अमिताभ की वसीयत, एक सीमित तारीफ की हकदार

संपादकीय
2 मार्च 2017


वैसे तो फिल्मी सितारों के बयानों को लेकर यह शक हमेशा ही रहता है कि वे अपनी कौन सी ताजा फिल्म को बढ़ावा देने के लिए वे कौन सी नौटंकी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी मशहूर लोगों की कही हुई बातों का लोगों पर असर तो होता ही है, और हम भी उन बातों की खबर बनाते हैं, और ऐसी ही एक खबर आज अमिताभ बच्चन ने मुहैया कराई है। उन्होंने एक तख्ती लेकर तस्वीर खिंचवाई है कि उनके मरने के बाद उनकी छोड़ी गई सम्पत्ति उनकी बेटी और बेटे के बीच बराबर बांट दी जाएगी क्योंकि वे लड़के-लड़की की समानता में भरोसा रखते हैं।
अब यह तो जाहिर है कि हिन्दुस्तान के सबसे व्यस्त फिल्मी सितारे, और देश के सबसे व्यस्त मॉडल भी रहते हुए अमिताभ ने हजारों करोड़ की जायदाद जुटाई होगी, और उनके बेटा-बेटी अपनी-अपनी हैसियत में भी खासे पैसे वाले होंगे, इसलिए अमिताभ की इतनी बड़ी विरासत के बंटवारे से भी बेटा-बेटी को अलग-अलग अरबों की दौलत मिलेगी, और बिना किसी खींचतान के इसमें सब लोग खुश रह सकते हैं। लेकिन फिर भी यह मानना गलत होगा कि खींचतान वहीं पर होती है जहां पर परिवार के लोगों के पास पैसों की कमी होती है, हम अपने इर्द-गिर्द भी अरबपतियों को देखते हैं कि किस तरह भाई-बहनों के बीच भी सांप-नेवले में मशहूर दुश्मनी के अंदाज में अदालती झगड़े चलते हैं, और पूरी-पूरी उम्र बंटवारे के मुकदमे में निकल जाती है। ऐसे में अमिताभ बच्चन ने आज अपनी अच्छी सेहत रहते हुए ही अपनी वसीयत कर दी, और बेटे-बेटी को बराबर का हक दिया, तो इससे देश में एक चर्चा तो होगी, और लोगों को यह लगेगा कि बेटी का हक भी कम नहीं होता है, या कम नहीं होना चाहिए।
इस पर हम चर्चा भी अमिताभ के लिए नहीं कर रहे, बल्कि बेटे और बेटी की बराबरी के लिए कर रहे हैं, जो कि हिन्दुस्तानी समाज में अधिकतर जगहों पर नहीं दिखती है। यहां की सांस्कृतिक बोलचाल में बेटी को बिदा करते हुए कह दिया जाता है कि डोली पर ससुराल जा रही है, अब वहां से अर्थी पर ही निकलना। मतलब यह रहता है कि बेटी के लिए मायके के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, और उसे बता दिया जाता है कि ससुराल में सुखी रहे या न रहे, अब वही उसका घर है। पुराने दकियानूसी खयालों के लोग यह कह सकते हैं कि ऐसी सोच के बाद लड़की अपनी ससुराल में बेहतर तरीके से सामंजस्य के साथ जीने की कोशिश करती है, और वह एक सफल वैवाहिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण बात होती है। लेकिन इस सोच के ठीक खिलाफ हकीकत यह रहती है कि ससुराल में ही जीने या मरने की एक बेबस सोच जब लड़की पर थोप दी जाती है, तो वह अपने बुनियादी मौलिक अधिकारों को भी  भूलकर तमाम किस्म की ज्यादतियों को बर्दाश्त करते हुए ससुराल में जिए और मरे। बहुत कम परिवार ऐसे रहते हैं जो कि अपनी बेटी को इस हौसले के साथ ससुराल भेजते हैं कि किसी जुल्म को बर्दाश्त करने की जरूरत नहीं है।
परिवारों में बेटे और बेटी के बीच जायदाद के बंटवारे के वक्त भारतीय समाज में जो बातें कही जाती हैं, उनमें से एक यह कि लड़की पराए घर चली जाती है, उसकी शादी पर अधिक खर्च करना होता है, दहेज देना पड़ता है, पूरी जिंदगी उसके ससुराल कुछ न कुछ भेजना होता है, और उसकी सारी उत्पादकता उसके ससुराल के ही काम आती है, इसलिए उसे शादी के बाद अपने पिता से और कुछ पाने का हक नहीं रहता। दूसरी तरफ बेटे के बारे में माना जाता है कि वह माता-पिता के साथ ही रहता है, और उनका घर-बार, कारोबार चलाता है, इसलिए पिता की सम्पत्ति पर उसी का हक रहना चाहिए। अमिताभ बच्चन ने आज जो चर्चा छेड़ी है, उससे हो सकता है कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर कोई फर्क न पड़े, और शायद पैसे वालों के बीच ही यह सुगबुगाहट रहे, लेकिन हमारा मानना है कि समाज में फेरबदल कई बार ऊपर से नीचे की तरफ आता है। इसलिए अधिक संपन्न लोग अगर कोई परंपरा शुरू करते हैं, तो धीरे-धीरे उनसे कम संपन्न तबके भी उसे मानने लगते हैं। अमिताभ बच्चन की इस घोषणा पर सारे समझदार लोगों को चर्चा आगे बढ़ानी चाहिए, और अपने-अपने दायरे में लोगों का हौसला बढ़ावा चाहिए कि वे सारा बंटवारा बेटे और बेटियोंं में बराबरी से करें। यह एक अलग बात है कि कमाने वाले लोगों को अपनी औलाद से परे भी कमाई को बांटने की सोच रखनी चाहिए, जैसा कि हिन्दुस्तान में टाटा उद्योग समूह करता है, या जैसा कि अमरीका में वारेन बफे और बिल गेट्स जैसे सैकड़ों खरबपति कर रहे हैं, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग कर रहे हैं, कि अपनी जायदाद का बड़ा हिस्सा समाज के लिए दे रहे हैं। अमिताभ बच्चन की वसीयत की समाज के लिए एक धेला भी नहीं दिख रहा है, उनको इसका हक तो है, लेकिन एक सामाजिक सरोकार के तहत वे इस हालत में भी थे कि हिन्दुस्तान के खरबपतियों के लिए एक मिसाल कायम कर जाते। लेकिन हमको मंदिरों से परे अमिताभ का कोई दान याद नहीं पड़ता, और अपने आखिरी दस्तावेज में भी उन्होंने सब कुछ महज बेटे और बेटी के लिए रखा है, इसलिए सामाजिक नजरिए से वे एक सीमित तारीफ के ही हकदार हैं, बेटे और बेटी को बराबर मानने के लिए। बाकी उनका सामाजिक सरोकार शून्य दिखाई पड़ता है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जमशेद जी टाटा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. लेख तो बढ़िया है लेकिन अगर आपने अमिताभ के विषय में लिखते हुए थोडा गूगल कर लिया होता तो पता चलता कि उन्होंने मंदिरों से इतर भी कई चैरिटी की हैं.ये एक दो लिंक है.
    जो पहली ही सर्च में मिले हैं. वैसे कहा जाता है वो अक्सर ये काम गुप्त रूप से करते हैं. इस मामले में उन्होंने दूसरा टॉपिक लिया था तो उसके विषय में बोला. बाकी लेख बढ़िया है. बस मंदिर वाला बिंदु तथ्यात्मक नहीं है.
    http://www.hindustantimes.com/tabloid/bachchan-s-charity-side/story-YJgC79hSNoGCJTQHbFb6AJ.html
    http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/amitabh-bachchan-requests-up-govt-to-donate-pension-for-charity/
    आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे.

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