सार्वजनिक पदों के लोग आस्था घर पर रखें

संपादकीय
20 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर एक बार फिर सरकारी पद पर किसी धर्म से जुड़े ऐसे व्यक्ति के बैठने का मुद्दा उठ रहा है जिसकी राजनीति धर्म के आधार पर चल रही हो। लेकिन यह ऐसा पहला मौका नहीं है। ठीक उन्हीं की तरह की भगवाधारी उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और लोगों को याद है कि किस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री-दफ्तर के अपने टेबिल पर ही मूर्तियों और मालाओं से मंदिर सा बना लिया था। दूसरी तरफ उत्तर-पूर्व में मिजोरम जैसे राज्य में लगभग सौ फीसदी ईसाई आबादी के चलते हुए सरकार पर चर्च का बेहद दबदबा हमेशा से दर्ज रहा है। पंजाब में अकाली दल सिख पंथ से जुड़ा हुआ है, और धार्मिक मामले वहां सरकारी कामकाज पर हमेशा से हावी रहे हैं। कुछ और संन्यासी या साध्वियां केंद्र और राज्यों में मंत्री रहते आए हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ में संत-कवि पवन दीवान भी शामिल थे।
भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोगों को सैद्धांतिक रूप से ऐसा होना चाहिए कि सभी धर्मों के लोगों की, और आस्तिकों को भी, ऐसे मंत्री-मुख्यमंत्री, ऐसे जज-अफसर पर भरोसा होना चाहिए। यह काम थोड़ा सा मुश्किल इसलिए है कि लोगों को किसी ओहदे पर रहते हुए भी अपनी धार्मिक या आध्यात्मिक आस्था को मानना जारी रखने की पूरी आजादी है, और इसके अलावा लोग जातियों के संगठन में भी सक्रिय रह लेते हैं। सरकारी दफ्तरों में लोग धर्म-आध्यात्म से जुड़ी हुई तस्वीरों को दीवारों पर और मेज के कांच के नीचे सजाकर रख लेते हैं, और अपनी गाडिय़ों में भी ऐसी तस्वीरें लगा लेते हैं। ऐसे बहुत से काम सरकारी खर्च पर भी होते हैं, और मध्यप्रदेश तो याद है कि उमा भारती ने मुख्यमंत्री निवास के अहाते में एक मंदिर भी बनवा लिया था।
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन में जनता के पैसों पर चलने वाले ऐसे ओहदों पर बैठे लोगों को अपनी आस्था घर पर रखनी चाहिए, और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र लचीला जरूर है, वह लोगों को कई तरह की छूट भी देता है, लेकिन नियमों से परे वह जिम्मेदारियों के कई तरह के तकाजे भी करता है, जिनके बिना लोकतंत्र, लोकतंत्र नहीं रह जाएगा। लोग महज अपने लिखित अधिकार का दावा करते रहें, और अपनी अलिखित जिम्मेदारी को मानने से इंकार करते रहें, या कतराते रहें, तो यह जनता के बीच अविश्वास पैदा करता है। अब हम नेहरू के जाने के आधी सदी बाद इस देश में नेहरू जैसे निरपेक्ष नेता की तो उम्मीद नहीं करते, क्योंकि ऐसे नेता तो खुद उनकी कांग्रेस पार्टी में भी नहीं रह गए हैं, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए। चारों तरफ अगर धर्मांधता का अंधेरा छा गया हो, तो भी लोकतंत्र की रौशनी की कोशिश खत्म नहीं करनी चाहिए। देश में यह चर्चा जरूर होनी चाहिए कि जनता की तनख्वाह पर बैठे लोग अपनी आस्था अपने घर पर रखें, और जनता के बीच एक भरोसा कायम रखें।

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