाद के आम चुनाव में एक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका बताता है।
लोकतंत्र की सारी सोच, और भारतीय संविधान की शपथ आदित्यनाथ के नाम के आगे दम तोड़ देती हैं। उनके तौर-तरीकों और उनकी हिंसा के साथ किसी लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती, और यह देश के सबसे बड़े राज्य में एक सबसे बड़ा साम्प्रदायिक प्रयोग भी होते दिख रहा है। वे किस तरह सरकार चलाएंगे, यह अटकल लगाना अभी मुमकिन नहीं है लेकिन देश के अमन-पसंद लोग आज आशंकाओं से भरे हुए निराश बैठे हैं, और भाजपा ने बिना किसी मजबूरी के जब योगी को उस ओहदे के लिए चुना है, तो आने वाले कुछ बरस तक मोदी सरकार और उनकी भाजपा की सोच और रणनीति इससे साफ भी होती है। भाजपा में अब हिन्दू-साम्प्रदायिकता की साख वाले लोगों को कोई खतरा नहीं है, उनकी संभावनाएं हैं, और यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक फिक्र की बात है। उत्तरप्रदेश में भाजपा के सामने आदित्यनाथ से बेहतर नाम मौजूद थे, लेकिन इस नफरतजीवी नेता को ऐसा नाजुक राज्य दे देना लोकतंत्र को हक्का-बक्का करता है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें